दिल्ली की बर्फ़… गुल्लू का गोला
दिल्ली की तपती दोपहरें और धूल भरी शामें उस झुग्गी-बस्ती की रोज़मर्रा की साथी थीं, जहाँ गुल्लू अपनी माँ के साथ रहता था। छोटी-सी झुग्गी, फटी हुई टीन की छत, दीवारों पर मौसम की मार के निशान और एक कोने में टंगी भगवान की धुंधली-सी तस्वीर—यही उनका पूरा संसार था।
गुल्लू उम्र में भले ही छोटा था, पर उसकी आँखों में बड़े सपने थे। वह अक्सर सड़क पर खड़े बर्फ़ के गोले वाले को देखा करता था। रंग-बिरंगे सिरप, बर्फ़ की ठंडी परत और बच्चों की खिलखिलाहट उसे किसी जादुई दुनिया जैसी लगती थी। लेकिन यह जादू उसके हिस्से में कभी नहीं आता था, क्योंकि उसकी माँ के पास दो समय की रोटी जुटा पाना भी किसी जंग से कम नहीं था।
उस दिन भी वही हुआ।
गुल्लू झुग्गी के बाहर खड़ा था। उसकी निगाहें बर्फ़ के गोले वाले की रेहड़ी पर थीं, जहाँ बच्चे घेरा बनाकर खड़े थे। कोई गुलाबी गोला खा रहा था, कोई नीला, कोई हरा। हर गोले में जैसे खुशी घुली हुई थी।
माँ झुग्गी के अंदर पुरानी फटी चटाई पर बैठी थी। उसके हाथों में खाली थैला था और आँखों में थकान।
“माँ… एक गोला ले दो ना,” गुल्लू ने धीमे स्वर में कहा।
माँ ने एक लंबी साँस ली। वह जानती थी कि उसकी जेब में आज भी कुछ नहीं है। पति की मृत्यु के बाद जिंदगी जैसे ठहर-सी गई थी। मजदूरी मिलती भी तो बस पेट भरने लायक। कई बार तो शाम का खाना भी अधूरा रह जाता।
“गुल्लू, अंदर आ जा बेटा। धूप बहुत तेज़ है, लू लग जाएगी,” माँ ने उसे पुकारा।
“माँ, सब बच्चे खा रहे हैं… मैं भी खाऊँगा,” गुल्लू ने मासूमियत से कहा।
माँ का दिल भर आया। वह चाहती थी कि अपने बच्चे की हर इच्छा पूरी करे, लेकिन हालात हर बार बीच में खड़े हो जाते थे।
“बेटा, वो ठंडी चीज़ है… बीमार कर देती है,” माँ ने उसे समझाने की कोशिश की।
गुल्लू ने होंठ सिकोड़े। “माँ, तू हमेशा मना करती है… मुझे पता है तेरे पास पैसे नहीं हैं।”
यह सुनकर माँ चुप हो गई। उसकी आँखें भर आईं। गुल्लू अभी छोटा था, लेकिन हालात ने उसे समझदार बना दिया था।
“बापू होते तो तू मुझे रोज़ गोला दिलाते न?” गुल्लू ने मासूम सवाल किया।
माँ के अंदर जैसे कुछ टूट गया। वह गुल्लू को खींचकर भीतर ले गई और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, “तू चिंता मत कर बेटा… तू बड़ा होकर बहुत पैसा कमाएगा। फिर तू मुझे रोज़ बर्फ़ का गोला खिलाएगा।”
गुल्लू ने यह सुनकर मुस्कुराया। उसकी आँखों में चमक आ गई। वह दौड़कर भगवान की तस्वीर के सामने गया। छोटे-छोटे हाथ जोड़कर वह कुछ फुसफुसाया—पता नहीं क्या, शायद कोई प्रार्थना या कोई इच्छा।
फिर वह चुपचाप आकर माँ के पास लेट गया।
शाम धीरे-धीरे ढलने लगी। बाहर बच्चों की आवाज़ें कम होने लगीं। रेहड़ी वाला भी धीरे-धीरे आगे बढ़ गया। लेकिन गुल्लू की आँखों में अभी भी बर्फ़ के गोले तैर रहे थे।
अचानक मौसम बदलने लगा।
आसमान में काले बादल घिर आए। तेज़ हवाएँ चलने लगीं। धूल उड़ने लगी। लोगों ने अपने-अपने ठिकानों की ओर भागना शुरू कर दिया। किसी को उम्मीद नहीं थी कि दिल्ली की गर्मी में ऐसा मौसम भी आ सकता है।
और फिर जो हुआ, उसने सबको चौंका दिया।
तेज़ बारिश के साथ ओले गिरने लगे। छोटे-छोटे सफेद टुकड़े आसमान से ऐसे बरसने लगे जैसे किसी ने आकाश से रुई बिखेर दी हो। कुछ ही मिनटों में सड़कें सफेद चादर से ढक गईं।
बच्चे डरकर अपने घरों में भाग गए। लेकिन गुल्लू बाहर निकल आया।
वह हैरानी से आसमान को देख रहा था। उसके लिए यह दृश्य किसी सपने से कम नहीं था। उसने हाथ फैलाकर ओले पकड़ने शुरू किए। ठंडी-ठंडी बर्फ़ उसके हाथों में पिघल रही थी।
“माँ! माँ! देखो… बर्फ़!” वह दौड़ता हुआ अंदर गया।
माँ घबरा गई। “क्या हुआ बेटा?”
“बाहर आओ माँ!” गुल्लू ने उसका हाथ खींचा।
माँ बाहर आई और जो देखा, वह स्तब्ध रह गई। पूरी गली सफेद हो चुकी थी। ओलों की बरसात अब भी चल रही थी।
तभी दूर से वही बर्फ़ के गोले वाला अपनी रेहड़ी को बचाने की कोशिश करता दिखा। उसकी रेहड़ी एक ओट में खड़ी थी और वह जल्दी-जल्दी सामान समेट रहा था।
गुल्लू दौड़ता हुआ गया और अपनी मुट्ठी में ओले भरकर वापस आ गया।
“माँ, देखो… गोला बन गया!” उसने खुशी से कहा।
माँ मुस्कुराई, लेकिन उसकी आँखों में आश्चर्य भी था। वह समझ नहीं पा रही थी कि इस अचानक आई बरसात को क्या कहे।
रेहड़ी वाला भी पास आ गया। उसने जल्दी से अपनी बोतलें निकालीं—लाल, नीली, हरी, पीली सिरप की बोतलें। उसने ओलों को इकट्ठा किया और गुल्लू के हाथों में रखे बर्फ़ के ढेर को रंगीन और मीठा बना दिया।
“ले बेटा… तेरा गोला तैयार है,” उसने मुस्कुराते हुए कहा।
गुल्लू की आँखों में चमक और बढ़ गई। वह खुशी से झूम उठा।
माँ ने आसमान की ओर देखा। उसकी आँखें नम थीं, लेकिन होंठों पर हल्की मुस्कान थी। वह मन ही मन बोली—“हे भगवान… तू सच में सुनता है।”
गुल्लू ने पहला निवाला लिया। उसकी आँखें खुशी से बंद हो गईं।
“माँ, ये सबसे अच्छा गोला है!” वह बोला।
माँ ने उसका सिर सहलाया। उसके दिल से एक लंबी थकान जैसे उतर गई हो।
उस दिन गुल्लू और उसकी माँ दोनों ने महसूस किया कि कभी-कभी जिंदगी में उम्मीदें अचानक किसी चमत्कार की तरह पूरी हो जाती हैं। शायद यह प्रकृति का संयोग था, या शायद किसी आस्था का फल।
पर उनके लिए यह एक ऐसा पल था जिसे वे कभी नहीं भूल सकते थे।
गली अब भी सफेद थी, हवा अब भी ठंडी थी, लेकिन झुग्गी के अंदर एक छोटी-सी गर्म खुशी जगमगा रही थी।
और गुल्लू के चेहरे पर बर्फ़ का गोला सिर्फ मिठास नहीं था… वह एक सपने की शुरुआत थी।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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