शीर्षक: “राख से उठती हुई साँस”
नवंबर की ठिठुरन से लेकर
आज की धूप तक,
कितनी ही आंधियाँ आईं—
कुछ बाहर चलीं,
कुछ भीतर घर बना गईं।
हौंसले टूटे भी,
और फिर किसी अदृश्य हाथ ने
धीरे से थाम लिया,
मानो कह रहा हो—
“अभी अंत नहीं,
अभी तुम्हारी कहानी बाकी है…”
जिस माँ की ममता में
आकाश बसता है,
उसी माँ की छाया जब
साया बनकर छल जाए,
तो बेटे का मन
कैसे विश्वास करे फिर किसी उजाले पर?
बीमारी की चादर में लिपटा बेटा,
आँखों में उम्मीद लिए—
पर अपनों की परछाइयाँ
पीछे मुड़कर देखना भी भूल गईं।
बहू की थकी पलकों पर
संघर्ष की लकीरें थीं,
और बच्चों के मासूम प्रश्न—
“क्या अपना घर भी
कभी पराया हो जाता है?”
और अब सुनो—
उस बहन की कहानी,
जो कभी भाई की धड़कन थी…
ये वही बहन है—
जिसके हर दर्द पर
भाई ने मरहम रखा,
जिसकी हर पुकार पर
वह छाया बनकर खड़ा रहा।
जब-जब उसके घर में
बीमारी ने दस्तक दी,
तब-तब उसी भाई ने
अस्पताल के बिल चुकाए,
अपने सपनों को एक तरफ़ रख
उसकी सांसों को बचाया।
उसके हर संघर्ष में
भाई ने कंधा दिया,
हर आँसू को
अपनी हथेलियों में छुपाया।
पर देखो समय का खेल—
ये वही बहन है
जिसने शादी के
छह महीने में ही
अपने पति का साथ छोड़ दिया,
और फिर सात वर्षों तक
रिश्तों को अदालतों में घसीटा,
अपने ही परिवार और खानदान पर
कलंक के छींटे उछाले।
वक्त ने करवट ली—
वही टूटा रिश्ता
फिर से जुड़ गया,
वही पति
फिर जीवनसाथी बन गया।
पर विडंबना देखो—
जिस घर को फिर बसाया,
उसी के सहारे
उसने अपने ही भाई का
घर उजाड़ दिया।
भाई का हक,
जो खून की स्याही से लिखा था,
उसे लालच की आग में
राख कर दिया गया।
छत…
जो सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं होती,
बल्कि विश्वास का आसमान होती है—
उसे भी छीन लिया गया,
और घर,
जो कभी मंदिर था,
उजड़े हुए शब्दों की तरह
बिखर गया।
माँ, बेटी, दामाद—
जब एक साथ हो जाएँ
अन्याय के पक्ष में,
तो सच की आवाज़
अक्सर भीड़ में दब जाती है।
परंतु…
सच मरता नहीं,
वह चुप रहकर
समय का इंतज़ार करता है।
और यह भी उतना ही सत्य है—
कि जो सच्चा होता है,
उसके रास्ते में चाहे
कितनी ही रुकावटें खड़ी कर दी जाएँ,
वे एक-एक कर
अदृश्य हो जाती हैं।
क्योंकि सत्य के साथ
किसी का नाम नहीं जुड़ा होता,
वहाँ स्वयं ईश्वर
पथ-प्रदर्शक बन जाता है।
आज के इस युग में,
जहाँ चालाकी को चतुराई कहा जाता है,
और धोखे को हुनर—
वहाँ सच्चाई अक्सर
मूर्खता का नाम पाती है।
धोखेबाज़ों को लगता है—
“किसी को नहीं पता
हमने क्या किया…”
पर वे भूल जाते हैं—
दुनिया की नज़रों से
भले ही बच जाएँ,
पर अपने ज़मीर से
कभी नहीं बच सकते।
रात के सन्नाटे में,
जब हर आवाज़ थम जाती है,
तब आत्मा
धीरे से पूछती है—
“क्या जो किया, वह सही था?”
और उस प्रश्न का उत्तर
न कोई झूठ छुपा सकता है,
न कोई बहाना मिटा सकता है।
क्योंकि—
ज़मीर की अदालत में
हर इंसान
खुद ही गवाह होता है,
खुद ही न्यायाधीश।
आज भले ही
धोखेबाज़ों के घर
दीप जलते दिखते हैं,
और सच्चे लोगों के आँगन में
अंधेरा पसरा होता है—
पर यह अंधेरा स्थायी नहीं होता।
ईश्वर की अदालत में
न कोई रिश्वत चलती है,
न कोई झूठ टिकता है।
हर आँसू
एक दिन न्याय बनता है,
और हर अन्याय
अपने अंत तक पहुँचता है।
याद रखो—
जो दूसरों का घर उजाड़ते हैं,
उनकी नींव भी
कभी न कभी हिलती है।
और जो सहते हैं,
टूटकर भी टिके रहते हैं—
उन्हीं के भीतर
सबसे बड़ी शक्ति जन्म लेती है।
यह कविता केवल दर्द नहीं,
एक चेतावनी है—
कि रिश्ते अगर स्वार्थ से चलेंगे,
तो अंत में
सब कुछ खो जाएगा।
और अगर जीवन तुम्हें
ऐसी अग्निपरीक्षा में डाले,
तो टूटना मत—
क्योंकि राख से ही
नई शुरुआत होती है।
ईश्वर देर करता है,
पर अंधेर नहीं—
वह हर सच्चे मन के लिए
रास्ते की हर बाधा को
एक दिन
खुद ही मिटा देता है।
इसलिए…
चलते रहो,
सहते रहो,
पर झुको मत अन्याय के आगे—
क्योंकि सत्य की राह कठिन जरूर है,
पर अंत में
वही सबसे उज्ज्वल होती है।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
उपर्युक्त कविता का एक–एक शब्द अनुभव की आधारशिला पर निर्मित है जिसकी सच्चाई को जिया है, देखा है, महसूस किया है। एक–एक शब्द को लिखते हुए बीते नासूर मंज़र सामने आ रहे हैं। एक लालची औरत जो मां, बहन, बेटी, बहू, बुआ सभी रूपों में है। वह किसी की बहन थी किसी की बेटी किसी की ननद....अनेक रूप पर है एक औरत। जी हां, एक औरत जिसने नारी की गरिमा को दागदार किया। गंदा खेल खेलकर भी विजेता है, पर ऊपर वाले की अदालत में उसको कटघरे में ही खड़े होना है। https://www.amazon.in/Nirupama-Sangharsho-Sailab-%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%AE%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%98%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A5%8B/dp/9394176438
क्या लाया है जो साथ ले जाएगा।
यहीं का कमाया यहीं पर रह जाएगा।
लूटा जो तूने अपने स्वार्थ के लिए
किसी अपने का आशियाना।
तो ध्यान रख
अन्तिम साँसों में माफ़ी को भी तरस जाएगा।
क्योंकि
ऐसे इंसानों को माफ़ी तो क्या फांसी का फंदा भी नहीं मिलता है।
ऊपर वाले की अदालत में सिर्फ़ और सिर्फ़ दूसरा जन्म कुत्ते का ही मिलता है।
जो भटकता है दर-दर, ठोकरों में ठुकराया जाता है।
आशियाना छीनकर किसी अपने का वो...
अपने परिवार के साथ कुत्ते का ही जन्म बार-बार पाता है।