Tuesday, 26 May 2026

“गर्मी की छुट्टियां: आम, आराम और अवकाश कार्य का संग्राम!”

 मई-जून की तपती दोपहर… पंखे की आवाज़ और आम के अचार की खुशबू के बीच जैसे ही स्कूलों में छुट्टियों की घोषणा होती है, बच्चों के चेहरे ऐसे खिल उठते हैं मानो किसी कैदी को उम्रकैद से रिहाई मिल गई हो।

बच्चे सोचते हैं —

“अब देर तक सोएंगे… कार्टून देखेंगे… नानी के घर जाएंगे… और दिनभर मौज-मस्ती करेंगे!”


लेकिन बेचारे बच्चों को यह नहीं पता होता कि उनके सपनों की गर्मियों पर सबसे बड़ा हमला अभी बाकी है — अवकाश कार्य!


जी हाँ… वही अवकाश कार्य, जो छुट्टियों को छुट्टियां कम और “घरेलू जेल” ज्यादा बना देता है।


पहले के समय में गर्मियों की छुट्टियां सचमुच छुट्टियां होती थीं।

बच्चे पेड़ों पर चढ़ते थे, गिल्ली-डंडा खेलते थे, नहर में नहाते थे और शाम को दादी से कहानियां सुनते थे।

लेकिन आज के बच्चे छुट्टियों में भी “प्रोजेक्ट वर्क” के जंगल में फंसे रहते हैं।


अब छुट्टियां शुरू होने से पहले स्कूलों में एक विशेष समारोह होता है — Holiday Homework Distribution Ceremony!

शिक्षक बड़े प्रेम से कहते हैं —

“बच्चों! छुट्टियों में खूब खेलना… आराम करना…”

और फिर अगले ही पल 75 पन्नों का अवकाश कार्य थमा देते हैं।


किसी बच्चे को सौरमंडल बनाना है…

किसी को “जल संरक्षण” पर मॉडल तैयार करना है…

तो किसी को 200 पन्नों की सुंदर लिखावट लिखनी है।


ऐसा लगता है मानो बच्चों को छुट्टियां नहीं, किसी निर्माण कंपनी का ठेका दिया गया हो।


सबसे अधिक संकट तो अभिभावकों पर आता है।

बच्चे बड़े मासूम बनकर कहते हैं —

“मम्मी, बस थोड़ा-सा help कर दो…”

और देखते ही देखते पूरा प्रोजेक्ट मां-बाप के सिर पर आ जाता है।


मां इंटरनेट खंगाल रही होती है…

पापा थर्माकोल काट रहे होते हैं…

और बच्चा आराम से मोबाइल पर reels देख रहा होता है।


फिर स्कूल खुलने पर वही बच्चा गर्व से कहता है —

“मैम! ये project मैंने खुद बनाया है…”

और माता-पिता पीछे खड़े अपनी कला पर मौन गर्व महसूस करते हैं।


कुछ माता-पिता तो इतने गंभीर हो जाते हैं कि अवकाश कार्य को राष्ट्रीय परियोजना मान लेते हैं।

घर में मीटिंग होती है —

“चार्ट पेपर कौन लाएगा?”

“ग्लिटर खत्म हो गया!”

“जल्दी Fevicol पकड़ाओ!”


पूरा घर ऐसा दिखता है जैसे कोई छोटा-मोटा आर्ट एंड क्राफ्ट उद्योग चल रहा हो।


वहीं दूसरी ओर कुछ बच्चे इतने प्रतिभाशाली होते हैं कि छुट्टियों के आखिरी दो दिन तक कॉपी को हाथ भी नहीं लगाते।

फिर अचानक उन्हें शिक्षा का महत्व समझ आता है।

रात 2 बजे तक लिखाई चलती है…

सुबह आंखें लाल… हाथ सुन्न… और मन में एक ही प्रार्थना —

“हे भगवान! काश स्कूल दो दिन और बंद हो जाए!”


गर्मियों की छुट्टियां अब बच्चों के लिए कम और अभिभावकों की परीक्षा ज्यादा बन गई हैं।

बच्चों की छुट्टियां शुरू होते ही मां-बाप की छुट्टियां समाप्त हो जाती हैं।


हालांकि अवकाश कार्य का उद्देश्य बच्चों को सीखने से जोड़ना होता है, लेकिन जब छुट्टियों का आधा समय चार्ट पेपर, फाइल और मॉडल में निकल जाए, तो “मौज-मस्ती” शब्द भी पसीना पोंछने लगता है।


सच तो यह है कि गर्मियों की छुट्टियां बच्चों के बचपन की सबसे खूबसूरत यादें होनी चाहिए।

जहां थोड़ी पढ़ाई हो… थोड़ा अनुशासन हो… लेकिन भरपूर खेल, हंसी, शरारत और परिवार का साथ भी हो।


क्योंकि बचपन बार-बार नहीं आता…

और छुट्टियों की असली शिक्षा किताबों से नहीं, जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों से मिलती है।


तो इस बार अगर कोई बच्चा छुट्टियों में थोड़ा आलस कर ले, देर तक सो ले या आम खाते हुए कहानी सुन ले…

तो उसे करने दीजिए।


आख़िर गर्मियों की छुट्टियां हैं…

कोई सरकारी टेंडर तो नहीं!


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

✋ माता-पिता के लिए छोटी-छोटी बातें, जो बच्चे का भविष्य बदल सकती हैं…

 ✋ माता-पिता के लिए छोटी-छोटी बातें, जो बच्चे का भविष्य बदल सकती हैं…


🌸 बच्चों को सिर्फ अच्छी शिक्षा नहीं,

अच्छे संस्कार और आपका समय भी चाहिए।


❤️ डांट से ज्यादा प्यार दीजिए

📖 मोबाइल से ज्यादा संवाद कीजिए

🤝 बच्चों की तुलना नहीं, हौसला बढ़ाइए

😊 उनकी छोटी कोशिशों की भी सराहना कीजिए

🏡 घर का माहौल शांत और सकारात्मक रखिए


याद रखिए…

बच्चे हमारी बातों से कम,

हमारे व्यवहार से ज्यादा सीखते हैं।


✨ आज की सही परवरिश ही

कल का अच्छा समाज बनाती है।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

शिक्षक : एक गुरु, एक मार्गदर्शक

 शिक्षक : एक गुरु, एक मार्गदर्शक


शिक्षक केवल वह व्यक्ति नहीं होता जो बच्चों को किताबों का ज्ञान दे, बल्कि वह एक ऐसा मार्गदर्शक होता है जो बच्चों के जीवन को सही दिशा देने का कार्य करता है। एक गुरु अपने विद्यार्थियों के भविष्य को संवारने के लिए दिन-रात मेहनत करता है। वह चाहता है कि उसका हर विद्यार्थी जीवन में सफल हो, अच्छे संस्कारों वाला बने और समाज में सम्मान प्राप्त करे।


आज के समय में अक्सर यह देखा जाता है कि जब शिक्षक बच्चों को अनुशासन में रखने के लिए डांटते हैं या दंड देते हैं, तो कई अभिभावक उसे गलत समझ लेते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि एक सच्चा शिक्षक कभी भी अपने स्वार्थ के लिए बच्चों को नहीं समझाता। उसका हर प्रयास बच्चों की भलाई और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए होता है।


अनुशासन जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। बिना अनुशासन के कोई भी व्यक्ति सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। यदि बच्चा समय पर पढ़ाई न करे, गलत संगति में पड़ जाए या अपने कर्तव्यों को न समझे, तो शिक्षक उसे सही रास्ते पर लाने का प्रयास करता है। कभी-कभी इसके लिए कठोरता भी दिखानी पड़ती है। यह कठोरता क्रोध नहीं, बल्कि बच्चों के प्रति चिंता और प्रेम का एक रूप होती है।


अभिभावकों को यह समझना होगा कि शिक्षक और माता-पिता दोनों का उद्देश्य एक ही है — बच्चों का सर्वांगीण विकास। यदि घर और विद्यालय एक-दूसरे के विरोध में खड़े होंगे, तो इसका सबसे अधिक नुकसान बच्चे को ही होगा। इसलिए आवश्यक है कि अभिभावक शिक्षक पर विश्वास रखें और बच्चों के सामने शिक्षक का सम्मान करें।


आज कई बच्चे मोबाइल, इंटरनेट और बाहरी प्रभावों के कारण जल्दी भटक जाते हैं। ऐसे समय में शिक्षक ही वह दीपक है जो अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करने का प्रयास करता है। वह केवल पढ़ाई ही नहीं, बल्कि जीवन के मूल्य, संस्कार, जिम्मेदारी और सम्मान की भावना भी सिखाता है।


अभिभावकों के लिए कुछ सुझाव


बच्चों के सामने शिक्षक का सम्मान करें।


यदि कोई समस्या हो तो शांतिपूर्वक शिक्षक से बात करें।


बच्चों की हर बात को अंतिम सत्य न मानें, पहले दोनों पक्ष समझें।


बच्चों को अनुशासन और मर्यादा का महत्व सिखाएं।


विद्यालय और शिक्षक के साथ सहयोगात्मक संबंध बनाए रखें।


बच्चों में मेहनत, समय की पाबंदी और जिम्मेदारी की आदत विकसित करें।



एक शिक्षक वास्तव में समाज का निर्माता होता है। डॉक्टर, इंजीनियर, अधिकारी या नेता — हर सफल व्यक्ति के पीछे किसी न किसी गुरु का हाथ अवश्य होता है। इसलिए हमें शिक्षकों का सम्मान करना चाहिए और उनके प्रयासों को समझना चाहिए।


जब माता-पिता और शिक्षक मिलकर बच्चों का मार्गदर्शन करते हैं, तभी एक मजबूत, संस्कारी और सफल पीढ़ी का निर्माण होता है।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

3-30-300 नियम शहरी जीवन को हरियाली और स्वस्थ वातावरण से जोड़ने का एक आधुनिक सिद्धांत है।

 3-30-300 नियम शहरी जीवन को हरियाली और स्वस्थ वातावरण से जोड़ने का एक आधुनिक सिद्धांत है। इसे शहरी वानिकी विशेषज्ञ Cecil Konijnendijk ने प्रस्तुत किया था। 


इस नियम का अर्थ है—


🌳 3 — तीन पेड़ दिखाई दें


हर व्यक्ति को अपने घर, स्कूल या कार्यस्थल से कम-से-कम 3 बड़े पेड़ दिखाई देने चाहिए।

यह मानसिक शांति, तनाव कम करने और प्रकृति से जुड़ाव बढ़ाने में सहायक माना जाता है। 


🌿 30 — 30% हरित क्षेत्र


हर मोहल्ले या क्षेत्र में लगभग 30% पेड़ों की छाया (Tree Canopy Cover) होनी चाहिए।

इससे तापमान कम रहता है, वायु शुद्ध होती है और पर्यावरण संतुलित रहता है। 


🚶 300 — 300 मीटर के भीतर पार्क


हर नागरिक के घर से अधिकतम 300 मीटर दूरी पर एक अच्छा सार्वजनिक पार्क या हरित क्षेत्र होना चाहिए।

ताकि लोग आसानी से प्रकृति तक पहुँच सकें और स्वस्थ जीवन जी सकें। 


✨ सरल शब्दों में


“हर व्यक्ति के आसपास पर्याप्त पेड़, हरियाली और खुला पार्क होना चाहिए।”


यह नियम आज दुनिया भर में सस्टेनेबल शहरों (Sustainable Cities) और स्वस्थ शहरी जीवन के लिए अपनाया जा रहा है। 🌍🌱


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

रेल की पटरी से… खेत की मेड़ तक

 रेल की पटरी से… खेत की मेड़ तक


गांव की वह मिट्टी आज भी मुझे वैसे ही याद है जैसे किसी मां की गोद की गर्माहट हमेशा मन में बसी रहती है। मैं उसी खेत की मेड़ पर बैठी हूं, जहां से सूरज हर सुबह अपने सुनहरे हाथ फैलाकर पूरे गांव को जगाता था। हवा में आज भी वही सोंधी खुशबू है, वही शीतल बयार है, और वही दूर तक फैले हरे-भरे खेत हैं, जिनमें कभी गेहूं की बालियां हवा से बातें करती थीं।


मेरी गोद में पले-बढ़े तुम सब—छुट्टन, गिरधर, बाला, गुल्लू और चमन—मेरे लिए सिर्फ नाम नहीं थे, बल्कि मेरे खेतों की मुस्कान थे। तुम्हारी किलकारियां मेरी धरती की धड़कन थीं। मुझे नहीं लगा था कि एक दिन यही धड़कन शहर की चकाचौंध में खो जाएगी।


तुम्हें याद है न, जब तुम छोटे थे, तो मेरे आंचल में छिपकर बारिश से बचते थे। मैं तुम्हें कहानियां सुनाती थी—धरती की, मेहनत की, और उस किसान की जो अपने पसीने से पूरे देश का पेट भरता है। तब तुम हंसते थे, और कहते थे—“मां, हम बड़े होकर यहीं रहेंगे, कभी तुम्हें छोड़कर नहीं जाएंगे।”


पर समय ने करवट ली।


धीरे-धीरे गांव की सादगी तुम्हें कम लगने लगी। खेतों की हरियाली से ज्यादा तुम्हें शहर की रोशनी आकर्षित करने लगी। रेडियो पर सुनाई देने वाली खबरें, ट्रेनों की आवाजें और बसों में बैठे लोगों की बातें—सबने तुम्हारे सपनों को नया रंग दे दिया। तुमने कहा था—“मां, वहां काम मिलेगा, जिंदगी बदल जाएगी।”


मैंने रोका था तुम्हें।


मैंने कहा था—“बेटा, यह खेत तुम्हारा घर है, यह मिट्टी तुम्हारी पहचान है।” पर तुम मुस्कुरा कर चले गए थे, जैसे मां की बातों को समय के पीछे छोड़ देना आसान हो।


कुछ दिनों तक तुम्हारी चिट्ठियां आती रहीं। कभी किसी ने बताया कि फैक्ट्री में काम मिल गया है, कभी किसी ने बताया कि शहर में जिंदगी आसान नहीं है, पर चल रही है। मैं हर चिट्ठी को सीने से लगाकर पढ़ती थी, जैसे तुम मेरे सामने बैठे हो।


फिर धीरे-धीरे चिट्ठियां आनी बंद हो गईं।


और फिर आया वह समय जिसे दुनिया ने “आपातकाल” कहा—कोरोना महामारी।


शहर की गलियां बंद हो गईं। फैक्ट्रियों के शटर गिर गए। बाजारों में सन्नाटा फैल गया। और जिन हाथों ने शहरों को सजाया था, वे हाथ अब खाली हो गए।


तुम सबने फिर से गांव की ओर लौटने का फैसला किया।


लेकिन यह लौटना वैसा नहीं था जैसा तुम बचपन में छुट्टियों में आते थे। यह लौटना मजबूरी का था, थकान का था, और भय से भरा हुआ था। तुम पैदल ही निकल पड़े—रेल की पटरी के किनारे-किनारे चलते हुए, भूख और थकान को पीछे छोड़ते हुए, उम्मीद के सहारे।


मैं खेत की मेड़ पर बैठी हर दिन तुम्हारी राह देखती रही।


दूर से धूल उड़ती, तो लगता तुम आ रहे हो। कभी किसी परछाई में तुम्हारा चेहरा ढूंढती, तो कभी हवा की आवाज में तुम्हारी हंसी सुनाई देती।


“छुट्टन का क्या हाल है?” मैं पूछती हवा से। “गिरधर ठीक तो होगा?” मैं खेतों से सवाल करती। “बाला, गुल्लू, चमन… सब कैसे होंगे?” मेरी आंखें हर दिशा में उन्हें ढूंढती रहतीं।


एक दिन दूर से एक यात्री मिला। उसकी आंखों में डर था, पैरों में छाले थे, और चेहरे पर थकान का पहाड़।


मैंने पूछा—“मेरे बच्चे… छुट्टन, गिरधर… क्या तुमने उन्हें देखा है?”


वह कुछ देर चुप रहा। फिर धीमी आवाज में बोला— “बहुत लंबा रास्ता है मां… रेल की पटरी पर भीड़ थी… भूख थी… और थकान भी… कुछ लोग आगे निकल गए, कुछ पीछे रह गए… और कुछ…”


उसने बात पूरी नहीं की।


लेकिन उसकी आंखों ने सब कह दिया।


मेरे हाथ कांप गए। दिल जैसे किसी ने रोक दिया हो। हवा अचानक भारी लगने लगी। खेतों की हरियाली धुंधली हो गई।


मैं समझ गई थी कि शहर की चकाचौंध ने सिर्फ सपने नहीं लिए थे… उसने कुछ जीवन भी निगल लिए थे।


रेल की पटरी, जो कभी तुम्हारे सपनों का रास्ता लगी थी, अब खामोश कहानियों की गवाह बन चुकी थी। वहां से कोई हंसी नहीं आई, सिर्फ खबरें आईं—लाशों की, भूख की, और थकी हुई सांसों की।


कहा गया कि कहीं किसी पटरी पर किसी का शरीर मिला… किसी के हाथ में अब भी रोटी का टुकड़ा था… किसी की आंखें खुली रह गई थीं जैसे रास्ता अब भी पूरा करना हो।


मैं खेत की मेड़ पर बैठी रह गई।


मेरा आंचल अब भी फैला हुआ था, जैसे मैं अब भी तुम्हें समेट सकती हूं। लेकिन अब वहां दौड़कर आने वाले कदम नहीं थे।


समय बीतता गया।


गांव फिर धीरे-धीरे संभलने लगा। खेतों में फिर से फसलें लहलहाने लगीं। पर मेरे भीतर का खालीपन वैसा ही रहा।


मैं हर गुजरते दिन से पूछती— “क्या सच में रेल की पटरी से खेत की मेड़ तक का सफर खत्म हो गया?”


और हर बार हवा चुप रहती।


आज भी मैं वहीं बैठी हूं, उसी मेड़ पर, जहां कभी तुम खेला करते थे। सूरज अब भी उगता है, खेत अब भी हरे हैं, लेकिन मेरी आंखों में वह इंतजार अब भी जिंदा है।


कभी-कभी लगता है कि दूर कहीं से तुम्हारी आवाज आएगी— “मां, हम आ गए…”


पर अब सिर्फ हवा आती है… और गुजर जाती है।


रेल की पटरी से खेत की मेड़ तक का वह सफर अब सिर्फ याद बनकर रह गया है—एक ऐसी याद, जिसमें उम्मीद भी थी और टूटे हुए सपनों की परछाईं भी।


और मैं… अब भी इंतजार में हूं।


शायद हमेशा रहूंगी।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

दिल्ली की बर्फ़… गुल्लू का गोला

 

दिल्ली की बर्फ़… गुल्लू का गोला

दिल्ली की तपती दोपहरें और धूल भरी शामें उस झुग्गी-बस्ती की रोज़मर्रा की साथी थीं, जहाँ गुल्लू अपनी माँ के साथ रहता था। छोटी-सी झुग्गी, फटी हुई टीन की छत, दीवारों पर मौसम की मार के निशान और एक कोने में टंगी भगवान की धुंधली-सी तस्वीर—यही उनका पूरा संसार था।

गुल्लू उम्र में भले ही छोटा था, पर उसकी आँखों में बड़े सपने थे। वह अक्सर सड़क पर खड़े बर्फ़ के गोले वाले को देखा करता था। रंग-बिरंगे सिरप, बर्फ़ की ठंडी परत और बच्चों की खिलखिलाहट उसे किसी जादुई दुनिया जैसी लगती थी। लेकिन यह जादू उसके हिस्से में कभी नहीं आता था, क्योंकि उसकी माँ के पास दो समय की रोटी जुटा पाना भी किसी जंग से कम नहीं था।

उस दिन भी वही हुआ।

गुल्लू झुग्गी के बाहर खड़ा था। उसकी निगाहें बर्फ़ के गोले वाले की रेहड़ी पर थीं, जहाँ बच्चे घेरा बनाकर खड़े थे। कोई गुलाबी गोला खा रहा था, कोई नीला, कोई हरा। हर गोले में जैसे खुशी घुली हुई थी।

माँ झुग्गी के अंदर पुरानी फटी चटाई पर बैठी थी। उसके हाथों में खाली थैला था और आँखों में थकान।

“माँ… एक गोला ले दो ना,” गुल्लू ने धीमे स्वर में कहा।

माँ ने एक लंबी साँस ली। वह जानती थी कि उसकी जेब में आज भी कुछ नहीं है। पति की मृत्यु के बाद जिंदगी जैसे ठहर-सी गई थी। मजदूरी मिलती भी तो बस पेट भरने लायक। कई बार तो शाम का खाना भी अधूरा रह जाता।

“गुल्लू, अंदर आ जा बेटा। धूप बहुत तेज़ है, लू लग जाएगी,” माँ ने उसे पुकारा।

“माँ, सब बच्चे खा रहे हैं… मैं भी खाऊँगा,” गुल्लू ने मासूमियत से कहा।

माँ का दिल भर आया। वह चाहती थी कि अपने बच्चे की हर इच्छा पूरी करे, लेकिन हालात हर बार बीच में खड़े हो जाते थे।

“बेटा, वो ठंडी चीज़ है… बीमार कर देती है,” माँ ने उसे समझाने की कोशिश की।

गुल्लू ने होंठ सिकोड़े। “माँ, तू हमेशा मना करती है… मुझे पता है तेरे पास पैसे नहीं हैं।”

यह सुनकर माँ चुप हो गई। उसकी आँखें भर आईं। गुल्लू अभी छोटा था, लेकिन हालात ने उसे समझदार बना दिया था।

“बापू होते तो तू मुझे रोज़ गोला दिलाते न?” गुल्लू ने मासूम सवाल किया।

माँ के अंदर जैसे कुछ टूट गया। वह गुल्लू को खींचकर भीतर ले गई और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, “तू चिंता मत कर बेटा… तू बड़ा होकर बहुत पैसा कमाएगा। फिर तू मुझे रोज़ बर्फ़ का गोला खिलाएगा।”

गुल्लू ने यह सुनकर मुस्कुराया। उसकी आँखों में चमक आ गई। वह दौड़कर भगवान की तस्वीर के सामने गया। छोटे-छोटे हाथ जोड़कर वह कुछ फुसफुसाया—पता नहीं क्या, शायद कोई प्रार्थना या कोई इच्छा।

फिर वह चुपचाप आकर माँ के पास लेट गया।

शाम धीरे-धीरे ढलने लगी। बाहर बच्चों की आवाज़ें कम होने लगीं। रेहड़ी वाला भी धीरे-धीरे आगे बढ़ गया। लेकिन गुल्लू की आँखों में अभी भी बर्फ़ के गोले तैर रहे थे।

अचानक मौसम बदलने लगा।

आसमान में काले बादल घिर आए। तेज़ हवाएँ चलने लगीं। धूल उड़ने लगी। लोगों ने अपने-अपने ठिकानों की ओर भागना शुरू कर दिया। किसी को उम्मीद नहीं थी कि दिल्ली की गर्मी में ऐसा मौसम भी आ सकता है।

और फिर जो हुआ, उसने सबको चौंका दिया।

तेज़ बारिश के साथ ओले गिरने लगे। छोटे-छोटे सफेद टुकड़े आसमान से ऐसे बरसने लगे जैसे किसी ने आकाश से रुई बिखेर दी हो। कुछ ही मिनटों में सड़कें सफेद चादर से ढक गईं।

बच्चे डरकर अपने घरों में भाग गए। लेकिन गुल्लू बाहर निकल आया।

वह हैरानी से आसमान को देख रहा था। उसके लिए यह दृश्य किसी सपने से कम नहीं था। उसने हाथ फैलाकर ओले पकड़ने शुरू किए। ठंडी-ठंडी बर्फ़ उसके हाथों में पिघल रही थी।

“माँ! माँ! देखो… बर्फ़!” वह दौड़ता हुआ अंदर गया।

माँ घबरा गई। “क्या हुआ बेटा?”

“बाहर आओ माँ!” गुल्लू ने उसका हाथ खींचा।

माँ बाहर आई और जो देखा, वह स्तब्ध रह गई। पूरी गली सफेद हो चुकी थी। ओलों की बरसात अब भी चल रही थी।

तभी दूर से वही बर्फ़ के गोले वाला अपनी रेहड़ी को बचाने की कोशिश करता दिखा। उसकी रेहड़ी एक ओट में खड़ी थी और वह जल्दी-जल्दी सामान समेट रहा था।

गुल्लू दौड़ता हुआ गया और अपनी मुट्ठी में ओले भरकर वापस आ गया।

“माँ, देखो… गोला बन गया!” उसने खुशी से कहा।

माँ मुस्कुराई, लेकिन उसकी आँखों में आश्चर्य भी था। वह समझ नहीं पा रही थी कि इस अचानक आई बरसात को क्या कहे।

रेहड़ी वाला भी पास आ गया। उसने जल्दी से अपनी बोतलें निकालीं—लाल, नीली, हरी, पीली सिरप की बोतलें। उसने ओलों को इकट्ठा किया और गुल्लू के हाथों में रखे बर्फ़ के ढेर को रंगीन और मीठा बना दिया।

“ले बेटा… तेरा गोला तैयार है,” उसने मुस्कुराते हुए कहा।

गुल्लू की आँखों में चमक और बढ़ गई। वह खुशी से झूम उठा।

माँ ने आसमान की ओर देखा। उसकी आँखें नम थीं, लेकिन होंठों पर हल्की मुस्कान थी। वह मन ही मन बोली—“हे भगवान… तू सच में सुनता है।”

गुल्लू ने पहला निवाला लिया। उसकी आँखें खुशी से बंद हो गईं।

“माँ, ये सबसे अच्छा गोला है!” वह बोला।

माँ ने उसका सिर सहलाया। उसके दिल से एक लंबी थकान जैसे उतर गई हो।

उस दिन गुल्लू और उसकी माँ दोनों ने महसूस किया कि कभी-कभी जिंदगी में उम्मीदें अचानक किसी चमत्कार की तरह पूरी हो जाती हैं। शायद यह प्रकृति का संयोग था, या शायद किसी आस्था का फल।

पर उनके लिए यह एक ऐसा पल था जिसे वे कभी नहीं भूल सकते थे।

गली अब भी सफेद थी, हवा अब भी ठंडी थी, लेकिन झुग्गी के अंदर एक छोटी-सी गर्म खुशी जगमगा रही थी।

और गुल्लू के चेहरे पर बर्फ़ का गोला सिर्फ मिठास नहीं था… वह एक सपने की शुरुआत थी।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

अगर नाम बनाना है, तो फैसले तुम्हारे अपने होने चाहिए

 अगर नाम बनाना है, तो फैसले तुम्हारे अपने होने चाहिए


दुनिया हमेशा सलाह देगी।

कोई कहेगा — “ये मत करो…”

कोई बोलेगा — “लोग क्या कहेंगे?”

तो कोई तुम्हारे सपनों को अपनी सोच की सीमाओं में बाँधने की कोशिश करेगा।


लेकिन सच यही है कि

अगर जीवन में अपनी पहचान बनानी है,

तो फैसले भी अपने लेने पड़ते हैं।


हर बड़ा इंसान कभी न कभी अकेला पड़ा है,

क्योंकि उसने भीड़ की नहीं,

अपने मन की सुनी थी।


दूसरों की राय सुनना गलत नहीं,

लेकिन अपनी सोच खो देना गलत है।

क्योंकि जब सफलता मिलती है,

तो लोग सिर्फ परिणाम देखते हैं,

संघर्ष और साहस नहीं।


जीवन आपका है,

तो दिशा भी आपकी होनी चाहिए।

गलतियाँ होंगी, ठोकरें भी लगेंगी,

लेकिन उन ठोकरों से मिली सीख

आपको और मजबूत बनाएगी।


याद रखिए —

दूसरों के फैसलों पर चलकर

आप शायद सुरक्षित रह सकते हैं,

लेकिन अपनी पहचान नहीं बना सकते।


जो लोग इतिहास लिखते हैं,

वे अक्सर वही होते हैं

जो अपने फैसलों पर भरोसा करना जानते हैं।


इसलिए…

अगर नाम बनाना है,

तो अपने सपनों की आवाज़ सुनिए,

अपने फैसलों पर विश्वास रखिए

और आगे बढ़िए।


क्योंकि

भीड़ रास्ते पर चलती है,

लेकिन रास्ते बनाने वाले

अपने निर्णय खुद लेते हैं।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन