जन्मदिन का सबसे बड़ा उपहार
आज सुबह जैसे ही आँख खुली, मोबाइल पर शुभकामनाओं की घंटियाँ बजने लगीं।
किसी ने लिखा— "ईश्वर आपको स्वस्थ रखें।"
किसी ने लिखा— "आपकी लेखनी यूँ ही समाज को दिशा देती रहे।"
किसी ने केवल एक 🌹 भेजा, पर उस गुलाब में भी अपनापन था।
मैं हर संदेश पढ़ती गई... और मन कृतज्ञता से भरता गया।
फिर न जाने क्यों, उँगली मोबाइल की उस सूची तक पहुँच गई जहाँ मेरे अपने... मेरे खून के रिश्ते थे।
मैंने सोचा— "शायद अभी तक व्यस्त होंगे... अभी संदेश आएगा..."
सुबह दोपहर बनी... दोपहर शाम में बदल गई...
लेकिन कुछ मोबाइल नंबर आज भी वैसे ही मौन थे, जैसे वर्षों से उनके मन मौन हैं।
तब अचानक लगा...
रिश्ते खून से नहीं टूटते, वे उपेक्षा से टूटते हैं।
कई लोग कहते हैं— "खून कभी पानी नहीं होता।"
पर मैंने जीवन में देखा है कि कई बार खून इतना ठंडा हो जाता है कि उसमें संवेदना ही जम जाती है।
आज के समय में सबसे अधिक ईर्ष्या कोई अजनबी नहीं करता।
सबसे अधिक बेचैनी उसे होती है... जो आपका अपना कहलाता है।
उसे आपका संघर्ष नहीं दिखाई देता।
उसे केवल आपकी सफलता दिखाई देती है।
उसे आपकी जागी हुई रातें नहीं दिखतीं।
उसे केवल आपकी मुस्कान दिखाई देती है।
और वही मुस्कान उसके भीतर ईर्ष्या की आग बन जाती है।
मैंने ऐसे रिश्ते देखे हैं...
जो हर पारिवारिक समारोह में सबसे आगे बैठते हैं, पर जब परिवार का कोई सदस्य संकट में हो, तो सबसे पहले अपनी नज़रें फेर लेते हैं।
वे आपके घर की मिठाई खा सकते हैं, लेकिन आपकी खुशी पचा नहीं सकते।
वे आपके दुख पर आँसू नहीं बहाते, लेकिन आपकी उपलब्धियों पर रातभर करवटें बदलते हैं।
सबसे बड़ा आश्चर्य यह नहीं कि वे साथ नहीं आए...
सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि उन्हें कभी अपनी कमी महसूस भी नहीं हुई।
आज जन्मदिन पर मुझे एक सत्य और स्पष्ट दिखाई दिया—
खानदान बहुत बड़ा हो सकता है, लेकिन इंसान बहुत कम होते हैं।
रिश्तेदारों की भीड़ में कई बार एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिलता, जो केवल इतना कह दे—
"घबराना मत... मैं तुम्हारे साथ हूँ।"
विश्वास कीजिए...
यह एक वाक्य किसी लाखों के उपहार से बड़ा होता है।
मैंने यह भी सीखा है कि जो लोग आपकी अनुपस्थिति में आपकी बुराई सुनकर मुस्कुरा देते हैं, वे आपकी उपस्थिति में चाहे जितनी बड़ी मुस्कान दे दें, उनकी आत्मा का आईना साफ़ नहीं होता।
इसलिए अब शिकायत नहीं करती।
क्योंकि जीवन ने सिखा दिया है—
रिश्ते जन्म से मिलते हैं, लेकिन अपने कर्मों से कमाने पड़ते हैं।
आज मेरे जन्मदिन पर मैं किसी से कोई गिला नहीं रखती।
मैं केवल इतना चाहती हूँ कि कोई भी मनुष्य अपने ही लोगों के बीच अकेला न पड़े।
यदि आपके घर, परिवार या रिश्तेदारी में कोई ऐसा व्यक्ति है जो चुपचाप संघर्ष कर रहा है...
तो उसे धन मत दीजिए।
उसे केवल दो शब्द दीजिए—
"मैं तुम्हारे साथ हूँ।"
क्योंकि कई बार यही दो शब्द किसी टूटते हुए मनुष्य को फिर से जीना सिखा देते हैं।
और अंत में...
आज मुझे सबसे बड़ा उपहार उन लोगों से मिला, जिनसे मेरा खून का रिश्ता नहीं था, लेकिन हृदय का संबंध था।
तब समझ आया—
रक्त शरीर को जीवित रखता है,
पर प्रेम ही रिश्तों को जीवित रखता है।
खून का रिश्ता जन्म देता है,
लेकिन आत्मीयता ही जीवन भर साथ निभाती है।
– डॉ. नीरू मोहन