“कीचड़ में छिपा हुआ आकाश”
“जिसे हम कीचड़ समझकर पैरों तले रौंद देते हैं, वही अपने भीतर किसी फूल का भविष्य छिपाए बैठा होता है…”
मुझे देखकर लोग नाक सिकोड़ते हैं।
मुझे कोई छूना नहीं चाहता।
कोई मेरे पास से गुजरता है तो अपने पाँव बचाकर चलता है, जैसे मैं कोई अपराध हूँ।
लेकिन मैं हमेशा ऐसा नहीं था।
मैं कभी मिट्टी था।
सोंधी, मुलायम और शांत।
फिर एक दिन आकाश ने अपनी मुट्ठी खोल दी।
बारिश आई।
उसने मुझे भिगोया।
मैं उसके साथ बहा, फिसला, घुला और बदलता गया।
मिट्टी और पानी के इस मिलन से मेरा जन्म हुआ।
बारिश ने हँसकर पूछा—
“अब बताओ, तुम्हारा नाम क्या है?”
मैंने कहा—
“तुमने मुझे बनाया है, तुम ही नाम रख दो।”
वह बोली—
“कीचड़।”
मैं चुप रहा।
नाम सुनकर अच्छा नहीं लगा।
मुझे लगा, यह कैसा नाम है!
इतने प्यार से बनाया और नाम ऐसा?
बारिश आगे बढ़ गई।
मैं वहीं रह गया।
कुछ दिन बाद मेरे भीतर से एक छोटी-सी हरी नोक बाहर निकली।
मैं घबरा गया।
“तुम कौन हो?”
वह बोली—
“बीज हूँ।”
मैंने कहा—
“यहाँ क्यों आई हो? लोग मुझे गंदा कहते हैं।”
बीज हँसा।
“इसीलिए तो आई हूँ।”
“मुझमें?”
“हाँ, तुममें।”
मैंने पहली बार अपने भीतर झाँका।
मुझे लगा, शायद मेरे भीतर भी कुछ है।
दिन बीते।
वह नन्ही-सी नोक पौधा बन गई।
फिर उसके ऊपर फूल आया।
एक दिन हवा आई।
उसने फूल को देखकर कहा—
“बहुत सुंदर हो।”
फूल ने सिर झुकाकर कहा—
“मेरा जन्म कहाँ हुआ, यह मत पूछना।”
हवा ने पूछा—
“क्यों?”
फूल मुस्कुराया—
“लोग मेरे रंग की प्रशंसा करेंगे, मेरे जन्म की नहीं।”
मैं चुप रहा।
मेरे भीतर कुछ हिलने लगा था।
मैंने पहली बार समझा—
शायद सुंदर चीज़ों को सुंदर बनाने में मेरा भी थोड़ा हिस्सा है।
कुछ दिनों बाद गर्मी आई।
सूरज ने मुझे सुखाना शुरू कर दिया।
मैंने बारिश को पुकारा—
“वापस आओ!”
बारिश दूर से बोली—
“हर बार मैं तुम्हें बचाने नहीं आ सकती।”
मैं डर गया।
“तो मैं खत्म हो जाऊँगा?”
बारिश बोली—
“नहीं।
तुम फिर मिट्टी बनोगे।”
मैंने पूछा—
“और फिर?”
वह बोली—
“फिर कभी बीज तुम्हारे भीतर घर बनाएगा।”
मैं बहुत देर तक चुप रहा।
अब मुझे अपने नाम से शिकायत नहीं थी।
फिर एक दिन नदी आई।
वह मुझे अपने साथ बहा ले गई।
मैंने पूछा—
“कहाँ ले जा रही हो?”
नदी बोली—
“समुद्र तक।”
मैंने कहा—
“लेकिन मैं तो कीचड़ हूँ। समुद्र में मेरा क्या काम?”
नदी हँसी।
“तुम्हें हर जगह अपना काम दिखाई नहीं देता।”
मैं उसके साथ बहता रहा।
रास्ते में उसने मुझे किनारे छोड़ा।
वहाँ सूखी धरती थी।
मैंने उसे छुआ।
धरती ने कुछ नहीं कहा।
बस चुपचाप मुझे अपने भीतर ले लिया।
कुछ महीनों बाद वहाँ हरी घास थी।
फिर फूल।
फिर पेड़।
मैं उन्हें देखता रहा।
किसी ने मेरा नाम नहीं लिया।
किसी ने यह नहीं कहा—
“देखो, यह कीचड़ की देन है।”
और शायद यही सबसे सुंदर बात थी।
मैंने उस दिन जाना—
हर अच्छी चीज़ को अपना नाम लिखवाने की जरूरत नहीं होती।
मैं कीचड़ हूँ।
मैं रास्ते रोकता हूँ।
पाँव गंदे करता हूँ।
फिसलाता हूँ।
कभी-कभी परेशानी भी बनता हूँ।
लेकिन मैं यह भी जानता हूँ—
मैं मिट्टी और पानी के बीच की वह अवस्था हूँ, जहाँ से जीवन कई बार जन्म लेता है।
इसलिए अब जब बारिश मुझे फिर से बनाती है, मैं उससे अपना नाम नहीं पूछता।
बस मुस्कुराकर कहता हूँ—
“मुझे फिर से कीचड़ बना दो।”
क्योंकि अब मुझे मालूम है—
मेरा अस्तित्व सुंदर दिखने के लिए नहीं है।
मेरा काम किसी सुंदर चीज़ के जन्म की जगह बनना है।
और शायद प्रकृति का सबसे बड़ा रहस्य यही है—
जिसे दुनिया बेकार समझकर किनारे कर देती है,
प्रकृति उसी में अगली सृष्टि का बीज छिपा देती है।
मैं कीचड़ हूँ।
मुझे देखकर मत घबराना।
कभी ध्यान से देखना—
शायद तुम्हारे पैरों के नीचे
किसी फूल का भविष्य पड़ा हो।