“लड़की का कोई घर नहीं होता” — आखिर ऐसा क्यों कहा जाता है?
यह वाक्य सुनने में जितना साधारण लगता है, उतना ही गहरा दर्द अपने भीतर छुपाए होता है।
बचपन से ही एक लड़की को यह सुनाया जाता है—
“यह घर तेरा नहीं, तुझे तो एक दिन ससुराल जाना है…”
और जब वह ससुराल पहुंचती है, तो कई बार वहां भी उसे यह एहसास दिलाया जाता है—
“तुम तो पराए घर से आई हो…”
यहीं से शुरू होता है एक लड़की का सबसे बड़ा संघर्ष —
अपनापन खोजने का संघर्ष।
बचपन का घर भी “अस्थायी” क्यों बना दिया जाता है?
एक लड़की उसी आंगन में जन्म लेती है, वहीं खेलती है, वहीं अपने सपने बुनती है।
मां की गोद, पिता का स्नेह, भाई-बहनों का साथ — सब कुछ उसी घर से जुड़ा होता है।
लेकिन धीरे-धीरे उसे यह एहसास कराया जाता है कि वह उस घर की “मेहमान” है।
उसके हर निर्णय के साथ एक वाक्य जुड़ जाता है—
“कल दूसरे घर जाना है…”
“ज्यादा अधिकार मत दिखाओ…”
“लड़कियां तो पराया धन होती हैं…”
सोचिए…
जिस बच्चे को बचपन से ही यह महसूस करा दिया जाए कि वह यहां स्थायी नहीं है, उसके मन पर क्या गुजरती होगी?
ससुराल में भी परीक्षा खत्म नहीं होती
शादी के बाद लड़की अपना घर, अपनी आदतें, अपने रिश्ते, यहां तक कि कई बार अपनी पहचान तक बदल देती है।
वह पूरी कोशिश करती है कि नए घर को अपना बना सके।
लेकिन कई बार वहां भी उसे अपनापन पाने के लिए खुद को साबित करना पड़ता है।
अगर वह अपनी बात रखे, तो कहा जाता है—
“अभी आई हो और नियम बदलने लगी…”
अगर चुप रहे, तो कहा जाता है—
“इसे किसी से मतलब ही नहीं…”
यानी एक लड़की जीवनभर दो घरों के बीच संतुलन बनाती रहती है,
लेकिन दोनों जगह उसे पूरी तरह “अपना” मानने में समाज हिचकता है।
सच क्या है?
सच यह है कि—
लड़की का घर होता है…
जहां उसे सम्मान मिले,
जहां उसकी भावनाओं को समझा जाए,
जहां उसे यह महसूस न कराया जाए कि वह बोझ या पराई है।
घर सिर्फ दीवारों से नहीं बनता,
घर अपनापन, विश्वास और सम्मान से बनता है।
और जिस दिन समाज यह समझ जाएगा,
उस दिन शायद कोई लड़की यह नहीं कहेगी कि—
“मेरा अपना कोई घर नहीं…”
बदलती सोच की जरूरत
अब समय आ गया है कि बेटियों को “पराया धन” नहीं,
बल्कि परिवार का समान अधिकार वाला सदस्य माना जाए।
उन्हें यह एहसास दिलाया जाए कि—
मायका भी उनका है
ससुराल भी उनका है
और सबसे जरूरी…
उनकी अपनी पहचान भी उनकी है।
क्योंकि एक लड़की सिर्फ रिश्ते निभाने के लिए नहीं जन्म लेती,
वह एक इंसान है,
जिसे हर जगह सम्मान और अपनापन मिलने का अधिकार है।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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