ईर्ष्या … सोशल मीडिया वाली
माधुरी को आज फिर वही बात खटक रही थी। वह बार-बार फोन की स्क्रीन पर उंगलियाँ फेर रही थी और फिर अचानक झुंझलाकर फोन पलंग पर फेंक दिया।
“सोशल मीडिया अब सोशल मीडिया नहीं रहा, निशा…,” माधुरी ने गहरी साँस लेते हुए कहा, “मुझे लगता है यह अब उन लोगों के लिए सबसे आसान हथियार बन गया है जिनके अंदर ईर्ष्या भरी होती है।”
निशा, जो रसोई की तरफ चाय बनाने जा रही थी, हल्के से मुस्कुराई। उसने बिना कुछ जवाब दिए गैस ऑन किया और चायपत्ती पानी में डाल दी। लेकिन माधुरी की बात हवा में तैरती रही।
दोनों दिल्ली विश्वविद्यालय के हॉस्टल में एक साथ रहती थीं। कमरा छोटा था, लेकिन सपनों की दुनिया बहुत बड़ी थी। निशा 25 साल की एक मेहनती और संवेदनशील लड़की थी, जो हिंदी में स्नातकोत्तर कर रही थी। उसे लिखने का शौक बचपन से था। वह अपने आस-पास की हर छोटी-बड़ी घटना को शब्दों में ढाल देती थी—कभी कविता, कभी कहानी, कभी कोई सामाजिक संदेश।
उसकी मां का देहांत तब हो गया था जब वह बहुत छोटी थी। पिता ने ही उसे पाल-पोसकर बड़ा किया था। जीवन ने उसे बचपन से ही संघर्षों से परिचित करा दिया था, शायद इसी कारण उसके शब्दों में दर्द भी था और सच्चाई भी।
निशा की रचनाएँ सोशल मीडिया पर अक्सर वायरल हो जाती थीं। लोग उसकी लेखनी की तारीफ करते नहीं थकते थे। लेकिन हर तारीफ के बीच कुछ ऐसे चेहरे भी थे जो मुस्कान के पीछे जलन छिपाए बैठे थे।
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उस रात निशा अपने लैपटॉप पर बैठी थी। वह एक नई कविता लिख रही थी—“सपनों की उड़ान और हकीकत की ज़मीन”।
माधुरी पीछे से उसे देख रही थी।
“तू रोज इतना अच्छा कैसे लिख लेती है?” माधुरी ने पूछा।
निशा ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा, “क्योंकि मैं देखती नहीं, महसूस करती हूँ।”
माधुरी कुछ देर चुप रही, फिर बोली, “पर यार, लोग तो अच्छे कमेंट भी करते हैं और बुरे भी। तू बुरा वाला पढ़कर परेशान मत हुआ कर।”
निशा ने स्क्रीन पर चलते कमेंट्स की तरफ देखा।
कुछ लिखते थे— “बहुत सुंदर रचना!” “दिल को छू लिया!”
लेकिन वहीं कुछ कमेंट्स ऐसे भी थे— “ये सब बनावटी है।” “ओवररेटेड राइटर।” “हर दिन यही ड्रामा।”
निशा ने हल्की सांस छोड़ी। “माधुरी, समस्या कमेंट नहीं है… समस्या सोच है।”
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अगले कुछ दिनों में सोशल मीडिया पर माहौल और बदल गया। निशा की एक पोस्ट—जिसमें उसने “युवाओं में बढ़ती मानसिक थकान” पर लिखा था—बहुत वायरल हुई।
लेकिन इसके साथ ही ट्रोलिंग भी शुरू हो गई।
कुछ लोग बिना पढ़े ही नकारात्मक कमेंट करने लगे। कोई लिखता, “ये सिर्फ लाइक बटोरने का तरीका है।” कोई कहता, “इतनी समझदार बनने की जरूरत क्या है?”
निशा ने शुरू में इन्हें नजरअंदाज किया, लेकिन धीरे-धीरे यह शोर बढ़ने लगा।
एक दिन हॉस्टल में इंटरनेट पर एक पोस्ट वायरल हुई जिसमें निशा की तस्वीर के साथ गलत और अपमानजनक बातें लिखी गई थीं।
माधुरी गुस्से में आग-बबूला हो गई।
“ये लोग हद कर रहे हैं निशा! तू कुछ जवाब क्यों नहीं देती?”
निशा चुप रही। उसकी आँखों में दर्द था, लेकिन चेहरे पर संयम भी था।
“अगर मैं हर पत्थर को जवाब देने लग जाऊँ, तो मैं अपनी राह कब चलूँगी?” उसने धीरे से कहा।
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रात बहुत देर तक निशा जागती रही। वह अपने पापा से वीडियो कॉल पर बात कर रही थी।
“बेटा, लोग हमेशा अच्छे काम का विरोध करते हैं। तुम अपना काम मत छोड़ना,” पिता की आवाज में अपनापन था।
निशा की आँखें भर आईं।
“पापा, कभी-कभी लगता है मैं गलत जगह हूँ।”
पिता मुस्कुराए, “नहीं बेटा, तुम सही जगह पर हो। बस लोग सही नहीं हैं।”
यह बात निशा के दिल में उतर गई।
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अगले दिन कॉलेज में एक सेमिनार था। विषय था—“सोशल मीडिया और मानसिक स्वास्थ्य”।
निशा को वक्ता के रूप में बुलाया गया।
माधुरी बहुत उत्साहित थी। “आज तू सबको जवाब दे दे।”
लेकिन निशा ने शांत स्वर में कहा, “मैं जवाब नहीं, समझ देना चाहती हूँ।”
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सेमिनार हॉल खचाखच भरा था। निशा मंच पर पहुँची। कुछ लोग उसे ध्यान से सुनने आए थे, कुछ सिर्फ जिज्ञासा से, और कुछ आलोचना के इरादे से।
निशा ने बोलना शुरू किया—
“सोशल मीडिया एक दर्पण की तरह है… लेकिन अब यह दर्पण साफ नहीं रहा। इसमें लोग दूसरों का चेहरा कम और अपनी सोच ज्यादा दिखाते हैं।”
हॉल शांत हो गया।
“ईर्ष्या आजकल बहुत आसानी से एक क्लिक में बदल जाती है—एक कमेंट, एक लाइक, या एक डिसलाइक में।”
उसने आगे कहा—
“जो लोग दूसरों की सफलता देखकर खुश नहीं हो पाते, वे धीरे-धीरे खुद को ही खो देते हैं।”
तालियाँ बजने लगीं।
लेकिन कुछ चेहरे अब भी असहज थे।
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कार्यक्रम के बाद कई छात्र निशा के पास आए और उसकी तारीफ की। लेकिन कुछ वही पुराने लोग थे जो दूर खड़े होकर उसे देख रहे थे—चुप, असहज और शायद भीतर से परेशान।
माधुरी ने निशा का हाथ पकड़ लिया।
“देखा? तूने सिर्फ लिखा नहीं… लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया।”
निशा हल्की मुस्कान के साथ बोली, “मुझे किसी को हराना नहीं है माधुरी… मुझे बस अपनी राह पर चलना है।”
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उस रात हॉस्टल के कमरे में एक अलग ही सुकून था।
माधुरी ने निशा के लिए हलवा बनाया और कहा, “आज तूने सच में कमाल कर दिया।”
दोनों हँस रही थीं।
माधुरी ने अचानक फोन उठाया और सेल्फी ली।
“ये फोटो याद रहेगी… एक दिन लोग कहेंगे—ये वही लड़की थी जिसने ईर्ष्या को जवाब नहीं, प्रेरणा से हराया था।”
निशा हँस पड़ी।
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समय बीतता गया। निशा की पहचान और मजबूत होती गई। ट्रोल्स भी धीरे-धीरे शांत हो गए, क्योंकि अब उसकी लेखनी सिर्फ वायरल नहीं, प्रभावशाली बन चुकी थी।
जो लोग पहले ईर्ष्या करते थे, उनमें से कुछ ने धीरे-धीरे उसे पढ़ना शुरू कर दिया। और कुछ ने खुद को बदल लिया।
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निष्कर्ष:
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि ईर्ष्या दूसरों को नहीं, स्वयं को अंदर से खोखला कर देती है। सोशल मीडिया एक शक्तिशाली माध्यम है—यह या तो निर्माण कर सकता है या विनाश, यह हमारे सोचने के तरीके पर निर्भर करता है।
यदि हमारे इरादे अच्छे हैं, तो रास्ते में आने वाले पत्थर भी हमें आगे बढ़ने की सीख देते हैं और वही पत्थर हमारे लिए मील का पत्थर बन जाते हैं।
हमें दूसरों की सफलता से प्रेरणा लेनी चाहिए, न कि ईर्ष्या। अगर हम किसी को प्रोत्साहित नहीं कर सकते, तो हमें उसे गिराने का भी अधिकार नहीं है।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन