नानी का घर और छुट्टियों का पहला दिन — 30 साल पुरानी यादों की दस्तक
वो समय आज भी मन के किसी पुराने बक्से में बंद है, जिसमें बचपन की खुशबू, मिट्टी की सोंधी महक और नानी के आँगन की ठंडी छाँव सुरक्षित रखी हुई है। जैसे ही गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू होती थीं, वैसे ही दिल में एक अलग ही हलचल शुरू हो जाती थी—नानी के घर जाने की तैयारी।
रेलवे स्टेशन पर सामान से भरे झोले, माँ की जल्दी-जल्दी की आवाज़ें और हमारा उत्साह—सब मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते थे जैसे कोई बड़ा उत्सव हो। सफर लंबा होता था, लेकिन उस सफर की हर खिड़की से दिखता बदलता दृश्य किसी फिल्म की तरह लगता था। खेत, नहरें, छोटे-छोटे स्टेशन—सब कुछ मानो हमें नानी के घर तक पहुँचाने की साजिश में लगे हों।
और फिर वो पल आता था—नानी का घर।
पुराना लेकिन बेहद प्यारा घर, जिसकी दीवारों पर समय की हल्की-हल्की दरारें थीं, लेकिन रिश्तों की गर्माहट बिल्कुल नई थी। जैसे ही हम दरवाज़े पर पहुँचते, नानी की आँखों में चमक आ जाती और उनके हाथों में मिठाई या आम का अचार तैयार मिलता। उनके गले लगने में ऐसा सुकून था, जो आज के किसी एयर कंडीशन्ड कमरे में भी नहीं मिलता।
छुट्टियों का पहला दिन हमेशा खास होता था। उस दिन पढ़ाई का नाम भी दूर-दूर तक नहीं होता था। सुबह उठते ही नानी का आदेश होता—“पहले दूध पी लो, फिर बाहर आकर खेलो।” और फिर शुरू होता था पूरा मोहल्ला हमारा संसार बन जाना। मिट्टी में खेलना, आम के पेड़ पर चढ़ना, तालाब किनारे दौड़ना—हर चीज़ में एक जादू था।
दोपहर में नानी की कहानी और उनके हाथों से बना सादा लेकिन स्वादिष्ट भोजन—रोटी, देसी घी और अचार—आज भी याद आते ही स्वाद जीभ पर आ जाता है। शाम होते-होते आँगन में बैठकर ठंडी हवा और झींगुरों की आवाज़ के बीच नानी की बातें सुनना—ये सब मिलकर जीवन का सबसे सुंदर अध्याय बन जाता था।
30 साल पहले की वो छुट्टियाँ सिर्फ समय नहीं थीं, वो जीवन का सबसे सच्चा आनंद थीं। न कोई मोबाइल था, न कोई स्क्रीन—बस रिश्ते थे, खेल थे, और बेफिक्र हँसी थी। आज जब जीवन तेज़ हो गया है, तब उन यादों की धीमी-धीमी आहट और भी गहरी लगती है।
नानी का घर अब भी कहीं दिल के भीतर वैसा ही खड़ा है—जहाँ हर छुट्टी का पहला दिन आज भी मुस्कुराता हुआ हमारा इंतज़ार कर रहा है।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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