“डिग्री के ढेर पर बैठा भविष्य”
आजकल हमारे देश में युवाओं को देखकर बड़ा गर्व होता है।
कंधों पर बैग नहीं, फाइलों का बोझ होता है…
जेब में पैसे नहीं, डिग्रियों की फोटोकॉपी होती है…
और चेहरे पर मुस्कान नहीं, प्रतियोगी परीक्षाओं की तारीखों का इंतज़ार होता है।
कहते हैं — “युवा देश का भविष्य हैं।”
सुनकर अच्छा लगता है…
बस दिक्कत इतनी है कि यह “भविष्य” हमेशा भविष्य में ही रहता है, वर्तमान में कभी आता ही नहीं!
आज का युवा बड़ा मेहनती है।
सुबह उठते ही मोबाइल में “Good Morning” नहीं, “नई भर्ती निकली क्या?” सर्च करता है।
उसकी जिंदगी का रोमांस अब किताबों, कोचिंग और Admit Card के बीच कहीं दम तोड़ चुका है।
घर वाले भी बड़े आशावादी होते हैं।
बचपन में कहते हैं —
“बेटा खूब पढ़ लो, जिंदगी बन जाएगी।”
बच्चा भी भोलेपन में पढ़ लेता है।
स्कूल में टॉप करता है, कॉलेज में डिग्री लेता है,
फिर एक दिन समझ आता है कि नौकरी के लिए डिग्री नहीं…
“सिफारिश, अनुभव और धैर्य की पीएचडी” चाहिए।
आजकल नौकरी का विज्ञापन किसी त्योहार की तरह आता है।
फॉर्म निकलते ही लाखों युवा ऐसे टूट पड़ते हैं जैसे बरसों से सूखे खेत पर पहली बारिश हुई हो।
फिर परीक्षा होती है…
पेपर लीक हो जाता है…
परीक्षा रद्द हो जाती है…
और युवा फिर से “देश का भविष्य” बनकर अगली तारीख का इंतज़ार करने लगता है।
सरकार कहती है —
“युवा आत्मनिर्भर बनें।”
युवा बेचारा सोचता है —
“नौकरी नहीं मिली तो चलो YouTube चैनल खोल लेते हैं।”
अब हर गली में तीन चीजें सबसे ज्यादा मिलती हैं —
कोचिंग सेंटर, मोटिवेशनल स्पीकर और बेरोजगार ग्रेजुएट।
कभी-कभी तो लगता है कि डिग्री अब ज्ञान का प्रमाण पत्र नहीं,
बल्कि बेरोजगारी में प्रवेश का टिकट बन गई है।
इंजीनियर चाय बेच रहा है…
एमए वाला डिलीवरी बॉय है…
और पीएचडी वाला YouTube पर “How to crack government exam” पढ़ा रहा है।
मजेदार बात यह है कि समाज भी बड़ा संवेदनशील है।
कोई शादी में मिल जाए तो पहला सवाल यही —
“और बेटा, क्या कर रहे हो आजकल?”
अब युवा क्या जवाब दे?
“देश का भविष्य बना हुआ हूँ अंकल… फिलहाल Waiting List में चल रहा हूँ!”
बेरोजगारी अब समस्या कम और जीवन शैली ज्यादा लगने लगी है।
मां सुबह चाय देते हुए पूछती है —
“आज कौन सा फॉर्म भरना है?”
पिता अखबार में नौकरी वाले पन्ने ऐसे ढूंढते हैं जैसे खोया हुआ सम्मान तलाश रहे हों।
और रिश्तेदार…
उन्हें तो बस तुलना करनी होती है —
“शर्मा जी का लड़का तो विदेश चला गया!”
अरे भाई, शर्मा जी के लड़के को छोड़ो…
यहां तो आधे युवा रेलवे की तैयारी करते-करते उम्र की अंतिम स्टेशन तक पहुंच जाते हैं।
फिर भी कमाल है हमारे युवाओं का।
टूटते हैं, बिखरते हैं, फिर भी अगले दिन नई उम्मीद लेकर खड़े हो जाते हैं।
शायद इसी जिद का नाम युवा होना है।
लेकिन सच यह भी है कि केवल भाषणों से भविष्य नहीं बनता।
जब तक डिग्रियां रोजगार से नहीं जुड़ेंगी,
तब तक लाखों युवा “देश का भविष्य” कहलाते रहेंगे…
और वर्तमान में बेरोजगारी का व्यंग्य झेलते रहेंगे।
क्योंकि आज का सबसे बड़ा मजाक यही है —
“डिग्री भी है, मेहनत भी है…
बस नौकरी नहीं है!”
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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