Tuesday, 9 June 2026

"कहे नीरू : रंगीला राजस्थान"

"कहे नीरू : रंगीला राजस्थान"

आल्हड़ धूप में सुनहरी है रेगिस्तान की बात,

राजस्थानी परिधान में बसी है शान की सौगात।

घूमर की लय पर थिरकती संस्कृति की पहचान,

हर रंग में झलकता है राजस्थान का सम्मान।


कुम्भलगढ़ की दीवारें कहती हैं वीरों की कहानी,

मेवाड़ की धरती गाती है राणा की अमर निशानी।

जैसलमेर का सोनार किला सूरज सा दमकता है,

हर पत्थर इतिहास का कोई पन्ना पढ़ता है।


पगड़ी की आन में बसता है स्वाभिमान पुराना,

घाघरे की लहरों में सिमटा है रंगों का खज़ाना।

कठपुतली की बोली हो या मांड की मधुर तान,

हर सुर में गूँजता है मेरा प्यारा राजस्थान।


दाल-बाटी की खुशबू से महक उठे हर द्वार,

अतिथि को देव मानना यहाँ का है संस्कार।

मरुधर की मिट्टी भी देती जीवन का ज्ञान,

कहे नीरू, सादगी में बसता है राजस्थान।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

शायरी 21

शायरी

1. 


जब भाषा की धुन गूंजती है, तो हर दिल में भारत का गीत बसता है,

हिंदी है हमारी पहचान, हम सबका अभिमान बसता है।

लड़कियों को भी भाषा का सम्मान मिले,

कहे नीरू, हिंदी में ही हमारी शक्ति छिपी है।


2. 


भाषा एक दीपक है, जो अंधेरे में उजाला करता है,

हिंदी में बसी हैं हमारी जड़ें, हमारी धड़कन बनकर बहता है।

सपनों की उड़ान में भाषा को साथी बनाओ,

कहे नीरू, हिंदी में ही भारत का उजाला है।


3. 


जब भारत एकता में बंधा, तो भाषा भी सहारा बनी,

हिंदी ने हर दिल को जोड़ा, हर घर में गूंजा अपना गीत।

गांव से शहर तक, हर कदम पर एकता की बात हो,

कहे नीरू, हिंदी में ही हमारी भारत माता बसती है।


4. 


हिंदी का हर शब्द एक पुल बनाता है,

जो दरवाज़े खोलता है, हर दिल और हर भाषा के लिए।

संस्कृति का ये राग हमें जोड़ता है,

कहे नीरू, हिंदी में ही हमारे सपनों का संसार है।


5. 


जब हम अपनी जड़ों से जुड़े, तो शक्ति मिली हमें,

हिंदी ने हमें बताया, कि हम कौन हैं, कहाँ से आए हैं।

भाषा का सम्मान, भारत का सम्मान है,

कहे नीरू, हिंदी में ही हमारी पहचान है।


6

अल्फ़ाज़ में कहाँ समेट पाते हैं हम दिल की दास्ताँ,

कुछ रिश्ते ख़ामोश रहकर भी उम्र भर बोलते हैं।


7

जो लोग दिल में बसते हैं, वो हर रोज़ नहीं मिलते,

कुछ चेहरे दूर रहकर भी ज़िंदगी के साथ चलते हैं।


8

वक़्त ने सिखा दिया हर दर्द को मुस्कुरा कर सहना,

अब शिकायत कम है हमको, तजुर्बों पर ज़्यादा भरोसा है।


9

जो लोग दिल में बसते हैं, वो हर रोज़ नहीं मिलते,

कुछ चेहरे दूर रहकर भी ज़िंदगी के साथ चलते हैं।


10

जो लोग दिल में बसते हैं, वो हर रोज़ नहीं मिलते,

कुछ चेहरे दूर रहकर भी ज़िंदगी के साथ चलते हैं।

कहे नीरू, ये खामोश यादें,

हमेशा दिल में बसी रहती हैं।


11

गरीबी की रातों में जब सपने भी ठहर जाते हैं,

कहें नीरू, हर बच्चे को शिक्षा का हक़ मिलना चाहिए।


12

लड़की का हर कदम भी हो बराबरी का,

कहे नीरू, बिन सपने अधूरी है ज़िंदगी।


13

सिस्टम के दरो-दीवार में जब आवाज़ें दबती हैं,

कहे नीरू, सच बोलना ही ताकत है।

हर इंसान का हक़ है सपने देखने का,

कहे नीरू, बदलाव की राह पर साथ देना ज़रूरी है।


14

जब आवाज़ें दबती हैं, तो सच और भी ज़ोर से बोलता है,

हर गरीब के पीछे एक सपना छिपा होता है।

लड़कियों के पंखों को काटकर मत देखो,

कहे नीरू, हर उड़ान का हक़ हर इंसान को है।


15

सपने वो नहीं जो रातों में आते हैं,

सपने वो हैं जो सुबह उठकर भी याद रहते हैं।

आओ, साथ मिलकर हम बदलाव की नींव रखें,

कहे नीरू, हर आवाज़ में ताकत है।


16

थार की धूप में सुनहरी है रेगिस्तान की बात,

राजस्थानी परिधान में बसी है शान और बात।

घूमर की लय में थिरकती हैं हर दिलों की बात,

जयपुर की हवेलियों में बसती है हमारी याद।


17

कुंभलगढ़ की दीवारें कहती हैं पुरानी कहानी,

मेवाड़ की बगिया में महकती है रानी।

चांदनी चौक की गलियों में बसा है प्यार,

राजस्थान की संस्कृति है अनमोल आधार।


18

पगड़ी की शान में बसा राजपूतों का अभिमान,

गोटा-पट्टी में लिपटी हर महिला की पहचान।

चोली और घाघरा, रंगों का ये उत्सव,

राजस्थानी वेशभूषा में है संस्कृति का भव्य तसव्वुर।


19

मीनाकारी की चमक, हाथों की बिंदी,

राजस्थानी लहंगा, हर कदम में है ग़ज़ब जिंदगानी।

साड़ी में भी झलकती है एक पुरानी कहानी,

कहे नीरू, राजस्थान का पहनावा है हमारी शान और निशानी।


20

कुंभलगढ़ की दीवारें कहती हैं पुरानी कहानी,

मेवाड़ की बगिया में महकती है रानी।

उदयपुर की झीलों में सपनों का बसेरा,

राजस्थान की हर गली में बसा है प्यार का प्यारा बसेरा।


21

चांदनी चौक में रंगीली महफ़िल सजती है,

घूमर और कालबेलिया से दिल की धड़कन बढ़ती है।

महाराणा प्रताप की वीर गाथा गूंजे,

कहे नीरू, राजस्थान की धड़कन हर दिल में पूजे।


विश्व पर्यावरण दिवस

 विश्व पर्यावरण दिवस

पेड़ों से पूछो, कैसे खड़े रहते हैं धूप की तपिश में भी, बिना शिकायत किए।

नदियों से पूछो, कैसे बहती रहती हैं अपना सब कुछ लुटाकर भी, प्यास किसी की अधूरी न रहे।

धरती से पूछो, कितने घाव सहती है, फिर भी हर मौसम में नई हरियाली उगा देती है।

हमने विकास के नाम पर कितने जंगल काट दिए, सुविधाओं की दौड़ में कितने रिश्ते प्रकृति से बाँट दिए।

अब समय है, सिर्फ़ भाषणों का नहीं, एक पौधा लगाने का, एक पेड़ बचाने का, एक नदी को साफ़ रखने का।

क्योंकि...

जब आख़िरी पेड़ कट जाएगा, आख़िरी नदी सूख जाएगी, और आख़िरी चिड़िया अपना गीत भूल जाएगी,

तब समझ आएगा कि धन से नहीं, धरती से चलती है ज़िंदगी।

आओ, इस पर्यावरण दिवस पर सिर्फ़ संकल्प न लें, अपनी आदतें भी बदलें।

ताकि आने वाली पीढ़ियाँ हमें दोषी नहीं, धरती का सच्चा रखवाला कहें।

धरती हमारी विरासत है,

और विरासत को सँभालना ही

सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

"सपनों से जिम्मेदारियों तक : जीवन, संबंध और पुनर्जन्म की कविताएँ"


"सपनों से जिम्मेदारियों तक : जीवन, संबंध और पुनर्जन्म की कविताएँ"

1. तेरा मेरा साथ रहे 

तेरा मेरा साथ रहे,

जैसे सुबह की पहली किरण में

चुपचाप मुस्कान का उजाला रहे…


तेरा मेरा साथ रहे,

जैसे सूखी राहों पर

बारिश की नर्म फुहार का सहारा रहे…


कभी तू थक जाए तो मैं संभाल लूँ,

कभी मैं टूट जाऊँ तो तू पुकार ले…

शब्द कम हों, पर समझ बहुत रहे,

तेरा मेरा साथ रहे…


भीड़ में भी हम अकेले न हों,

हर मोड़ पर एक-दूसरे का भरोसा रहे…

ना कोई शर्त हो, ना कोई हिसाब,

बस दिल से दिल का रिश्ता जिंदा रहे…


तेरा मेरा साथ रहे,

जैसे हवा में खुशबू का एहसास रहे,

और जिंदगी बस यूँ ही

थोड़ी आसान, थोड़ी अपनी सी रहे…



2. जब ज़िंदगी शुरू हो जाती है


जब शौक के लिए वक्त न मिले

तो समझ जाना, ज़िंदगी शुरू हो गई है…


जहाँ किताबें धूल खा जाएँ,

और सपनों की अलमारी

सिर्फ ज़रूरतों से भर जाए…


जहाँ मुस्कान भी

टाइम-टेबल देखकर आए,

और नींद भी थकी हुई आँखों से पूछे—

“आज फिर देर से मिलोगे क्या?”


जब अपने ही शौक

किसी पुराने कोने में रख दिए जाएँ,

और हम बस भागते रहें

कभी काम के पीछे, कभी जिम्मेदारियों के पीछे…


तो समझ लेना,

अब बचपन नहीं रहा,

अब ज़िंदगी शुरू हो गई है—

जहाँ जीना नहीं, निभाना पड़ता है…


पर फिर भी कहीं भीतर

एक छोटा सा बच्चा जिंदा रहता है,

जो कहता है—

“एक दिन फिर से अपने लिए जिऊँगा…”



3. जिम्मेदारियों के दिन


क्योंकि अब दिन सपनों से नहीं,

जिम्मेदारियों के चलने लगे हैं…


सुबह आँख खुलते ही

ख्वाब नहीं, हिसाब खुलता है,

कौन सा काम बाकी है

ये सवाल हर सांस में घुलता है…


पहले जिन रास्तों पर

सपने साथ चलते थे,

अब उन्हीं रास्तों पर

वक्त की भीड़ में हम अकेले चलते हैं…


हँसी भी अब यूँ ही नहीं आती,

पहले सोचती है—

“क्या आज मुझे इजाज़त है?”


और दिल…

वो अब भी कहीं छुपकर

पुरानी ख्वाहिशों को सहलाता है,

पर बाहर आते-आते

जिम्मेदारियों का दरवाज़ा बंद हो जाता है…


फिर भी,

इन सबके बीच

एक उम्मीद धीरे से कहती है—

“थोड़ा और संभाल लो,

शायद एक दिन सपने फिर लौट आएँ…”



4. टूटन का चमत्कार


ईश्वर टूटी हुई चीज़ों का

बखूबी इस्तेमाल करते हैं…


बादल टूटते हैं तो

धरती प्यास बुझा लेती है,

सूखी मिट्टी भी

जीने की वजह पा लेती है…


बीज टूटते हैं तो

एक नया जीवन जन्म लेता है,

टूटकर भी वो

हरियाली का सपना बुन लेता है…


कली बिखरती है तो

फूल बनकर मुस्कुराती है,

और हर टूटन के भीतर

एक नई कहानी बन जाती है…


इंसान भी जब टूटता है

तो बिखरने नहीं आता,

वो भीतर ही भीतर

फिर से खुद को गढ़कर उठ जाता है…


शायद यही नियम है इस सृष्टि का—

जो टूटता है, वही

किसी और रूप में

सबसे सुंदर बनकर लौट आता है…


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन 

सिर्फ़ तेरा साथ

सिर्फ़ तेरा साथ

ना सोने की चाहत थी,
ना चाँदी का कोई ख्वाब था,
इस भागती हुई दुनिया में
बस तेरा साथ ही लाजवाब था।

जब जीवन की राहों में
धूप बहुत तीखी हो जाती है,
तब किसी अपने की छाँव ही
पूरी दुनिया बन जाती है।

ना बड़े महलों की इच्छा थी,
ना ऊँचे नाम की कोई प्यास,
बस इतना भर काफी था—
मेरे हाथों में तेरा हाथ।

जब अग्नि को साक्षी मानकर
हमने कुछ वचन निभाने चाहे,
तब समझ आया, रिश्ते केवल
शब्दों से नहीं, विश्वास से बंधते हैं।

समय के संग चेहरे बदलेंगे,
बालों में चाँदी उतर आएगी,
पर यदि साथ बना रहा तेरा,
तो हर उम्र मुस्कुराएगी।

जीवन कोई फूलों की सेज नहीं,
यहाँ काँटे भी मिलते हैं,
पर दो लोग साथ चलें तो
रास्ते आसान लगते हैं।

ना तू पूर्ण, ना मैं पूर्ण,
फिर भी यह बंधन खास है,
क्योंकि सारी दुनिया से बढ़कर
मुझे सिर्फ़ तेरा साथ है।

जब तक साँसों की डोर चले,
जब तक यह जीवन साथ रहे,
हर प्रार्थना में बस यही माँगूँ—
तेरा विश्वास मेरे पास रहे।

दुनिया चाहे जो भी दे दे,
या मुझसे सब कुछ छीन ले,
मेरी सबसे बड़ी दौलत तो
सिर्फ़ तेरा साथ ही रहे।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

थकान का भी एक सच होता है। कविता

 

थकान का भी एक सच होता है

सब कहते हैं —
"कितनी स्ट्रॉन्ग हो तुम!"
हर मुश्किल में मुस्कुरा लेती हो,
हर आँधी में संभल जाती हो।

पर काश...
किसी ने यह भी पूछा होता —
"थक तो नहीं गई हो तुम?"

कंधों पर जिम्मेदारियों का पहाड़ उठाए,
हर रिश्ते का भार निभाए,
सबके आँसू पोंछते-पोंछते
क्या कभी अपनी आँखें भी भीगी हैं तुमसे?

सबको तुम्हारी हँसी दिखाई देती है,
पर उस हँसी के पीछे छिपी
खामोश चीखें कौन सुनता है?

लोग तुम्हारी हिम्मत की मिसाल देते हैं,
पर यह नहीं जानते
कि कई रातें ऐसी भी होती हैं
जब तकिया ही तुम्हारा एकमात्र हमदर्द होता है।

तुम्हें देखकर सब कहते हैं—
"इसे क्या होगा, यह तो मजबूत है!"
मगर मजबूत लोग भी
पत्थर नहीं होते।

उनके भी सपने टूटते हैं,
उनका भी मन भर आता है,
उन्हें भी कभी-कभी
सब कुछ छोड़कर रो लेने का मन करता है।

मजबूत होना कोई शौक नहीं,
अक्सर यह हालातों की दी हुई मजबूरी होती है।
जब सहारा देने वाला कोई न हो,
तो इंसान खुद ही अपना सहारा बन जाता है।

हाँ, मैं मजबूत हूँ,
क्योंकि समय ने मुझे ऐसा बना दिया।
पर इसका मतलब यह नहीं
कि मुझे दर्द नहीं होता।

आज बस इतना कहना है—
जब किसी को मजबूत कहो,
तो उसके साहस की तारीफ़ करने से पहले
एक बार यह भी पूछ लेना—

"सच बताना,
थक तो नहीं गए हो तुम?"

क्योंकि कई बार
यही एक सवाल
किसी टूटते हुए इंसान को
फिर से जीने की वजह दे देता है।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

मेरी दिल्ली मेरी नज़र से कविता

 

मेरी दिल्ली — मेरी नज़र से

मैंने दिल्ली को किताबों में नहीं पढ़ा,
मैंने दिल्ली को जीया है।
इसके मौसमों को बदलते देखा है,
इसके रास्तों को बढ़ते देखा है।

जब मैं छोटी थी,
तब गलियाँ भी अपनी लगती थीं,
छतों पर उड़ती पतंगों में
सपनों की डोर बंधी लगती थी।

मैंने दिल्ली की सर्दियों में
धूप के टुकड़े समेटे हैं,
गर्मियों की तपती दोपहर में
आम और बचपन दोनों बटोरे हैं।

यहाँ की सुबहें कभी
मंदिर की घंटियों से जागती थीं,
और शामें चाय की भाप संग
घर-आँगन में उतर आती थीं।

मैंने दिल्ली को भीड़ बनते देखा है,
और भीड़ में अकेला पड़ते भी देखा है।
नई इमारतों को आसमान छूते देखा है,
पुराने पेड़ों को कटते भी देखा है।

यह शहर केवल सड़कों का जाल नहीं,
यह मेरी स्मृतियों का घर है।
यहाँ हर मोड़ पर
मेरे जीवन का कोई सफ़र है।

यहीं मैंने गिरना सीखा,
यहीं संभलना सीखा।
यहीं अपनों की पहचान हुई,
और यहीं बदलता समय देखा।

दिल्ली मेरे लिए
लाल किले की दीवार भर नहीं,
या संसद के गलियारों की खबर नहीं,
दिल्ली तो मेरे जीवन का वह पन्ना है
जिस पर मेरी उम्र की स्याही दर्ज है।

तिरपन वर्षों से
मैं इसकी धड़कनों के साथ चल रही हूँ,
कभी इसकी रफ्तार से थक जाती हूँ,
तो कभी इसकी जीवंतता पर मुस्कुरा देती हूँ।

बहुत कुछ बदल गया है यहाँ,
पर एक बात आज भी वैसी है—
दिल्ली मेरे लिए सिर्फ़ एक शहर नहीं,
मेरी यादों, मेरे संघर्षों,
मेरे सपनों और मेरी पहचान का दूसरा नाम है।

मेरी दिल्ली,
तू मेरे जीवन की वह कहानी है,
जिसे मैं हर दिन जीती हूँ,
और हर बार नए अर्थों में पढ़ती हूँ।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन