शीर्षक: छोटी सी बात, बड़ा अंज़ाम
शाम का समय था। हल्की-हल्की हवा चल रही थी और मोहल्ले के बच्चे गली में खेल रहे थे। सब कुछ सामान्य था, जब तक कि एक छोटी-सी बात ने बड़ा रूप नहीं ले लिया।
रवि और अमित बचपन के दोस्त थे। दोनों साथ पढ़ते, खेलते और हर खुशी-दुख साझा करते थे। उस दिन भी वे क्रिकेट खेल रहे थे। खेल के दौरान अमित ने एक आसान कैच छोड़ दिया। बस, इतनी-सी बात पर रवि हँस पड़ा और मज़ाक में कह दिया— “तू तो हर बार गड़बड़ कर देता है!”
अमित को यह बात चुभ गई। वह पहले से ही थोड़ा परेशान था, लेकिन रवि की हँसी ने उसके मन में चिंगारी जला दी। उसने गुस्से में जवाब दिया— “तू खुद क्या बड़ा खिलाड़ी है? हर बार दूसरों को ही दोष देता है!”
बस, यहीं से बात बिगड़ गई। जो मज़ाक था, वह तकरार बन गया। दोनों ने एक-दूसरे को कटु शब्द कह दिए। गली में खेल रुक गया और दोस्ती में दरार आ गई।
दिन बीतते गए। दोनों ने बात करना बंद कर दिया। मोहल्ले वाले भी हैरान थे कि इतनी गहरी दोस्ती अचानक कैसे टूट गई।
एक दिन स्कूल में शिक्षक ने एक कहानी सुनाई—
“एक छोटा-सा कील अगर समय पर न ठोका जाए, तो पूरा पुल गिर सकता है।”
यह बात रवि के दिल को छू गई। उसे एहसास हुआ कि एक छोटी-सी मज़ाक की बात ने उसकी सबसे प्यारी दोस्ती को तोड़ दिया।
वह उसी दिन अमित के पास गया और बोला— “मुझसे गलती हो गई, मैंने मज़ाक में तुम्हें चोट पहुँचा दी।”
अमित की आँखों में भी नमी आ गई। उसने कहा— “मुझे भी गुस्सा नहीं करना चाहिए था।”
दोनों गले मिल गए। गली में फिर से वही हँसी लौट आई।
सीख: छोटी-सी बात अगर समय पर संभाल ली जाए, तो बड़ा अंज़ाम होने से बचाया जा सकता है। शब्दों में ताकत होती है—वे जोड़ भी सकते हैं और तोड़ भी सकते हैं।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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