Saturday, 23 May 2026

जब बच्चों की गलती ‘नादानी’ कहलाने लगे…

 **“जब बच्चों की गलती ‘नादानी’ कहलाने लगे…

और शिक्षक की डाँट ‘गलती’ बन जाए!”**

आज का समय सच में सोचने पर मजबूर करता है।

बच्चों के हाथों में किताबों से पहले मोबाइल आ गया,

और समझ से पहले गुस्सा।

छोटी-छोटी बातों पर दोस्ती टूट जाती है,

मजाक लड़ाई में बदल जाता है,

और गुस्से में बच्चे वो कर जाते हैं जिसका अंदाज़ा शायद उन्हें खुद भी नहीं होता।

सबसे दुखद बात ये नहीं कि बच्चे गलती कर रहे हैं…

दुख इस बात का है कि अब गलतियों को भी “बचपन की शरारत” कहकर टाल दिया जाता है।

हाल ही में एक घटना के बारे में सुनने को मिला।

दो बच्चों के बीच मामूली कहासुनी हुई और बात इतनी बढ़ गई कि मारपीट तक पहुँच गई।

एक बच्चा बुरी तरह घायल हो गया।

बाद में टीचर्स ने आकर स्थिति संभाली।

शुक्र है कि बच्चा अब सुरक्षित है।

लेकिन इस घटना ने मन में एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा कर दिया—

**अगर बच्चों को सही-गलत बताने वाला भी चुप हो जाए…

तो फिर बच्चों को संभालेगा कौन?**

आज एक अजीब परिस्थिति बनती जा रही है।

जब बच्चा गलत करता है, बदतमीज़ी करता है, झूठ बोलता है या किसी को चोट पहुँचाता है,

तो अक्सर लोग कहते हैं —

“अरे बच्चे हैं… हो जाता है।”

लेकिन वही बच्चा जब किसी टीचर की डाँट सुन ले,

तो सबसे पहले उंगलियाँ शिक्षक पर उठ जाती हैं।

मानो अब समझाना भी अपराध हो गया हो।

सच तो ये है कि हर डाँट के पीछे नफरत नहीं होती।

कई बार उसमें चिंता छिपी होती है।

जिम्मेदारी छिपी होती है।

और एक कोशिश होती है कि बच्चा जीवन में गलत रास्ते पर न जाए।

एक शिक्षक सिर्फ किताबें नहीं पढ़ाता…

वो बच्चों का व्यवहार भी गढ़ता है।

उन्हें अनुशासन, सम्मान और इंसानियत सिखाने की कोशिश करता है।

हाँ, किसी भी तरह की मारपीट बिल्कुल गलत है।

लेकिन बच्चों को उनकी गलती का एहसास करवाना भी उतना ही जरूरी है।

क्योंकि अगर हर गलती पर सिर्फ बचाव किया जाएगा,

तो बच्चे धीरे-धीरे सही और गलत का फर्क समझना बंद कर देंगे।

आज जरूरत इस बात की नहीं कि

Parents और Teachers एक-दूसरे को गलत साबित करें।

जरूरत इस बात की है कि दोनों साथ खड़े हों।

क्योंकि बच्चा सिर्फ स्कूल से नहीं सीखता…

वो घर से भी सीखता है।

अगर घर में हर गलती पर सिर्फ पक्ष लिया जाएगा,

तो बच्चा कभी अपनी कमी स्वीकार करना नहीं सीख पाएगा।

Parents से बस एक छोटी सी विनती है —

हर बार सिर्फ अपने बच्चे की बात सुनकर निर्णय मत लीजिए।

एक बार शिक्षक की बात भी समझिए।

क्योंकि कई बार टीचर की सख्ती में ही बच्चे का भविष्य छिपा होता है।

और Teachers से भी यही अपेक्षा है कि

वे बच्चों को प्रेम, धैर्य और समझदारी के साथ सही दिशा दिखाते रहें।

क्योंकि आज बच्चों को सिर्फ पढ़ाई नहीं…

संस्कारों की भी सबसे ज्यादा जरूरत है।

**बच्चों की गलतियों को छुपाने से नहीं,

उन्हें स्वीकार कर सुधारने से उनका भविष्य बेहतर बनता है।**

जिस दिन घर और स्कूल दोनों मिलकर बच्चों को संभालने लगेंगे,

उस दिन शायद बच्चों में बढ़ती हिंसा, गुस्सा और असंवेदनशीलता भी कम होने लगेगी।

क्योंकि बच्चे वही बनते हैं…

जो वो घर और स्कूल — दोनों जगह देखते और सीखते हैं।

Parents और Teachers दोनों अपनी राय जरूर दें…

क्योंकि बच्चों का भविष्य किसी एक की नहीं,

हम सबकी जिम्मेदारी है।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

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