Tuesday, 26 May 2026

नानी का घर और छुट्टियों का पहला दिन — व्यंग्य

 नानी का घर और छुट्टियों का पहला दिन — व्यंग्य 


छुट्टियाँ शुरू होते ही घर में ऐसा माहौल बनता था,

जैसे बच्चों को नहीं, किसी युद्ध अभियान पर भेजा जा रहा हो।

माँ की आवाज़ें तेज़ हो जाती थीं—

“बैग ठीक से पैक करो, वहाँ रहकर नाटक मत करना!”

और हम सोचते थे—

नाटक तो अभी घर में चल रहा है।


रेलवे स्टेशन पर हमारा उत्साह देखकर लगता था

कि हम घूमने नहीं,

बल्कि किसी ऐतिहासिक खोज पर निकले हैं—

जिसमें सबसे बड़ा खजाना नानी का घर है।


नानी का घर पहुँचते ही

सबसे पहले स्वागत भोजन से नहीं,

“तुम कितने दुबले हो गए!”

इस सार्वभौमिक डायलॉग से होता था।

जो हर बार नया नहीं होता था,

फिर भी हर बार असर जरूर करता था।


छुट्टियों का पहला दिन—

आज़ादी का दिन कहलाता था,

लेकिन असल में वो दिन होता था

“अब बाहर जाकर खेलो, लेकिन गंदे मत होना”

जैसे विरोधाभासी आदेशों का दिन।


हम मिट्टी में खेलने निकलते थे,

और लौटकर हमें ऐसे देखा जाता था

जैसे हमने मिट्टी नहीं,

पूरा भूवैज्ञानिक संग्रहालय पहन लिया हो।


नानी का प्यार भी अद्भुत था—

एक हाथ से पराठा,

और दूसरे हाथ से “खाओ-खाओ” का दबाव।

भूख न हो तब भी खाना पड़ता था,

क्योंकि मना करना वहाँ अपराध माना जाता था।


और सबसे बड़ा व्यंग्य तो यह था—

घर में स्कूल की पढ़ाई से छुट्टी मिलती थी,

लेकिन नानी के घर में जीवन की पूरी परीक्षा चलती थी—

“तुमने फल खाया या नहीं?”

“धूप में क्यों निकले?”

“दोस्त अच्छे हैं या नहीं?”


रात को जब हम थककर सोते थे,

तो लगता था—

छुट्टियाँ आराम के लिए नहीं,

एक और तरह की अनुशासन यात्रा के लिए होती हैं।


फिर भी अजीब बात है—

उसी “कठिन अनुशासन” में

सबसे ज्यादा सुकून था,

और उसी सुकून को हम आज

“बचपन” कहते हैं।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

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