Monday, 8 June 2026

“सोशल मीडिया का नया ज़माना” (व्यंग्य कविता)

 “सोशल मीडिया का नया ज़माना” (व्यंग्य कविता)


अब जमाना बदल गया है, साहब,

यहाँ चेहरा नहीं, प्रोफाइल चलता है।

मुस्कान असली हो या नकली,

लाइक के नीचे सब कुछ पलता है।


सुबह उठते ही दुनिया नहीं देखते,

पहले नोटिफिकेशन देखते हैं,

किसने देखा, किसने छोड़ा,

किसने दिल पर तीर फेंके—ये गिनते हैं।


यहाँ ज्ञान से ज्यादा

कैप्शन की चमक बिकती है,

और सच्चाई अक्सर

“एडिट” के पीछे छिपती है।


दोस्त कम, फॉलोअर ज्यादा हैं,

पर रिश्ते अब भी साइलेंट मोड में खड़े हैं।

कभी जो बातें घंटों होती थीं,

अब वो सिर्फ “स्टोरी” में पड़े हैं।


लाइक बढ़े तो आत्मविश्वास उड़ता है,

कम हो तो इंसान टूट सा जाता है।

कमेंट में तारीफ मिले तो दिन बनता है,

वरना पूरा अस्तित्व हिल जाता है।


यहाँ सब “रियल” होने का दावा करते हैं,

पर हर कोई थोड़ा “फिल्टर” में जीता है।

और जो सच में सच बोल दे,

वो ट्रोलिंग का स्वाद पीता है।


सबसे बड़ा मज़ाक यही है इस दुनिया का—

यहाँ दिखना ज़रूरी है, होना नहीं।

और जो चुप रहे समझदारी से,

उसका नाम भी “गुमनाम” हो जाना है कहीं।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

डिजिटल सफलता और रिश्तों की खामोश जलन

डिजिटल सफलता और रिश्तों की खामोश जलन

जब आप कंटेंट क्रिएटर बनते हो,

तो सबसे पहले तालियाँ नहीं बजतीं…

सबसे पहले आँखें जलती हैं।


आपका पहला वीडियो नहीं देखा जाता,

उसे “स्कैन” किया जाता है—

कितने व्यू आए, कितनी तारीफ हुई… और क्यों हुई!


लाइक बटन से ज्यादा सक्रिय होता है

तुलना का दिमाग—

“इसमें ऐसा क्या खास है जो ये आगे बढ़ रहा है?”


कमेंट नहीं आते,

पर घर की चर्चाएँ शुरू हो जाती हैं—

“देखो, अब ये भी स्टार बनने चला है!”


सबसे दिलचस्प बात यह है—

आपकी हर सफलता पर

चेहरे मुस्कुराते हैं,

पर भीतर एक अनकहा हिसाब चलता रहता है।


व्हाट्सऐप स्टेटस पर लिखा जाता है—

“शुभकामनाएँ बेटा/बेटी”

और उसी के साथ

एक अदृश्य प्रश्न भी घूमता है—

“इतना आगे कैसे बढ़ गया?”


आपका चैनल बढ़ता है,

पर कुछ लोगों के अंदर का संतुलन घटने लगता है।


कमेंट सेक्शन में अनजान लोग बढ़ते हैं,

पर अपने ही लोग

एक नई प्रतियोगिता बना लेते हैं—

“देखते हैं ये कब तक टिकता है…”


और सबसे बड़ा व्यंग्य यही है—

आपकी मेहनत उन्हें प्रेरणा नहीं लगती,

उन्हें यह एक “अनचाही सफलता” लगती है।


इसलिए वे देखते हैं, समझते हैं, याद रखते हैं…

पर स्वीकार नहीं करते।


क्योंकि स्वीकार करना कभी-कभी

सबसे मुश्किल लाइक होता है—

जो रिश्तों के ego को दबाकर देना पड़ता है।



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✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

कॉफी की भाप में कविता

भाप बनकर उठते शब्द,

कप में घुलते एहसास हैं।

कॉफी केवल पेय नहीं,

मन के अनकहे संवाद हैं।


कभी कड़वाहट जीवन जैसी,

कभी मिठास किसी याद सी।

हर घूँट में छिपी हुई है,

एक कहानी अनबयानी सी।


कलम जब थककर बैठ जाती,

कॉफी उसे उड़ान देती है।

सूने कागज़ के आँगन में,

भावों की मुस्कान देती है।


कविता का अपना एक जहान है,

जहाँ सपने आकार लेते हैं।

और कॉफी के छोटे से कप में,

अनगिनत शब्द जन्म लेते हैं।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

चाय और कविता

 चाय और कविता


चाय कोई पेय भर नहीं,

दिनभर की थकान का विराम है।

कभी अकेलेपन की साथी,

तो कभी अपनों के नाम है।


उबलते पानी में जैसे

पत्तियों का रंग उतरता है,

वैसे ही जीवन का अनुभव

धीरे-धीरे मन में निखरता है।


एक कप चाय और कुछ पल,

बस इतना ही काफी होता है।

कई बार जो बात शब्द न कह पाएं,

वह चाय की चुस्की कह जाती है।


कविता भी कुछ ऐसी ही है—

धीरे-धीरे मन में पकती है,

और चाय की सोंधी खुशबू संग

कागज़ पर उतरकर खिलती है।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

"ये जो अपने मन की स्याही है न..."(कविता)

 "ये जो अपने मन की स्याही है न..."


ये जो अपने मन की स्याही है न,

कभी सूखती नहीं है।

वक्त चाहे जितने पन्ने पलट दे,

यह अपनी कहानी लिखती रहती है।


कभी दर्द के अक्षर बनकर,

कभी उम्मीद के गीत रचती है।

जो बातें होंठों तक नहीं आतीं,

उन्हें चुपचाप कागज़ पर रखती है।


मन की स्याही का रंग बड़ा अजीब होता है,

दिखता काला है,

पर उसके भीतर

पूरी ज़िंदगी के रंग छिपे होते हैं।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

मेरी बेटी, मेरा आईना Kavita

 

मेरी बेटी, मेरा आईना

माँ ने मुझे चलना सिखाया,
गिरकर फिर संभलना सिखाया।
रिश्तों की डोर निभानी सिखाई,
अपनों के लिए पिघलना सिखाया।

मीठे शब्दों का मान सिखाया,
बड़ों का सम्मान सिखाया।
दुख में भी मुस्काना सिखाया,
हर हाल में जी जाना सिखाया।

पर माँ ने मुझे एक बात नहीं सिखाई,
अपने हिस्से की लड़ाई लड़ना नहीं सिखाई।
हर दर्द को चुपचाप पी जाना सिखाया,
पर अन्याय के आगे अड़ जाना नहीं सिखाई।

शायद उसकी पीढ़ी ने यही देखा था,
त्याग को ही स्त्री का गहना समझा था।
आँसू छिपाकर मुस्कुराना सीखा था,
अपने सपनों को घर के कोने में रखना सीखा था।

लेकिन मेरी बेटी,
मैं तुझे वही सब दूँगी जो माँ ने मुझे दिया,
संस्कारों का अमृत, प्रेम की छाया,
रिश्तों की गरिमा और विश्वास की माया।

पर इसके साथ कुछ और भी सिखाऊँगी,
अपने मन की आवाज़ सुनना सिखाऊँगी।
गलत को गलत कहना सिखाऊँगी,
अपने अधिकारों के लिए खड़ा होना सिखाऊँगी।

तुझे झुकना नहीं, समझना सिखाऊँगी,
डरना नहीं, सच कहना सिखाऊँगी।
अपनी पहचान खुद बनाना सिखाऊँगी,
भीड़ में भी अलग नज़र आना सिखाऊँगी।

क्योंकि तू मेरी बेटी है,
पर सिर्फ मेरी परछाई नहीं।
तू अपना एक आकाश है,
किसी और की परिभाषा नहीं।

तुझमें मैं अपना बचपन देखती हूँ,
अपने अधूरे सपनों का दर्पण देखती हूँ।
पर चाहती हूँ कि तू वहाँ पहुँचे,
जहाँ तक मेरी उड़ान नहीं पहुँची।

तू मेरा आईना है,
मगर मेरी कहानी दोहराने के लिए नहीं।
तू मेरी विरासत है,
मगर अपनी नई इबारत लिखने के लिए।

जब भी तुझे देखती हूँ,
अपने ही चेहरे की चमक दिखाई देती है।
फर्क बस इतना है कि मेरी आँखों में जो ख्वाब अधूरे थे,
तेरी आँखों में उनकी पूरी दुनिया दिखाई देती है।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

"माँ, तुमने सब सिखाया... पर एक बात छूट गई"

 "माँ, तुमने सब सिखाया... पर एक बात छूट गई"


माँ,

तुमने मुझे चलना सिखाया,

गिरकर फिर संभलना सिखाया,

रिश्तों की डोर को सहेजना सिखाया,

अपनों के लिए खुद को भूल जाना सिखाया।


तुमने सिखाया कि

बड़ों का सम्मान कैसे किया जाता है,

छोटों पर स्नेह कैसे लुटाया जाता है,

घर को घर कैसे बनाया जाता है,

और आँसू छिपाकर मुस्कुराया कैसे जाता है।


पर माँ,

एक बात शायद तुम भी न सीख सकीं,

इसलिए मुझे भी न सिखा सकीं—


अपने हक़ के लिए लड़ना।


तुमने सहना सिखाया,

पर अन्याय के सामने खड़ा होना नहीं।

तुमने चुप रहना सिखाया,

पर अपनी बात बेखौफ़ कहना नहीं।


शायद तुम्हारे समय की मजबूरी थी,

या संस्कारों की कोई पुरानी परिभाषा,

जहाँ बेटियों को त्याग का पाठ तो मिलता था,

पर अधिकारों का अध्याय अधूरा रह जाता था।


आज जब मैं अपनी बेटी को देखती हूँ,

तो एक नया सपना बुनती हूँ।


मैं उसे दया भी सिखाऊँगी,

और दृढ़ता भी।

मैं उसे प्रेम भी सिखाऊँगी,

और आत्मसम्मान भी।


वह झुके जहाँ विनम्रता ज़रूरी हो,

पर टूटे कभी नहीं।

वह सुने सबकी,

पर अपनी आवाज़ खोए कभी नहीं।


मैं चाहती हूँ कि मेरी बेटी

संस्कारों की मूर्ति ही नहीं,

साहस की मिसाल भी बने।


वह जान सके कि

त्याग और आत्मसमर्पण में फर्क होता है,

और प्रेम का अर्थ

खुद को मिटा देना नहीं होता।


माँ,

तुमने मुझे बहुत कुछ दिया,

इतना कि मैं उम्र भर ऋणी रहूँगी।


बस एक अधूरा पाठ

मैं अपनी बेटी को पूरा पढ़ाऊँगी—


कि बेटियाँ केवल सहने के लिए नहीं,

सही के लिए खड़े होने के लिए भी जन्म लेती हैं।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन