नानी का घर और छुट्टियों का पहला दिन
(कविता)
छुट्टियों की पहली सुबह,
दिल जैसे उड़कर चल पड़ा,
बैग में कपड़े कम थे शायद,
सपनों का सामान ज़्यादा भरा।
रेल की सीटी, खिड़की के शीशे,
बचपन को रास्ता दिखाते थे,
हर स्टेशन पर नए रंग जैसे,
मन में चित्र बनाते थे।
नानी का घर… बस नाम ही काफी,
थकान सारी मिट जाती थी,
दरवाज़े पर उनकी आँखों की चमक,
जैसे धूप मुस्काती थी।
आँगन में मिट्टी की खुशबू,
पेड़ों की छाया गहरी थी,
और रसोई से आती आवाज़ें,
लगती जैसे कोई पहरी थी।
पहला दिन था बिना पढ़ाई का,
बस खेल, हँसी और शोर था,
ना कोई घड़ी की सख़्ती थी,
ना वक्त का कोई जोर था।
रात को नानी की कहानियाँ,
नींद से पहले उतरती थीं,
और आँखों में बचपन की दुनिया,
धीरे-धीरे बसती थीं।
अब भी जब आँखें बंद करूँ,
वो आँगन सामने आता है,
नानी का घर और छुट्टियों का दिन,
दिल आज भी वहीं जाता है।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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