Monday, 3 August 2026

बरसात का लोकतंत्र

 बरसात का लोकतंत्र


जब बादल कम और बहाने ज़्यादा बरसे...


रात भर बादल गरजते रहे।


सुबह अख़बार आया तो पहली खबर थी—


"शहर पानी-पानी!"


दूसरी खबर थी—


"प्रशासन पूरी तरह सतर्क।"


दोनों खबरें साथ पढ़कर रामस्वरूप हँस पड़ा।


बोला, "अगर प्रशासन सचमुच सतर्क होता तो शहर पानी-पानी नहीं होता, और अगर शहर पानी-पानी है तो सतर्कता प्रेस नोट में ही रही होगी।"


बात आई-गई हो गई।


लेकिन दो घंटे बाद उसकी गली सचमुच नदी बन चुकी थी।


बच्चे स्कूल नहीं जा पाए।


एम्बुलेंस आधे रास्ते में फँस गई।


दूध वाला नाव खोज रहा था और नगर निगम के अधिकारी फ़ाइल।


उधर जिला कार्यालय में आपात बैठक चल रही थी।


पहला अधिकारी बोला,

"स्थिति गंभीर है।"


दूसरा बोला,

"जी, मीडिया को पहले बता दें कि हम रात से मैदान में हैं।"


तीसरा बोला,

"सर... मैदान तो पानी में है।"


सबने उसे घूरकर देखा।

इतनी ईमानदारी सरकारी बैठक में अच्छी नहीं लगती।


इधर नेता जी का काफ़िला निकल पड़ा।


चार गाड़ियाँ...


आठ सुरक्षाकर्मी...


दस कैमरे...


और एक जोड़ी बिल्कुल नई रबर की चप्पल।


नेता जी घुटने तक पानी में उतरे।


कैमरामैन चिल्लाया—

"सर... थोड़ा उदास चेहरा बनाइए।"


चेहरा उदास हुआ।


दूसरे कैमरे ने कहा—

"सर... अब एक बच्चे को गोद में ले लीजिए।"


बच्चा आया।


फोटो हुई।


बच्चा वापस चला गया।


नेता जी ने चप्पल उतारी और गाड़ी में बैठते हुए बोले—


"जनता के दुख-दर्द में हमेशा साथ हूँ।"


पीछे खड़ा बच्चा अपनी माँ से पूछ रहा था—


"माँ... ये अंकल हमारे साथ कब थे?"


माँ ने कहा—


"बेटा... फोटो में।"


उधर सोशल मीडिया पर भी बाढ़ आ चुकी थी।


एक युवक कमर तक पानी में खड़ा होकर रील बना रहा था—


"हेलो दोस्तों...

देखिए मैं मौत के मुँह से लाइव हूँ।

वीडियो अच्छा लगे तो लाइक, शेयर और सब्सक्राइब ज़रूर करना।"


पाँच मिनट बाद वही युवक पानी से निकलकर कॉफी पीते हुए अगली रील बना रहा था—


"बारिश का मज़ा ही कुछ और है..."


दूसरी ओर एक बुज़ुर्ग अपनी दवाइयाँ बचाने के लिए पानी में घुटनों के बल रेंग रहे थे।


लेकिन उनकी कोई रील नहीं बनी।


क्योंकि दर्द कभी ट्रेंड नहीं करता...


ड्रामा करता है।


शाम तक प्रशासन ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर दी।


कहा—


"इतनी बारिश सौ साल में पहली बार हुई है।"


पास बैठा बूढ़ा शिक्षक मुस्कुराया।


बोला—


"बेटा...

बारिश तो हर साल नई होती है,

लेकिन बहाना हमेशा पुराना होता है।"


अगले दिन विपक्ष पहुँचा।


उन्होंने उसी सड़क पर प्रेस वार्ता की जहाँ कल सत्ता पक्ष खड़ा था।


बोले—


"यदि हम सत्ता में होते तो शहर वेनिस बन जाता।"


भीड़ में से आवाज़ आई—


"साहब...

शहर तो अभी भी वेनिस ही बना हुआ है।

बस फ़र्क इतना है कि वहाँ गोंडोला चलता है, यहाँ ट्रैक्टर।"


तालियाँ बज उठीं।


दोनों पक्ष मुस्कुराए।


क्योंकि जनता की हँसी भी चुनाव तक ही गिनी जाती है।


उधर ठेकेदार अपने बंगले की बालकनी से बारिश देख रहा था।


उसने चाय की चुस्की ली और इंजीनियर से कहा—


"सड़क फिर बह गई?"


इंजीनियर बोला—


"जी सर।"


ठेकेदार मुस्कुराया—


"बहुत बढ़िया।

अगले महीने फिर टेंडर आएगा।"


बारिश उसकी दुश्मन नहीं थी...


उसकी साझेदार थी।


रात को टीवी चैनलों पर बहस शुरू हो गई।


एक एंकर गरजा—


"देश जानना चाहता है कि पानी सड़क पर क्यों है?"


दूसरा गरजा—


"पहले यह बताइए कि विपक्ष कहाँ था?"


तीसरा गरजा—


"इसमें विदेशी साज़िश की भी जाँच होनी चाहिए।"


इतनी देर में शहर का एक बच्चा अपनी कॉपी में नाव बना रहा था।


उसने मासूमियत से पूछा—


"पापा...

क्या बारिश हमेशा सड़कें बहा देती है?"


पिता ने लंबी साँस ली और कहा—


"नहीं बेटा...

बारिश तो सिर्फ़ पानी लाती है।


सड़कें तो बेईमानी बहा देती है।"


बच्चे ने फिर पूछा—


"फिर हर साल यही क्यों होता है?"


पिता ने कहा—


"क्योंकि हर साल बादल बदलते हैं...

लेकिन नीयत नहीं।"


अगली सुबह सूरज निकल आया।


पानी उतर गया।


कीचड़ रह गया।


वादे रह गए।


फ़ोटो रह गए।


हैशटैग बदल गए।


और शहर अगले मानसून का इंतज़ार करने लगा।


क्योंकि यहाँ बरसात मौसम नहीं...


एक वार्षिक उत्सव है—


जहाँ जनता डूबती है...


राजनीति तैरती है...


प्रशासन प्रेस नोट लिखता है...


ठेकेदार अगला टेंडर गिनता है...


और सोशल मीडिया पूछता है—


"दोस्तों... आपको बारिश कैसी लगी? कमेंट करके ज़रूर बताइए!"


याद रखिए—


बरसात कभी शहर को नहीं डुबोती।


शहर तब डूबता है जब नालियों से पहले ज़मीर जाम हो जाए, जब जिम्मेदारी फ़ाइलों में बह जाए और जब जनता हर साल भीगने की आदत को ही अपनी किस्मत मान ले।


जिस दिन नागरिक सवाल पूछना सीख जाएगा और व्यवस्था जवाब देना, उस दिन बारिश केवल मौसम होगी—समाचार नहीं।

बरसात : जब बादल नहीं, चरित्र टपकने लगे

 बरसात : जब बादल नहीं, चरित्र टपकने लगे


पहली बारिश की बूँद जैसे ही धरती पर गिरी, मिट्टी महक उठी। बच्चे कागज़ की नाव लेकर दौड़ पड़े। किसान ने आकाश की ओर हाथ जोड़ दिए। मोर ने पंख फैला दिए।


लेकिन शहर में एक अलग ही बरसात शुरू हो चुकी थी।


यह पानी की नहीं, अवसरों की बरसात थी।


नगर निगम की सड़कें पहली फुहार में ही ऐसे बह गईं, मानो डामर ने भी ठेकेदार से कह दिया हो—"भाई, जितना कमीशन मिला था, उतना ही टिक पाया।"


नेता जी छाता लेकर निकले। कैमरे पहले से तैयार थे। एक बच्चे को गोद में उठाया, दो मिनट कीचड़ में चले, तीसरे मिनट गाड़ी में बैठकर बोले—

"देखिए, जनता के बीच हूँ।"


उधर सोशल मीडिया पर भी बादल गरज रहे थे।


किसी ने दस साल पुरानी बाढ़ की तस्वीर डालकर लिखा—"आज हमारे शहर का हाल।"


दूसरे ने किसी विदेशी सड़क की फोटो लगाकर लिखा—"यह हमारे वार्ड की उपलब्धि है।"


तीसरे ने घर की खिड़की से चाय का कप पकड़कर लिखा—

"बारिश... अहा! कितना सुंदर मौसम!"


उसी पोस्ट के नीचे एक रिक्शेवाला भीगते हुए सवारी ढूँढ़ रहा था।

एक मजदूर की आधी दिहाड़ी बारिश बहा ले गई थी।

एक फुटपाथ पर रहने वाली माँ अपने बच्चों को प्लास्टिक से ढँक रही थी।


पर उनकी तस्वीरें ट्रेंड नहीं करतीं।


बारिश तेज हुई तो मोहल्ले के नाले ने लोकतंत्र की तरह अपना मुँह खोल दिया।

जिसने कभी सफाई नहीं देखी थी, वह अब पूरे अधिकार से सड़क पर बह रहा था।


लोग बोले—

"सरकार निकम्मी है।"


सरकार बोली—

"पिछली सरकार जिम्मेदार है।"


पिछली सरकार बोली—

"हमारे समय में इतनी बारिश कहाँ होती थी!"


और बादल ऊपर से हँस रहे थे।


इतने में चौराहे पर बैठे एक बूढ़े चायवाले ने मुस्कुराकर कहा—


"बेटा, बरसात तो हर साल आती है। फर्क इतना है कि पहले छत टपकती थी, अब नीयत टपकती है।"


सभी चुप हो गए।


वह फिर बोला—


"पहले लोग बरसात में पड़ोसी को घर बुला लेते थे।

अब मोबाइल निकालकर उसकी डूबती हुई वीडियो बना लेते हैं।

पहले छाता बाँटा जाता था।

अब सलाह बाँटी जाती है।

पहले नालियाँ साफ होती थीं।

अब सिर्फ भाषण साफ-सुथरे होते हैं।"


बारिश धीरे-धीरे थम गई।


सड़क पर कीचड़ रह गया।

दीवारों पर पोस्टर रह गए।

सोशल मीडिया पर रीलें रह गईं।


और लोगों के मन में वही पुराना सवाल रह गया—


"बरसात आखिर पानी की थी... या इंसानियत के बह जाने की?"


उस दिन समझ आया कि बादल कभी समाज को डुबोते नहीं।


समाज तब डूबता है जब ईमानदारी सूख जाती है, जिम्मेदारियाँ बह जाती हैं और संवेदनाएँ सीवर में उतर जाती हैं।


बरसात से डरना नहीं चाहिए...

डर उस दिन से होना चाहिए, जिस दिन पानी से पहले हमारा चरित्र बहने लगे।

Saturday, 1 August 2026

आत्मीय आभार

 आत्मीय आभार


जीवन की एक और सीढ़ी पर

समय ने चुपचाप मेरा हाथ थाम लिया है।

पीछे मुड़कर देखती हूँ तो

यात्रा में जितनी उपलब्धियाँ दिखती हैं,

उनसे कहीं अधिक

आप सभी लोगों का स्नेह दिखाई देता है।


🎉 जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ! 🎉


जन्मदिन की असली खुशी

दो आत्मीय शब्दों में परिपूर्ण है।


यह उन संबंधों में भी बसती है

जो बिना किसी आग्रह के

आपको अपनी शुभकामनाओं में याद रखते हैं।


आज जो भी शुभेच्छाएँ मिलीं,

वे केवल शब्द नहीं थीं—

वे विश्वास थीं, अपनापन था,

और वह मौन आशीर्वाद था

जो दूर रहकर भी

सीधे हृदय तक पहुँच जाता है।


मैं अपने विद्यालय के आदरणीय प्रबंधक महोदय जी,

आदरणीया प्रधानाचार्य जी,

आदरणीय उपप्रधानाचार्य जी

तथा अपने सभी प्रिय साथी शिक्षकों के प्रति

हृदय की गहराइयों से कृतज्ञ हूँ।


आप सबका स्नेह, सम्मान और आशीर्वाद

मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं।

विश्वास मानिए,

आपकी शुभकामनाएँ मुझ तक पहुँच चुकी हैं—

उन्होंने आज के दिन को

उत्सव नहीं, आशीर्वाद बना दिया है।


इस जन्मदिन पर मैं ईश्वर से अपने लिए नहीं,

आप सभी के स्वस्थ, सुखी और उज्ज्वल जीवन की

कामना करती हूँ। यदि मेरे हिस्से का कोई भी प्रकाश है,

तो वह आप सबके स्नेह से ही प्रकाशित है।


स्नेह सहित

सदैव समर्पित

डॉ. नीरू मोहन

जन्मदिन का सबसे बड़ा उपहार

 जन्मदिन का सबसे बड़ा उपहार

आज सुबह जैसे ही आँख खुली, मोबाइल पर शुभकामनाओं की घंटियाँ बजने लगीं।

किसी ने लिखा— "ईश्वर आपको स्वस्थ रखें।"

किसी ने लिखा— "आपकी लेखनी यूँ ही समाज को दिशा देती रहे।"

किसी ने केवल एक 🌹 भेजा, पर उस गुलाब में भी अपनापन था।

मैं हर संदेश पढ़ती गई... और मन कृतज्ञता से भरता गया।

फिर न जाने क्यों, उँगली मोबाइल की उस सूची तक पहुँच गई जहाँ मेरे अपने... मेरे खून के रिश्ते थे।

मैंने सोचा— "शायद अभी तक व्यस्त होंगे... अभी संदेश आएगा..."

सुबह दोपहर बनी... दोपहर शाम में बदल गई...

लेकिन कुछ मोबाइल नंबर आज भी वैसे ही मौन थे, जैसे वर्षों से उनके मन मौन हैं।

तब अचानक लगा...

रिश्ते खून से नहीं टूटते, वे उपेक्षा से टूटते हैं।

कई लोग कहते हैं— "खून कभी पानी नहीं होता।"

पर मैंने जीवन में देखा है कि कई बार खून इतना ठंडा हो जाता है कि उसमें संवेदना ही जम जाती है।

आज के समय में सबसे अधिक ईर्ष्या कोई अजनबी नहीं करता।

सबसे अधिक बेचैनी उसे होती है... जो आपका अपना कहलाता है।

उसे आपका संघर्ष नहीं दिखाई देता।

उसे केवल आपकी सफलता दिखाई देती है।

उसे आपकी जागी हुई रातें नहीं दिखतीं।

उसे केवल आपकी मुस्कान दिखाई देती है।

और वही मुस्कान उसके भीतर ईर्ष्या की आग बन जाती है।

मैंने ऐसे रिश्ते देखे हैं...

जो हर पारिवारिक समारोह में सबसे आगे बैठते हैं, पर जब परिवार का कोई सदस्य संकट में हो, तो सबसे पहले अपनी नज़रें फेर लेते हैं।

वे आपके घर की मिठाई खा सकते हैं, लेकिन आपकी खुशी पचा नहीं सकते।

वे आपके दुख पर आँसू नहीं बहाते, लेकिन आपकी उपलब्धियों पर रातभर करवटें बदलते हैं।

सबसे बड़ा आश्चर्य यह नहीं कि वे साथ नहीं आए...

सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि उन्हें कभी अपनी कमी महसूस भी नहीं हुई।

आज जन्मदिन पर मुझे एक सत्य और स्पष्ट दिखाई दिया—

खानदान बहुत बड़ा हो सकता है, लेकिन इंसान बहुत कम होते हैं।

रिश्तेदारों की भीड़ में कई बार एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिलता, जो केवल इतना कह दे—

"घबराना मत... मैं तुम्हारे साथ हूँ।"

विश्वास कीजिए...

यह एक वाक्य किसी लाखों के उपहार से बड़ा होता है।

मैंने यह भी सीखा है कि जो लोग आपकी अनुपस्थिति में आपकी बुराई सुनकर मुस्कुरा देते हैं, वे आपकी उपस्थिति में चाहे जितनी बड़ी मुस्कान दे दें, उनकी आत्मा का आईना साफ़ नहीं होता।

इसलिए अब शिकायत नहीं करती।

क्योंकि जीवन ने सिखा दिया है—

रिश्ते जन्म से मिलते हैं, लेकिन अपने कर्मों से कमाने पड़ते हैं।

आज मेरे जन्मदिन पर मैं किसी से कोई गिला नहीं रखती।

मैं केवल इतना चाहती हूँ कि कोई भी मनुष्य अपने ही लोगों के बीच अकेला न पड़े।

यदि आपके घर, परिवार या रिश्तेदारी में कोई ऐसा व्यक्ति है जो चुपचाप संघर्ष कर रहा है...

तो उसे धन मत दीजिए।

उसे केवल दो शब्द दीजिए—

"मैं तुम्हारे साथ हूँ।"

क्योंकि कई बार यही दो शब्द किसी टूटते हुए मनुष्य को फिर से जीना सिखा देते हैं।

और अंत में...

आज मुझे सबसे बड़ा उपहार उन लोगों से मिला, जिनसे मेरा खून का रिश्ता नहीं था, लेकिन हृदय का संबंध था।

तब समझ आया—

रक्त शरीर को जीवित रखता है,

पर प्रेम ही रिश्तों को जीवित रखता है।

खून का रिश्ता जन्म देता है,

लेकिन आत्मीयता ही जीवन भर साथ निभाती है।

– डॉ. नीरू मोहन

"पति गुस्सा करे तो क्या करें?" संवाद शैली

 "पति गुस्सा करे तो क्या करें?"

पत्नी: आजकल लोग पूछते हैं—पति गुस्सा करे तो क्या करें?

परामर्शदाता: सबसे पहले यह समझिए कि हर गुस्से का जवाब गुस्से से देना समाधान नहीं होता।

पत्नी: तो क्या हमेशा चुप रहना चाहिए?

परामर्शदाता: नहीं। चुप्पी भी हमेशा समाधान नहीं होती। यदि सामने वाला बहुत क्रोधित है, तो पहले उसे शांत होने का समय दें। फिर सही समय पर शांत स्वर में बात करें।

पत्नी: अगर गुस्सा मेरी गलती की वजह से हो?

परामर्शदाता: अपनी गलती स्वीकार करना रिश्ते को छोटा नहीं, बल्कि मजबूत बनाता है।

पत्नी: और अगर गलती उनकी हो?

परामर्शदाता: तब भी अपमान या ताने देने के बजाय अपनी बात स्पष्ट और सम्मानपूर्वक रखें। उद्देश्य जीतना नहीं, रिश्ता बचाना होना चाहिए।

पत्नी: अगर उनका गुस्सा बार-बार अपमान, डराने या मारपीट तक पहुँच जाए?

परामर्शदाता: यह सामान्य वैवाहिक मतभेद नहीं है। ऐसी स्थिति में अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता दें, भरोसेमंद परिवारजन या मित्र से बात करें और आवश्यकता हो तो पेशेवर या कानूनी सहायता लें।

पत्नी: तो रिश्ते का सबसे बड़ा मंत्र क्या है?

परामर्शदाता: गुस्से में निर्णय नहीं, और शांति में संवाद। सम्मान, धैर्य और विश्वास—यही किसी भी विवाह की सबसे मजबूत नींव हैं।

समापन संदेश:

"पति हो या पत्नी—गुस्सा इंसान को छोटा नहीं बनाता, लेकिन गुस्से में बोले गए शब्द अक्सर रिश्तों को छोटा कर देते हैं। इसलिए बहस जीतने से अधिक महत्वपूर्ण है, रिश्ता बचाना।"

पति गुस्सा करे तो क्या करें? एकल संवाद

 पति गुस्सा करे तो क्या करें?


अक्सर मुझसे पूछा जाता है—"मैडम, पति बहुत गुस्सा करते हैं, क्या करें?"


तो मेरा पहला जवाब होता है—सबसे पहले यह समझिए कि गुस्सा कोई बीमारी नहीं, एक भावना है। लेकिन उस भावना को कैसे व्यक्त किया जाए, यही इंसान का चरित्र बताता है।


पति गुस्सा करें तो उसी समय बहस जीतने की कोशिश मत कीजिए। आग पर पेट्रोल डालने से घर नहीं बचता। कभी-कभी एक कदम पीछे हटना हार नहीं, रिश्ते की समझदारी होती है।


लेकिन इसका यह अर्थ भी बिल्कुल नहीं कि हर बार चुप रहिए, हर अपमान सहिए या अपनी आत्मसम्मान की बलि दे दीजिए। शांत समय का इंतज़ार कीजिए और फिर स्पष्ट शब्दों में कहिए—"आपकी बात मुझे स्वीकार हो सकती है, लेकिन आपका गुस्सा और अपमान नहीं।"


याद रखिए, पति-पत्नी का रिश्ता अदालत नहीं है, जहाँ हर दिन कोई जीते और कोई हारे। यह तो वह जगह है जहाँ दोनों को मिलकर रिश्ता जीतना होता है।


हाँ, एक बात और। यदि गुस्सा केवल ऊँची आवाज़ तक सीमित नहीं है, बल्कि गाली, अपमान, धमकी या हाथ उठाने तक पहुँच गया है, तो इसे सामान्य मत मानिए। वहाँ चुप्पी नहीं, साहस और सही मदद की ज़रूरत होती है।


इसलिए मेरा मानना है—पति गुस्सा करें तो पहले परिस्थिति को संभालिए, फिर संवाद कीजिए। लेकिन यदि गुस्सा आपकी गरिमा और सुरक्षा पर चोट करने लगे, तो समझौता नहीं, सही निर्णय लीजिए।


क्योंकि रिश्ते प्यार से चलते हैं, डर से नहीं।

जब मैं मरकर वापस आई

 जब मैं मरकर वापस आई


जिस दिन मैं मरी, उस दिन पहली बार मेरे घर में इतनी भीड़ थी।


जिन रिश्तेदारों को मेरे जीते-जी मेरा पता याद नहीं था, वे सबसे आगे खड़े होकर रो रहे थे। पड़ोसन, जो हर सुबह मेरी बुराई से अपनी चाय मीठी करती थी, आज कह रही थी—

"बहुत नेक औरत थी... भगवान ऐसी आत्मा सबको दे।"


मैं ऊपर खड़ी सब देख रही थी।


यमदूत बोले, "चलो, समय हो गया।"


मैंने कहा, "बस पाँच मिनट... देख लूँ, मेरे जाने के बाद कौन कितना दुखी है।"


उन्होंने मुस्कुराकर इजाज़त दे दी।


सबसे पहले मेरी अलमारी खुली।


आँसू पोंछते-पोंछते लोग गहनों का हिसाब लगाने लगे।

बेटा बोला, "माँ ने किसे क्या लिखा है?"

बेटी बोली, "पहले लॉकर की चाबी ढूँढ़ो।"


पति, जो जीते-जी कभी चाय तक नहीं बना पाए थे, अब रिश्तेदारों के सामने सुबकते हुए कह रहे थे—

"मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी चली गई..."


और पाँच मिनट बाद वही धीरे से पूछ रहे थे—

"खाना कितने लोगों का बनवाना है?"


मैंने पहली बार समझा...

मौत से बड़ा आयोजन, मौत के बाद की व्यवस्थाएँ होती हैं।


तभी मोबाइल बजने लगे।


एक ने मेरी फोटो पर काली पट्टी लगाई।

दूसरे ने लिखा—

"ओम् शांति... जीवन का कोई भरोसा नहीं।"


तीसरे ने पोस्ट डालते ही नीचे लिखा—

"वैसे मेरी नई रील भी देख लेना।"


मैं हँसी भी और रोई भी।


तभी यमराज बोले,

"चलो, अब सच जान लिया?"


मैंने कहा,

"नहीं प्रभु... एक कमरा अभी बाकी है।"


वहाँ मेरी बूढ़ी माँ अकेली बैठी थीं।


उनके पास न मोबाइल था,

न श्रद्धांजलि का भाषण,

न कैमरा।


बस मेरी बचपन की फ्रॉक सीने से लगाकर इतना ही कह रही थीं—


"बेटी... एक बार आ जा।"


उस एक वाक्य ने मेरी पूरी आत्मा हिला दी।


शायद पहली बार समझ आया कि दुनिया में सबसे सच्चा शोक वही करता है,

जिसने आपको सचमुच जिया हो।


इतने में ऊपर से आवाज़ आई—


"गलती हो गई...

जिसे लाना था, वह दूसरी गली में रहती थी।

तुम्हारी उम्र अभी बाकी है।"


और अगले ही पल...


मैं अस्पताल के बिस्तर पर आँखें खोल चुकी थी।


सब मुझे देखकर खुश थे।


लेकिन मैं बदल चुकी थी।


अब मैंने लोगों की बातों पर नहीं,

उनके व्यवहार पर विश्वास करना शुरू किया।


अब मैं हर दिन ऐसे जीती हूँ,

मानो मौत अभी दरवाज़े पर खड़ी हो।


क्योंकि...


मरकर वापस आने से मैंने यही सीखा—

इंसान की असली कीमत उसके मरने पर नहीं, उसके जीते-जी दिए गए सम्मान से तय होती है।

मेरे से मिलने आए कान्हा

 मेरे से मिलने आए कान्हा


उस रात मैं बिल्कुल अकेला था।


कमरे में सन्नाटा था, लेकिन मेरे भीतर शोर था।

रिश्तों के टूटने का शोर...

उम्मीदों के बिखरने का शोर...

और उन चेहरों का शोर, जिन्हें मैंने अपना समझा था।


कहते हैं कि अपने कभी धोखा नहीं देते।


लेकिन जीवन ने सिखाया कि कभी-कभी सबसे गहरे घाव वही देते हैं, जिनके लिए हम सबसे अधिक जीते हैं।


मैं सोचता रहा—

क्या रिश्ते केवल स्वार्थ तक ही सीमित रह गए हैं?

क्या बड़े-बुज़ुर्गों के सम्मान की कीमत अब सुविधाओं से तय होती है?

क्या त्याग का कोई मोल नहीं बचा?


इन सवालों का उत्तर किसी इंसान के पास नहीं था।


मैंने थके हुए मन से श्रीकृष्ण की तस्वीर के सामने दीपक जलाया।


बस इतना ही कहा—


"कान्हा... अब मुझसे नहीं होता।

अगर सच में हो, तो एक बार मिल जाओ।"


आँखें कब बंद हुईं, पता ही नहीं चला।


अचानक बाँसुरी की मधुर धुन सुनाई दी।


मैंने आँखें खोलीं।


सामने पीताम्बर धारण किए, मोरपंख सजाए, अधरों पर मुस्कान लिए कान्हा खड़े थे।


मैं फूट-फूटकर रो पड़ा।


मैंने कहा,

"कान्हा...

जिन्हें अपना माना, वही बदल गए।

जिनके लिए जीवन लगा दिया, उन्होंने ही मुझे अकेला छोड़ दिया।"


कान्हा मुस्कुराए।


बोले,

"तुम्हें लोगों ने नहीं बदला...

उन्होंने तुम्हारी आँखों से भ्रम हटाया है।


जिसे तुम अंत समझ रहे हो,

मैं उसे तुम्हारी नई शुरुआत बना रहा हूँ।"


मैंने पूछा,

"लेकिन इतना दर्द क्यों?"


कान्हा ने कहा,


"सोना आग में तपे बिना कुंदन नहीं बनता।

और भक्त परीक्षा के बिना भक्त नहीं बनता।"


मैं चुप था।


उन्होंने फिर कहा,


"तुम लोगों के व्यवहार को अपना भाग्य मत समझो।

जो तुम्हें छोड़ गए, उन्हें छोड़ दो।

लेकिन अपने भीतर का प्रेम मत छोड़ना।

क्योंकि जो कटु होकर जीता है, वह हर दिन हारता है।

जो विश्वास रखकर जीता है, उसे मैं कभी अकेला नहीं छोड़ता।"


इतना कहकर कान्हा ने मेरा हाथ थाम लिया।


उस स्पर्श में ऐसी शांति थी, जो वर्षों से नहीं मिली थी।


सुबह जब मेरी आँख खुली, तो कमरा वैसा ही था।


दीपक अब भी जल रहा था।


लेकिन मैं बदल चुका था।


अब मैं रिश्तों से अपेक्षा नहीं करता।

सम्मान मिले तो धन्यवाद,

न मिले तो भी शिकायत नहीं।


क्योंकि उस रात मैंने जान लिया था—


जब दुनिया के सारे दरवाज़े बंद हो जाते हैं,

तब वृंदावन का एक द्वार खुलता है।


और उस द्वार पर खड़े होकर कान्हा मुस्कुराते हुए कहते हैं—


"जब सब साथ छोड़ दें, तब समझ लेना...

अब मैं स्वयं तुम्हारा हाथ पकड़ने आया हूँ।"


उस दिन से मैंने लोगों के बदलते चेहरों को नहीं,

कान्हा की स्थिर मुस्कान को अपना सहारा बना लिया।


क्योंकि रिश्ते साथ दें या न दें,

कान्हा कभी अपने भक्त का साथ नहीं छोड़ते।

तीज का झूला और दिखावे की दुनिया"

 शीर्षक: "तीज का झूला और दिखावे की दुनिया"

सावन की पहली फुहार पड़ी तो गाँव की गलियाँ हरी चूड़ियों की खनक से भर उठीं। हर तरफ मेहंदी की खुशबू, झूलों की पींग और गीतों की मिठास थी।

गाँव की दादी बोलीं—

"तीज तो वो पर्व है बिटिया, जिसमें श्रृंगार से ज्यादा संस्कार सजते हैं।"

लेकिन अब तीज भी समय के साथ बदल गई थी।

गाँव की सीमा ने जैसे ही मोबाइल खोला, देखा—

"तीज स्पेशल प्रतियोगिता!

सबसे सुंदर साड़ी, सबसे महंगी ज्वेलरी और सबसे शानदार मेहंदी वाली महिला को मिलेगा पुरस्कार!"

सीमा मुस्कुराई और बोली—

"वाह! अब तो सुहाग की लंबी उम्र की प्रार्थना भी शायद ब्रांडेड साड़ी पहनकर ही स्वीकार होगी!"

पास बैठी उसकी सास हँस पड़ीं।

बोलीं—

"हमारे समय में तीज पर बहू के हाथों की मेहंदी देखी जाती थी, अब तो मेहंदी से ज्यादा मोबाइल कैमरे का एंगल देखा जाता है।"

उधर शहर में रहने वाली रिया ने तीज की तैयारी शुरू कर दी।

उसने पति से कहा—

"सुनो, इस बार तीज पर मुझे लाखों वाली ज्वेलरी चाहिए। पड़ोस की कविता ने पिछले साल इतनी महंगी पहनी थी कि उसकी फोटो पर हजारों लाइक आए थे।"

पति ने धीरे से पूछा—

"लेकिन तुम्हें खुशी किससे मिलेगी? गहनों से या मेरे साथ बिताए समय से?"

रिया थोड़ी देर चुप रही।

फिर बोली—

"समय तो फोटो में दिखाई नहीं देता ना!"

पति मुस्कुराया—

"शायद इसी वजह से आजकल रिश्ते कमजोर और पोस्ट मजबूत हो रहे हैं।"

तीज के दिन मोहल्ले की महिलाओं ने बड़ा आयोजन किया। मंच सजा, कैमरे लगे और घोषणा हुई—

"अब होगी मिसेज तीज प्रतियोगिता!"

एक महिला बोली—

"मेरी साड़ी विदेश से आई है।"

दूसरी बोली—

"मेरी ज्वेलरी असली है।"

तीसरी बोली—

"मेरे मेकअप आर्टिस्ट ने मुझे तीन घंटे में तैयार किया है।"

तभी कोने में बैठी बूढ़ी अम्मा ने अपनी पुरानी हरी साड़ी ठीक करते हुए कहा—

"बेटियों, एक बात पूछूँ?"

सबने उनकी ओर देखा।

अम्मा बोलीं—

"जिस तीज में पत्नी पति की लंबी उम्र की कामना करती थी, वह कब पति की जेब की लंबाई नापने का त्योहार बन गई?"

कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।

अम्मा ने आगे कहा—

"मैंने भी तीज रखी है। कभी नई साड़ी नहीं मिली, कभी महंगे गहने नहीं मिले। लेकिन मेरे पति ने जब बीमारी में मेरा हाथ पकड़ा, मेरे बच्चों ने जब मेरे माथे पर प्यार से हाथ रखा—वही मेरे लिए सबसे बड़ा श्रृंगार था।"

उनकी आँखों में चमक थी।

"याद रखना बेटियों, तीज का चाँद चेहरे की चमक नहीं, रिश्तों की रोशनी देखता है।"

अगले दिन सोशल मीडिया पर तस्वीरें वायरल थीं।

किसी की साड़ी की चर्चा थी, किसी की ज्वेलरी की।

लेकिन सबसे ज्यादा साझा की जा रही थी अम्मा की एक तस्वीर—

पुरानी हरी साड़ी में मुस्कुराती हुई।

नीचे लिखा था—

"त्योहार कपड़ों से नहीं, भावनाओं से खूबसूरत होते हैं।

जहाँ प्रेम सच्चा हो, वहाँ साधारण साड़ी भी रानी का श्रृंगार बन जाती है।"

और शायद यही तीज का असली संदेश था—

"झूले ऊँचे हों या छोटे, रिश्तों की डोर मजबूत होनी चाहिए।

क्योंकि दिखावे के बाजार में भावनाएँ सबसे कीमती और सबसे कम बिकने वाली चीज़ हैं।"

जब बादल नहीं, चरित्र टपकने लगे

 बरसात : जब बादल नहीं, चरित्र टपकने लगे


पहली बारिश की बूँद जैसे ही धरती पर गिरी, मिट्टी महक उठी। बच्चे कागज़ की नाव लेकर दौड़ पड़े। किसान ने आकाश की ओर हाथ जोड़ दिए। मोर ने पंख फैला दिए।


लेकिन शहर में एक अलग ही बरसात शुरू हो चुकी थी।


यह पानी की नहीं, अवसरों की बरसात थी।


नगर निगम की सड़कें पहली फुहार में ही ऐसे बह गईं, मानो डामर ने भी ठेकेदार से कह दिया हो—"भाई, जितना कमीशन मिला था, उतना ही टिक पाया।"


नेता जी छाता लेकर निकले। कैमरे पहले से तैयार थे। एक बच्चे को गोद में उठाया, दो मिनट कीचड़ में चले, तीसरे मिनट गाड़ी में बैठकर बोले—

"देखिए, जनता के बीच हूँ।"


उधर सोशल मीडिया पर भी बादल गरज रहे थे।


किसी ने दस साल पुरानी बाढ़ की तस्वीर डालकर लिखा—"आज हमारे शहर का हाल।"


दूसरे ने किसी विदेशी सड़क की फोटो लगाकर लिखा—"यह हमारे वार्ड की उपलब्धि है।"


तीसरे ने घर की खिड़की से चाय का कप पकड़कर लिखा—

"बारिश... अहा! कितना सुंदर मौसम!"


उसी पोस्ट के नीचे एक रिक्शेवाला भीगते हुए सवारी ढूँढ़ रहा था।

एक मजदूर की आधी दिहाड़ी बारिश बहा ले गई थी।

एक फुटपाथ पर रहने वाली माँ अपने बच्चों को प्लास्टिक से ढँक रही थी।


पर उनकी तस्वीरें ट्रेंड नहीं करतीं।


बारिश तेज हुई तो मोहल्ले के नाले ने लोकतंत्र की तरह अपना मुँह खोल दिया।

जिसने कभी सफाई नहीं देखी थी, वह अब पूरे अधिकार से सड़क पर बह रहा था।


लोग बोले—

"सरकार निकम्मी है।"


सरकार बोली—

"पिछली सरकार जिम्मेदार है।"


पिछली सरकार बोली—

"हमारे समय में इतनी बारिश कहाँ होती थी!"


और बादल ऊपर से हँस रहे थे।


इतने में चौराहे पर बैठे एक बूढ़े चायवाले ने मुस्कुराकर कहा—


"बेटा, बरसात तो हर साल आती है। फर्क इतना है कि पहले छत टपकती थी, अब नीयत टपकती है।"


सभी चुप हो गए।


वह फिर बोला—


"पहले लोग बरसात में पड़ोसी को घर बुला लेते थे।

अब मोबाइल निकालकर उसकी डूबती हुई वीडियो बना लेते हैं।

पहले छाता बाँटा जाता था।

अब सलाह बाँटी जाती है।

पहले नालियाँ साफ होती थीं।

अब सिर्फ भाषण साफ-सुथरे होते हैं।"


बारिश धीरे-धीरे थम गई।


सड़क पर कीचड़ रह गया।

दीवारों पर पोस्टर रह गए।

सोशल मीडिया पर रीलें रह गईं।


और लोगों के मन में वही पुराना सवाल रह गया—


"बरसात आखिर पानी की थी... या इंसानियत के बह जाने की?"


उस दिन समझ आया कि बादल कभी समाज को डुबोते नहीं।


समाज तब डूबता है जब ईमानदारी सूख जाती है, जिम्मेदारियाँ बह जाती हैं और संवेदनाएँ सीवर में उतर जाती हैं।


बरसात से डरना नहीं चाहिए...

डर उस दिन से होना चाहिए, जिस दिन पानी से पहले हमारा चरित्र बहने लगे।

बरसात का लोकतंत्र

 बरसात का लोकतंत्र


जब बादल कम और बहाने ज़्यादा बरसे...


रात भर बादल गरजते रहे।


सुबह अख़बार आया तो पहली खबर थी—


"शहर पानी-पानी!"


दूसरी खबर थी—


"प्रशासन पूरी तरह सतर्क।"


दोनों खबरें साथ पढ़कर रामस्वरूप हँस पड़ा।


बोला, "अगर प्रशासन सचमुच सतर्क होता तो शहर पानी-पानी नहीं होता, और अगर शहर पानी-पानी है तो सतर्कता प्रेस नोट में ही रही होगी।"


बात आई-गई हो गई।


लेकिन दो घंटे बाद उसकी गली सचमुच नदी बन चुकी थी।


बच्चे स्कूल नहीं जा पाए।


एम्बुलेंस आधे रास्ते में फँस गई।


दूध वाला नाव खोज रहा था और नगर निगम के अधिकारी फ़ाइल।


उधर जिला कार्यालय में आपात बैठक चल रही थी।


पहला अधिकारी बोला,

"स्थिति गंभीर है।"


दूसरा बोला,

"जी, मीडिया को पहले बता दें कि हम रात से मैदान में हैं।"


तीसरा बोला,

"सर... मैदान तो पानी में है।"


सबने उसे घूरकर देखा।

इतनी ईमानदारी सरकारी बैठक में अच्छी नहीं लगती।


इधर नेता जी का काफ़िला निकल पड़ा।


चार गाड़ियाँ...


आठ सुरक्षाकर्मी...


दस कैमरे...


और एक जोड़ी बिल्कुल नई रबर की चप्पल।


नेता जी घुटने तक पानी में उतरे।


कैमरामैन चिल्लाया—

"सर... थोड़ा उदास चेहरा बनाइए।"


चेहरा उदास हुआ।


दूसरे कैमरे ने कहा—

"सर... अब एक बच्चे को गोद में ले लीजिए।"


बच्चा आया।


फोटो हुई।


बच्चा वापस चला गया।


नेता जी ने चप्पल उतारी और गाड़ी में बैठते हुए बोले—


"जनता के दुख-दर्द में हमेशा साथ हूँ।"


पीछे खड़ा बच्चा अपनी माँ से पूछ रहा था—


"माँ... ये अंकल हमारे साथ कब थे?"


माँ ने कहा—


"बेटा... फोटो में।"


उधर सोशल मीडिया पर भी बाढ़ आ चुकी थी।


एक युवक कमर तक पानी में खड़ा होकर रील बना रहा था—


"हेलो दोस्तों...

देखिए मैं मौत के मुँह से लाइव हूँ।

वीडियो अच्छा लगे तो लाइक, शेयर और सब्सक्राइब ज़रूर करना।"


पाँच मिनट बाद वही युवक पानी से निकलकर कॉफी पीते हुए अगली रील बना रहा था—


"बारिश का मज़ा ही कुछ और है..."


दूसरी ओर एक बुज़ुर्ग अपनी दवाइयाँ बचाने के लिए पानी में घुटनों के बल रेंग रहे थे।


लेकिन उनकी कोई रील नहीं बनी।


क्योंकि दर्द कभी ट्रेंड नहीं करता...


ड्रामा करता है।


शाम तक प्रशासन ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर दी।


कहा—


"इतनी बारिश सौ साल में पहली बार हुई है।"


पास बैठा बूढ़ा शिक्षक मुस्कुराया।


बोला—


"बेटा...

बारिश तो हर साल नई होती है,

लेकिन बहाना हमेशा पुराना होता है।"


अगले दिन विपक्ष पहुँचा।


उन्होंने उसी सड़क पर प्रेस वार्ता की जहाँ कल सत्ता पक्ष खड़ा था।


बोले—


"यदि हम सत्ता में होते तो शहर वेनिस बन जाता।"


भीड़ में से आवाज़ आई—


"साहब...

शहर तो अभी भी वेनिस ही बना हुआ है।

बस फ़र्क इतना है कि वहाँ गोंडोला चलता है, यहाँ ट्रैक्टर।"


तालियाँ बज उठीं।


दोनों पक्ष मुस्कुराए।


क्योंकि जनता की हँसी भी चुनाव तक ही गिनी जाती है।


उधर ठेकेदार अपने बंगले की बालकनी से बारिश देख रहा था।


उसने चाय की चुस्की ली और इंजीनियर से कहा—


"सड़क फिर बह गई?"


इंजीनियर बोला—


"जी सर।"


ठेकेदार मुस्कुराया—


"बहुत बढ़िया।

अगले महीने फिर टेंडर आएगा।"


बारिश उसकी दुश्मन नहीं थी...


उसकी साझेदार थी।


रात को टीवी चैनलों पर बहस शुरू हो गई।


एक एंकर गरजा—


"देश जानना चाहता है कि पानी सड़क पर क्यों है?"


दूसरा गरजा—


"पहले यह बताइए कि विपक्ष कहाँ था?"


तीसरा गरजा—


"इसमें विदेशी साज़िश की भी जाँच होनी चाहिए।"


इतनी देर में शहर का एक बच्चा अपनी कॉपी में नाव बना रहा था।


उसने मासूमियत से पूछा—


"पापा...

क्या बारिश हमेशा सड़कें बहा देती है?"


पिता ने लंबी साँस ली और कहा—


"नहीं बेटा...

बारिश तो सिर्फ़ पानी लाती है।


सड़कें तो बेईमानी बहा देती है।"


बच्चे ने फिर पूछा—


"फिर हर साल यही क्यों होता है?"


पिता ने कहा—


"क्योंकि हर साल बादल बदलते हैं...

लेकिन नीयत नहीं।"


अगली सुबह सूरज निकल आया।


पानी उतर गया।


कीचड़ रह गया।


वादे रह गए।


फ़ोटो रह गए।


हैशटैग बदल गए।


और शहर अगले मानसून का इंतज़ार करने लगा।


क्योंकि यहाँ बरसात मौसम नहीं...


एक वार्षिक उत्सव है—


जहाँ जनता डूबती है...


राजनीति तैरती है...


प्रशासन प्रेस नोट लिखता है...


ठेकेदार अगला टेंडर गिनता है...


और सोशल मीडिया पूछता है—


"दोस्तों... आपको बारिश कैसी लगी? कमेंट करके ज़रूर बताइए!"


याद रखिए—


बरसात कभी शहर को नहीं डुबोती।


शहर तब डूबता है जब नालियों से पहले ज़मीर जाम हो जाए, जब जिम्मेदारी फ़ाइलों में बह जाए और जब जनता हर साल भीगने की आदत को ही अपनी किस्मत मान ले।


जिस दिन नागरिक सवाल पूछना सीख जाएगा और व्यवस्था जवाब देना, उस दिन बारिश केवल मौसम होगी—समाचार नहीं।

शादी के छह पड़ाव… और सातवाँ सच"

 शीर्षक: "शादी के छह पड़ाव… और सातवाँ सच"

"शादी एक दिन का शोर नहीं होती, यह दो दिलों के बीच उम्रभर चलने वाला संवाद होती है।"

गाँव के पुराने घर की चौखट पर बैठी दादी आज फिर मुस्कुरा रही थीं। सामने आँगन में पोती की शादी की तैयारियाँ चल रही थीं। कहीं हल्दी की खुशबू थी, कहीं गीतों की गूँज और कहीं मोबाइल से फोटो खींचने की होड़।

पोती ने दादी से पूछा—

"दादी, आजकल लोग कहते हैं शादी तो बस एक इवेंट है… एक दिन की पार्टी। क्या सच में ऐसा है?"

दादी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

"नहीं बिटिया, शादी कोई एक दिन का कार्यक्रम नहीं, यह छह पड़ावों से गुजरने वाली जिंदगी की कहानी है।"

पहला पड़ाव — रिश्ता।

दादी बोलीं—

"जब दो लोग पहली बार मिलते हैं, तब केवल चेहरे नहीं मिलते, दो संस्कार, दो परिवार और दो सपने मिलते हैं। आजकल लोग फोटो देखकर रिश्ता तय कर लेते हैं, लेकिन जिंदगी फोटो से नहीं, स्वभाव से चलती है।"

दूसरा पड़ाव — वचन।

"सगाई की अंगूठी उंगली में पहनाई जाती है, लेकिन असली वादा दिल में लिखा जाता है। अंगूठी खो जाए तो भी रिश्ता बचा रहना चाहिए।"

तीसरा पड़ाव — तैयारी।

दादी हँसते हुए बोलीं—

"आजकल शादी की तैयारी में लाखों खर्च हो जाते हैं, लेकिन कई बार एक-दूसरे को समझने के लिए पाँच मिनट भी नहीं मिलते। सजावट घर की होती है, पर रिश्ता दिल का सजना चाहिए।"

चौथा पड़ाव — विवाह।

"फेरे सिर्फ अग्नि के सामने नहीं होते बिटिया, असली फेरे तो तब होते हैं जब पति-पत्नी एक-दूसरे के दुख के चार कदम साथ चलें।"

पाँचवाँ पड़ाव — गृहस्थी।

"शादी के बाद पता चलता है कि जिंदगी केवल हनीमून की तस्वीर नहीं होती। कभी बजट की चिंता होती है, कभी जिम्मेदारियों का बोझ। वहीं से प्रेम की असली परीक्षा शुरू होती है।"

छठा पड़ाव — साथ निभाना।

दादी की आँखें नम हो गईं।

"जब बाल सफेद हो जाएँ, चेहरे पर झुर्रियाँ आ जाएँ और फिर भी दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़कर कहें— 'तुम साथ हो तो सब ठीक है'… वही शादी की असली जीत है।"

पोती चुपचाप दादी की बातें सुन रही थी।

तभी बाहर से आवाज आई—

"दादी, आपकी पुरानी शादी की फोटो कहाँ है?"

दादी ने दीवार की ओर देखा। वहाँ दादा जी के साथ उनकी पुरानी तस्वीर लगी थी। उन्होंने कहा—

"देखो बिटिया, उस समय न बड़े होटल थे, न महंगे कपड़े, न सोशल मीडिया पर दिखाने की चिंता। बस एक विश्वास था कि जिंदगी चाहे जैसी हो, साथ नहीं छोड़ेंगे।"

फिर दादी मुस्कुराईं और बोलीं—

"आजकल लोग शादी में मेहमानों की संख्या गिनते हैं, खर्चे का हिसाब रखते हैं… लेकिन भूल जाते हैं कि शादी की सफलता रिश्तेदारों की तालियों से नहीं, दो लोगों की खामोश समझदारी से तय होती है।"

आँगन में शहनाई बज रही थी।

पोती ने दादी का हाथ पकड़ लिया।

उसे समझ आ गया था कि—

"शादी का पहला दिन सबको दिखाई देता है, लेकिन उसे निभाने के लिए जो हजारों दिन लगते हैं, वही रिश्ते की असली कहानी लिखते हैं।"

स्वर्ग जाने की सीढ़ी

 स्वर्ग जाने की सीढ़ी


गाँव के बीचों-बीच एक दिन एक महात्मा जी आए। उन्होंने घोषणा की—


"मैं स्वर्ग जाने की सीढ़ी बेच रहा हूँ। जो इसे खरीद लेगा, उसके लिए स्वर्ग का रास्ता आसान हो जाएगा।"


बस फिर क्या था!


सुबह तक जहाँ सब्ज़ी वालों के ठेले लगते थे, वहाँ अब सीढ़ी खरीदने वालों की कतार थी।


कोई बोला, "मुझे दस पायदान वाली देना।"


दूसरा बोला, "मुझे सबसे ऊँची वाली चाहिए। आखिर मैं बड़ा आदमी हूँ।"


तीसरा बोला, "क्या ईएमआई पर मिल जाएगी? स्वर्ग भी किस्तों में मिल जाए तो अच्छा है!"


महात्मा मुस्कुराते रहे। सीढ़ियाँ बिकती रहीं।


एक नेता जी आए। बोले, "मेरे लिए वीआईपी सीढ़ी निकालो। मुझे लाइन में लगने की आदत नहीं है।"


एक व्यापारी बोला, "थोड़ी छूट कर दीजिए।"


एक बाबू ने पूछा, "कोई सिफ़ारिश वाला रास्ता नहीं है क्या?"


एक धर्मगुरु बोले, "मेरे अनुयायियों को थोक में दे दीजिए।"


महात्मा हर किसी को सीढ़ी देते रहे।


शाम होने तक पूरा मैदान सीढ़ियों से भर गया।


लेकिन एक अजीब बात हुई...


कोई ऊपर नहीं जा रहा था।


सब अपनी-अपनी सीढ़ी की सफ़ाई कर रहे थे।

कोई उसे रंग रहा था।

कोई उस पर अपना नाम लिख रहा था।

कोई उसकी फोटो सोशल मीडिया पर डाल रहा था—


"देखिए, मैंने स्वर्ग की सीढ़ी खरीद ली!"


लाइक्स बढ़ रहे थे...

लेकिन ऊँचाई नहीं।


इतने में एक बूढ़ी औरत आई।


उसने महात्मा से पूछा,

"बाबा, सीढ़ी तो सबके पास है... लेकिन स्वर्ग कौन जाएगा?"


महात्मा मुस्कुराए और बोले—


"बेटी, सीढ़ी खरीदने से कोई ऊपर नहीं जाता। ऊपर वही जाता है जो पहला कदम रखता है।"


भीड़ एक-दूसरे का चेहरा देखने लगी।


महात्मा ने आगे कहा—


"आज लोग धर्म खरीद रहे हैं, लेकिन धैर्य नहीं।

माला खरीद रहे हैं, लेकिन मन नहीं बदल रहे।

मंदिर बना रहे हैं, लेकिन भीतर का अहंकार नहीं तोड़ रहे।

दान दे रहे हैं, लेकिन अपमान बाँटना नहीं छोड़ रहे।

सीढ़ियाँ बहुत हैं...

चलने वाले बहुत कम हैं।"


इतना सुनते ही कुछ लोगों ने अपनी सीढ़ियाँ छोड़ दीं।


लेकिन अधिकांश लोग वहीं खड़े रहे...


क्योंकि उन्हें स्वर्ग नहीं,

स्वर्ग की 'सेल्फ़ी' चाहिए थी।


संदेश


आज हर व्यक्ति स्वर्ग जाने का शॉर्टकट खोज रहा है।

कोई चमत्कार में, कोई दिखावे में, कोई पद में, कोई पैसे में।


जबकि स्वर्ग की असली सीढ़ी लकड़ी या लोहे की नहीं होती।

उसकी हर पायदान पर एक शब्द लिखा होता है—


सत्य, सेवा, करुणा, क्षमा, विनम्रता, ईमानदारी और प्रेम।


जो इन पायदानों पर रोज़ चढ़ता है,

उसे स्वर्ग मरने के बाद नहीं,

जीते-जी अपने भीतर मिल जाता है।

ब्लॉगिंग की दुनिया का सच

 ब्लॉगिंग की दुनिया का सच


गाँव में एक दिन खबर फैली कि शहर से एक बड़ा "ज्ञान व्यापारी" आया है।


वह चौपाल पर खड़ा होकर चिल्ला रहा था—


"ज्ञान चाहिए? सफलता चाहिए? करोड़ों पाठक चाहिए? बस मेरा ब्लॉग पढ़िए!"


लोग उमड़ पड़े।


किसी ने पूछा, "क्या आपने जीवन में बहुत कुछ सीखा है?"


वह बोला,

"सीखा नहीं... गूगल से इकट्ठा किया है।"


दूसरे ने पूछा,

"क्या ये सब आपके अनुभव हैं?"


वह हँसा,

"अनुभव लिखने में समय लगता है, कॉपी-पेस्ट करने में नहीं।"


भीड़ फिर भी ताली बजाती रही।


कुछ ही दिनों में उसने "सफलता के 21 मंत्र", "अमीर बनने के 51 तरीके", "एक मिनट में विद्वान बनें" और "पाँच मिनट में संत बनने की कला" जैसे सैकड़ों ब्लॉग लिख डाले।


हर लेख के नीचे एक ही वाक्य लिखा होता—


"अगर यह लेख पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।"


लेकिन कहीं यह नहीं लिखा था—


"अगर जीवन बदल गया हो तो किसी ज़रूरतमंद की मदद भी कर देना।"


धीरे-धीरे गाँव के लोग भी ब्लॉग लिखने लगे।


जिसने कभी किताब नहीं पढ़ी थी, वह "पढ़ने के लाभ" पर लेख लिख रहा था।


जो सुबह दस बजे तक बिस्तर से नहीं उठता था, वह "सुबह चार बजे उठने का रहस्य" बता रहा था।


जिसका अपना परिवार उससे बात नहीं करता था, वह "रिश्ते कैसे निभाएँ" पर विशेषज्ञ बन बैठा था।


और जिसने जीवन में एक पौधा तक नहीं लगाया था, वह "पर्यावरण बचाइए" पर दस हज़ार शब्द लिख चुका था।


एक दिन गाँव के बूढ़े पुस्तकालयाध्यक्ष ने सबको बुलाया।


उन्होंने एक पुरानी डायरी दिखाई।


उसमें केवल दस पन्ने लिखे थे।


लोग हँस पड़े—

"बस इतने ही?"


बूढ़े ने शांत स्वर में कहा—


"हाँ... क्योंकि इनमें जो लिखा है, वह पहले जीया गया है, फिर लिखा गया है।"


पूरा चौपाल शांत हो गया।


उन्होंने आगे कहा—


"बेटा, ब्लॉग लिखना बुरा नहीं है।

लेकिन जब शब्द अनुभव से बड़े हो जाएँ और शीर्षक सत्य से बड़े हो जाएँ, तब लेख नहीं, भ्रम पैदा होते हैं।


आज लोग पढ़ने से ज़्यादा क्लिक गिनते हैं।

ज्ञान से ज़्यादा कीवर्ड खोजते हैं।

सत्य से ज़्यादा ट्रेंड का पीछा करते हैं।


और सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि...


जिस लेख का शीर्षक होता है — 'मोबाइल की लत छोड़िए'... उसे पढ़ने के लिए भी मोबाइल ही उठाना पड़ता है!"


चौपाल में ठहाका गूँज उठा।


लेकिन वह हँसी कुछ ही क्षणों की थी।


क्योंकि हर किसी को लगा कि यह कहानी किसी और की नहीं...


उसी की थी।


संदेश


ब्लॉगिंग का उद्देश्य केवल ट्रैफिक, विज्ञापन और वायरल होना नहीं होना चाहिए।


शब्द तब तक ज्ञान नहीं बनते, जब तक उनके पीछे सत्य, अध्ययन, अनुभव और समाज के प्रति जिम्मेदारी न हो।


जो लेखक केवल खोज-इंजन के लिए लिखता है, उसे क्लिक मिल सकते हैं।

लेकिन जो मनुष्य के अंतर्मन के लिए लिखता है, उसे इतिहास याद रखता है।

प्रदर्शन या संवाद?

 प्रदर्शन या संवाद?


शहर के चौक पर सैकड़ों विद्यार्थी इकट्ठा थे। हाथों में तख्तियाँ थीं, गुस्सा था और नारे भी।


उसी रास्ते से एक वृद्ध शिक्षक गुज़रे। उन्होंने किसी को नहीं टोका। बस पास खड़े एक छात्र से पूछा, "बेटा, क्या तुम जानते हो कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत क्या होती है?"


छात्र बोला, "प्रदर्शन।"


शिक्षक मुस्कुराए, "नहीं, लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है—विवेकपूर्ण संवाद।"


सभी छात्र उनकी ओर देखने लगे।


शिक्षक बोले, "सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है। उससे सवाल पूछना नागरिक का अधिकार है, लेकिन कानून का सम्मान करना भी उतना ही बड़ा कर्तव्य है। यदि विरोध हिंसा, अफवाह, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान या दूसरों की पढ़ाई और जीवन में बाधा बन जाए, तो उसका उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है।"


उन्होंने आगे कहा, "हर सरकार से गलती भी हो सकती है और अच्छे निर्णय भी। इसलिए न अंधा समर्थन सही है और न अंधा विरोध। सही रास्ता है—तथ्यों के आधार पर अपनी बात रखना, न्यायिक और संवैधानिक प्रक्रियाओं का सम्मान करना और समाज में शांति बनाए रखना।"


विद्यार्थियों में सन्नाटा छा गया।


एक छात्र आगे आया और बोला, "सर, हमने अपनी आवाज़ उठाने का अधिकार तो समझा, लेकिन अपनी ज़िम्मेदारी भूल गए थे।"


शिक्षक ने उत्तर दिया, "याद रखो, राष्ट्र केवल सरकार से नहीं बनता, बल्कि उन नागरिकों से बनता है जो मतभेद होने पर भी संविधान, कानून और एक-दूसरे के सम्मान को नहीं छोड़ते।"


उस दिन कई तख्तियाँ नीचे झुक गईं, लेकिन कई सिर ऊँचे हो गए—क्योंकि उन्होंने विरोध से पहले विवेक और संवाद का महत्व समझ लिया।


संदेश:

लोकतंत्र में अपनी बात रखना अधिकार है, परंतु कानून, शांति और संविधान का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। मतभेद हों तो समाधान संवाद और संवैधानिक तरीकों से खोजे जाने चाहिए, न कि अव्यवस्था से।

मोमबत्ती और मशाल

 मोमबत्ती और मशाल


नगर के बीचों-बीच एक चौराहा था। वहाँ दो वस्तुएँ रखी थीं—एक छोटी-सी मोमबत्ती और एक जलती हुई मशाल।


मोमबत्ती मुस्कुराकर बोली, "मैं अँधेरा दूर करने के लिए जलती हूँ।"


मशाल हँस पड़ी, "मैं भी उजाला करती हूँ, लेकिन जब कोई मुझे गुस्से में उठा लेता है, तो मैं रास्ता नहीं, घर जला देती हूँ।"


इतने में कुछ युवा वहाँ पहुँचे। उनके हाथों में नारे थे, आँखों में आक्रोश।


एक वृद्ध ने उनसे पूछा, "तुम्हारा उद्देश्य क्या है?"


उन्होंने कहा, "न्याय चाहिए।"


वृद्ध बोले, "न्याय माँगना गलत नहीं है। लेकिन यदि न्याय की राह में कानून टूटे, दूसरों की पढ़ाई रुके, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचे और समाज में वैमनस्य फैले, तो नुकसान किसका होगा? सरकार का... या पूरे देश का?"


युवाओं ने कोई उत्तर नहीं दिया।


वृद्ध ने आगे कहा, "सरकारें आती-जाती हैं, लेकिन राष्ट्र स्थायी होता है। यदि किसी निर्णय पर असहमति है, तो संविधान ने न्यायालय, संवाद और शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति के रास्ते दिए हैं। वही लोकतंत्र की शक्ति है।"


पास खड़ी मोमबत्ती बोली, "मैं कम जलती हूँ, पर उजाला करती हूँ।"


मशाल ने सिर झुका लिया, "और मैं जब क्रोध के हाथों में चली जाती हूँ, तो उजाले से अधिक धुआँ फैलाती हूँ।"


युवाओं ने अपने नारे नहीं छोड़े, लेकिन उनका तरीका बदल गया। उन्होंने तय किया कि वे अपनी बात तथ्यों, तर्कों और संवैधानिक तरीकों से रखेंगे।


उस दिन किसी की जीत या हार नहीं हुई। जीता तो केवल लोकतंत्र, जिसने सिखाया कि अधिकार और कर्तव्य साथ-साथ चलते हैं।


संदेश:


"लोकतंत्र में असहमति अपराध नहीं है, लेकिन कानून का सम्मान प्रत्येक नागरिक का धर्म है। आवाज़ बुलंद हो, पर विवेक उससे भी ऊँचा हो।"

एक सवाल, जो हम सबको खुद से पूछना चाहिए...

 🔴 एक सवाल, जो हम सबको खुद से पूछना चाहिए...


पहले लोग कहते थे—"इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है।"

आज लगता है—इंसान की जान सबसे सस्ती चीज़ हो गई है।


सुबह अख़बार खोलिए, रात का समाचार देखिए—कहीं पत्नी ने पति की हत्या कर दी, कहीं पति ने पत्नी की जान ले ली। कहीं बेटे ने बूढ़े माँ-बाप को मार डाला, कहीं माता-पिता ने अपने ही बच्चों का जीवन छीन लिया। छोटी-सी कहासुनी, थोड़ी-सी नाराज़गी, कुछ रुपये, थोड़ा-सा शक... और फैसला सीधे मौत!


सोचिए, हम किस समाज की ओर बढ़ रहे हैं?


जिस घर में बच्चों को प्रेम, धैर्य और संवाद सीखना था, वहाँ वे हिंसा देख रहे हैं। जिस समाज में कानून का डर होना चाहिए था, वहाँ अपराधी बेखौफ दिखाई देते हैं। जिस व्यवस्था का काम नागरिकों को सुरक्षा देना है, उसे केवल घटनाओं के बाद जागना नहीं, बल्कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए पहले से सक्रिय होना होगा।


जब हत्या एक खबर बनकर रह जाए और संवेदना कुछ घंटों में खत्म हो जाए, तब समझ लीजिए कि खतरा केवल किसी एक परिवार पर नहीं, पूरे समाज पर है।


आज ज़रूरत केवल कठोर कानून की नहीं, बल्कि परिवारों में संवाद, समाज में संवेदना और प्रशासन की सतर्कता की भी है। हर हत्या केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती, वह समाज के चरित्र पर लगा एक गहरा घाव होती है।


आइए, ऐसी व्यवस्था और ऐसा समाज बनाने की मांग करें जहाँ किसी की जान लेना आसान नहीं, बल्कि कानून का भय और इंसानियत का सम्मान सबसे बड़ा हो।


क्या हम आने वाली पीढ़ी को प्रेम का समाज देंगे या हिंसा की विरासत?



सब्ज़ी मंडी का सबसे महँगा माल

 सब्ज़ी मंडी का सबसे महँगा माल


सुबह-सुबह सब्ज़ी मंडी में बड़ी भीड़ थी।


एक आदमी खीरे वाले से बोला, "भैया, खीरा कितने का दिया?"


सब्ज़ी वाले ने मुस्कुराकर कहा, "साहब, पचास रुपये किलो।"


आदमी ने एक-एक खीरा हाथ में लेकर देखा, दबाया, पलटा और फिर बोला, "ज़रा संभालकर तौलना, कहीं कटा-फटा न हो।"


पास ही खड़ा एक बूढ़ा यह दृश्य देख रहा था। उसकी आँखों में एक अजीब-सी मुस्कान थी—मुस्कान कम, दर्द ज़्यादा।


वह धीरे से बोला, "वाह रे इंसान... खीरा खरीदते समय तुझे उसकी सलामती की चिंता है, लेकिन इंसान मर जाए तो तू दो मिनट का वीडियो बनाकर आगे बढ़ जाता है।"


सब चुप हो गए।


बूढ़ा फिर बोला—


"आजकल खीरा काटने से पहले लोग सोचते हैं, लेकिन इंसान को काटने से पहले नहीं सोचते।"


एक पल के लिए मंडी जैसे थम गई।


कल ही अख़बार में खबर थी—पत्नी ने पति की हत्या कर दी। परसों खबर थी—पति ने पत्नी की जान ले ली। कहीं बेटे ने बूढ़े माँ-बाप को मार दिया, कहीं माँ-बाप ने अपने ही बच्चों का गला घोंट दिया। बाहर निकलिए तो सड़क पर छोटी-सी बहस जानलेवा हो जाती है।


लगता है अब मौत का कारण नफ़रत नहीं, आदत बनती जा रही है।


बूढ़े ने आसमान की ओर देखा और धीमे से कहा—


"हे भगवान! तूने धरती पर इंसान भेजे थे या चलते-फिरते हथियार?"


सब्ज़ी वाला पहली बार अपनी दुकान से बाहर निकला। उसने अपने खीरों को देखा और फिर सामने खड़े लोगों को।


आज उसे पहली बार लगा कि उसकी दुकान में सबसे सस्ती चीज़ खीरा है।


सबसे महँगी चीज़ तो इंसान की जान होनी चाहिए थी...


लेकिन अफ़सोस...


अब वह सबसे सस्ती हो गई है।


और इससे बड़ा व्यंग्य क्या होगा कि इस देश में लोग सब्ज़ियाँ खरीदते समय मोलभाव करते हैं, पर नफ़रत बाँटते समय एक पल का भी हिसाब नहीं रखते।


कहते हैं, सभ्यता आगे बढ़ रही है।


शायद सच है...


क्योंकि अब हत्या करने के तरीक़े आधुनिक हो गए हैं, लेकिन इंसानियत आज भी अपनी लाठी टेककर किसी पुराने गाँव की पगडंडी पर बैठी रो रही है।


प्रश्न केवल यह नहीं कि हत्यारे कौन हैं। प्रश्न यह भी है कि ऐसा समाज बनने दिया किसने, जहाँ इंसान की जान से ज़्यादा कीमत मोबाइल की स्क्रीन पर चलती हुई एक "ब्रेकिंग न्यूज़" की रह गई है।

जब मौत सस्ती हो गई (व्यंग्यात्मक कहानी)

 जब मौत सस्ती हो गई


उस दिन यमराज बड़े परेशान थे।


चित्रगुप्त ने पूछा, "महाराज, आज इतने चिंतित क्यों हैं?"


यमराज ने एक लंबी साँस ली और बोले, "पहले मुझे किसी की आयु पूरी होने का इंतज़ार करना पड़ता था। अब तो इंसान खुद ही मेरा काम छीनने लगा है।"


चित्रगुप्त ने आश्चर्य से पूछा, "कैसे?"


यमराज ने पृथ्वी की ओर इशारा किया।


"देखो... वहाँ एक पति, अपनी पत्नी का जीवन छीन रहा है। दूसरी ओर एक पत्नी, अपने पति की हत्या की योजना बना रही है। कहीं बेटा बूढ़े माँ-बाप पर हाथ उठा रहा है, तो कहीं पिता अपने ही बच्चे का भविष्य नहीं, जीवन खत्म कर रहा है। सड़क पर मामूली विवाद तलवार बन जाता है, और गुस्सा अब सीधे श्मशान का रास्ता पूछता है।"


चित्रगुप्त चुप हो गए।


कुछ देर बाद उन्होंने धीरे से कहा, "महाराज, क्या धरती पर इंसान कम हो गए हैं?"


यमराज बोले, "नहीं... इंसान तो उतने ही हैं, लेकिन इंसानियत कम हो गई है।"


उसी समय धरती से एक आवाज़ आई—


"ब्रेकिंग न्यूज़... एक और हत्या!"


न्यूज़ एंकर ने खबर पढ़ी। लोगों ने वीडियो देखा। कुछ ने दुख जताया, कुछ ने बहस की, कुछ ने आगे बढ़कर अगली खबर देख ली।


यमराज मुस्कुराए, लेकिन उस मुस्कान में गहरा दर्द था।


"चित्रगुप्त, अब मुझे मृत्यु से डर नहीं लगता। डर इस बात का है कि जिस समाज में हत्या एक खबर बन जाए और संवेदना कुछ मिनटों की मेहमान रह जाए, वहाँ जीवन की कीमत कौन समझाएगा?"


चित्रगुप्त ने अपनी पोथी बंद कर दी।


उन्होंने पहली बार लिखा—


"आज धरती पर मौत नहीं बढ़ी है... जीवन सस्ता हो गया है।"


और शायद यही हमारे समय का सबसे बड़ा व्यंग्य है।


हम सब्ज़ी खरीदते समय ताज़गी देखते हैं, कपड़े खरीदते समय गुणवत्ता देखते हैं, मोबाइल खरीदते समय गारंटी पूछते हैं...


लेकिन किसी इंसान की जान लेते समय न रिश्ता याद आता है, न कानून, न भगवान और न ही अपनी आत्मा।


कभी सोचिए...


अगर यही सभ्यता है, तो फिर जंगलों को बदनाम करने का हमें कोई अधिकार नहीं।

मेरी माँ की आसमानी साड़ी कहानी

 मेरी माँ की आसमानी साड़ी

कहते हैं, किसी घर की सबसे कीमती चीज़ सोना-चाँदी नहीं होती, बल्कि वे यादें होती हैं जो वर्षों बाद भी साँस लेती रहती हैं।

मेरे घर में भी एक ऐसी ही धरोहर थी—मेरी माँ की आसमानी रंग की सूती साड़ी।

वह कोई बनारसी नहीं थी... न उस पर ज़री का काम था... न कोई महँगी कढ़ाई...

लेकिन उस साड़ी के हर धागे में मेरी माँ का जीवन बुना हुआ था।

बचपन से मैंने माँ को उसी साड़ी में सबसे अधिक देखा।

सुबह वह उसे धोतीं... आँगन की रस्सी पर सुखातीं... दोपहर की धूप उसे फिर पहनने लायक बना देती... और शाम तक वही साड़ी फिर माँ के शरीर पर होती।

तब मैं सोचती थी— "क्या माँ को नई साड़ियाँ पसंद नहीं?"

आज समझती हूँ...

उन्हें नई साड़ियाँ पसंद थीं, लेकिन उनसे कहीं ज़्यादा अपने बच्चों के सपने प्रिय थे।

उसी आसमानी साड़ी में माँ मुझे स्कूल छोड़ने जाती थीं।

उसी साड़ी में मेरी फीस भरती थीं।

उसी साड़ी में मेरी परीक्षा के बाहर घंटों इंतज़ार करती थीं।

उसी साड़ी में रिश्तेदारों की शादियों में जातीं, जहाँ लोग उनके कपड़ों को देखते थे और मैं उनकी मुस्कान को।

मुझे आज भी याद है...

किसी दुकान पर मेरी नज़र किसी फ्रॉक या सूट पर टिक जाती, तो माँ बिना एक पल सोचे कहतीं—

"इसे पैक कर दीजिए।"

दुकानदार जब पूछता— "बहन जी, आपके लिए भी कोई साड़ी दिखाऊँ?"

तो माँ मुस्कुरा देतीं—

"नहीं... मेरी वाली अभी बिल्कुल ठीक है।"

वह "अभी" कई वर्षों तक चलता रहा।

माँ अपनी इच्छाओं को हर बार धोकर, सुखाकर, तह लगाकर फिर पहन लेती थीं।

लेकिन हमारी इच्छाएँ कभी पुरानी नहीं होने देती थीं।

समय बदला।

हम पढ़े, आगे बढ़े, अपने पैरों पर खड़े हुए।

अब मेरी अलमारी से पहले माँ की अलमारी भरने लगी।

हर त्योहार पर मैं उनके लिए साड़ी लाती।

कभी रेशमी... कभी छपाई वाली... कभी उनकी पसंद का हल्का गुलाबी रंग... कभी गहरा हरा...

मुझे लगता था— अब माँ की अधूरी इच्छाएँ पूरी हो जाएँगी।

लेकिन माँ नई साड़ियाँ अलमारी में सहेजकर रख देतीं और रोज़ फिर वही आसमानी साड़ी पहन लेतीं।

मैंने एक दिन थोड़ा रूठकर पूछा—

"माँ, मेरी लाई हुई साड़ियाँ अच्छी नहीं लगतीं क्या?"

उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

"बेटी... साड़ी सिर्फ़ कपड़ा नहीं होती, उसमें उम्र के बरस, रिश्तों की खुशबू और बच्चों के बचपन की सिलवटें भी बस जाती हैं। यह आसमानी साड़ी अब मेरी आदत नहीं... मेरी ज़िंदगी है।"

उस दिन भी मैं पूरी तरह नहीं समझी।

फिर...

एक दिन माँ चली गईं।

इतनी चुपचाप कि घर की दीवारें भी कई दिनों तक उन्हें पुकारती रहीं।

जब उनकी अलमारी खोली, तो मेरी दी हुई साड़ियाँ लगभग नई थीं।

कई पर तो अब भी तह वैसी ही थी, जैसी दुकान से आई थीं।

और सबसे ऊपर रखी थी...

वही आसमानी साड़ी।

मैंने उसे अपने सीने से लगा लिया।

उसमें अब भी साबुन की हल्की-सी महक थी...

और माँ के आँचल की गर्माहट जैसे कहीं छिपी हुई थी।

आज माँ मेरे साथ नहीं हैं...

लेकिन बैठक की दीवार पर टँगी उसी आसमानी साड़ी में मुस्कुराती उनकी तस्वीर हर दिन मुझसे बात करती है।

जब भी मैं उसे देखती हूँ, लगता है जैसे माँ अभी कहेंगी—

"बेटी... अपना ध्यान रखना।"

उस तस्वीर के सामने खड़े-खड़े अक्सर सोचती हूँ...

कभी इस घर में एक ऐसी स्त्री रहती थी, जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी एक साड़ी को बार-बार धोकर पहन ली...

ताकि उसकी बेटी कभी अभावों को पहनने के लिए मजबूर न हो।

आज मेरी अलमारी में साड़ियों की कमी नहीं है।

लेकिन हर नई साड़ी को हाथ में लेते ही आँखें उस पुरानी आसमानी साड़ी को खोजने लगती हैं...

क्योंकि अब समझ आया है—

साड़ी की कीमत उसके कपड़े से नहीं, उसे पहनने वाली माँ के त्याग से तय होती है।

और जीवन का सबसे बड़ा दुःख यह नहीं कि माँ के पास कभी साड़ियाँ कम थीं...

सबसे बड़ा दुःख यह है कि जब मैं उन्हें दुनिया की सबसे सुंदर साड़ियाँ पहनाना चाहती थी, तब उन्हें पहनने के लिए मेरी माँ ही इस दुनिया में नहीं थीं।

दीवार पर टँगी उनकी वह आसमानी साड़ी वाली तस्वीर आज भी मुस्कुरा रही है...

शायद इसलिए कि माँ कभी जाती नहीं।

वे अपने बच्चों की स्मृतियों में, अपने आँचल की खुशबू में और अपनी पुरानी साड़ियों की तहों में हमेशा जीवित रहती हैं।

— डॉ. नीरू मोहन

Wednesday, 29 July 2026

प्रकृति मेरी पहली गुरु कहानी

 गुरुपूर्णिमा का दिन था।


विद्यालय में गुरु-वंदना का कार्यक्रम चल रहा था। मंच पर गुरुजनों का सम्मान हो रहा था। बच्चों के हाथों में फूल थे, भाषण थे, कविताएँ थीं।


लेकिन एक बच्ची चुपचाप विद्यालय के पीछे बने पुराने बरगद के पेड़ के नीचे जाकर बैठ गई।


उसकी शिक्षिका ने पूछा,

"बेटी, यहाँ अकेली क्यों बैठी हो? सब लोग गुरुओं का सम्मान कर रहे हैं।"


बच्ची मुस्कुराई और बोली,

"मैडम, मैं भी अपने गुरु को प्रणाम कर रही हूँ।"


शिक्षिका ने चारों ओर देखा। वहाँ कोई नहीं था।


"कहाँ हैं तुम्हारे गुरु?"


बच्ची ने आकाश की ओर इशारा किया।


"वो देखिए... सूरज।"


फिर उसने मिट्टी को छुआ।


"ये धरती।"


फिर हवा के झोंके को महसूस करते हुए बोली—


"ये हवा... और वह नदी, जो गाँव के किनारे बहती है।"


शिक्षिका कुछ पल के लिए मौन रह गई।


बच्ची बोली—


"सूरज ने मुझे सिखाया कि जलते रहो, तब ही उजाला होगा।

धरती ने सिखाया कि जितना सहोगे, उतना फल दोगे।

पेड़ों ने सिखाया कि पत्थर खाने के बाद भी फल देना मत छोड़ो।

नदी ने बताया कि रुकना मृत्यु है, बहना जीवन।

हवा ने समझाया कि दिखाई दिए बिना भी किसी का जीवन आसान बनाया जा सकता है।

और बारिश ने सिखाया कि समय पर बरसना ही सबसे बड़ा दान है।"


शिक्षिका की आँखें भर आईं।


उन्होंने कहा,

"आज तो तुमने मुझे भी शिक्षा दे दी।"


इतने में पास खड़ा बरगद जैसे पत्तों की सरसराहट में बोल उठा—


"मनुष्य बड़ा विचित्र शिष्य है।

जिस प्रकृति से सीखकर सभ्यता बनाई,

उसी प्रकृति को काटकर विकास का प्रमाण-पत्र माँगता है।"


बच्ची ने पेड़ के तने को छूकर कहा—


"गुरु दक्षिणा क्या दूँ?"


बरगद मानो मुस्कुराया—


"बस इतना वचन दे दो कि जिस प्रकृति ने तुम्हें जीना सिखाया है, उसे जीने दोगी।"


उस दिन बच्ची ने कोई नारियल नहीं चढ़ाया,

कोई महँगा उपहार नहीं दिया,

बस विद्यालय से लौटते समय सड़क किनारे एक पौधा लगाया,

उसे पानी दिया,

और मन ही मन कहा—


"गुरुदेव...

आज आपकी दक्षिणा स्वीकार कीजिए।"


गुरुपूर्णिमा केवल उन गुरुओं को प्रणाम करने का पर्व नहीं है, जो कक्षा में ज्ञान देते हैं; यह उन मौन गुरुओं को भी नमन करने का अवसर है, जो बिना बोले जीवन जीने की कला सिखाते हैं।


क्योंकि मनुष्य का पहला गुरु प्रकृति है, और अंतिम शिक्षक भी वही।


संदेश:

आज गुरुपूर्णिमा पर यदि सचमुच गुरु का सम्मान करना है, तो एक पौधा लगाइए, एक वृक्ष बचाइए, एक नदी को गंदा होने से रोकिए। यही प्रकृति-गुरु के प्रति सच्ची गुरु-दक्षिणा होगी।

Friday, 12 June 2026

राजस्थान की संस्कृति पर चार पंक्तियां की कविताएँ


1. रंगीला राजस्थान


रेत सुनहरी, नभ नीला है, अनुपम इसकी शान,

घूमर की मधुर थापों से गूँजे हर आँगन-धान।

पगड़ी, ओढ़नी, लोक सुरों का अद्भुत है सम्मान,

कहे नीरू, रंगों से सजा है मेरा राजस्थान।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन



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2. मरुधरा की महिमा


तपती रेत भी देती हमको साहस का उपहार,

कठिन डगर पर चलना सिखलाए इसका हर विस्तार।

ऊँटों की पदचाप सुनाती जीवन का गुणगान,

मरुधरा की महिमा गाता सारा हिंदुस्तान।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन



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3. राजस्थान : शौर्य, संस्कृति और सम्मान


महाराणा की वीरता का गूँजे अमर बखान,

पन्ना धाय के त्याग से जग करता अभिमान।

संस्कृति जिसकी पहचान है, सम्मान जिसकी जान,

शौर्य और गौरव का प्रतीक है राजस्थान।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन



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4. माटी की महक, राजस्थान की चमक


माटी में इतिहास बसा है, खुशबू में संस्कार,

हर कण में बलिदान लिखा है, हर दिल में सत्कार।

हवेलियों की छटा निराली, अनुपम इसकी झलक,

माटी की महक से जगमग है राजस्थान की चमक।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन



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5. मरुभूमि का गौरवगान


थार की रेत सुनाती है संघर्षों की बात,

धूप यहाँ भी जीवन गढ़ती, देती नई सौगात।

लोकगीतों की सरगम में बसता इसका मान,

मरुभूमि का गौरव गाता भारत का सम्मान।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन



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6. राजस्थान की रंगत


कहीं घूमर, कहीं कालबेलिया, कहीं मांड की तान,

कहीं मेले, कहीं उत्सव, कहीं लोकगीत महान।

रंग-बिरंगे परिधानों से खिलता इसका गगन,

राजस्थान की रंगत देखे मुस्काता है चमन।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन



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7. वीरों की धरती राजस्थान


हल्दीघाटी की गाथाएँ आज भी देती पुकार,

वीरों की इस भूमि ने लिखे साहस के अध्याय अपार।

त्याग, धर्म और राष्ट्रभक्ति जिसकी सच्ची पहचान,

वीरों की धरती कहलाता मेरा राजस्थान।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन



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8. संस्कृति के रंग, राजस्थान के संग


लोककला की छवि निराली, अद्भुत इसका रूप,

संगीतों की मधुर लहरियाँ, जैसे शीतल धूप।

परंपराओं की सुगंध से महके सारा जहान,

संस्कृति के रंग लिए चलता राजस्थान।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन



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9. मरुधर का मान


कठिन परिस्थितियों में भी मुस्काना जिसने सीखा,

संघर्षों के बीच सफलता का दीपक जिसने लिखा।

अतिथि-सेवा, प्रेम और साहस जिसकी पहचान,

भारत के मस्तक का तिलक है मरुधर का मान।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन



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10. कहे नीरू : रंगीला राजस्थान


दाल-बाटी की खुशबू महके, गूँजे मधुर लोकगान,

किलों, मंदिरों, हवेलियों से जगमग इसका मान।

शौर्य, प्रेम और संस्कृति का अनुपम है वरदान,

कहे नीरू, भारत का गौरव है रंगीला राजस्थान।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

सुविचार

 1. मुश्किलें रास्ता रोकती नहीं, रास्ता बनाना सिखाती हैं।

जो गिरकर संभल जाता है, वही मंज़िल तक पहुँच पाता है।



2. समय और संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाते,

ये इंसान को उसकी असली पहचान दिलाते हैं।



3. हार से मत घबराओ, हार तो एक सबक है,

जीत उसी की होती है, जिसके इरादे अटल हैं।



4. अंधेरों से लड़ने का हौसला रखो,

सूरज बनने का अवसर स्वयं मिल जाएगा।



5. कर्म की राह पर चलते रहो निरंतर,

किस्मत भी एक दिन तुम्हारे दर पर दस्तक देगी।



6. जो अपने दर्द को ताकत बना लेता है,

वह हर तूफान से आगे निकल जाता है।



7. सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता,

मेहनत ही हर मंज़िल की असली सीढ़ी होती है।



8. वक्त बदलते देर नहीं लगती,

इसलिए हिम्मत कभी मत बदलना।



9. संघर्ष जितना कठिन होगा,

सफलता का स्वाद उतना ही मधुर होगा।



10. खुद पर विश्वास रखो,

दुनिया का हर बड़ा सफर एक छोटे कदम से शुरू होता है।



1. समय पर

डॉ. नीरू मोहन कहती हैं—

वक्त की रेत मुट्ठी में कहाँ ठहरती है,

जो इसकी कद्र करे, मंज़िल उसी से सँवरती है।


2. रिश्तों पर

डॉ. नीरू मोहन कहती हैं—

रिश्ते शब्दों से नहीं, संवेदनाओं से निभाए जाते हैं,

जो दिल में बसते हैं, वे दूर होकर भी पास नज़र आते हैं।


3. संघर्ष पर

डॉ. नीरू मोहन कहती हैं—

ठोकरों ने ही चलना सिखाया है मुझे,

वरना मंज़िल का रास्ता कौन बताता मुझे।


4. अपेक्षा और उपेक्षा पर

डॉ. नीरू मोहन कहती हैं—

अपेक्षाएँ जब हद से बढ़ जाती हैं अक्सर,

उपेक्षाओं की चुभन भी उतनी ही गहरी होती है।


5. आत्मविश्वास पर

डॉ. नीरू मोहन कहती हैं—

आईनों से नहीं, अपने हौसलों से पहचान बनती है,

भीड़ में नहीं, अपने कर्मों से शान बनती है।


6. जीवन पर

डॉ. नीरू मोहन कहती हैं—

जीवन की किताब में हर पन्ना जरूरी होता है,

कुछ सिखाने के लिए, कुछ सँवारने के लिए।


7. मौन पर

डॉ. नीरू मोहन कहती हैं—

हर सवाल का जवाब शब्दों में नहीं मिलता,

कभी-कभी मौन भी बहुत कुछ कह जाता है।


8. यथार्थ पर

डॉ. नीरू मोहन कहती हैं—

चेहरों की भीड़ में सच कम ही मिलता है,

हर मुस्कान के पीछे एक संघर्ष पलता है।


9. स्त्री शक्ति पर

डॉ. नीरू मोहन कहती हैं—

वो सिर्फ़ घर नहीं, संसार सजाती है,

अपनी पीड़ा छुपाकर सबको हँसाती है।


10. स्वाभिमान पर

डॉ. नीरू मोहन कहती हैं—

झुकना संस्कार है तो झुकिए अवश्य,

पर स्वाभिमान बिके, इतना भी मत झुकिए।



1. रिश्तों पर

रिश्तों की डोर प्रेम से हर पल मजबूत होती है,

स्वार्थ की आँधी आए तो अक्सर कमजोर होती है।

अपनेपन की छाँव में खिलता है हर इंसान,

कहे नीरू, प्रेम से ही बसता है परिवार।


2. बुज़ुर्गों के सम्मान पर

जिन हाथों ने थामकर चलना हमें सिखाया है,

उन्हीं हाथों को अक्सर वक्त ने तन्हा पाया है।

उनके अनुभव में छिपा है जीवन का सार,

कहे नीरू, बुज़ुर्ग हैं घर का सच्चा आधार।


3. नारी सम्मान पर

नारी से ही सृष्टि का सुंदर विस्तार है,

उसके बिना जीवन का हर रंग बेकार है।

सम्मान दो उसे, यही मानवता का मान,

कहे नीरू, नारी से ही महके संसार।


4. पर्यावरण पर

पेड़ों की छाँव में जीवन का संगीत बसता है,

हरियाली से ही धरती का सौंदर्य हँसता है।

प्रकृति की रक्षा करना हम सबका अधिकार,

कहे नीरू, हर पौधा है जीवन का उपहार।


5. सामाजिक एकता पर

भाषाएँ हों अलग मगर दिलों में प्यार रहे,

धर्म कोई भी हो, मानवता का विचार रहे।

मिल-जुलकर चलने में ही जीवन का सम्मान,

कहे नीरू, एकता से बनता है देश महान।


6. शिक्षा पर

ज्ञान का दीपक जब हर घर में जल जाएगा,

अज्ञान का अंधियारा खुद ही मिट जाएगा।

शिक्षा से ही खुलते हैं उन्नति के द्वार,

कहे नीरू, विद्या है जीवन का श्रृंगार।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन



Tuesday, 9 June 2026

"कहे नीरू : रंगीला राजस्थान"

"कहे नीरू : रंगीला राजस्थान"

आल्हड़ धूप में सुनहरी है रेगिस्तान की बात,

राजस्थानी परिधान में बसी है शान की सौगात।

घूमर की लय पर थिरकती संस्कृति की पहचान,

हर रंग में झलकता है राजस्थान का सम्मान।


कुम्भलगढ़ की दीवारें कहती हैं वीरों की कहानी,

मेवाड़ की धरती गाती है राणा की अमर निशानी।

जैसलमेर का सोनार किला सूरज सा दमकता है,

हर पत्थर इतिहास का कोई पन्ना पढ़ता है।


पगड़ी की आन में बसता है स्वाभिमान पुराना,

घाघरे की लहरों में सिमटा है रंगों का खज़ाना।

कठपुतली की बोली हो या मांड की मधुर तान,

हर सुर में गूँजता है मेरा प्यारा राजस्थान।


दाल-बाटी की खुशबू से महक उठे हर द्वार,

अतिथि को देव मानना यहाँ का है संस्कार।

मरुधर की मिट्टी भी देती जीवन का ज्ञान,

कहे नीरू, सादगी में बसता है राजस्थान।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

शायरी 21

शायरी

1. 


जब भाषा की धुन गूंजती है, तो हर दिल में भारत का गीत बसता है,

हिंदी है हमारी पहचान, हम सबका अभिमान बसता है।

लड़कियों को भी भाषा का सम्मान मिले,

कहे नीरू, हिंदी में ही हमारी शक्ति छिपी है।


2. 


भाषा एक दीपक है, जो अंधेरे में उजाला करता है,

हिंदी में बसी हैं हमारी जड़ें, हमारी धड़कन बनकर बहता है।

सपनों की उड़ान में भाषा को साथी बनाओ,

कहे नीरू, हिंदी में ही भारत का उजाला है।


3. 


जब भारत एकता में बंधा, तो भाषा भी सहारा बनी,

हिंदी ने हर दिल को जोड़ा, हर घर में गूंजा अपना गीत।

गांव से शहर तक, हर कदम पर एकता की बात हो,

कहे नीरू, हिंदी में ही हमारी भारत माता बसती है।


4. 


हिंदी का हर शब्द एक पुल बनाता है,

जो दरवाज़े खोलता है, हर दिल और हर भाषा के लिए।

संस्कृति का ये राग हमें जोड़ता है,

कहे नीरू, हिंदी में ही हमारे सपनों का संसार है।


5. 


जब हम अपनी जड़ों से जुड़े, तो शक्ति मिली हमें,

हिंदी ने हमें बताया, कि हम कौन हैं, कहाँ से आए हैं।

भाषा का सम्मान, भारत का सम्मान है,

कहे नीरू, हिंदी में ही हमारी पहचान है।


6

अल्फ़ाज़ में कहाँ समेट पाते हैं हम दिल की दास्ताँ,

कुछ रिश्ते ख़ामोश रहकर भी उम्र भर बोलते हैं।


7

जो लोग दिल में बसते हैं, वो हर रोज़ नहीं मिलते,

कुछ चेहरे दूर रहकर भी ज़िंदगी के साथ चलते हैं।


8

वक़्त ने सिखा दिया हर दर्द को मुस्कुरा कर सहना,

अब शिकायत कम है हमको, तजुर्बों पर ज़्यादा भरोसा है।


9

जो लोग दिल में बसते हैं, वो हर रोज़ नहीं मिलते,

कुछ चेहरे दूर रहकर भी ज़िंदगी के साथ चलते हैं।


10

जो लोग दिल में बसते हैं, वो हर रोज़ नहीं मिलते,

कुछ चेहरे दूर रहकर भी ज़िंदगी के साथ चलते हैं।

कहे नीरू, ये खामोश यादें,

हमेशा दिल में बसी रहती हैं।


11

गरीबी की रातों में जब सपने भी ठहर जाते हैं,

कहें नीरू, हर बच्चे को शिक्षा का हक़ मिलना चाहिए।


12

लड़की का हर कदम भी हो बराबरी का,

कहे नीरू, बिन सपने अधूरी है ज़िंदगी।


13

सिस्टम के दरो-दीवार में जब आवाज़ें दबती हैं,

कहे नीरू, सच बोलना ही ताकत है।

हर इंसान का हक़ है सपने देखने का,

कहे नीरू, बदलाव की राह पर साथ देना ज़रूरी है।


14

जब आवाज़ें दबती हैं, तो सच और भी ज़ोर से बोलता है,

हर गरीब के पीछे एक सपना छिपा होता है।

लड़कियों के पंखों को काटकर मत देखो,

कहे नीरू, हर उड़ान का हक़ हर इंसान को है।


15

सपने वो नहीं जो रातों में आते हैं,

सपने वो हैं जो सुबह उठकर भी याद रहते हैं।

आओ, साथ मिलकर हम बदलाव की नींव रखें,

कहे नीरू, हर आवाज़ में ताकत है।


16

थार की धूप में सुनहरी है रेगिस्तान की बात,

राजस्थानी परिधान में बसी है शान और बात।

घूमर की लय में थिरकती हैं हर दिलों की बात,

जयपुर की हवेलियों में बसती है हमारी याद।


17

कुंभलगढ़ की दीवारें कहती हैं पुरानी कहानी,

मेवाड़ की बगिया में महकती है रानी।

चांदनी चौक की गलियों में बसा है प्यार,

राजस्थान की संस्कृति है अनमोल आधार।


18

पगड़ी की शान में बसा राजपूतों का अभिमान,

गोटा-पट्टी में लिपटी हर महिला की पहचान।

चोली और घाघरा, रंगों का ये उत्सव,

राजस्थानी वेशभूषा में है संस्कृति का भव्य तसव्वुर।


19

मीनाकारी की चमक, हाथों की बिंदी,

राजस्थानी लहंगा, हर कदम में है ग़ज़ब जिंदगानी।

साड़ी में भी झलकती है एक पुरानी कहानी,

कहे नीरू, राजस्थान का पहनावा है हमारी शान और निशानी।


20

कुंभलगढ़ की दीवारें कहती हैं पुरानी कहानी,

मेवाड़ की बगिया में महकती है रानी।

उदयपुर की झीलों में सपनों का बसेरा,

राजस्थान की हर गली में बसा है प्यार का प्यारा बसेरा।


21

चांदनी चौक में रंगीली महफ़िल सजती है,

घूमर और कालबेलिया से दिल की धड़कन बढ़ती है।

महाराणा प्रताप की वीर गाथा गूंजे,

कहे नीरू, राजस्थान की धड़कन हर दिल में पूजे।


विश्व पर्यावरण दिवस

 विश्व पर्यावरण दिवस

पेड़ों से पूछो, कैसे खड़े रहते हैं धूप की तपिश में भी, बिना शिकायत किए।

नदियों से पूछो, कैसे बहती रहती हैं अपना सब कुछ लुटाकर भी, प्यास किसी की अधूरी न रहे।

धरती से पूछो, कितने घाव सहती है, फिर भी हर मौसम में नई हरियाली उगा देती है।

हमने विकास के नाम पर कितने जंगल काट दिए, सुविधाओं की दौड़ में कितने रिश्ते प्रकृति से बाँट दिए।

अब समय है, सिर्फ़ भाषणों का नहीं, एक पौधा लगाने का, एक पेड़ बचाने का, एक नदी को साफ़ रखने का।

क्योंकि...

जब आख़िरी पेड़ कट जाएगा, आख़िरी नदी सूख जाएगी, और आख़िरी चिड़िया अपना गीत भूल जाएगी,

तब समझ आएगा कि धन से नहीं, धरती से चलती है ज़िंदगी।

आओ, इस पर्यावरण दिवस पर सिर्फ़ संकल्प न लें, अपनी आदतें भी बदलें।

ताकि आने वाली पीढ़ियाँ हमें दोषी नहीं, धरती का सच्चा रखवाला कहें।

धरती हमारी विरासत है,

और विरासत को सँभालना ही

सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

"सपनों से जिम्मेदारियों तक : जीवन, संबंध और पुनर्जन्म की कविताएँ"


"सपनों से जिम्मेदारियों तक : जीवन, संबंध और पुनर्जन्म की कविताएँ"

1. तेरा मेरा साथ रहे 

तेरा मेरा साथ रहे,

जैसे सुबह की पहली किरण में

चुपचाप मुस्कान का उजाला रहे…


तेरा मेरा साथ रहे,

जैसे सूखी राहों पर

बारिश की नर्म फुहार का सहारा रहे…


कभी तू थक जाए तो मैं संभाल लूँ,

कभी मैं टूट जाऊँ तो तू पुकार ले…

शब्द कम हों, पर समझ बहुत रहे,

तेरा मेरा साथ रहे…


भीड़ में भी हम अकेले न हों,

हर मोड़ पर एक-दूसरे का भरोसा रहे…

ना कोई शर्त हो, ना कोई हिसाब,

बस दिल से दिल का रिश्ता जिंदा रहे…


तेरा मेरा साथ रहे,

जैसे हवा में खुशबू का एहसास रहे,

और जिंदगी बस यूँ ही

थोड़ी आसान, थोड़ी अपनी सी रहे…



2. जब ज़िंदगी शुरू हो जाती है


जब शौक के लिए वक्त न मिले

तो समझ जाना, ज़िंदगी शुरू हो गई है…


जहाँ किताबें धूल खा जाएँ,

और सपनों की अलमारी

सिर्फ ज़रूरतों से भर जाए…


जहाँ मुस्कान भी

टाइम-टेबल देखकर आए,

और नींद भी थकी हुई आँखों से पूछे—

“आज फिर देर से मिलोगे क्या?”


जब अपने ही शौक

किसी पुराने कोने में रख दिए जाएँ,

और हम बस भागते रहें

कभी काम के पीछे, कभी जिम्मेदारियों के पीछे…


तो समझ लेना,

अब बचपन नहीं रहा,

अब ज़िंदगी शुरू हो गई है—

जहाँ जीना नहीं, निभाना पड़ता है…


पर फिर भी कहीं भीतर

एक छोटा सा बच्चा जिंदा रहता है,

जो कहता है—

“एक दिन फिर से अपने लिए जिऊँगा…”



3. जिम्मेदारियों के दिन


क्योंकि अब दिन सपनों से नहीं,

जिम्मेदारियों के चलने लगे हैं…


सुबह आँख खुलते ही

ख्वाब नहीं, हिसाब खुलता है,

कौन सा काम बाकी है

ये सवाल हर सांस में घुलता है…


पहले जिन रास्तों पर

सपने साथ चलते थे,

अब उन्हीं रास्तों पर

वक्त की भीड़ में हम अकेले चलते हैं…


हँसी भी अब यूँ ही नहीं आती,

पहले सोचती है—

“क्या आज मुझे इजाज़त है?”


और दिल…

वो अब भी कहीं छुपकर

पुरानी ख्वाहिशों को सहलाता है,

पर बाहर आते-आते

जिम्मेदारियों का दरवाज़ा बंद हो जाता है…


फिर भी,

इन सबके बीच

एक उम्मीद धीरे से कहती है—

“थोड़ा और संभाल लो,

शायद एक दिन सपने फिर लौट आएँ…”



4. टूटन का चमत्कार


ईश्वर टूटी हुई चीज़ों का

बखूबी इस्तेमाल करते हैं…


बादल टूटते हैं तो

धरती प्यास बुझा लेती है,

सूखी मिट्टी भी

जीने की वजह पा लेती है…


बीज टूटते हैं तो

एक नया जीवन जन्म लेता है,

टूटकर भी वो

हरियाली का सपना बुन लेता है…


कली बिखरती है तो

फूल बनकर मुस्कुराती है,

और हर टूटन के भीतर

एक नई कहानी बन जाती है…


इंसान भी जब टूटता है

तो बिखरने नहीं आता,

वो भीतर ही भीतर

फिर से खुद को गढ़कर उठ जाता है…


शायद यही नियम है इस सृष्टि का—

जो टूटता है, वही

किसी और रूप में

सबसे सुंदर बनकर लौट आता है…


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन 

सिर्फ़ तेरा साथ

सिर्फ़ तेरा साथ

ना सोने की चाहत थी,
ना चाँदी का कोई ख्वाब था,
इस भागती हुई दुनिया में
बस तेरा साथ ही लाजवाब था।

जब जीवन की राहों में
धूप बहुत तीखी हो जाती है,
तब किसी अपने की छाँव ही
पूरी दुनिया बन जाती है।

ना बड़े महलों की इच्छा थी,
ना ऊँचे नाम की कोई प्यास,
बस इतना भर काफी था—
मेरे हाथों में तेरा हाथ।

जब अग्नि को साक्षी मानकर
हमने कुछ वचन निभाने चाहे,
तब समझ आया, रिश्ते केवल
शब्दों से नहीं, विश्वास से बंधते हैं।

समय के संग चेहरे बदलेंगे,
बालों में चाँदी उतर आएगी,
पर यदि साथ बना रहा तेरा,
तो हर उम्र मुस्कुराएगी।

जीवन कोई फूलों की सेज नहीं,
यहाँ काँटे भी मिलते हैं,
पर दो लोग साथ चलें तो
रास्ते आसान लगते हैं।

ना तू पूर्ण, ना मैं पूर्ण,
फिर भी यह बंधन खास है,
क्योंकि सारी दुनिया से बढ़कर
मुझे सिर्फ़ तेरा साथ है।

जब तक साँसों की डोर चले,
जब तक यह जीवन साथ रहे,
हर प्रार्थना में बस यही माँगूँ—
तेरा विश्वास मेरे पास रहे।

दुनिया चाहे जो भी दे दे,
या मुझसे सब कुछ छीन ले,
मेरी सबसे बड़ी दौलत तो
सिर्फ़ तेरा साथ ही रहे।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

थकान का भी एक सच होता है। कविता

 

थकान का भी एक सच होता है

सब कहते हैं —
"कितनी स्ट्रॉन्ग हो तुम!"
हर मुश्किल में मुस्कुरा लेती हो,
हर आँधी में संभल जाती हो।

पर काश...
किसी ने यह भी पूछा होता —
"थक तो नहीं गई हो तुम?"

कंधों पर जिम्मेदारियों का पहाड़ उठाए,
हर रिश्ते का भार निभाए,
सबके आँसू पोंछते-पोंछते
क्या कभी अपनी आँखें भी भीगी हैं तुमसे?

सबको तुम्हारी हँसी दिखाई देती है,
पर उस हँसी के पीछे छिपी
खामोश चीखें कौन सुनता है?

लोग तुम्हारी हिम्मत की मिसाल देते हैं,
पर यह नहीं जानते
कि कई रातें ऐसी भी होती हैं
जब तकिया ही तुम्हारा एकमात्र हमदर्द होता है।

तुम्हें देखकर सब कहते हैं—
"इसे क्या होगा, यह तो मजबूत है!"
मगर मजबूत लोग भी
पत्थर नहीं होते।

उनके भी सपने टूटते हैं,
उनका भी मन भर आता है,
उन्हें भी कभी-कभी
सब कुछ छोड़कर रो लेने का मन करता है।

मजबूत होना कोई शौक नहीं,
अक्सर यह हालातों की दी हुई मजबूरी होती है।
जब सहारा देने वाला कोई न हो,
तो इंसान खुद ही अपना सहारा बन जाता है।

हाँ, मैं मजबूत हूँ,
क्योंकि समय ने मुझे ऐसा बना दिया।
पर इसका मतलब यह नहीं
कि मुझे दर्द नहीं होता।

आज बस इतना कहना है—
जब किसी को मजबूत कहो,
तो उसके साहस की तारीफ़ करने से पहले
एक बार यह भी पूछ लेना—

"सच बताना,
थक तो नहीं गए हो तुम?"

क्योंकि कई बार
यही एक सवाल
किसी टूटते हुए इंसान को
फिर से जीने की वजह दे देता है।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

मेरी दिल्ली मेरी नज़र से कविता

 

मेरी दिल्ली — मेरी नज़र से

मैंने दिल्ली को किताबों में नहीं पढ़ा,
मैंने दिल्ली को जीया है।
इसके मौसमों को बदलते देखा है,
इसके रास्तों को बढ़ते देखा है।

जब मैं छोटी थी,
तब गलियाँ भी अपनी लगती थीं,
छतों पर उड़ती पतंगों में
सपनों की डोर बंधी लगती थी।

मैंने दिल्ली की सर्दियों में
धूप के टुकड़े समेटे हैं,
गर्मियों की तपती दोपहर में
आम और बचपन दोनों बटोरे हैं।

यहाँ की सुबहें कभी
मंदिर की घंटियों से जागती थीं,
और शामें चाय की भाप संग
घर-आँगन में उतर आती थीं।

मैंने दिल्ली को भीड़ बनते देखा है,
और भीड़ में अकेला पड़ते भी देखा है।
नई इमारतों को आसमान छूते देखा है,
पुराने पेड़ों को कटते भी देखा है।

यह शहर केवल सड़कों का जाल नहीं,
यह मेरी स्मृतियों का घर है।
यहाँ हर मोड़ पर
मेरे जीवन का कोई सफ़र है।

यहीं मैंने गिरना सीखा,
यहीं संभलना सीखा।
यहीं अपनों की पहचान हुई,
और यहीं बदलता समय देखा।

दिल्ली मेरे लिए
लाल किले की दीवार भर नहीं,
या संसद के गलियारों की खबर नहीं,
दिल्ली तो मेरे जीवन का वह पन्ना है
जिस पर मेरी उम्र की स्याही दर्ज है।

तिरपन वर्षों से
मैं इसकी धड़कनों के साथ चल रही हूँ,
कभी इसकी रफ्तार से थक जाती हूँ,
तो कभी इसकी जीवंतता पर मुस्कुरा देती हूँ।

बहुत कुछ बदल गया है यहाँ,
पर एक बात आज भी वैसी है—
दिल्ली मेरे लिए सिर्फ़ एक शहर नहीं,
मेरी यादों, मेरे संघर्षों,
मेरे सपनों और मेरी पहचान का दूसरा नाम है।

मेरी दिल्ली,
तू मेरे जीवन की वह कहानी है,
जिसे मैं हर दिन जीती हूँ,
और हर बार नए अर्थों में पढ़ती हूँ।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

खुद को व्यस्त रखो कविता

 शीर्षक: "खुद को व्यस्त रखो"


खुद को इतना व्यस्त रखो,

कि फुर्सत भी तुमसे मिलने का समय माँगे।


कुछ पढ़ो, कुछ लिखो,

कुछ सीखो, कुछ सिखाओ,

हर दिन अपने कल से

एक कदम आगे निकल जाओ।


दुनिया क्या कहती है,

इस पर समय मत गँवाओ,

दुनिया का काम कहना है,

तुम अपना काम करते जाओ।


जो लोग खाली बैठे हैं,

वो किस्मत को कोसते हैं,

जो खुद को काम में झोंक देते हैं,

वो इतिहास लिखते हैं।


जब मन टूटे तो कलम उठा लेना,

जब हौसला डगमगाए तो किताब उठा लेना,

जब रास्ते बंद नज़र आएँ,

तो नया रास्ता बना लेना।


याद रखो—

सफलता शोर मचाने वालों को नहीं,

लगातार चलते रहने वालों को मिलती है।


इसलिए खुद को इतना व्यस्त रखो,

कि नकारात्मकता तुम्हारे दरवाज़े तक आए,

और लौटकर चली जाए।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

कुछ अनकही सी

 कुछ अनकही सी...

कुछ अनकही सी बातें हैं,
जो शब्दों तक आकर लौट जाती हैं,
आँखों की दहलीज़ पर ठहरकर
चुप्पियों में कहीं खो जाती हैं।

कुछ दर्द ऐसे भी होते हैं,
जो आँसुओं का सहारा नहीं लेते,
बस मुस्कानों की ओट में छिपकर
धीरे-धीरे उम्र भर चलते रहते।

कुछ रिश्ते किताबों जैसे होते हैं,
जिनके कई पन्ने कभी पढ़े ही नहीं जाते,
और कुछ लोग इतने अपने होकर भी
दिल की भाषा समझ नहीं पाते।

कुछ सपने रातों में नहीं,
जागती आँखों में पलते हैं,
मगर जिम्मेदारियों के मौसम में
अक्सर चुपचाप बिखर जाते हैं।

कुछ अनकही सी शिकायतें हैं,
कुछ अनसुने से सवाल,
जिनका उत्तर शायद वक्त के पास है,
या फिर किसी बीते हुए ख्याल के पास।

फिर भी जीवन चलता रहता है,
हर अधूरी कहानी के साथ,
क्योंकि हर अनकही बात का भी
एक मुकम्मल अर्थ होता है कहीं न कहीं।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

अनकहा सच (कविता)

 शीर्षक: “अनकहा सच”


तू सब जानती है, पर दुनिया ये कहाँ जानती है,

मेरे ख़ामोश लफ़्ज़ों की आग भी कोई कहाँ पहचानती है।


चेहरे पर मुस्कान है, भीतर कितनी दरारें हैं,

ये भीड़ तो बस कहानी की चमकती बाहें पहचानती है।


मैं टूटकर भी हर रोज़ जुड़ने का हुनर रखता हूँ,

पर मेरी थकान को कोई सच्चाई कहाँ मानती है।


सच आँखों में रहता है, मगर आवाज़ नहीं बन पाता,

और झूठ की दुनिया बस तालियाँ ही पहचानती है।


तू जानती है मेरा दर्द, मेरी हर अनकही बात,

पर दुनिया तो बस कहानी का सजना-संवरना जानती है।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

Monday, 8 June 2026

“सोशल मीडिया का नया ज़माना” (व्यंग्य कविता)

 “सोशल मीडिया का नया ज़माना” (व्यंग्य कविता)


अब जमाना बदल गया है, साहब,

यहाँ चेहरा नहीं, प्रोफाइल चलता है।

मुस्कान असली हो या नकली,

लाइक के नीचे सब कुछ पलता है।


सुबह उठते ही दुनिया नहीं देखते,

पहले नोटिफिकेशन देखते हैं,

किसने देखा, किसने छोड़ा,

किसने दिल पर तीर फेंके—ये गिनते हैं।


यहाँ ज्ञान से ज्यादा

कैप्शन की चमक बिकती है,

और सच्चाई अक्सर

“एडिट” के पीछे छिपती है।


दोस्त कम, फॉलोअर ज्यादा हैं,

पर रिश्ते अब भी साइलेंट मोड में खड़े हैं।

कभी जो बातें घंटों होती थीं,

अब वो सिर्फ “स्टोरी” में पड़े हैं।


लाइक बढ़े तो आत्मविश्वास उड़ता है,

कम हो तो इंसान टूट सा जाता है।

कमेंट में तारीफ मिले तो दिन बनता है,

वरना पूरा अस्तित्व हिल जाता है।


यहाँ सब “रियल” होने का दावा करते हैं,

पर हर कोई थोड़ा “फिल्टर” में जीता है।

और जो सच में सच बोल दे,

वो ट्रोलिंग का स्वाद पीता है।


सबसे बड़ा मज़ाक यही है इस दुनिया का—

यहाँ दिखना ज़रूरी है, होना नहीं।

और जो चुप रहे समझदारी से,

उसका नाम भी “गुमनाम” हो जाना है कहीं।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

डिजिटल सफलता और रिश्तों की खामोश जलन

डिजिटल सफलता और रिश्तों की खामोश जलन

जब आप कंटेंट क्रिएटर बनते हो,

तो सबसे पहले तालियाँ नहीं बजतीं…

सबसे पहले आँखें जलती हैं।


आपका पहला वीडियो नहीं देखा जाता,

उसे “स्कैन” किया जाता है—

कितने व्यू आए, कितनी तारीफ हुई… और क्यों हुई!


लाइक बटन से ज्यादा सक्रिय होता है

तुलना का दिमाग—

“इसमें ऐसा क्या खास है जो ये आगे बढ़ रहा है?”


कमेंट नहीं आते,

पर घर की चर्चाएँ शुरू हो जाती हैं—

“देखो, अब ये भी स्टार बनने चला है!”


सबसे दिलचस्प बात यह है—

आपकी हर सफलता पर

चेहरे मुस्कुराते हैं,

पर भीतर एक अनकहा हिसाब चलता रहता है।


व्हाट्सऐप स्टेटस पर लिखा जाता है—

“शुभकामनाएँ बेटा/बेटी”

और उसी के साथ

एक अदृश्य प्रश्न भी घूमता है—

“इतना आगे कैसे बढ़ गया?”


आपका चैनल बढ़ता है,

पर कुछ लोगों के अंदर का संतुलन घटने लगता है।


कमेंट सेक्शन में अनजान लोग बढ़ते हैं,

पर अपने ही लोग

एक नई प्रतियोगिता बना लेते हैं—

“देखते हैं ये कब तक टिकता है…”


और सबसे बड़ा व्यंग्य यही है—

आपकी मेहनत उन्हें प्रेरणा नहीं लगती,

उन्हें यह एक “अनचाही सफलता” लगती है।


इसलिए वे देखते हैं, समझते हैं, याद रखते हैं…

पर स्वीकार नहीं करते।


क्योंकि स्वीकार करना कभी-कभी

सबसे मुश्किल लाइक होता है—

जो रिश्तों के ego को दबाकर देना पड़ता है।



---


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

कॉफी की भाप में कविता

भाप बनकर उठते शब्द,

कप में घुलते एहसास हैं।

कॉफी केवल पेय नहीं,

मन के अनकहे संवाद हैं।


कभी कड़वाहट जीवन जैसी,

कभी मिठास किसी याद सी।

हर घूँट में छिपी हुई है,

एक कहानी अनबयानी सी।


कलम जब थककर बैठ जाती,

कॉफी उसे उड़ान देती है।

सूने कागज़ के आँगन में,

भावों की मुस्कान देती है।


कविता का अपना एक जहान है,

जहाँ सपने आकार लेते हैं।

और कॉफी के छोटे से कप में,

अनगिनत शब्द जन्म लेते हैं।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

चाय और कविता

 चाय और कविता


चाय कोई पेय भर नहीं,

दिनभर की थकान का विराम है।

कभी अकेलेपन की साथी,

तो कभी अपनों के नाम है।


उबलते पानी में जैसे

पत्तियों का रंग उतरता है,

वैसे ही जीवन का अनुभव

धीरे-धीरे मन में निखरता है।


एक कप चाय और कुछ पल,

बस इतना ही काफी होता है।

कई बार जो बात शब्द न कह पाएं,

वह चाय की चुस्की कह जाती है।


कविता भी कुछ ऐसी ही है—

धीरे-धीरे मन में पकती है,

और चाय की सोंधी खुशबू संग

कागज़ पर उतरकर खिलती है।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

"ये जो अपने मन की स्याही है न..."(कविता)

 "ये जो अपने मन की स्याही है न..."


ये जो अपने मन की स्याही है न,

कभी सूखती नहीं है।

वक्त चाहे जितने पन्ने पलट दे,

यह अपनी कहानी लिखती रहती है।


कभी दर्द के अक्षर बनकर,

कभी उम्मीद के गीत रचती है।

जो बातें होंठों तक नहीं आतीं,

उन्हें चुपचाप कागज़ पर रखती है।


मन की स्याही का रंग बड़ा अजीब होता है,

दिखता काला है,

पर उसके भीतर

पूरी ज़िंदगी के रंग छिपे होते हैं।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

मेरी बेटी, मेरा आईना Kavita

 

मेरी बेटी, मेरा आईना

माँ ने मुझे चलना सिखाया,
गिरकर फिर संभलना सिखाया।
रिश्तों की डोर निभानी सिखाई,
अपनों के लिए पिघलना सिखाया।

मीठे शब्दों का मान सिखाया,
बड़ों का सम्मान सिखाया।
दुख में भी मुस्काना सिखाया,
हर हाल में जी जाना सिखाया।

पर माँ ने मुझे एक बात नहीं सिखाई,
अपने हिस्से की लड़ाई लड़ना नहीं सिखाई।
हर दर्द को चुपचाप पी जाना सिखाया,
पर अन्याय के आगे अड़ जाना नहीं सिखाई।

शायद उसकी पीढ़ी ने यही देखा था,
त्याग को ही स्त्री का गहना समझा था।
आँसू छिपाकर मुस्कुराना सीखा था,
अपने सपनों को घर के कोने में रखना सीखा था।

लेकिन मेरी बेटी,
मैं तुझे वही सब दूँगी जो माँ ने मुझे दिया,
संस्कारों का अमृत, प्रेम की छाया,
रिश्तों की गरिमा और विश्वास की माया।

पर इसके साथ कुछ और भी सिखाऊँगी,
अपने मन की आवाज़ सुनना सिखाऊँगी।
गलत को गलत कहना सिखाऊँगी,
अपने अधिकारों के लिए खड़ा होना सिखाऊँगी।

तुझे झुकना नहीं, समझना सिखाऊँगी,
डरना नहीं, सच कहना सिखाऊँगी।
अपनी पहचान खुद बनाना सिखाऊँगी,
भीड़ में भी अलग नज़र आना सिखाऊँगी।

क्योंकि तू मेरी बेटी है,
पर सिर्फ मेरी परछाई नहीं।
तू अपना एक आकाश है,
किसी और की परिभाषा नहीं।

तुझमें मैं अपना बचपन देखती हूँ,
अपने अधूरे सपनों का दर्पण देखती हूँ।
पर चाहती हूँ कि तू वहाँ पहुँचे,
जहाँ तक मेरी उड़ान नहीं पहुँची।

तू मेरा आईना है,
मगर मेरी कहानी दोहराने के लिए नहीं।
तू मेरी विरासत है,
मगर अपनी नई इबारत लिखने के लिए।

जब भी तुझे देखती हूँ,
अपने ही चेहरे की चमक दिखाई देती है।
फर्क बस इतना है कि मेरी आँखों में जो ख्वाब अधूरे थे,
तेरी आँखों में उनकी पूरी दुनिया दिखाई देती है।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

"माँ, तुमने सब सिखाया... पर एक बात छूट गई"

 "माँ, तुमने सब सिखाया... पर एक बात छूट गई"


माँ,

तुमने मुझे चलना सिखाया,

गिरकर फिर संभलना सिखाया,

रिश्तों की डोर को सहेजना सिखाया,

अपनों के लिए खुद को भूल जाना सिखाया।


तुमने सिखाया कि

बड़ों का सम्मान कैसे किया जाता है,

छोटों पर स्नेह कैसे लुटाया जाता है,

घर को घर कैसे बनाया जाता है,

और आँसू छिपाकर मुस्कुराया कैसे जाता है।


पर माँ,

एक बात शायद तुम भी न सीख सकीं,

इसलिए मुझे भी न सिखा सकीं—


अपने हक़ के लिए लड़ना।


तुमने सहना सिखाया,

पर अन्याय के सामने खड़ा होना नहीं।

तुमने चुप रहना सिखाया,

पर अपनी बात बेखौफ़ कहना नहीं।


शायद तुम्हारे समय की मजबूरी थी,

या संस्कारों की कोई पुरानी परिभाषा,

जहाँ बेटियों को त्याग का पाठ तो मिलता था,

पर अधिकारों का अध्याय अधूरा रह जाता था।


आज जब मैं अपनी बेटी को देखती हूँ,

तो एक नया सपना बुनती हूँ।


मैं उसे दया भी सिखाऊँगी,

और दृढ़ता भी।

मैं उसे प्रेम भी सिखाऊँगी,

और आत्मसम्मान भी।


वह झुके जहाँ विनम्रता ज़रूरी हो,

पर टूटे कभी नहीं।

वह सुने सबकी,

पर अपनी आवाज़ खोए कभी नहीं।


मैं चाहती हूँ कि मेरी बेटी

संस्कारों की मूर्ति ही नहीं,

साहस की मिसाल भी बने।


वह जान सके कि

त्याग और आत्मसमर्पण में फर्क होता है,

और प्रेम का अर्थ

खुद को मिटा देना नहीं होता।


माँ,

तुमने मुझे बहुत कुछ दिया,

इतना कि मैं उम्र भर ऋणी रहूँगी।


बस एक अधूरा पाठ

मैं अपनी बेटी को पूरा पढ़ाऊँगी—


कि बेटियाँ केवल सहने के लिए नहीं,

सही के लिए खड़े होने के लिए भी जन्म लेती हैं।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

शिक्षा और संवाद की मर्यादा : शिक्षक का सम्मान सर्वोपरि

 शिक्षा और संवाद की मर्यादा : शिक्षक का सम्मान सर्वोपरि


शिक्षक चाहे किसी विद्यालय, महाविद्यालय या विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों को शिक्षा दे रहा हो अथवा सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों के माध्यम से ज्ञान का प्रसार कर रहा हो, दोनों ही समान रूप से सम्मान और प्रतिष्ठा के अधिकारी हैं। ज्ञान देने का माध्यम भले बदल जाए, लेकिन गुरु का स्वरूप नहीं बदलता। जो व्यक्ति समाज को शिक्षा, संस्कार और जागरूकता प्रदान करता है, वह गुरु है और भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सदैव सर्वोच्च माना गया है।


कोरोना काल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जब विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के द्वार बंद हो गए थे, तब डिजिटल प्लेटफॉर्म ही शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम बनकर उभरे थे। लाखों शिक्षक मोबाइल, लैपटॉप और इंटरनेट के माध्यम से विद्यार्थियों तक पहुँचे। यूट्यूब, गूगल मीट, ज़ूम और अन्य ऑनलाइन मंचों ने शिक्षा की निरंतरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यदि उस कठिन समय में डिजिटल शिक्षा का सहारा न होता, तो करोड़ों विद्यार्थियों की पढ़ाई गंभीर रूप से प्रभावित होती। इसलिए डिजिटल माध्यम से शिक्षा देने वाले शिक्षकों के योगदान को कमतर आँकना न तो न्यायसंगत है और न ही यथार्थपरक।


वर्तमान में Anjana Om Kashyap के एक कथित विवादित बयान को लेकर देशभर में चर्चा हो रही है। इस विवाद ने केवल एक व्यक्ति के वक्तव्य पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया, बल्कि यह भी सोचने को विवश किया है कि शिक्षा जैसे संवेदनशील विषयों पर संवाद करते समय भाषा की मर्यादा कितनी आवश्यक है।


शिक्षा जैसे पवित्र विषय पर होने वाली किसी भी बहस में भाषा की मर्यादा अत्यंत आवश्यक होती है, क्योंकि यह केवल विचारों का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि समाज की दिशा और सोच को प्रभावित करने वाली प्रक्रिया होती है। भारतीय परंपरा में शिक्षक को केवल एक नौकरी करने वाला व्यक्ति नहीं माना गया है, बल्कि उसे ज्ञान का दीपक, मार्गदर्शक और चरित्र निर्माण का आधार स्तंभ कहा गया है। शिक्षक ही राष्ट्र के भविष्य का निर्माता होता है। वह केवल पाठ्यपुस्तक का ज्ञान नहीं देता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के व्यक्तित्व, संस्कार और दृष्टिकोण का निर्माण भी करता है।


ऐसे में जब किसी शिक्षक या शिक्षा व्यवस्था पर आलोचना की जाए, तो वह व्यक्तिगत आक्षेप या अपमानजनक शब्दों से नहीं, बल्कि ठोस तथ्यों, तर्कों और संतुलित दृष्टिकोण के आधार पर होनी चाहिए। आलोचना का उद्देश्य सुधार होना चाहिए, न कि किसी वर्ग का सार्वजनिक अपमान।


यदि किसी एक व्यक्ति या कुछ प्रवृत्तियों की आलोचना करते हुए पूरे शिक्षक वर्ग को अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया जाता है, तो यह न केवल अस्वीकार्य माना जाता है, बल्कि समाज के एक सम्मानित वर्ग की गरिमा को भी ठेस पहुँचाता है। यही कारण है कि ऐसी टिप्पणियाँ व्यापक विवाद और जन-आक्रोश का कारण बन जाती हैं।


मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। उसकी शक्ति केवल सूचना देने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जनमत का निर्माण भी करता है। इसलिए मीडिया से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने शब्दों और अभिव्यक्तियों में संतुलन, संवेदनशीलता और मर्यादा बनाए रखे। टीआरपी, बहस और प्रतिस्पर्धा के इस दौर में भी यह नहीं भूलना चाहिए कि शब्दों का प्रभाव दूरगामी होता है। एक असंयमित टिप्पणी लाखों शिक्षकों और करोड़ों विद्यार्थियों की भावनाओं को प्रभावित कर सकती है।


आज आवश्यकता इस बात की है कि हम शिक्षक के योगदान को समझें और उसका सम्मान करें, चाहे वह कक्षा में ब्लैकबोर्ड के सामने खड़ा होकर पढ़ा रहा हो या मोबाइल स्क्रीन के माध्यम से लाखों विद्यार्थियों तक ज्ञान पहुँचा रहा हो। दोनों ही राष्ट्र निर्माण के सहभागी हैं, दोनों ही गुरु हैं और दोनों ही सम्मान के अधिकारी हैं।


सार रूप में कहा जाए तो शिक्षा पर चर्चा जितनी आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक उसकी भाषा में संयम, सम्मान और जिम्मेदारी भी है। शिक्षक का सम्मान केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य, ज्ञान की परंपरा और आने वाली पीढ़ियों के उज्ज्वल कल का सम्मान है।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

दीपिका और त्विशा: दो बेटियाँ, दो कहानियाँ, समाज के लिए एक चेतावनी

 दीपिका और त्विशा: दो बेटियाँ, दो कहानियाँ, समाज के लिए एक चेतावनी


दीपिका और त्विशा की कहानियाँ केवल दहेज, प्रताड़ना या संदिग्ध मौतों की खबरें नहीं हैं, बल्कि वे उन अनकहे दर्दों का आईना हैं जिन्हें आज भी अनेक बेटियाँ अपने भीतर दबाकर जीती हैं। इन घटनाओं के कानूनी तथ्यों का अंतिम निर्णय न्यायालय करेगा, लेकिन इनके पीछे छिपी सामाजिक सच्चाइयों से आँखें नहीं मूँदी जा सकतीं।


जब भी किसी बहू के साथ होने वाले अत्याचार की बात होती है, तो चर्चा अक्सर पति या दहेज की मांग तक सीमित रह जाती है। लेकिन सच्चाई यह है कि कई घरों में एक बेटी को सबसे अधिक मानसिक पीड़ा उन लोगों से मिलती है जिनसे उसे अपनापन मिलने की उम्मीद होती है। कटु शब्द, ताने, अपमान, तुलना, हर बात में कमी निकालना, मायके को नीचा दिखाना और हर समय दबाव बनाकर रखना—यह भी मानसिक उत्पीड़न का ही रूप है।


कई बार दहेज से भी अधिक खतरनाक वह मानसिक वातावरण होता है जहाँ बहू को यह एहसास दिलाया जाता है कि वह इस घर की सदस्य नहीं, बल्कि एक बाहरी व्यक्ति है। ऐसे में उसका आत्मविश्वास टूटता है, उसका मनोबल बिखरता है और वह भीतर ही भीतर घुटने लगती है।


यह कहना गलत नहीं होगा कि आज समाज में अनेक परिवार ऐसे हैं जिनकी खुशियाँ आपसी ईर्ष्या, अहंकार और अनावश्यक हस्तक्षेप के कारण नष्ट हो जाती हैं। जहाँ सास माँ की भूमिका निभाने के बजाय अधिकारों की लड़ाई लड़ने लगे और ननद बहन बनने के बजाय प्रतिस्पर्धी बन जाए, वहाँ घर का वातावरण धीरे-धीरे तनाव का केंद्र बन जाता है। इसका परिणाम केवल बहू ही नहीं, पूरे परिवार को भुगतना पड़ता है।


हालाँकि यह भी उतना ही सत्य है कि हर सास या हर ननद ऐसी नहीं होती। असंख्य परिवारों में सास माँ से बढ़कर स्नेह देती हैं और ननद बहन से बढ़कर साथ निभाती है। इसलिए समस्या किसी रिश्ते में नहीं, बल्कि उस सोच में है जो रिश्तों को प्रेम के बजाय अधिकार और नियंत्रण का माध्यम बना देती है।


समाज को यह समझना होगा कि एक बेटी जब विवाह करके नए घर में आती है, तो वह अपने सपनों, विश्वास और भावनाओं के साथ आती है। उसे स्वीकार करना, उसका सम्मान करना और उसे मानसिक सुरक्षा देना पूरे परिवार की जिम्मेदारी है। केवल शारीरिक हिंसा ही अपराध नहीं है, शब्दों से दिया गया घाव भी कई बार जीवनभर नहीं भरता।


आज की बेटियों को भी यह सीख लेनी होगी कि किसी भी प्रकार के मानसिक, भावनात्मक या सामाजिक उत्पीड़न को सामान्य मानकर सहन न करें। अपनी बात कहें, अपने अधिकारों को जानें और समय रहते सहायता लें। चुप्पी कभी समाधान नहीं बनती।


दीपिका और त्विशा जैसी बेटियों की कहानियाँ हमें यही संदेश देती हैं कि एक घर तभी स्वर्ग बनता है जब वहाँ सम्मान, संवेदना और अपनापन हो। जहाँ ताने, अपमान और मानसिक प्रताड़ना का माहौल हो, वहाँ रिश्ते जीवित तो रह सकते हैं, लेकिन खुशियाँ मर जाती हैं।


बेटी को केवल दहेज से नहीं,

मानसिक उत्पीड़न से भी बचाना होगा।

क्योंकि कई बार शरीर पर लगे घाव दिख जाते हैं,

लेकिन आत्मा पर लगे घाव पूरी जिंदगी दर्द देते हैं।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

छिपकली लघु कथा

 छिपकली


रसोई की दीवार पर एक छिपकली रोज़ दिखाई देती थी। घर के लोग उसे देखकर घबरा जाते, कोई झाड़ू उठाता तो कोई उसे भगाने की कोशिश करता। लेकिन वह हर बार बच निकलती और फिर किसी कोने में दिखाई दे जाती।


एक दिन घर की छोटी बच्ची ने पूछा,

“माँ, हम इसे हमेशा भगाते क्यों हैं?”


माँ ने कहा,

“क्योंकि यह गंदी लगती है।”


बच्ची कुछ देर सोचती रही। तभी उसने देखा कि वही छिपकली एक मच्छर और फिर एक कीड़े को खा गई।


बच्ची मुस्कुराई और बोली,

“माँ, जिसे हम बेकार समझ रहे हैं, वह तो घर की सफाई कर रही है।”


माँ चुप हो गई।


उस दिन पहली बार घर वालों ने छिपकली को ध्यान से देखा। वह दीवार पर चुपचाप अपना काम कर रही थी। न किसी से शिकायत, न किसी से प्रशंसा की अपेक्षा।


बच्ची ने धीरे से कहा,

“माँ, हर वह चीज़ बुरी नहीं होती जो हमें अच्छी न लगे।”


माँ ने बेटी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,

“बेटा, यही तो जीवन का सबसे बड़ा सच है। कई बार जिन लोगों या चीज़ों को हम बिना समझे ठुकरा देते हैं, वही हमारे लिए सबसे अधिक उपयोगी साबित होते हैं।”


उस दिन के बाद छिपकली दीवार पर पहले की तरह ही आती रही, लेकिन अब उसे देखकर घर में डर नहीं, एक सीख याद आती थी।


सीख:

किसी का मूल्य उसके रूप से नहीं, उसके कर्म से आँकना चाहिए।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

विभिन्न शीर्षकों पर दस व्यंग्य / दस कहानियां/ दस कविताएं / दस संस्मरण

 विभिन्न शीर्षकों पर  दस व्यंग्य / दस कहानियां/ दस कविताएं

10 व्यंग्य

1. संघर्ष ही जीवन है, और जीत उसका परिणाम


व्यंग्य: “संघर्ष का पोस्टर, सफलता का फोटोशूट”


आजकल संघर्ष भी ट्रेंड में है। लोग संघर्ष कम करते हैं, और उसका पोस्टर ज्यादा बनाते हैं। इंस्टाग्राम पर कैप्शन चलता है—“संघर्ष जारी है…” और नीचे फोटो नई बाइक के साथ।


गांव में संघर्ष खेत में होता था, आज Wi-Fi की स्पीड में होता है।

और जीत? वो तो सिर्फ रिज़ल्ट वाले दिन याद आती है।


सच यही है—संघर्ष दिखता है, जीत बस स्टेटस बन जाती है।



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2. रुकना नहीं है, बस धैर्य के साथ चलते रहना है


व्यंग्य: “धैर्य का रिचार्ज खत्म है”


लोग कहते हैं—धैर्य रखो।

लेकिन आजकल धैर्य भी मोबाइल डेटा की तरह खत्म हो जाता है।


लाइन में खड़े रहो तो धैर्य उड़ जाता है,

और इंटरनेट स्लो हो तो इंसान खुद ही “रुक” जाता है।


असल में हम चलते कम हैं, “लोडिंग…” ज्यादा देखते हैं।



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3. आज जिएं, मुस्कुराएँ और हर पल का आनंद लें


व्यंग्य: “खुशी का पैकेज ऑफर”


आजकल खुशी भी ऑफर में मिलती है—“सेल में मुस्कान खरीदो, चिंता फ्री पाओ।”


पर सच्चाई यह है कि हम मुस्कुराते कम हैं, और फिल्टर ज्यादा लगाते हैं।


हर पल का आनंद लेने का मतलब है—फोन की बैटरी 5% होने पर भी रिलैक्स रहना… जो लगभग असंभव है।



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4. ईश्वर आपको सुख नहीं, सुकून और संतोष दे


व्यंग्य: “सुकून अब आउट ऑफ स्टॉक है”


आजकल लोग ईश्वर से भी ट्रेंडिंग चीज़ मांगते हैं—“थोड़ा सुख, थोड़ा पैसा, और वाई-फाई फास्ट कर दो।”


सुकून? वो तो अब “नो डिलीवरी एरिया” में है।

संतोष? वो तो पुराने जमाने की किताबों में रह गया है।


असल में हम प्रार्थना कम, और ऑर्डर ज्यादा करते हैं।



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5. असली पूंजी बैंक में नहीं, दिलों में होती है


व्यंग्य: “दिलों का बैंक और एटीएम की लाइन”


कहते हैं दिलों में पूंजी होती है।

लेकिन आजकल दिल भी तभी खुलते हैं जब UPI पेमेंट फेल हो जाए।


लोग कहते हैं—“हम दिल जीतते हैं।”

पर स्कैनर न चले तो रिश्ता भी “पेमेंट पेंडिंग” हो जाता है।



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6. तुम्हारा साथ मेरी ताकत है, मुस्कान मेरी आदत


व्यंग्य: “रिश्तों का नेटवर्क एरर”


साथ और मुस्कान बहुत सुंदर शब्द हैं, लेकिन आजकल साथ भी नेटवर्क पर निर्भर है।


“ऑनलाइन हो तो प्यार है, ऑफलाइन हो तो सवाल है।”


मुस्कान भी अब फोटो में ज्यादा और असल में कम दिखती है।



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7. सच्चा जीवन वही जिसमें लोग आपकी बुराई करने से पहले सोचें


व्यंग्य: “गाँव की चाय और शहर की खबरें”


पहले लोग सोचते थे, अब सीधे बोलते हैं।

बुराई करने से पहले सोचने का समय अब किसी के पास नहीं—डेटा पैक सीमित है।


अब तो सच्चा जीवन वही है जिसमें लोग आपकी बुराई “रील” देखकर करें।



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8. सुकून ही सबसे बड़ी दौलत है


व्यंग्य: “सुकून की EMI”


सुकून अब भी सबसे बड़ी दौलत है, बस समस्या यह है कि यह EMI पर भी नहीं मिलता।


लोग बैंक बैलेंस बढ़ाते हैं, लेकिन नींद घटाते जाते हैं।


रात में मोबाइल ऑन और मन ऑफ—यही आज का सुकून है।



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9. कर्म ही बीज है, जीवन उसका फल


व्यंग्य: “बीज बोओ, रील बनाओ”


पहले लोग बीज बोते थे, अब फोटो डालते हैं—“आज हमने मेहनत की।”


फसल बाद में आती है, लेकिन पोस्ट पहले वायरल हो जाता है।


कर्म अभी भी बीज है, बस फर्क इतना है कि अब बीज से ज्यादा कैमरा चल रहा है।



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10. कर्म करो, फल समय पर मिलेगा ही


व्यंग्य: “रिजल्ट का वेटिंग रूम”


आजकल हर कोई कर्म करता है, लेकिन साथ में पूछता भी है—“रिजल्ट कब आएगा?”


धैर्य अब Google पर सर्च हो रहा है—“फल तुरंत कैसे मिले?”


असल में हम कर्म कम, और कन्फर्मेशन ज्यादा चाहते हैं।

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10 कहानियां

1. संघर्ष ही जीवन है, और जीत उसका परिणाम


कहानी: “पत्थरों से रास्ता”


गाँव के बाहर एक लड़का रोज़ स्कूल जाते हुए एक टूटी पगडंडी से गुजरता था। रास्ते में बड़े-बड़े पत्थर और कांटे थे। हर दिन उसके कपड़े फटते, पैर छिलते, लेकिन वह रुकता नहीं था।


लोग कहते—“ये रास्ता छोड़ दे, आसान रास्ता चुन ले।”

लड़का मुस्कुराकर कहता—“जो आसान है, वो मुझे मजबूत नहीं बनाएगा।”


सालों बाद वही टूटी पगडंडी पक्की सड़क बन गई और वही लड़का उसी रास्ते पर स्कूल का प्रधानाचार्य बनकर लौटा।


उस दिन उसने कहा—

“संघर्ष ही जीवन था, और आज की जीत उसका परिणाम है।”



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2. रुकना नहीं है, बस धैर्य के साथ चलते रहना है


कहानी: “धीमे कदमों की उड़ान”


एक गरीब किसान का बेटा पढ़ाई में बहुत धीमा था। लोग उसका मज़ाक उड़ाते। वह हर दिन किताब लेकर बैठता, लेकिन जल्दी कुछ याद नहीं होता।


वह रुक सकता था, लेकिन उसने हार नहीं मानी।

धीरे-धीरे, सालों बाद वही लड़का IAS अधिकारी बन गया।


जब उससे पूछा गया—“तुमने कैसे किया?”

उसने कहा—

“मैं तेज़ नहीं था, लेकिन रुका भी नहीं था।”



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3. आज जिएं, मुस्कुराएँ और हर पल का आनंद लें


कहानी: “एक दिन की सीख”


एक बूढ़ा व्यक्ति हर दिन उदास रहता था। एक बच्चा रोज़ उसे देखकर मुस्कुराता था।


एक दिन बच्चे ने पूछा—“आप कभी खुश क्यों नहीं रहते?”

बूढ़े ने कहा—“मेरे पास खुशी के दिन नहीं बचे।”


बच्चा हँसा और बोला—“दिन नहीं बदलते, आप बदलिए।”


उस दिन बूढ़े ने पहली बार खुलकर मुस्कुराया और बोला—

“आज ही मेरा सबसे अच्छा दिन है।”



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4. ईश्वर आपको सुख नहीं, सुकून और संतोष दे


कहानी: “दो घर”


दो पड़ोसी थे। एक अमीर, दूसरा साधारण। अमीर के घर में हर सुविधा थी, पर वह हमेशा तनाव में रहता था। साधारण व्यक्ति कम में भी खुश रहता था।


एक दिन अमीर व्यक्ति ने पूछा—“तुम खुश कैसे रहते हो?”

उसने कहा—“मैं जो है, उसमें ईश्वर को देखता हूँ।”


अमीर व्यक्ति चुप हो गया… उसे समझ आ गया कि

सुकून पैसे में नहीं, सोच में है।



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5. असली पूंजी बैंक में नहीं, दिलों में होती है


कहानी: “नाम जो दिलों में बस गया”


एक आदमी बहुत अमीर था, लेकिन किसी की मदद नहीं करता था। उसकी मौत के बाद लोग सिर्फ संपत्ति के बारे में बात करते रहे।


दूसरी ओर, एक गरीब शिक्षक था जो बच्चों की मदद करता था। उसकी मृत्यु पर पूरा गाँव रो पड़ा।


किसी ने कहा—

“पहला आदमी पैसा छोड़ गया, दूसरा दिलों में जगह छोड़ गया।”



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6. तुम्हारा साथ मेरी ताकत है, मुस्कान मेरी आदत


कहानी: “एक मुस्कान का सहारा”


एक युवक बहुत अकेला और टूट चुका था। जिंदगी में असफलता ही असफलता थी। तभी उसकी दोस्त ने हर दिन उसे मुस्कुराकर हिम्मत दी।


धीरे-धीरे उसका हौसला लौट आया।

वह सफल हो गया।


जब उसने कहा—“तुमने क्या किया मेरे लिए?”

वह बोली—“मैंने कुछ नहीं, बस साथ दिया और मुस्कुराई।”



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7. सच्चा जीवन वही जिसमें लोग आपकी बुराई करने से पहले सोचें


कहानी: “चुप्पी का जवाब”


एक व्यक्ति के खिलाफ लोग हमेशा बातें करते थे। लेकिन उसने कभी जवाब नहीं दिया, बस अपना काम ईमानदारी से करता रहा।


कुछ साल बाद वही लोग उसके सम्मान में खड़े थे।


किसी ने पूछा—“तुमने जवाब क्यों नहीं दिया?”

उसने कहा—“कर्म बोलते हैं, शब्द नहीं।”



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8. सुकून ही सबसे बड़ी दौलत है


कहानी: “सोने का तकिया”


एक राजा के पास सब कुछ था, लेकिन वह रातों को नहीं सो पाता था। एक साधारण संत एक पेड़ के नीचे चैन से सोता था।


राजा ने पूछा—“तुम्हें डर नहीं लगता?”

संत ने कहा—“जिसके पास इच्छाएँ कम हों, उसके पास डर भी कम होता है।”


राजा समझ गया—

“सच्ची दौलत सुकून है।”



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9. कर्म ही बीज है, जीवन उसका फल


कहानी: “खेत का सच”


एक किसान हमेशा अच्छे बीज बोता और मेहनत करता था। उसका पड़ोसी आलसी था और खराब बीज डालता था।


समय आया—एक के खेत में सोना जैसी फसल, दूसरे के खेत में सूखा।


पड़ोसी ने पूछा—“ऐसा क्यों?”

किसान बोला—“जो बोया है, वही तो पाया है।”



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10. कर्म करो, फल समय पर मिलेगा ही


कहानी: “इंतज़ार का फल”


एक छात्र दिन-रात मेहनत करता रहा, लेकिन कई बार असफल हुआ। लोग कहते—“छोड़ दे।”


वह बोला—“मैं इंतज़ार नहीं कर रहा, मैं तैयार हो रहा हूँ।”


सालों बाद वही छात्र अपने गाँव का सबसे सफल डॉक्टर बना।


उसने कहा—

“फल देर से मिला, लेकिन सही समय पर मिला।”



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10 कविताएं

नीचे आपके सभी विषयों पर नए शीर्षक के साथ 24-24 पंक्तियों की यथार्थवादी कविताएँ आपकी शैली में प्रस्तुत हैं—



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1. “संघर्षों की राह और सपनों की पहचान”


संघर्षों की धूप में जब पाँव जलते हैं,

तब सपनों के बीज भीतर पलते हैं।

हर ठोकर एक नया सबक दे जाती है,

हर हार भी कुछ कहकर चली जाती है।


रास्ते आसान कभी हुआ नहीं करते,

सपने यूँ ही किसी को मिला नहीं करते।

पसीने की बूंदें जब मिट्टी में गिरती हैं,

तब ही किस्मत की लकीरें भी फिरती हैं।


लोग कहते हैं क्यों इतना लड़ते हो,

पर हम तो हर दर्द से आगे बढ़ते हो।

जो रुक जाए वह कहानी नहीं बनता,

संघर्ष बिना कोई सच्चा इंसान नहीं बनता।


कभी भूख, कभी तानों की मार मिली,

कभी उम्मीद भी अधूरी बार-बार मिली।

फिर भी दिल ने हार कब मानी है,

यही तो जीवन की असली कहानी है।


जो आग में तपता वही सोना बनता है,

हर दर्द यहाँ एक सोपान बनता है।

संघर्ष ही जीवन का सच्चा प्रमाण है,

और जीत उसी का सुंदर परिणाम है।



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2. “धीमे कदमों की अनकही यात्रा”


रुकने को मन कई बार कहता है,

पर भीतर कोई आवाज़ बहता है।

कहता है चल, चाहे राह कठिन हो,

हर कदम में तेरा ही चिन्ह हो।


धीमे चलना भी हार नहीं होती,

हर गति में भी तैयारी होती।

जो ठहर गया वो पीछे छूट गया,

जो चला वही इतिहास बन गया।


लोग तेज़ दौड़ को ही जीत समझते हैं,

पर कई धीमे भी मंज़िल छू लेते हैं।

हर श्वास में धैर्य की कहानी है,

यही जीवन की सच्ची रवानी है।


गिरकर उठना ही पहचान बनती है,

हर कोशिश ही नई जान बनती है।

जो थककर भी चलता रहता है,

वही समय को भी बदलता रहता है।


रास्ते खुद आसान हो जाते हैं,

जब कदम रुकते नहीं, बढ़ जाते हैं।

धैर्य ही असली शक्ति की निशानी है,

यही जीवन की सच्ची रवानी है।



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3. “आज का क्षण और मुस्कान का अर्थ”


आज को जो जी ले वही अमीर है,

बाकी सब तो कल की फकीर है।

हर पल में एक कहानी छुपी है,

हर साँस में एक रवानी छुपी है।


मुस्कान चेहरे की सजावट नहीं,

यह दिल की सच्ची आवाज़ सही।

जो मुस्कुरा दे वही जीत जाता है,

हर दर्द भी हल्का हो जाता है।


कल की चिंता क्यों इतनी भारी है,

आज की खुशी ही असली प्यारी है।

बीता हुआ कल लौटेगा नहीं,

आने वाला कल भी अपना नहीं।


तो क्यों न आज को अपनाया जाए,

हर पल को दिल से सजाया जाए।

जीवन तभी सुंदर बन पाता है,

जब इंसान मुस्कुराना जान पाता है।


छोटी-छोटी खुशियाँ ही जीवन हैं,

यही असली सुंदरता का चिन्ह हैं।

हर क्षण को जो अपनाता है,

वही सच में जीवन पाता है।



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4. “सुकून और संतोष की असली संपदा”


धन की दौड़ में मन खो जाता है,

सुकून कहीं दूर सो जाता है।

हर इच्छा एक नई आग जलाती है,

और शांति धीरे-धीरे चली जाती है।


संतोष ही असली खजाना है,

बाकी सब तो आना-जाना है।

जो पास है उसमें खुश रहना सीखो,

हर पल को सच में जीना सीखो।


बाहर की चमक धोखा दे सकती है,

पर भीतर की शांति साथ चलती है।

जो मन को शांत कर लेता है,

वही जीवन को पा लेता है।


ईश्वर की सबसे बड़ी देन यही है,

सुकून से भरी हुई दुनिया सही है।

जहाँ लालच का नाम नहीं होता,

वहाँ दुख का काम नहीं होता।


कम में भी जो खुश रह जाता है,

वही सच्चा सुख पा जाता है।

सुकून ही सबसे बड़ी दौलत है,

यही जीवन की असली हकीकत है।



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5. “दिलों की दौलत और रिश्तों की पहचान”


बैंक का बैलेंस बढ़ता जाता है,

पर दिल का खालीपन रह जाता है।

रिश्ते जब सच्चे बन जाते हैं,

तब जीवन में रंग आ जाते हैं।


दौलत से सब कुछ नहीं मिलता है,

सम्मान भी दिल से खिलता है।

जो दूसरों के दिल जीत लेते हैं,

वही असली जीवन जी लेते हैं।


नाम और शोहरत मिट सकते हैं,

पर भाव हमेशा रह सकते हैं।

एक अच्छा व्यवहार ही पहचान है,

यही सबसे बड़ी इंसानियत की शान है।


किसी की मदद जो कर जाता है,

वह दिलों में घर कर जाता है।

यही असली पूंजी कहलाती है,

जो हर दिल में बस जाती है।


रिश्तों की गहराई ही जीवन है,

बाकी सब तो केवल धन है।

दिलों की दौलत सबसे खास है,

यही जीवन की असली आस है।



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6. “मुस्कान, साथ और जीवन का सहारा”


तुम्हारा साथ जब पास होता है,

हर दर्द भी खास होता है।

अकेलापन दूर चला जाता है,

दिल फिर से मुस्कुरा जाता है।


मुस्कान तुम्हारी एक आदत सी है,

मेरे लिए एक राहत सी है।

जब तुम हँसते हो दुनिया हँसती है,

हर उदासी भी वहीं बिखरती है।


रिश्ते शब्दों से नहीं बनते हैं,

ये तो एहसासों से चलते हैं।

एक साथ ही ताकत बन जाता है,

जीवन को नया रास्ता दिखाता है।


कभी दूरियाँ भी पास लगती हैं,

जब यादें दिल में बसती हैं।

तुम्हारी मुस्कान मेरी दुनिया है,

यही मेरी सबसे बड़ी पूंजी है।


हर दिन एक नई उम्मीद जगती है,

जब तुम्हारी याद साथ चलती है।

साथ ही जीवन की पहचान है,

यही दिल की सच्ची शान है।



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7. “चरित्र की ऊँचाई और मौन की ताकत”


लोगों की बातें चलती रहती हैं,

पर सच्चाई खड़ी रहती है।

जो कर्म से खुद को साबित करता है,

वही समय को जीतता है।


बुराई करने से पहले सोचते हैं,

ऐसा जीवन कम ही होते हैं।

जहाँ चरित्र की ऊँचाई होती है,

वहाँ आलोचना भी छोटी होती है।


मौन भी एक जवाब बन जाता है,

जब कर्म ही सब बताता है।

शब्दों की जरूरत नहीं रहती,

सच की रोशनी ही दिखती।


समय सब कुछ बदल देता है,

झूठ खुद ही गिर जाता है।

जो ईमान पर चलता जाता है,

वही सम्मान पाता है।


असली जीवन वही होता है,

जहाँ कर्म बोलता होता है।

और लोग सोचने पर मजबूर हों,

वही सच्चा व्यक्तित्व होता है।



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8. “सुकून की खोज और मन की शांति”


दौड़ बहुत है इस दुनिया में,

पर चैन कहाँ है जिंदगानी में।

हर कोई कुछ और चाहता है,

पर मन कभी नहीं भर पाता है।


सुकून बाहर नहीं मिलता है,

यह तो भीतर ही खिलता है।

जो खुद को समझ जाता है,

वही शांति पा जाता है।


लालच की आग बुझती नहीं,

पर संतोष की रोशनी कम नहीं।

जो पास है वही बहुत है,

यही जीवन की असली हद है।


रातों की नींद जो खो गई है,

वही सबसे बड़ी दौलत है।

अगर मन शांत हो जाए,

तो जीवन स्वर्ग बन जाए।


सुकून ही असली पहचान है,

बाकी सब तो एक कहानी है।

शांति ही सबसे बड़ा धन है,

यही जीवन का असली मन है।



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9. “कर्मों के बीज और जीवन की फसल”


जैसा बोओ वैसा ही पाओ,

यही जीवन का सच्चा भाव।

कर्मों का बीज जो बोया है,

वही फल बनकर आया है।


अच्छाई का पौधा बड़ा होता है,

समय के साथ खड़ा होता है।

बुराई भी कभी न टिकती है,

वह खुद ही गिरती दिखती है।


मेहनत की जब धूप लगती है,

तब सफलता भी खिलती है।

हर कर्म की अपनी भाषा है,

यही जीवन की परिभाषा है।


समय कभी किसी का नहीं,

पर कर्म सबका साथी सही।

जो आज बोएगा वही पाएगा,

यही नियम बदल न पाएगा।


जीवन एक खेत सा होता है,

जहाँ कर्म ही सब कुछ होता है।

कर्म ही बीज है सच्चा सत्य,

और जीवन उसका सुंदर तथ्य।



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10. “समय, धैर्य और फल की प्रतीक्षा”


कर्म करो चिंता मत करो,

फल का समय खुद आने दो।

धैर्य ही सबसे बड़ा गुण है,

यही जीवन का सच्चा धुन है।


बीज तुरंत पेड़ नहीं बनता,

हर सपना जल्दी नहीं सजता।

समय की अपनी चाल होती है,

हर चीज़ में टाल होती है।


जो रुक जाता वह खो जाता है,

जो चलता वह पा जाता है।

हर प्रयास का फल मिलता है,

बस समय पर खिलता है।


लोग जल्दी में सब चाहते हैं,

पर प्रकृति धीमे चलती है।

यही उसका नियम पुराना है,

यही उसका सच्चा बहाना है।


कर्म का फल निश्चित आता है,

बस धैर्य उसे बुलाता है।

कर्म करो फल मिलेगा ही,

यही जीवन का सत्य सही।



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10 संस्मरण

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1. “संघर्षों के दिन और सफलता की पहली दस्तक”


मुझे आज भी वे दिन याद हैं जब जीवन आसान नहीं था। रास्ते छोटे थे, सपने बड़े थे, और साधन बहुत सीमित। हर दिन एक नई परीक्षा जैसा लगता था।


कई बार मन कहता था कि रुक जाऊँ, पर भीतर से कोई आवाज़ कहती थी—चलते रहो।


एक समय ऐसा भी आया जब असफलता ने दरवाज़ा लगातार खटखटाया। लोग कहते—“शायद यह तुमसे नहीं होगा।”


लेकिन वही संघर्ष मेरे भीतर की ताकत बन गया। धीरे-धीरे हालात बदले, और एक दिन वही मेहनत पहचान बन गई।


आज समझ आता है—संघर्ष ही जीवन था, और जीत उसका परिणाम।



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2. “धीमे कदमों का सफर जो रुका नहीं”


मैं हमेशा तेज़ नहीं चल पाया। कई लोग मुझसे आगे निकल जाते थे, और मैं पीछे रह जाता था। पर मैंने कभी रुकना नहीं सीखा।


हर दिन थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़ता रहा। कभी थकान होती, कभी निराशा, पर कदम चलते रहे।


लोग हँसते थे कि मैं धीमा हूँ, पर मुझे पता था कि मैं रुकने वालों में नहीं हूँ।


समय ने मुझे सिखाया कि गति से ज्यादा महत्वपूर्ण निरंतरता होती है।


आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो समझ आता है—धीमे कदम भी मंज़िल तक पहुँचते हैं, अगर वे रुकते नहीं।



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3. “एक मुस्कान जिसने दिन बदल दिया”


एक समय मैं बहुत व्यस्त और परेशान रहता था। हर दिन तनाव भारी लगता था। उसी समय एक छोटे बच्चे की मुस्कान ने मुझे रोक लिया।


वह बिना किसी कारण मुस्कुरा रहा था। न उसके पास ज्यादा कुछ था, न कोई चिंता।


उस मुस्कान ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया—हम क्यों इतने उलझे रहते हैं?


उस दिन मैंने सीखा कि आज को जीना चाहिए। मुस्कुराना एक विकल्प है, और खुशी हमारे भीतर है।


उस दिन के बाद मैंने छोटे-छोटे पलों में जीना शुरू किया।



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4. “सुकून की तलाश का एक सफर”


मैंने जीवन में बहुत कुछ पाने की कोशिश की—सफलता, पैसा, पहचान। लेकिन जितना पाता गया, उतनी बेचैनी बढ़ती गई।


एक समय ऐसा आया जब सब कुछ होते हुए भी मन खाली था।


तभी एक साधारण व्यक्ति से मुलाकात हुई, जो कम में भी संतुष्ट था। उसके चेहरे पर एक अलग ही शांति थी।


उसने कहा—“सुकून बाहर नहीं, भीतर होता है।”


उस दिन समझ आया कि असली दौलत संतोष है, और सुकून ही जीवन का सबसे बड़ा खजाना है।



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5. “दिलों की पूंजी का अनुभव”


मैंने देखा है कि बैंक का बैलेंस बढ़ने से लोग बदल जाते हैं, लेकिन दिलों में जगह बनाने वाले लोग कभी नहीं बदलते।


एक बार मुझे किसी ने बिना स्वार्थ के मदद की। उस मदद ने मुझे धन से ज्यादा भरोसा दिया।


तभी समझ आया कि असली पूंजी पैसों में नहीं, बल्कि रिश्तों में होती है।


जो लोग दूसरों के दिलों में जगह बना लेते हैं, वे कभी अकेले नहीं रहते।



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6. “एक साथ और मुस्कान की याद”


जीवन में कुछ लोग ऐसे मिलते हैं जिनकी मौजूदगी ही ताकत बन जाती है। मेरे जीवन में भी ऐसा ही एक रिश्ता रहा।


जब भी मैं टूटता, उनका साथ मुझे संभाल लेता। और उनकी मुस्कान मेरे लिए उम्मीद बन जाती।


धीरे-धीरे वह मुस्कान मेरी आदत बन गई।


आज भी याद करता हूँ तो लगता है—कुछ रिश्ते शब्दों से नहीं, एहसासों से जीए जाते हैं।



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7. “मौन में छुपा जीवन का उत्तर”


एक समय मैं हर आलोचना का जवाब देने की कोशिश करता था। लेकिन इससे केवल थकान बढ़ती थी।


फिर मैंने देखा कि कुछ लोग बिना कुछ बोले भी अपनी सच्चाई साबित कर देते हैं।


धीरे-धीरे मैंने भी मौन को अपनाया और अपने कर्मों को बोलने दिया।


समय ने दिखाया कि सच्चाई को बोलने की जरूरत नहीं होती, वह खुद सामने आ जाती है।



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8. “सुकून की असली पहचान”


मैंने एक दौर देखा जब सब कुछ था, लेकिन नींद नहीं थी। रातें लंबी लगती थीं और मन भारी रहता था।


फिर धीरे-धीरे समझ आया कि दौलत से ज्यादा जरूरी शांति है।


जब मैंने अपेक्षाएँ कम कीं और संतोष बढ़ाया, तब जीवन बदल गया।


अब समझ आता है—सुकून ही सबसे बड़ी दौलत है।



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9. “कर्मों का असली अनुभव”


मैंने जीवन में कई बार देखा कि मेहनत तुरंत फल नहीं देती। लेकिन समय कभी खाली नहीं जाता।


कुछ काम ऐसे भी थे जिनका परिणाम देर से मिला, पर जब मिला तो बहुत सही मिला।


तभी समझ आया कि हर कर्म एक बीज है, और समय उसका खेत।


जो बोया जाता है, वही लौटकर आता है।



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10. “धैर्य और फल की सीख”


मैं बहुत बार जल्दी परिणाम चाहता था। लेकिन जीवन ने हर बार मुझे धैर्य सिखाया।


कई प्रयास ऐसे रहे जिनमें देर लगी, लेकिन हार कभी नहीं मानी।


एक दिन जब परिणाम मिला, तो समझ आया कि समय हमेशा सही होता है।


आज अनुभव कहता है—कर्म करो, फल समय पर मिलेगा ही।