Saturday, 23 May 2026

बहुत घटिया होती है घरों की राजनीति

 बहुत घटिया होती है घरों की राजनीति…

घर…

एक ऐसा शब्द, जिसे सुनते ही मन में अपनापन, सुरक्षा, प्रेम और सुकून का एहसास होना चाहिए।

लेकिन जब उसी घर में राजनीति शुरू हो जाए, तो वही घर धीरे-धीरे इंसान की आत्मा को तोड़ने लगता है।

घर की राजनीति किसी संसद से कम नहीं होती।

बस फर्क इतना होता है कि वहाँ कुर्सियों के लिए लड़ाई होती है, और यहाँ रिश्तों के लिए।

कभी बहू-बेटी की तुलना,

कभी भाई-भाई के बीच दूरी,

कभी विरासत का लालच,

तो कभी किसी एक सदस्य को नीचा दिखाने की साजिश…

धीरे-धीरे घर का वातावरण ऐसा हो जाता है जहाँ लोग खुलकर हँसते नहीं, बल्कि संभलकर बोलते हैं।

हर शब्द तौला जाता है, हर व्यवहार पर नजर रखी जाती है।

कौन किसके साथ बैठा, किसने किसकी तारीफ कर दी, किसने किसकी बात काट दी…

इन छोटी-छोटी बातों से रिश्तों की दीवारों में दरार पड़ने लगती है।

सबसे दुखद बात यह है कि घर की राजनीति अक्सर उन लोगों द्वारा की जाती है, जो खुद को सबसे “अपना” कहते हैं।

चेहरे पर मिठास और भीतर ईर्ष्या…

सामने प्यार और पीछे कटाक्ष…

यही दोहरा व्यवहार रिश्तों को अंदर से खोखला कर देता है।

कुछ लोग घर में ऐसा माहौल बना देते हैं कि एक सदस्य हमेशा अपराधी जैसा महसूस करे।

उसकी हर बात गलत साबित की जाती है।

उसकी सफलता से जलन होती है और उसकी असफलता पर भीतर ही भीतर खुशी।

ऐसी राजनीति केवल रिश्ते नहीं तोड़ती, बल्कि इंसान का आत्मविश्वास भी छीन लेती है।

कई लोग बाहर की लड़ाइयों से नहीं, बल्कि घर के तानों और मानसिक दबाव से हार जाते हैं।

कभी-कभी घरों में पक्षपात भी राजनीति का सबसे बड़ा हथियार बन जाता है।

एक बच्चे को अधिक महत्व, दूसरे को उपेक्षा…

एक बहू को सम्मान, दूसरी को ताने…

एक की गलती पर चुप्पी, दूसरे की छोटी बात पर अपमान…

यही असमानता धीरे-धीरे मन में जहर घोलती है।

विडंबना यह है कि घर की राजनीति करने वाले लोग अक्सर यह भूल जाते हैं कि वे जिस रिश्ते को तोड़ रहे हैं, उसी रिश्ते के सहारे उन्हें जीवन के कठिन समय में खड़ा होना पड़ सकता है।

घर तब तक घर रहता है, जब तक वहाँ विश्वास जीवित रहता है।

जिस दिन विश्वास खत्म हो जाए, वहाँ केवल लोग साथ रहते हैं… दिल नहीं।

सच्चाई तो यह है कि रिश्ते राजनीति से नहीं, संवेदनाओं से चलते हैं।

जहाँ हर बात में चालाकी हो, वहाँ प्रेम टिक नहीं सकता।

जरूरत इस बात की है कि घर को युद्धभूमि नहीं, शरणस्थली बनाया जाए।

जहाँ कोई डरकर नहीं, अपनापन महसूस करके रहे।

जहाँ बातों से घाव नहीं, मरहम मिले।

जहाँ रिश्ते जीतने की नहीं, निभाने की कोशिश हो।

क्योंकि घर की राजनीति में कोई एक व्यक्ति नहीं हारता…

पूरा परिवार हार जाता है।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

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