Friday, 23 January 2026

बसंत पंचमी — ज्ञान, सृजन और नवचेतना का पर्व – डॉ नीरू मोहन

 बसंत पंचमी — ज्ञान, सृजन और नवचेतना का पर्व

पीली धूप ने जब धरती को चूमा,

हिम-नींद से जागा हर कोना-कोना।

सरसों हँसी, अमुआ मुसकाया,

बसंत पंचमी ने रंग रचाया।

वीणा की तान में बसी विद्या-ज्योति,

माँ शारदे आईं, करुणा पिरोती।

शब्दों में मधु, स्वरों में उजास,

कलम को मिली सृजन की प्यास।

ऋतु के आँचल में नव अंकुर फूटे,

मन के जाले, शीत-ग्रंथ टूटे।

पीत-वसन में आशा हँसती,

अज्ञान की छाया दूर सरकती।

किसान के खेतों में सपनों की बालें,

छात्र-पथ पर जलते दीप उजाले।

कलाएँ जागें, विज्ञान निखरे,

संस्कृति के स्वर नभ में बिखरे।

बसंत पंचमी—आरंभ का घोष,

जीवन में लय, विचार में उद्‍घोष।

ज्ञान, सौंदर्य, श्रम का संगम—

यही है बसंत का पावन आगमन।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

26 जनवरी : नवचेतना का उद्घोष – डॉ नीरू मोहन

 26 जनवरी : नवचेतना का उद्घोष

यह केवल एक तारीख नहीं,

यह संकल्प की वह भोर है

जब शब्द बने संविधान,

और विचारों को मिला राष्ट्र।

लाल क़िले से नहीं,

जन-जन के मन से उठी थी

लोकतंत्र की पहली आवाज़—

“हम भारत के लोग…”

स्याही में नहीं,

रक्त-त्याग में लिखा गया

न्याय, समता और स्वतंत्रता का अध्याय।

आज के युवाओ!

यह ध्वज केवल लहराने को नहीं,

दायित्व का संकेत है—

नीला अशोकचक्र पूछता है तुमसे

क्या गति है तुम्हारे कर्मों में?

केसरिया याद दिलाता है

बलिदान सिर्फ़ इतिहास नहीं,

वर्तमान की परीक्षा भी है।

समाज के कंधों पर टिकी है

संविधान की मर्यादा—

जहाँ अधिकार तभी अर्थ रखते हैं

जब कर्तव्य जाग्रत हों।

नारे नहीं, निर्माण चाहिए,

भीड़ नहीं, विवेक चाहिए,

वायरल पोस्ट नहीं,

सार्थक प्रयोजन चाहिए।

आओ!

26 जनवरी को

केवल परेड में नहीं,

अपने आचरण में उतारें—

भाषा में संयम,

विचार में वैज्ञानिकता,

और कर्म में राष्ट्रबोध।

जब युवा सजग होगा,

तब लोकतंत्र सशक्त होगा;

जब समाज संवेदनशील होगा,

तब संविधान जीवित होगा।

यही गणतंत्र का नवीनीकरण है—

हर पीढ़ी द्वारा

फिर-फिर किया गया वचन।

🇮🇳 जय संविधान। जय भारत। 🇮🇳

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

Monday, 19 January 2026

जनवरी में लगने वाला दिखावे का मेला #डॉ नीरू मोहन

जनवरी में लगने वाला दिखावे का मेला

हर वर्ष जनवरी आती है,

सर्द हवा के साथ

एक जाना-पहचाना मेला भी—

विश्व हिंदी पुस्तक मेला।

तारीखें बदलती नहीं,

केवल पोस्टर नए होते हैं,

वही मंच, वही भाषण,

वही चमकदार बैनर,

वही औपचारिक मुस्कानें।

पुस्तकें फिर सजती हैं

शीशे की अलमारियों में,

छूने के लिए नहीं—

देखने के लिए।

पन्ने ठिठुरते हैं

भीड़ की गर्मी में भी।

यहाँ हर साल

लेखक बढ़ते जाते हैं,

किताबें बढ़ती जाती हैं,

पर पाठक—

हर जनवरी

कुछ और कम हो जाते हैं।

भीड़ है,

पर पढ़ने की नहीं,

भीड़ है

फोटो, रील, स्टेटस की।

किताब हाथ में

सिर्फ़ फ्रेम के लिए है।

जनवरी का यह मेला

अब आदत बन गया है—

एक रस्म,

एक औपचारिकता,

जहाँ हिंदी

सम्मान नहीं

प्रदर्शन का विषय है।

हर वर्ष यही दोहराव,

हर वर्ष वही प्रश्न—

क्या कभी इस मेले में

पाठक लौटेंगे?

या यह मेला

सिर्फ़ भीड़ का मेला

बनकर ही रह जाएगा?

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन 

विश्व पुस्तक मेला #डॉ नीरू मोहन

पुस्तकों का मेला लगता हर वर्ष है।

पोस्टरों में चमक, चेहरों पर हर्ष है।

पर! हर हाथ में किताब नहीं,

हर हाथ में कैमरा है—

पन्नों से ज़्यादा

पोस्ट की चिंता है।


मंच सजे हैं, भाषण गूंजे,

तालियाँ बजतीं—

पर सुनने वाला मन

कहीं खो गया है।

लेखक हैं, किताबें हैं,

पर पाठक

कुर्सियों के बीच

दुर्लभ प्रजाति-सा बैठा है।


भीड़ है—

हाँ, बहुत भीड़ है,

पर यह भीड़ पढ़ने नहीं आई,

यह आई है

दिखने, दिखाने,

सेल्फ़ी लेने,

स्टेटस लगाने के लिए।


किताबें बाँटी जाती हैं

जैसे विज़िटिंग कार्ड,

पढ़ी जाएँगी या नहीं—

यह प्रश्न

अब अप्रासंगिक है।

महत्वपूर्ण यह है कि

किसके साथ फोटो खिंची।


हिंदी यहाँ

सम्मानित नहीं,

प्रदर्शित है—

एक औपचारिक रस्म की तरह,

जहाँ शब्द

सजावट बन गए हैं

और विचार

कोने में खड़े हैं।


यह मेला

पुस्तकों का नहीं,

पब्लिसिटी का उत्सव है—

जहाँ पढ़ना

सबसे शांत,

सबसे अकेली क्रिया बन चुका है।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन 

Tuesday, 13 January 2026

क्या भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली अपने अंत की ओर बढ़ रही है? डॉ नीरू मोहन

क्या भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली अपने अंत की ओर बढ़ रही है?

यह कथन कि आने वाले दस वर्षों में भारत के 80% कॉलेज और विश्वविद्यालय अप्रासंगिक या बंद हो सकते हैं, पहली नज़र में अतिशयोक्ति प्रतीत होता है। किंतु यदि हम भावनाओं से नहीं, आंकड़ों, श्रम-बाज़ार के रुझानों और तकनीकी यथार्थ से बात करें, तो यह आशंका चौंकाने वाली नहीं रह जाती—बल्कि तर्कसंगत लगने लगती है।

आज का भारत एक विचित्र विरोधाभास से गुजर रहा है। एक ओर लाखों युवा डिग्रियाँ लेकर बेरोज़गार या अल्प-वेतन पर कार्यरत हैं, दूसरी ओर कुशल श्रमिकों की भारी माँग है।

प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, टाइल वर्कर जैसे पेशे—जिन्हें अब तक “कम प्रतिष्ठित” माना जाता था—आज स्थिर, मांग-आधारित और बढ़ती आय प्रदान कर रहे हैं। वहीं डिलीवरी पार्टनर, छोटे दुकानदार और तकनीकी सेवा प्रदाता बिना किसी औपचारिक दीक्षांत समारोह के तुरंत नकद प्रवाह अर्जित कर रहे हैं।

इसके विपरीत, सामान्य कॉलेजों से निकले बीए, बीकॉम, बीएससी या यहाँ तक कि टियर–2/3 एमबीए स्नातक—अक्सर न्यूनतम वेतन, अस्थायी अनुबंध और “अनुभव की शर्त” के जाल में फँसे रहते हैं। उनकी आय तब तक स्थिर रहती है, जब तक वे अतिरिक्त कौशल स्वयं न जोड़ें—जो व्यवस्था का वादा नहीं, व्यक्ति का संघर्ष होता है।

यह अंतर संयोग नहीं है; यह संरचनात्मक विफलता का संकेत है।

कौशल बनाम डिग्री: बदलती प्राथमिकताएँ

इक्कीसवीं सदी की अर्थव्यवस्था डिग्री-केंद्रित नहीं, कौशल-केंद्रित होती जा रही है। कौशल:

तेज़ी से सीखे जा सकते हैं

मांग के साथ विकसित होते हैं

सीधे आय से जुड़े होते हैं

और समय-समय पर अपडेट किए जा सकते हैं

जबकि अधिकांश डिग्रियाँ:

स्थिर पाठ्यक्रम पर आधारित हैं

बाज़ार से कटे हुए हैं

वर्षों तक वही ज्ञान दोहराती हैं

और मूल्यह्रास (depreciation) का शिकार हैं

जब कौशल हर दो–तीन वर्ष में अप्रचलित हो जाते हैं, तब तीन या पाँच वर्ष की स्थिर डिग्री किस भविष्य की सुरक्षा देती है?

उत्तर असहज है—लगभग किसी की नहीं।

शिक्षा प्रणाली का मूल संकट

समस्या केवल कॉलेजों की नहीं है; समस्या शासन और दृष्टि की है। भारत की शिक्षा नीति का संचालन आज भी ऐसे प्रशासनिक ढाँचों के हाथ में है, जो:

जोखिम से बचने में विश्वास रखते हैं

नवाचार को प्रक्रिया में उलझा देते हैं

और परिवर्तन को “फाइल मूवमेंट” समझते हैं

नीतियाँ बनाने वाले अधिकांश निर्णयकर्ता उसी परीक्षा प्रणाली से निकले हैं, जो स्मृति, अनुशासन और आज्ञाकारिता को पुरस्कृत करती है—रचनात्मकता, सिस्टम थिंकिंग या अनिश्चितता से जूझने की क्षमता को नहीं।

यही कारण है कि नई शिक्षा नीति जैसे प्रयास भी जन्म लेते ही पुराने लगने लगते हैं, क्योंकि दुनिया उनसे कहीं तेज़ गति से आगे बढ़ चुकी होती है।

भविष्य का श्रमिक कौन होगा?

आज स्कूल में प्रवेश लेने वाला बच्चा जब 2040–45 के आसपास स्नातक बनेगा, तब दुनिया में:

व्यापक ऑटोमेशन होगा

करियर एक नहीं, अनेक होंगे

डोमेन लगातार बदलेंगे

और सीखना एक सतत प्रक्रिया होगी

उस समय समाज को चाहिए होंगे:

सिस्टम में सोचने वाले मनुष्य

डेटा के साथ तर्क करने वाले मस्तिष्क

भावनात्मक और संज्ञानात्मक लचीलापन

अस्पष्ट समस्याओं का समाधान करने की क्षमता

परंतु हमारी कक्षाएँ आज भी:

एक–सा पाठ्यक्रम पढ़ा रही हैं

प्रयोग को औपचारिकता बना चुकी हैं

और सभी छात्रों को एक ही साँचे में ढालना चाहती हैं

यह शिक्षा नहीं, संस्थागत जड़ता है।

निष्कर्ष: डिग्री नहीं, दिशा चाहिए

यह कहना कि “डिग्री बेकार है” एक सरलीकरण होगा। समस्या डिग्री की अवधारणा नहीं, डिग्री की वर्तमान संरचना और उद्देश्य है। जब तक उच्च शिक्षा:

बाज़ार से संवाद नहीं करेगी

कौशल को केंद्र में नहीं रखेगी

और सीखने को आजीवन प्रक्रिया नहीं मानेगी

तब तक कॉलेजों की संख्या बढ़ती रहेगी,

पर प्रासंगिकता घटती जाएगी।

और तब 80% संस्थानों के बंद होने की बात

अतिशयोक्ति नहीं,

बल्कि पूर्वानुमान मानी जाएगी।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन 

Saturday, 10 January 2026

कहानी : “रीस्टार्ट बटन” ©️ डॉ नीरू मोहन

 कहानी : “रीस्टार्ट बटन”

अर्जुन मोबाइल स्क्रीन पर उँगली फेरते-फेरते थक चुका था।

नोटिफिकेशन की भीड़, दूसरों की चमकती ज़िंदगी, और अपने भीतर फैलता खालीपन—सब कुछ एक साथ सिर पर सवार था। इंजीनियरिंग की डिग्री हाथ में थी, लेकिन नौकरी नहीं। हर दिन माँ का वही सवाल—“आज कुछ हुआ?”—और हर बार वही जवाब—“देख रहा हूँ।”

एक रात अर्जुन ने इंस्टाग्राम बंद किया और फोन को उल्टा रख दिया। अचानक उसे लगा जैसे कमरे में पहली बार सन्नाटा उतरा हो। उसी सन्नाटे में उसे अपनी पुरानी डायरी याद आई—वह जिसमें उसने कॉलेज के पहले साल में लिखा था, “मुझे कुछ अपना बनाना है, भीड़ का हिस्सा नहीं।”

अगले दिन उसने एक छोटा-सा फैसला लिया।

न बड़ी घोषणा, न सोशल मीडिया पोस्ट—बस रोज़ तीन घंटे अपने कौशल पर काम। उसने डेटा एनालिटिक्स सीखा, मुफ्त कोर्स किए, रोज़ एक प्रोजेक्ट बनाया। दोस्त बोले—“इससे क्या होगा?”—पर अर्जुन ने जवाब देना छोड़ दिया और काम करना शुरू कर दिया।

तीन महीने बाद भी नौकरी नहीं मिली। हौसला डगमगाया। उसी रात माँ ने चुपचाप उसके कमरे में चाय रख दी और बस इतना कहा—

“बीज बोया है तो समय दो, फल अपने आप आएगा।”

छठे महीने अर्जुन ने एक ओपन-सोर्स प्रोजेक्ट में योगदान दिया। किसी बड़े नाम से नहीं, बल्कि अपने काम से पहचान बनी। सातवें महीने एक स्टार्टअप से मेल आया—“आपका काम देखा, बात करेंगे?”

इंटरव्यू छोटा था, सवाल सीधे। अर्जुन ने आत्मविश्वास से नहीं, ईमानदारी से जवाब दिए। दो दिन बाद ऑफर लेटर आया। सैलरी बहुत बड़ी नहीं थी, पर रास्ता साफ़ था।

उस शाम अर्जुन ने फिर फोन उठाया। इस बार पोस्ट करने के लिए नहीं—डायरी खोलने के लिए। उसने लिखा:

“ज़िंदगी में सबसे ज़रूरी अपडेट बाहर नहीं, अंदर होता है। जब हम खुद पर काम करते हैं, तब किस्मत भी नोटिस करती है।”

और हाँ—उसने एक बात और समझ ली थी—

हर युवा के पास एक ‘रीस्टार्ट बटन’ होता है। उसे दबाने की हिम्मत चाहिए।

प्रेरणा संदेश (आज के युवाओं के लिए)

👉 तुलना छोड़िए, कौशल चुनिए।

👉 दिखावा नहीं, निरंतरता अपनाइए।

👉 देर से सही, पर सही दिशा में चलिए।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

🌍 विश्व हिंदी दिवस विशेष | छंदयुक्त अलंकारिक कविता (दोहा छंद)

 🌍 विश्व हिंदी दिवस विशेष | छंदयुक्त अलंकारिक कविता (दोहा छंद)

हिंदी केवल भाषा नहीं, संस्कारों की शान,

विश्वमंच पर गूँजती, बनकर मानव-ज्ञान।

गंगा-जमुनी धार सी, शब्दों की उजली धूप,

भाव-विचार के सेतु पर, रचती एक अनूप।

तुलसी की चौपाइयों में, कबीर की हुंकार,

प्रेमचंद की कलम बनी, जन-जन की सरकार।

माटी की सौंधी गंध में, विज्ञान का भी तेज,

लोक-बोली से विश्व तक, हिंदी का विस्तार-वेश।

नाद-ब्रह्म की साधना, छंदों की सजी थाती,

रस, अलंकार, लय लिए, हिंदी सरस सुहाती।

संविधान की चेतना, लोकतंत्र की आस,

हिंदी बोले सत्य को, रखकर सबका पास।

अनुवादों की पुल बने, संवादों की धुरी,

विश्वशनीयता की कसौटी, हिंदी पूरी खरी।

आओ मिलकर शपथ लें, शब्द-दीप जलाएँ,

विश्वमंच पर हिंदी का, गौरव-गीत सुनाएँ।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन