Saturday, 1 August 2026

आत्मीय आभार

 आत्मीय आभार


जीवन की एक और सीढ़ी पर

समय ने चुपचाप मेरा हाथ थाम लिया है।

पीछे मुड़कर देखती हूँ तो

यात्रा में जितनी उपलब्धियाँ दिखती हैं,

उनसे कहीं अधिक

आप सभी लोगों का स्नेह दिखाई देता है।


🎉 जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ! 🎉


जन्मदिन की असली खुशी

दो आत्मीय शब्दों में परिपूर्ण है।


यह उन संबंधों में भी बसती है

जो बिना किसी आग्रह के

आपको अपनी शुभकामनाओं में याद रखते हैं।


आज जो भी शुभेच्छाएँ मिलीं,

वे केवल शब्द नहीं थीं—

वे विश्वास थीं, अपनापन था,

और वह मौन आशीर्वाद था

जो दूर रहकर भी

सीधे हृदय तक पहुँच जाता है।


मैं अपने विद्यालय के आदरणीय प्रबंधक महोदय जी,

आदरणीया प्रधानाचार्य जी,

आदरणीय उपप्रधानाचार्य जी

तथा अपने सभी प्रिय साथी शिक्षकों के प्रति

हृदय की गहराइयों से कृतज्ञ हूँ।


आप सबका स्नेह, सम्मान और आशीर्वाद

मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं।

विश्वास मानिए,

आपकी शुभकामनाएँ मुझ तक पहुँच चुकी हैं—

उन्होंने आज के दिन को

उत्सव नहीं, आशीर्वाद बना दिया है।


इस जन्मदिन पर मैं ईश्वर से अपने लिए नहीं,

आप सभी के स्वस्थ, सुखी और उज्ज्वल जीवन की

कामना करती हूँ। यदि मेरे हिस्से का कोई भी प्रकाश है,

तो वह आप सबके स्नेह से ही प्रकाशित है।


स्नेह सहित

सदैव समर्पित

डॉ. नीरू मोहन

जन्मदिन का सबसे बड़ा उपहार

 जन्मदिन का सबसे बड़ा उपहार

आज सुबह जैसे ही आँख खुली, मोबाइल पर शुभकामनाओं की घंटियाँ बजने लगीं।

किसी ने लिखा— "ईश्वर आपको स्वस्थ रखें।"

किसी ने लिखा— "आपकी लेखनी यूँ ही समाज को दिशा देती रहे।"

किसी ने केवल एक 🌹 भेजा, पर उस गुलाब में भी अपनापन था।

मैं हर संदेश पढ़ती गई... और मन कृतज्ञता से भरता गया।

फिर न जाने क्यों, उँगली मोबाइल की उस सूची तक पहुँच गई जहाँ मेरे अपने... मेरे खून के रिश्ते थे।

मैंने सोचा— "शायद अभी तक व्यस्त होंगे... अभी संदेश आएगा..."

सुबह दोपहर बनी... दोपहर शाम में बदल गई...

लेकिन कुछ मोबाइल नंबर आज भी वैसे ही मौन थे, जैसे वर्षों से उनके मन मौन हैं।

तब अचानक लगा...

रिश्ते खून से नहीं टूटते, वे उपेक्षा से टूटते हैं।

कई लोग कहते हैं— "खून कभी पानी नहीं होता।"

पर मैंने जीवन में देखा है कि कई बार खून इतना ठंडा हो जाता है कि उसमें संवेदना ही जम जाती है।

आज के समय में सबसे अधिक ईर्ष्या कोई अजनबी नहीं करता।

सबसे अधिक बेचैनी उसे होती है... जो आपका अपना कहलाता है।

उसे आपका संघर्ष नहीं दिखाई देता।

उसे केवल आपकी सफलता दिखाई देती है।

उसे आपकी जागी हुई रातें नहीं दिखतीं।

उसे केवल आपकी मुस्कान दिखाई देती है।

और वही मुस्कान उसके भीतर ईर्ष्या की आग बन जाती है।

मैंने ऐसे रिश्ते देखे हैं...

जो हर पारिवारिक समारोह में सबसे आगे बैठते हैं, पर जब परिवार का कोई सदस्य संकट में हो, तो सबसे पहले अपनी नज़रें फेर लेते हैं।

वे आपके घर की मिठाई खा सकते हैं, लेकिन आपकी खुशी पचा नहीं सकते।

वे आपके दुख पर आँसू नहीं बहाते, लेकिन आपकी उपलब्धियों पर रातभर करवटें बदलते हैं।

सबसे बड़ा आश्चर्य यह नहीं कि वे साथ नहीं आए...

सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि उन्हें कभी अपनी कमी महसूस भी नहीं हुई।

आज जन्मदिन पर मुझे एक सत्य और स्पष्ट दिखाई दिया—

खानदान बहुत बड़ा हो सकता है, लेकिन इंसान बहुत कम होते हैं।

रिश्तेदारों की भीड़ में कई बार एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिलता, जो केवल इतना कह दे—

"घबराना मत... मैं तुम्हारे साथ हूँ।"

विश्वास कीजिए...

यह एक वाक्य किसी लाखों के उपहार से बड़ा होता है।

मैंने यह भी सीखा है कि जो लोग आपकी अनुपस्थिति में आपकी बुराई सुनकर मुस्कुरा देते हैं, वे आपकी उपस्थिति में चाहे जितनी बड़ी मुस्कान दे दें, उनकी आत्मा का आईना साफ़ नहीं होता।

इसलिए अब शिकायत नहीं करती।

क्योंकि जीवन ने सिखा दिया है—

रिश्ते जन्म से मिलते हैं, लेकिन अपने कर्मों से कमाने पड़ते हैं।

आज मेरे जन्मदिन पर मैं किसी से कोई गिला नहीं रखती।

मैं केवल इतना चाहती हूँ कि कोई भी मनुष्य अपने ही लोगों के बीच अकेला न पड़े।

यदि आपके घर, परिवार या रिश्तेदारी में कोई ऐसा व्यक्ति है जो चुपचाप संघर्ष कर रहा है...

तो उसे धन मत दीजिए।

उसे केवल दो शब्द दीजिए—

"मैं तुम्हारे साथ हूँ।"

क्योंकि कई बार यही दो शब्द किसी टूटते हुए मनुष्य को फिर से जीना सिखा देते हैं।

और अंत में...

आज मुझे सबसे बड़ा उपहार उन लोगों से मिला, जिनसे मेरा खून का रिश्ता नहीं था, लेकिन हृदय का संबंध था।

तब समझ आया—

रक्त शरीर को जीवित रखता है,

पर प्रेम ही रिश्तों को जीवित रखता है।

खून का रिश्ता जन्म देता है,

लेकिन आत्मीयता ही जीवन भर साथ निभाती है।

– डॉ. नीरू मोहन

"पति गुस्सा करे तो क्या करें?" संवाद शैली

 "पति गुस्सा करे तो क्या करें?"

पत्नी: आजकल लोग पूछते हैं—पति गुस्सा करे तो क्या करें?

परामर्शदाता: सबसे पहले यह समझिए कि हर गुस्से का जवाब गुस्से से देना समाधान नहीं होता।

पत्नी: तो क्या हमेशा चुप रहना चाहिए?

परामर्शदाता: नहीं। चुप्पी भी हमेशा समाधान नहीं होती। यदि सामने वाला बहुत क्रोधित है, तो पहले उसे शांत होने का समय दें। फिर सही समय पर शांत स्वर में बात करें।

पत्नी: अगर गुस्सा मेरी गलती की वजह से हो?

परामर्शदाता: अपनी गलती स्वीकार करना रिश्ते को छोटा नहीं, बल्कि मजबूत बनाता है।

पत्नी: और अगर गलती उनकी हो?

परामर्शदाता: तब भी अपमान या ताने देने के बजाय अपनी बात स्पष्ट और सम्मानपूर्वक रखें। उद्देश्य जीतना नहीं, रिश्ता बचाना होना चाहिए।

पत्नी: अगर उनका गुस्सा बार-बार अपमान, डराने या मारपीट तक पहुँच जाए?

परामर्शदाता: यह सामान्य वैवाहिक मतभेद नहीं है। ऐसी स्थिति में अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता दें, भरोसेमंद परिवारजन या मित्र से बात करें और आवश्यकता हो तो पेशेवर या कानूनी सहायता लें।

पत्नी: तो रिश्ते का सबसे बड़ा मंत्र क्या है?

परामर्शदाता: गुस्से में निर्णय नहीं, और शांति में संवाद। सम्मान, धैर्य और विश्वास—यही किसी भी विवाह की सबसे मजबूत नींव हैं।

समापन संदेश:

"पति हो या पत्नी—गुस्सा इंसान को छोटा नहीं बनाता, लेकिन गुस्से में बोले गए शब्द अक्सर रिश्तों को छोटा कर देते हैं। इसलिए बहस जीतने से अधिक महत्वपूर्ण है, रिश्ता बचाना।"

पति गुस्सा करे तो क्या करें? एकल संवाद

 पति गुस्सा करे तो क्या करें?


अक्सर मुझसे पूछा जाता है—"मैडम, पति बहुत गुस्सा करते हैं, क्या करें?"


तो मेरा पहला जवाब होता है—सबसे पहले यह समझिए कि गुस्सा कोई बीमारी नहीं, एक भावना है। लेकिन उस भावना को कैसे व्यक्त किया जाए, यही इंसान का चरित्र बताता है।


पति गुस्सा करें तो उसी समय बहस जीतने की कोशिश मत कीजिए। आग पर पेट्रोल डालने से घर नहीं बचता। कभी-कभी एक कदम पीछे हटना हार नहीं, रिश्ते की समझदारी होती है।


लेकिन इसका यह अर्थ भी बिल्कुल नहीं कि हर बार चुप रहिए, हर अपमान सहिए या अपनी आत्मसम्मान की बलि दे दीजिए। शांत समय का इंतज़ार कीजिए और फिर स्पष्ट शब्दों में कहिए—"आपकी बात मुझे स्वीकार हो सकती है, लेकिन आपका गुस्सा और अपमान नहीं।"


याद रखिए, पति-पत्नी का रिश्ता अदालत नहीं है, जहाँ हर दिन कोई जीते और कोई हारे। यह तो वह जगह है जहाँ दोनों को मिलकर रिश्ता जीतना होता है।


हाँ, एक बात और। यदि गुस्सा केवल ऊँची आवाज़ तक सीमित नहीं है, बल्कि गाली, अपमान, धमकी या हाथ उठाने तक पहुँच गया है, तो इसे सामान्य मत मानिए। वहाँ चुप्पी नहीं, साहस और सही मदद की ज़रूरत होती है।


इसलिए मेरा मानना है—पति गुस्सा करें तो पहले परिस्थिति को संभालिए, फिर संवाद कीजिए। लेकिन यदि गुस्सा आपकी गरिमा और सुरक्षा पर चोट करने लगे, तो समझौता नहीं, सही निर्णय लीजिए।


क्योंकि रिश्ते प्यार से चलते हैं, डर से नहीं।

जब मैं मरकर वापस आई

 जब मैं मरकर वापस आई


जिस दिन मैं मरी, उस दिन पहली बार मेरे घर में इतनी भीड़ थी।


जिन रिश्तेदारों को मेरे जीते-जी मेरा पता याद नहीं था, वे सबसे आगे खड़े होकर रो रहे थे। पड़ोसन, जो हर सुबह मेरी बुराई से अपनी चाय मीठी करती थी, आज कह रही थी—

"बहुत नेक औरत थी... भगवान ऐसी आत्मा सबको दे।"


मैं ऊपर खड़ी सब देख रही थी।


यमदूत बोले, "चलो, समय हो गया।"


मैंने कहा, "बस पाँच मिनट... देख लूँ, मेरे जाने के बाद कौन कितना दुखी है।"


उन्होंने मुस्कुराकर इजाज़त दे दी।


सबसे पहले मेरी अलमारी खुली।


आँसू पोंछते-पोंछते लोग गहनों का हिसाब लगाने लगे।

बेटा बोला, "माँ ने किसे क्या लिखा है?"

बेटी बोली, "पहले लॉकर की चाबी ढूँढ़ो।"


पति, जो जीते-जी कभी चाय तक नहीं बना पाए थे, अब रिश्तेदारों के सामने सुबकते हुए कह रहे थे—

"मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी चली गई..."


और पाँच मिनट बाद वही धीरे से पूछ रहे थे—

"खाना कितने लोगों का बनवाना है?"


मैंने पहली बार समझा...

मौत से बड़ा आयोजन, मौत के बाद की व्यवस्थाएँ होती हैं।


तभी मोबाइल बजने लगे।


एक ने मेरी फोटो पर काली पट्टी लगाई।

दूसरे ने लिखा—

"ओम् शांति... जीवन का कोई भरोसा नहीं।"


तीसरे ने पोस्ट डालते ही नीचे लिखा—

"वैसे मेरी नई रील भी देख लेना।"


मैं हँसी भी और रोई भी।


तभी यमराज बोले,

"चलो, अब सच जान लिया?"


मैंने कहा,

"नहीं प्रभु... एक कमरा अभी बाकी है।"


वहाँ मेरी बूढ़ी माँ अकेली बैठी थीं।


उनके पास न मोबाइल था,

न श्रद्धांजलि का भाषण,

न कैमरा।


बस मेरी बचपन की फ्रॉक सीने से लगाकर इतना ही कह रही थीं—


"बेटी... एक बार आ जा।"


उस एक वाक्य ने मेरी पूरी आत्मा हिला दी।


शायद पहली बार समझ आया कि दुनिया में सबसे सच्चा शोक वही करता है,

जिसने आपको सचमुच जिया हो।


इतने में ऊपर से आवाज़ आई—


"गलती हो गई...

जिसे लाना था, वह दूसरी गली में रहती थी।

तुम्हारी उम्र अभी बाकी है।"


और अगले ही पल...


मैं अस्पताल के बिस्तर पर आँखें खोल चुकी थी।


सब मुझे देखकर खुश थे।


लेकिन मैं बदल चुकी थी।


अब मैंने लोगों की बातों पर नहीं,

उनके व्यवहार पर विश्वास करना शुरू किया।


अब मैं हर दिन ऐसे जीती हूँ,

मानो मौत अभी दरवाज़े पर खड़ी हो।


क्योंकि...


मरकर वापस आने से मैंने यही सीखा—

इंसान की असली कीमत उसके मरने पर नहीं, उसके जीते-जी दिए गए सम्मान से तय होती है।

मेरे से मिलने आए कान्हा

 मेरे से मिलने आए कान्हा


उस रात मैं बिल्कुल अकेला था।


कमरे में सन्नाटा था, लेकिन मेरे भीतर शोर था।

रिश्तों के टूटने का शोर...

उम्मीदों के बिखरने का शोर...

और उन चेहरों का शोर, जिन्हें मैंने अपना समझा था।


कहते हैं कि अपने कभी धोखा नहीं देते।


लेकिन जीवन ने सिखाया कि कभी-कभी सबसे गहरे घाव वही देते हैं, जिनके लिए हम सबसे अधिक जीते हैं।


मैं सोचता रहा—

क्या रिश्ते केवल स्वार्थ तक ही सीमित रह गए हैं?

क्या बड़े-बुज़ुर्गों के सम्मान की कीमत अब सुविधाओं से तय होती है?

क्या त्याग का कोई मोल नहीं बचा?


इन सवालों का उत्तर किसी इंसान के पास नहीं था।


मैंने थके हुए मन से श्रीकृष्ण की तस्वीर के सामने दीपक जलाया।


बस इतना ही कहा—


"कान्हा... अब मुझसे नहीं होता।

अगर सच में हो, तो एक बार मिल जाओ।"


आँखें कब बंद हुईं, पता ही नहीं चला।


अचानक बाँसुरी की मधुर धुन सुनाई दी।


मैंने आँखें खोलीं।


सामने पीताम्बर धारण किए, मोरपंख सजाए, अधरों पर मुस्कान लिए कान्हा खड़े थे।


मैं फूट-फूटकर रो पड़ा।


मैंने कहा,

"कान्हा...

जिन्हें अपना माना, वही बदल गए।

जिनके लिए जीवन लगा दिया, उन्होंने ही मुझे अकेला छोड़ दिया।"


कान्हा मुस्कुराए।


बोले,

"तुम्हें लोगों ने नहीं बदला...

उन्होंने तुम्हारी आँखों से भ्रम हटाया है।


जिसे तुम अंत समझ रहे हो,

मैं उसे तुम्हारी नई शुरुआत बना रहा हूँ।"


मैंने पूछा,

"लेकिन इतना दर्द क्यों?"


कान्हा ने कहा,


"सोना आग में तपे बिना कुंदन नहीं बनता।

और भक्त परीक्षा के बिना भक्त नहीं बनता।"


मैं चुप था।


उन्होंने फिर कहा,


"तुम लोगों के व्यवहार को अपना भाग्य मत समझो।

जो तुम्हें छोड़ गए, उन्हें छोड़ दो।

लेकिन अपने भीतर का प्रेम मत छोड़ना।

क्योंकि जो कटु होकर जीता है, वह हर दिन हारता है।

जो विश्वास रखकर जीता है, उसे मैं कभी अकेला नहीं छोड़ता।"


इतना कहकर कान्हा ने मेरा हाथ थाम लिया।


उस स्पर्श में ऐसी शांति थी, जो वर्षों से नहीं मिली थी।


सुबह जब मेरी आँख खुली, तो कमरा वैसा ही था।


दीपक अब भी जल रहा था।


लेकिन मैं बदल चुका था।


अब मैं रिश्तों से अपेक्षा नहीं करता।

सम्मान मिले तो धन्यवाद,

न मिले तो भी शिकायत नहीं।


क्योंकि उस रात मैंने जान लिया था—


जब दुनिया के सारे दरवाज़े बंद हो जाते हैं,

तब वृंदावन का एक द्वार खुलता है।


और उस द्वार पर खड़े होकर कान्हा मुस्कुराते हुए कहते हैं—


"जब सब साथ छोड़ दें, तब समझ लेना...

अब मैं स्वयं तुम्हारा हाथ पकड़ने आया हूँ।"


उस दिन से मैंने लोगों के बदलते चेहरों को नहीं,

कान्हा की स्थिर मुस्कान को अपना सहारा बना लिया।


क्योंकि रिश्ते साथ दें या न दें,

कान्हा कभी अपने भक्त का साथ नहीं छोड़ते।

तीज का झूला और दिखावे की दुनिया"

 शीर्षक: "तीज का झूला और दिखावे की दुनिया"

सावन की पहली फुहार पड़ी तो गाँव की गलियाँ हरी चूड़ियों की खनक से भर उठीं। हर तरफ मेहंदी की खुशबू, झूलों की पींग और गीतों की मिठास थी।

गाँव की दादी बोलीं—

"तीज तो वो पर्व है बिटिया, जिसमें श्रृंगार से ज्यादा संस्कार सजते हैं।"

लेकिन अब तीज भी समय के साथ बदल गई थी।

गाँव की सीमा ने जैसे ही मोबाइल खोला, देखा—

"तीज स्पेशल प्रतियोगिता!

सबसे सुंदर साड़ी, सबसे महंगी ज्वेलरी और सबसे शानदार मेहंदी वाली महिला को मिलेगा पुरस्कार!"

सीमा मुस्कुराई और बोली—

"वाह! अब तो सुहाग की लंबी उम्र की प्रार्थना भी शायद ब्रांडेड साड़ी पहनकर ही स्वीकार होगी!"

पास बैठी उसकी सास हँस पड़ीं।

बोलीं—

"हमारे समय में तीज पर बहू के हाथों की मेहंदी देखी जाती थी, अब तो मेहंदी से ज्यादा मोबाइल कैमरे का एंगल देखा जाता है।"

उधर शहर में रहने वाली रिया ने तीज की तैयारी शुरू कर दी।

उसने पति से कहा—

"सुनो, इस बार तीज पर मुझे लाखों वाली ज्वेलरी चाहिए। पड़ोस की कविता ने पिछले साल इतनी महंगी पहनी थी कि उसकी फोटो पर हजारों लाइक आए थे।"

पति ने धीरे से पूछा—

"लेकिन तुम्हें खुशी किससे मिलेगी? गहनों से या मेरे साथ बिताए समय से?"

रिया थोड़ी देर चुप रही।

फिर बोली—

"समय तो फोटो में दिखाई नहीं देता ना!"

पति मुस्कुराया—

"शायद इसी वजह से आजकल रिश्ते कमजोर और पोस्ट मजबूत हो रहे हैं।"

तीज के दिन मोहल्ले की महिलाओं ने बड़ा आयोजन किया। मंच सजा, कैमरे लगे और घोषणा हुई—

"अब होगी मिसेज तीज प्रतियोगिता!"

एक महिला बोली—

"मेरी साड़ी विदेश से आई है।"

दूसरी बोली—

"मेरी ज्वेलरी असली है।"

तीसरी बोली—

"मेरे मेकअप आर्टिस्ट ने मुझे तीन घंटे में तैयार किया है।"

तभी कोने में बैठी बूढ़ी अम्मा ने अपनी पुरानी हरी साड़ी ठीक करते हुए कहा—

"बेटियों, एक बात पूछूँ?"

सबने उनकी ओर देखा।

अम्मा बोलीं—

"जिस तीज में पत्नी पति की लंबी उम्र की कामना करती थी, वह कब पति की जेब की लंबाई नापने का त्योहार बन गई?"

कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।

अम्मा ने आगे कहा—

"मैंने भी तीज रखी है। कभी नई साड़ी नहीं मिली, कभी महंगे गहने नहीं मिले। लेकिन मेरे पति ने जब बीमारी में मेरा हाथ पकड़ा, मेरे बच्चों ने जब मेरे माथे पर प्यार से हाथ रखा—वही मेरे लिए सबसे बड़ा श्रृंगार था।"

उनकी आँखों में चमक थी।

"याद रखना बेटियों, तीज का चाँद चेहरे की चमक नहीं, रिश्तों की रोशनी देखता है।"

अगले दिन सोशल मीडिया पर तस्वीरें वायरल थीं।

किसी की साड़ी की चर्चा थी, किसी की ज्वेलरी की।

लेकिन सबसे ज्यादा साझा की जा रही थी अम्मा की एक तस्वीर—

पुरानी हरी साड़ी में मुस्कुराती हुई।

नीचे लिखा था—

"त्योहार कपड़ों से नहीं, भावनाओं से खूबसूरत होते हैं।

जहाँ प्रेम सच्चा हो, वहाँ साधारण साड़ी भी रानी का श्रृंगार बन जाती है।"

और शायद यही तीज का असली संदेश था—

"झूले ऊँचे हों या छोटे, रिश्तों की डोर मजबूत होनी चाहिए।

क्योंकि दिखावे के बाजार में भावनाएँ सबसे कीमती और सबसे कम बिकने वाली चीज़ हैं।"