https://youtu.be/caJpXUOs5c8?si=X05BZp2nWFyY4LaE
साहित्य सिंधु **गद्य-पद्य संग्रह**
Monday, 20 April 2026
Monday, 30 March 2026
शीर्षक: “राख से उठती हुई साँस”
शीर्षक: “राख से उठती हुई साँस”
नवंबर की ठिठुरन से लेकर
आज की धूप तक,
कितनी ही आंधियाँ आईं—
कुछ बाहर चलीं,
कुछ भीतर घर बना गईं।
हौंसले टूटे भी,
और फिर किसी अदृश्य हाथ ने
धीरे से थाम लिया,
मानो कह रहा हो—
“अभी अंत नहीं,
अभी तुम्हारी कहानी बाकी है…”
जिस माँ की ममता में
आकाश बसता है,
उसी माँ की छाया जब
साया बनकर छल जाए,
तो बेटे का मन
कैसे विश्वास करे फिर किसी उजाले पर?
बीमारी की चादर में लिपटा बेटा,
आँखों में उम्मीद लिए—
पर अपनों की परछाइयाँ
पीछे मुड़कर देखना भी भूल गईं।
बहू की थकी पलकों पर
संघर्ष की लकीरें थीं,
और बच्चों के मासूम प्रश्न—
“क्या अपना घर भी
कभी पराया हो जाता है?”
और अब सुनो—
उस बहन की कहानी,
जो कभी भाई की धड़कन थी…
ये वही बहन है—
जिसके हर दर्द पर
भाई ने मरहम रखा,
जिसकी हर पुकार पर
वह छाया बनकर खड़ा रहा।
जब-जब उसके घर में
बीमारी ने दस्तक दी,
तब-तब उसी भाई ने
अस्पताल के बिल चुकाए,
अपने सपनों को एक तरफ़ रख
उसकी सांसों को बचाया।
उसके हर संघर्ष में
भाई ने कंधा दिया,
हर आँसू को
अपनी हथेलियों में छुपाया।
पर देखो समय का खेल—
ये वही बहन है
जिसने शादी के
छह महीने में ही
अपने पति का साथ छोड़ दिया,
और फिर सात वर्षों तक
रिश्तों को अदालतों में घसीटा,
अपने ही परिवार और खानदान पर
कलंक के छींटे उछाले।
वक्त ने करवट ली—
वही टूटा रिश्ता
फिर से जुड़ गया,
वही पति
फिर जीवनसाथी बन गया।
पर विडंबना देखो—
जिस घर को फिर बसाया,
उसी के सहारे
उसने अपने ही भाई का
घर उजाड़ दिया।
भाई का हक,
जो खून की स्याही से लिखा था,
उसे लालच की आग में
राख कर दिया गया।
छत…
जो सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं होती,
बल्कि विश्वास का आसमान होती है—
उसे भी छीन लिया गया,
और घर,
जो कभी मंदिर था,
उजड़े हुए शब्दों की तरह
बिखर गया।
माँ, बेटी, दामाद—
जब एक साथ हो जाएँ
अन्याय के पक्ष में,
तो सच की आवाज़
अक्सर भीड़ में दब जाती है।
परंतु…
सच मरता नहीं,
वह चुप रहकर
समय का इंतज़ार करता है।
और यह भी उतना ही सत्य है—
कि जो सच्चा होता है,
उसके रास्ते में चाहे
कितनी ही रुकावटें खड़ी कर दी जाएँ,
वे एक-एक कर
अदृश्य हो जाती हैं।
क्योंकि सत्य के साथ
किसी का नाम नहीं जुड़ा होता,
वहाँ स्वयं ईश्वर
पथ-प्रदर्शक बन जाता है।
आज के इस युग में,
जहाँ चालाकी को चतुराई कहा जाता है,
और धोखे को हुनर—
वहाँ सच्चाई अक्सर
मूर्खता का नाम पाती है।
धोखेबाज़ों को लगता है—
“किसी को नहीं पता
हमने क्या किया…”
पर वे भूल जाते हैं—
दुनिया की नज़रों से
भले ही बच जाएँ,
पर अपने ज़मीर से
कभी नहीं बच सकते।
रात के सन्नाटे में,
जब हर आवाज़ थम जाती है,
तब आत्मा
धीरे से पूछती है—
“क्या जो किया, वह सही था?”
और उस प्रश्न का उत्तर
न कोई झूठ छुपा सकता है,
न कोई बहाना मिटा सकता है।
क्योंकि—
ज़मीर की अदालत में
हर इंसान
खुद ही गवाह होता है,
खुद ही न्यायाधीश।
आज भले ही
धोखेबाज़ों के घर
दीप जलते दिखते हैं,
और सच्चे लोगों के आँगन में
अंधेरा पसरा होता है—
पर यह अंधेरा स्थायी नहीं होता।
ईश्वर की अदालत में
न कोई रिश्वत चलती है,
न कोई झूठ टिकता है।
हर आँसू
एक दिन न्याय बनता है,
और हर अन्याय
अपने अंत तक पहुँचता है।
याद रखो—
जो दूसरों का घर उजाड़ते हैं,
उनकी नींव भी
कभी न कभी हिलती है।
और जो सहते हैं,
टूटकर भी टिके रहते हैं—
उन्हीं के भीतर
सबसे बड़ी शक्ति जन्म लेती है।
यह कविता केवल दर्द नहीं,
एक चेतावनी है—
कि रिश्ते अगर स्वार्थ से चलेंगे,
तो अंत में
सब कुछ खो जाएगा।
और अगर जीवन तुम्हें
ऐसी अग्निपरीक्षा में डाले,
तो टूटना मत—
क्योंकि राख से ही
नई शुरुआत होती है।
ईश्वर देर करता है,
पर अंधेर नहीं—
वह हर सच्चे मन के लिए
रास्ते की हर बाधा को
एक दिन
खुद ही मिटा देता है।
इसलिए…
चलते रहो,
सहते रहो,
पर झुको मत अन्याय के आगे—
क्योंकि सत्य की राह कठिन जरूर है,
पर अंत में
वही सबसे उज्ज्वल होती है।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
उपर्युक्त कविता का एक–एक शब्द अनुभव की आधारशिला पर निर्मित है जिसकी सच्चाई को जिया है, देखा है, महसूस किया है। एक–एक शब्द को लिखते हुए बीते नासूर मंज़र सामने आ रहे हैं। एक लालची औरत जो मां, बहन, बेटी, बहू, बुआ सभी रूपों में है। वह किसी की बहन थी किसी की बेटी किसी की ननद....अनेक रूप पर है एक औरत। जी हां, एक औरत जिसने नारी की गरिमा को दागदार किया। गंदा खेल खेलकर भी विजेता है, पर ऊपर वाले की अदालत में उसको कटघरे में ही खड़े होना है। https://www.amazon.in/Nirupama-Sangharsho-Sailab-%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%AE%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%98%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A5%8B/dp/9394176438
क्या लाया है जो साथ ले जाएगा।
यहीं का कमाया यहीं पर रह जाएगा।
लूटा जो तूने अपने स्वार्थ के लिए
किसी अपने का आशियाना।
तो ध्यान रख
अन्तिम साँसों में माफ़ी को भी तरस जाएगा।
क्योंकि
ऐसे इंसानों को माफ़ी तो क्या फांसी का फंदा भी नहीं मिलता है।
ऊपर वाले की अदालत में सिर्फ़ और सिर्फ़ दूसरा जन्म कुत्ते का ही मिलता है।
जो भटकता है दर-दर, ठोकरों में ठुकराया जाता है।
आशियाना छीनकर किसी अपने का वो...
अपने परिवार के साथ कुत्ते का ही जन्म बार-बार पाता है।
Sunday, 29 March 2026
“रिश्तों का अपहरण” कविता
“रिश्तों का अपहरण”
वो बहन नहीं—मधु का मुखौटा थी,
जिसने ममता का मान गिराया,
राखी के धागों की मर्यादा
स्वार्थ की अग्नि में जलाया।
वो बहनोई नहीं—मोह का व्यापारी,
जिसने घर-घर सौदे किए,
जिस थाली में थूका करता था,
आज उसी के कण-कण जीए।
वो भांजा नहीं—कपट का अंकुर,
जिसने संस्कारों को त्याग दिया,
मामा के आँगन की छाया को
लालच की धूप में बाँट दिया।
वो भांजी नहीं—विष-हँसी की छाया,
जिसकी मुस्कान में छल बसा,
निर्दोष बचपन की आड़ में
हर रिश्ते का सच ही धँसा।
भाई के हक पर जो डाका डाले,
वो कैसा अपना कहलाता है?
जिसने रक्त के रिश्तों को तोड़ा,
वो सुख से कब मुस्काता है?
थूका था जिसने उस चौखट पर,
आज उसी का अन्न निगलता है,
कर्मों का दर्पण झूठ नहीं बोलता—
हर चेहरा सच उगलता है।
बच्चों की हाय जब लगती है,
तो भाग्य भी रूठ ही जाता है,
अधिकार छीनने वाला अंत में
खुद से ही छूट ही जाता है।
सोने के महल भी ढह जाते हैं,
जब नींव में आँसू होते हैं,
धोखे की दीवारें गिरती हैं—
जब सत्य के पत्थर होते हैं।
सीख यही है हर इंसान के लिए—
रिश्ते धन से ऊपर होते हैं,
जो अपनों को ही लूट गया,
वो जीवन भर रोते हैं।
अधिकार नहीं—आशीष कमाओ,
सत्य के पथ पर चलना सीखो,
वरना समय की कठोर अदालत में
हर छल का दंड ही देखो।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
Saturday, 14 March 2026
कौन है सच का वारिस
शीर्षक: “कौन है सच का वारिस?”
जिसने आँगन में धूप सहेजी,
जिसने छाँव को घर बनाया,
जिसने माँ की थकी हथेली को
हर दिन अपने माथे लगाया।
जिसने पिता की झुकी कमर को
अपने कंधों का बल दिया,
जिसने सास–ससुर को भी
माँ–बाप सा ही मान लिया।
वही बेटा… वही बहू
आज कटघरे में खड़े किए जाते हैं,
और जो दूर से रिश्ते निभाते थे
वे वारिस बनकर घर ले जाते हैं।
बेटी–दामाद मुस्काते हैं
काग़ज़ों के खेल दिखाकर,
मौके की नब्ज़ पहचानकर
हक़ का दीपक ही बुझाकर।
सब कहते हैं—
“देखो, कितने भाग्यशाली हैं माँ–बाप,
बेटी ने कितना साथ दिया!”
पर कोई नहीं पढ़ पाता
उन आँखों का मौन जिया।
जो बेटा हर आँधी में
दीवार बनकर खड़ा रहा,
जो बहू हर अपमान सहकर भी
घर का दीप जलाती रही।
वही आज लालच के बाज़ार में
सबसे सस्ता करार दिया जाता है,
और जो जीवन भर दूर रहे
उन्हें सबसे बड़ा उपकार बताया जाता है।
संपत्ति के काग़ज़ों पर
रिश्तों की कीमत लिख दी जाती है,
सच की आवाज़ दबाकर
झूठ की जय-जयकार की जाती है।
समाज की चौपाल पर
फैसले भी कितने अजीब होते हैं—
जो त्याग करे वह अपराधी,
जो हड़पे वही नसीब होते हैं।
पर इतिहास गवाह रहेगा—
काग़ज़ घर के मालिक बना सकते हैं,
पर सेवा और त्याग ही
दिलों के असली वारिस कहलाते हैं।
एक दिन सच की धूप निकलेगी,
और झूठ की छाया सिमट जाएगी,
जिस बेटे ने जीवन भर दिया
वही विरासत की असली कहानी कहलाएगी।
जब दुख के बादल घिर–घिरकर आते हैं।
तब मन के उद्गार शब्दों में बँध जाते हैं।
बीती बातें, बीते लम्हें नासूर बने छिपे कहीं
सोच की दीवार से बाहर खिड़की से झांकते हैं।
कहते हैं छला गया है जो सच्चा इंसान
सब्र उसका खाली नहीं जाएगा।
जिसने लूटा है घर उसका जानबूझकर
एक दिन वो बिन पानी ही मर जाएगा।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
Friday, 13 March 2026
फेसबुक के कवि (हास्य–व्यंगात्मक कविता)
फेसबुक के कवि
(हास्य-व्यंग्यात्मक कविता)
फेसबुक की फुलवारी में, कवियों की भरमार,
जिस डाली पर दृष्टि डालिए, लटका एक विचार।
कोई दर्द की गठरी लेकर, कोई प्रेम-पिटारा,
दो पंक्तियों में बाँट रहा है जीवन-सागर सारा।
कल तक जो “हाय-हेलो” में भी, अटक-अटक रह जाते थे,
आज वही भावों के घोड़े पर, छंदों सहित इठलाते हैं।
सुबह-सुबह ही पोस्ट चिपकती—
“रात बहुत संगीन थी”,
नीचे देखा, फोटो नयी थी,
ऊपर लिखी “ज़मीन थी”!
कोई लिखता—
“चाँद मेरी चौखट पर रोया,
सूरज मेरे द्वारे सोया”,
पाठक बेचारा सोच रहा है—
“आख़िर ये सब किसने ढोया?”
उपमाओं के उधार-गृह से, शब्द उठा लाते हैं,
रूपक की रंगरेज़ी करके, खुद को तुलसी बताते हैं।
अनुप्रास की ऐसी आंधी, अक्षर-अक्षर काँप उठे,
अर्थ बेचारा कोने बैठा, सिर पर रखकर हाथ लिये।
नयनों को वे नीर बताते, अधरों को अंगार,
जुल्फों में बरसात बाँधते, गालों में गुलज़ार।
सेल्फी के संग शेर लगाकर, बनते भाव-विभोर,
मानो काव्य-गंगा बहती, मोबाइल के इक छोर!
“मैं टूटा हूँ, बिखरा हूँ,
जग से थोड़ा खिसका हूँ”,
ऐसी पोस्टें पढ़-पढ़कर अब
लगता—कम खिसका हूँ!
लाइक यहाँ पर लक्ष्मी मैया, कमेंट बड़े वरदान,
“वाह-वाह” के पुष्प चढ़ाकर, करते सब सम्मान।
जिसको बीस प्रशंसा मिल जाए, वह भवभूति कहलाए,
जिसके सौ दिल एकत्र हो जाएँ, वह कालिदास बन जाए!
कुछ कवियों की रचना में तो, ऐसा घना कुहासा,
चार पंक्ति में सात पहेली, आठ उपमाएँ पासा।
पूछो— “भाई, आशय क्या है?”
कहते— “यह अनुभूति है”,
समझ न आए तो दोष तुम्हारा,
उनकी कहाँ त्रुटि है!
मित्र-मंडली भी अद्भुत देखो, कैसी नीति निभाती है,
चाहे कविता उलटी-पुलटी, “लाजवाब” बतलाती है।
एक ने लिखा— “पत्थर हँसते, पत्ते करते शोर”,
दूजे ने कमेंट किया— “वाह! हिला दिया मन-डोर!”
पर इस हँसी के बीच कहीं यह सच्चाई भी रहती है,
भीड़ बहुत है शब्दों की पर, चुप्पी गहरी बहती है।
कुछ चेहरे सचमुच लिखते हैं अपने मन की पीड़ा,
कुछ रचनाएँ जन्म लेती हैं सहकर जीवन-क्रीड़ा।
कवि वही जो शब्द नहीं, संवेदना भी गढ़ता हो,
जो भाषा के आँगन में सच का दीपक धरता हो।
पोस्ट बनाना सरल बहुत है, कविता होना साधन,
जिसमें जीवन तपकर निकले, वही काव्य का आँगन।
इसलिए हे फेसबुक-कवि, व्यंग्य हमारा मान,
थोड़ा हँस लो, थोड़ा सोचो, थोड़ा रखो ध्यान।
शब्द अगर बस शोर बनेंगे, खो जाएगा सार,
कविता तब ही जीवित होगी, जब हो सच्चा प्यार।
फेसबुक की इस दुनिया में, लिखना कोई पाप नहीं,
पर कविता की देहरी पर बस, दिखावा स्वीकार नहीं।
मन के कुंभ में भाव पके हों, भाषा हो सुघड़, गंभीर,
तब ही कविता फूल बनेगी, वरना केवल तदबीर।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
Sunday, 8 March 2026
नारी : नवचेतना-नवप्रभा
नारी : नवचेतना-नवप्रभा
नारी—
ममता-मंदाकिनी-मधुरिमा,
करुणा-किरण-कुसुमिता;
सृजन-सरिता-सुगंधिता,
संघर्ष-संकल्प-स्फुरिता।
वह—
धैर्य-धरित्री-सी धीर,
आत्मविश्वास-अग्नि-दीप्त;
आकाश-आकांक्षा-असीम,
स्वप्न-सुमन-संचित।
उसकी दृष्टि में
प्रज्ञा-प्रभात-प्रकाश,
उसके हृदय में
संवेदना-सरस-संसार।
वह—
त्याग-तपोवन-तरुवर,
साहस-सूर्य-समुज्ज्वल;
विपदा-वज्र-वर्षा में भी
आशा-अंकुर-अविकल।
कभी
ममता-मधु-मंजरी बन
दुख-दग्ध-मन सींचे,
कभी
चेतना-चण्डिका बन
अन्याय-अंधकार भींचे।
वह—
संस्कृति-सरोवर-सुगंध,
समता-सम्मान-साधना;
मानवता-मंगल-मालिनी,
भविष्य-भोर-भावना।
आओ—
नारी-नमन-नवगीत गाएँ,
सम्मान-सुमन-सजाएँ;
क्योंकि वही है—
जीवन-ज्योति-जननी,
सृष्टि-सृजन-साधना।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
Tuesday, 3 March 2026
धुलेंडी : रंगों का आत्मसंवाद
धुलेंडी : रंगों का आत्मसंवाद
राख से उठती रागिनी,
धधकती धूल में धुला अभिमान,
होलिका दहन की ज्वाला से
आज जन्मा नव-इंसान।
रंगों ने रच दी रचना नई,
हर कण में करुणा की काया,
सूनी साँसों की सरगम ने
जीवन का जश्न मनाया।
गुलाल नहीं — ये गालों पर
गर्वित गाथा का स्पर्श है,
भीतर जमी हुई बर्फ़ों पर
बसंत का मधुर उत्कर्ष है।
लाल रंग ललकार बना है,
अन्यायों से जंग का,
पीला रंग प्रतीक बना है
आस्था के उमंग का।
नीला नभ-सा निडर बने मन,
हरा धरा-सा धैर्य धरे,
भीतर के भय-भस्मासुर को
हँसकर हर मानव परे।
धुलेंडी की यह धूल नहीं,
संघर्षों का श्रृंगार है,
जो गिरकर भी उठ खड़ा हो —
वही सच्चा त्यौहार है।
रंग नहीं ये केवल बाहर,
ये अंतर की आभा हैं,
जो विष-बेलें मन में उगतीं —
उन पर प्रहार की प्रभा हैं।
आओ आज धुलेंडी पर हम
द्वेष-दहन का व्रत लें,
मन की मलिनता माटी में मिलाकर
मानवता का रंग गढ़ें।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन