Tuesday, 26 May 2026

“तन्हाई के साथ मेरा रिश्ता” kavita

 “तन्हाई के साथ मेरा रिश्ता”


भीड़ में रहकर भी

कुछ लोग हमेशा अकेले रह जाते हैं…

चेहरे मुस्कुराते रहते हैं,

पर भीतर से धीरे-धीरे टूट जाते हैं…।


तन्हाई भी अजीब साथी है,

शोर में भी सुनाई देती है…

रात के सन्नाटों में

पुरानी यादों की चादर ओढ़े

चुपचाप पास बैठ जाती है…।


कभी माँ की याद बनकर,

कभी अधूरे सपनों की कसक बनकर,

तो कभी अपनों के बदले हुए व्यवहार बनकर

दिल को बहुत कुछ समझा जाती है…।


अब तो मैंने भी

तन्हाई से दोस्ती कर ली है…

क्योंकि हर कोई साथ निभाए,

ये ज़रूरी तो नहीं…।


कुछ दर्द ऐसे होते हैं

जो शब्दों में नहीं ढलते,

बस आँखों की नमी बनकर

खामोशी में बहते रहते हैं…।


और सच कहूँ…

तन्हाई इंसान को तोड़ती भी है

और खुद से मिलवाती भी है…।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

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