मेरी माँ : तपते समय की शीतल छाया
माँ,
तुम कोई साधारण शब्द नहीं,
वह मौन प्रार्थना हो
जो अभावों की राख में भी
आशा का दीप जला देती है।
तुमने जीवन को
फूलों की सेज पर नहीं,
काँटों की पगडंडी पर चलकर जिया,
फिर भी तुम्हारे होंठों पर
कभी शिकायत का धुआँ नहीं दिखा।
जब घर की चौखट पर
ज़रूरतें दस्तक देती थीं,
तब तुम अपने हिस्से की इच्छाएँ
चुपचाप तुलसी के नीचे दबा देती थीं।
और हमारे हिस्से में
रोटी के साथ संस्कार परोस देती थीं।
माँ,
तुम सचमुच उस नदी की तरह हो
जो स्वयं पथरीले घाट सहती है,
पर अपने बच्चों को
सिर्फ निर्मल जल देती है।
तुमने सिखाया—
कि गरीबी केवल जेब में होती है,
विचारों में नहीं।
तुमने बताया—
कि झुकना संस्कार है,
पर टूट जाना कमजोरी नहीं होना चाहिए।
तुम्हारे आँचल में
कभी भेदभाव की सिलवट नहीं रही।
सब बच्चों के लिए
तुम्हारा स्नेह
बरसात की उस पहली फुहार जैसा था
जो हर आँगन को समान रूप से भिगोती है।
तुम सीधी थीं,
पर तुम्हारी सादगी में
जीवन का सबसे बड़ा दर्शन छिपा था।
तुम सच्ची थीं,
इसलिए तुम्हारी आँखों में
ईश्वर का उजाला बसता था।
माँ,
तुमने हमें धन नहीं,
मन की समृद्धि दी।
ऊँचे महल नहीं,
ऊँचे संस्कार दिए।
और यही कारण है कि
आज भी जब जीवन थक जाता है,
तुम्हारी सीख
बरगद की छाँव बनकर
मन को विश्राम देती है।
इस मातृदिवस पर
तुम्हारे चरणों में
शब्दों के समस्त पुष्प अर्पित हैं।
क्योंकि तुम वह दीप हो
जिसने स्वयं जलकर
हम सबके जीवन को उजाला दिया।
तुम्हारी ममता
किसी उत्सव की मोहताज नहीं,
वह तो जीवन का वह सत्य है
जो हर जन्म में
ईश्वर का सबसे सुंदर रूप बनकर उतरता है।
माँ पद्म को समर्पित
ममता, त्याग और समान स्नेह की अनुपम प्रतिमा।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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