Monday, 8 June 2026

“सोशल मीडिया का नया ज़माना” (व्यंग्य कविता)

 “सोशल मीडिया का नया ज़माना” (व्यंग्य कविता)


अब जमाना बदल गया है, साहब,

यहाँ चेहरा नहीं, प्रोफाइल चलता है।

मुस्कान असली हो या नकली,

लाइक के नीचे सब कुछ पलता है।


सुबह उठते ही दुनिया नहीं देखते,

पहले नोटिफिकेशन देखते हैं,

किसने देखा, किसने छोड़ा,

किसने दिल पर तीर फेंके—ये गिनते हैं।


यहाँ ज्ञान से ज्यादा

कैप्शन की चमक बिकती है,

और सच्चाई अक्सर

“एडिट” के पीछे छिपती है।


दोस्त कम, फॉलोअर ज्यादा हैं,

पर रिश्ते अब भी साइलेंट मोड में खड़े हैं।

कभी जो बातें घंटों होती थीं,

अब वो सिर्फ “स्टोरी” में पड़े हैं।


लाइक बढ़े तो आत्मविश्वास उड़ता है,

कम हो तो इंसान टूट सा जाता है।

कमेंट में तारीफ मिले तो दिन बनता है,

वरना पूरा अस्तित्व हिल जाता है।


यहाँ सब “रियल” होने का दावा करते हैं,

पर हर कोई थोड़ा “फिल्टर” में जीता है।

और जो सच में सच बोल दे,

वो ट्रोलिंग का स्वाद पीता है।


सबसे बड़ा मज़ाक यही है इस दुनिया का—

यहाँ दिखना ज़रूरी है, होना नहीं।

और जो चुप रहे समझदारी से,

उसका नाम भी “गुमनाम” हो जाना है कहीं।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

डिजिटल सफलता और रिश्तों की खामोश जलन

डिजिटल सफलता और रिश्तों की खामोश जलन

जब आप कंटेंट क्रिएटर बनते हो,

तो सबसे पहले तालियाँ नहीं बजतीं…

सबसे पहले आँखें जलती हैं।


आपका पहला वीडियो नहीं देखा जाता,

उसे “स्कैन” किया जाता है—

कितने व्यू आए, कितनी तारीफ हुई… और क्यों हुई!


लाइक बटन से ज्यादा सक्रिय होता है

तुलना का दिमाग—

“इसमें ऐसा क्या खास है जो ये आगे बढ़ रहा है?”


कमेंट नहीं आते,

पर घर की चर्चाएँ शुरू हो जाती हैं—

“देखो, अब ये भी स्टार बनने चला है!”


सबसे दिलचस्प बात यह है—

आपकी हर सफलता पर

चेहरे मुस्कुराते हैं,

पर भीतर एक अनकहा हिसाब चलता रहता है।


व्हाट्सऐप स्टेटस पर लिखा जाता है—

“शुभकामनाएँ बेटा/बेटी”

और उसी के साथ

एक अदृश्य प्रश्न भी घूमता है—

“इतना आगे कैसे बढ़ गया?”


आपका चैनल बढ़ता है,

पर कुछ लोगों के अंदर का संतुलन घटने लगता है।


कमेंट सेक्शन में अनजान लोग बढ़ते हैं,

पर अपने ही लोग

एक नई प्रतियोगिता बना लेते हैं—

“देखते हैं ये कब तक टिकता है…”


और सबसे बड़ा व्यंग्य यही है—

आपकी मेहनत उन्हें प्रेरणा नहीं लगती,

उन्हें यह एक “अनचाही सफलता” लगती है।


इसलिए वे देखते हैं, समझते हैं, याद रखते हैं…

पर स्वीकार नहीं करते।


क्योंकि स्वीकार करना कभी-कभी

सबसे मुश्किल लाइक होता है—

जो रिश्तों के ego को दबाकर देना पड़ता है।



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✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

कॉफी की भाप में कविता

भाप बनकर उठते शब्द,

कप में घुलते एहसास हैं।

कॉफी केवल पेय नहीं,

मन के अनकहे संवाद हैं।


कभी कड़वाहट जीवन जैसी,

कभी मिठास किसी याद सी।

हर घूँट में छिपी हुई है,

एक कहानी अनबयानी सी।


कलम जब थककर बैठ जाती,

कॉफी उसे उड़ान देती है।

सूने कागज़ के आँगन में,

भावों की मुस्कान देती है।


कविता का अपना एक जहान है,

जहाँ सपने आकार लेते हैं।

और कॉफी के छोटे से कप में,

अनगिनत शब्द जन्म लेते हैं।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

चाय और कविता

 चाय और कविता


चाय कोई पेय भर नहीं,

दिनभर की थकान का विराम है।

कभी अकेलेपन की साथी,

तो कभी अपनों के नाम है।


उबलते पानी में जैसे

पत्तियों का रंग उतरता है,

वैसे ही जीवन का अनुभव

धीरे-धीरे मन में निखरता है।


एक कप चाय और कुछ पल,

बस इतना ही काफी होता है।

कई बार जो बात शब्द न कह पाएं,

वह चाय की चुस्की कह जाती है।


कविता भी कुछ ऐसी ही है—

धीरे-धीरे मन में पकती है,

और चाय की सोंधी खुशबू संग

कागज़ पर उतरकर खिलती है।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

"ये जो अपने मन की स्याही है न..."(कविता)

 "ये जो अपने मन की स्याही है न..."


ये जो अपने मन की स्याही है न,

कभी सूखती नहीं है।

वक्त चाहे जितने पन्ने पलट दे,

यह अपनी कहानी लिखती रहती है।


कभी दर्द के अक्षर बनकर,

कभी उम्मीद के गीत रचती है।

जो बातें होंठों तक नहीं आतीं,

उन्हें चुपचाप कागज़ पर रखती है।


मन की स्याही का रंग बड़ा अजीब होता है,

दिखता काला है,

पर उसके भीतर

पूरी ज़िंदगी के रंग छिपे होते हैं।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

मेरी बेटी, मेरा आईना Kavita

 

मेरी बेटी, मेरा आईना

माँ ने मुझे चलना सिखाया,
गिरकर फिर संभलना सिखाया।
रिश्तों की डोर निभानी सिखाई,
अपनों के लिए पिघलना सिखाया।

मीठे शब्दों का मान सिखाया,
बड़ों का सम्मान सिखाया।
दुख में भी मुस्काना सिखाया,
हर हाल में जी जाना सिखाया।

पर माँ ने मुझे एक बात नहीं सिखाई,
अपने हिस्से की लड़ाई लड़ना नहीं सिखाई।
हर दर्द को चुपचाप पी जाना सिखाया,
पर अन्याय के आगे अड़ जाना नहीं सिखाई।

शायद उसकी पीढ़ी ने यही देखा था,
त्याग को ही स्त्री का गहना समझा था।
आँसू छिपाकर मुस्कुराना सीखा था,
अपने सपनों को घर के कोने में रखना सीखा था।

लेकिन मेरी बेटी,
मैं तुझे वही सब दूँगी जो माँ ने मुझे दिया,
संस्कारों का अमृत, प्रेम की छाया,
रिश्तों की गरिमा और विश्वास की माया।

पर इसके साथ कुछ और भी सिखाऊँगी,
अपने मन की आवाज़ सुनना सिखाऊँगी।
गलत को गलत कहना सिखाऊँगी,
अपने अधिकारों के लिए खड़ा होना सिखाऊँगी।

तुझे झुकना नहीं, समझना सिखाऊँगी,
डरना नहीं, सच कहना सिखाऊँगी।
अपनी पहचान खुद बनाना सिखाऊँगी,
भीड़ में भी अलग नज़र आना सिखाऊँगी।

क्योंकि तू मेरी बेटी है,
पर सिर्फ मेरी परछाई नहीं।
तू अपना एक आकाश है,
किसी और की परिभाषा नहीं।

तुझमें मैं अपना बचपन देखती हूँ,
अपने अधूरे सपनों का दर्पण देखती हूँ।
पर चाहती हूँ कि तू वहाँ पहुँचे,
जहाँ तक मेरी उड़ान नहीं पहुँची।

तू मेरा आईना है,
मगर मेरी कहानी दोहराने के लिए नहीं।
तू मेरी विरासत है,
मगर अपनी नई इबारत लिखने के लिए।

जब भी तुझे देखती हूँ,
अपने ही चेहरे की चमक दिखाई देती है।
फर्क बस इतना है कि मेरी आँखों में जो ख्वाब अधूरे थे,
तेरी आँखों में उनकी पूरी दुनिया दिखाई देती है।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

"माँ, तुमने सब सिखाया... पर एक बात छूट गई"

 "माँ, तुमने सब सिखाया... पर एक बात छूट गई"


माँ,

तुमने मुझे चलना सिखाया,

गिरकर फिर संभलना सिखाया,

रिश्तों की डोर को सहेजना सिखाया,

अपनों के लिए खुद को भूल जाना सिखाया।


तुमने सिखाया कि

बड़ों का सम्मान कैसे किया जाता है,

छोटों पर स्नेह कैसे लुटाया जाता है,

घर को घर कैसे बनाया जाता है,

और आँसू छिपाकर मुस्कुराया कैसे जाता है।


पर माँ,

एक बात शायद तुम भी न सीख सकीं,

इसलिए मुझे भी न सिखा सकीं—


अपने हक़ के लिए लड़ना।


तुमने सहना सिखाया,

पर अन्याय के सामने खड़ा होना नहीं।

तुमने चुप रहना सिखाया,

पर अपनी बात बेखौफ़ कहना नहीं।


शायद तुम्हारे समय की मजबूरी थी,

या संस्कारों की कोई पुरानी परिभाषा,

जहाँ बेटियों को त्याग का पाठ तो मिलता था,

पर अधिकारों का अध्याय अधूरा रह जाता था।


आज जब मैं अपनी बेटी को देखती हूँ,

तो एक नया सपना बुनती हूँ।


मैं उसे दया भी सिखाऊँगी,

और दृढ़ता भी।

मैं उसे प्रेम भी सिखाऊँगी,

और आत्मसम्मान भी।


वह झुके जहाँ विनम्रता ज़रूरी हो,

पर टूटे कभी नहीं।

वह सुने सबकी,

पर अपनी आवाज़ खोए कभी नहीं।


मैं चाहती हूँ कि मेरी बेटी

संस्कारों की मूर्ति ही नहीं,

साहस की मिसाल भी बने।


वह जान सके कि

त्याग और आत्मसमर्पण में फर्क होता है,

और प्रेम का अर्थ

खुद को मिटा देना नहीं होता।


माँ,

तुमने मुझे बहुत कुछ दिया,

इतना कि मैं उम्र भर ऋणी रहूँगी।


बस एक अधूरा पाठ

मैं अपनी बेटी को पूरा पढ़ाऊँगी—


कि बेटियाँ केवल सहने के लिए नहीं,

सही के लिए खड़े होने के लिए भी जन्म लेती हैं।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

शिक्षा और संवाद की मर्यादा : शिक्षक का सम्मान सर्वोपरि

 शिक्षा और संवाद की मर्यादा : शिक्षक का सम्मान सर्वोपरि


शिक्षक चाहे किसी विद्यालय, महाविद्यालय या विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों को शिक्षा दे रहा हो अथवा सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों के माध्यम से ज्ञान का प्रसार कर रहा हो, दोनों ही समान रूप से सम्मान और प्रतिष्ठा के अधिकारी हैं। ज्ञान देने का माध्यम भले बदल जाए, लेकिन गुरु का स्वरूप नहीं बदलता। जो व्यक्ति समाज को शिक्षा, संस्कार और जागरूकता प्रदान करता है, वह गुरु है और भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सदैव सर्वोच्च माना गया है।


कोरोना काल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जब विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के द्वार बंद हो गए थे, तब डिजिटल प्लेटफॉर्म ही शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम बनकर उभरे थे। लाखों शिक्षक मोबाइल, लैपटॉप और इंटरनेट के माध्यम से विद्यार्थियों तक पहुँचे। यूट्यूब, गूगल मीट, ज़ूम और अन्य ऑनलाइन मंचों ने शिक्षा की निरंतरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यदि उस कठिन समय में डिजिटल शिक्षा का सहारा न होता, तो करोड़ों विद्यार्थियों की पढ़ाई गंभीर रूप से प्रभावित होती। इसलिए डिजिटल माध्यम से शिक्षा देने वाले शिक्षकों के योगदान को कमतर आँकना न तो न्यायसंगत है और न ही यथार्थपरक।


वर्तमान में Anjana Om Kashyap के एक कथित विवादित बयान को लेकर देशभर में चर्चा हो रही है। इस विवाद ने केवल एक व्यक्ति के वक्तव्य पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया, बल्कि यह भी सोचने को विवश किया है कि शिक्षा जैसे संवेदनशील विषयों पर संवाद करते समय भाषा की मर्यादा कितनी आवश्यक है।


शिक्षा जैसे पवित्र विषय पर होने वाली किसी भी बहस में भाषा की मर्यादा अत्यंत आवश्यक होती है, क्योंकि यह केवल विचारों का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि समाज की दिशा और सोच को प्रभावित करने वाली प्रक्रिया होती है। भारतीय परंपरा में शिक्षक को केवल एक नौकरी करने वाला व्यक्ति नहीं माना गया है, बल्कि उसे ज्ञान का दीपक, मार्गदर्शक और चरित्र निर्माण का आधार स्तंभ कहा गया है। शिक्षक ही राष्ट्र के भविष्य का निर्माता होता है। वह केवल पाठ्यपुस्तक का ज्ञान नहीं देता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के व्यक्तित्व, संस्कार और दृष्टिकोण का निर्माण भी करता है।


ऐसे में जब किसी शिक्षक या शिक्षा व्यवस्था पर आलोचना की जाए, तो वह व्यक्तिगत आक्षेप या अपमानजनक शब्दों से नहीं, बल्कि ठोस तथ्यों, तर्कों और संतुलित दृष्टिकोण के आधार पर होनी चाहिए। आलोचना का उद्देश्य सुधार होना चाहिए, न कि किसी वर्ग का सार्वजनिक अपमान।


यदि किसी एक व्यक्ति या कुछ प्रवृत्तियों की आलोचना करते हुए पूरे शिक्षक वर्ग को अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया जाता है, तो यह न केवल अस्वीकार्य माना जाता है, बल्कि समाज के एक सम्मानित वर्ग की गरिमा को भी ठेस पहुँचाता है। यही कारण है कि ऐसी टिप्पणियाँ व्यापक विवाद और जन-आक्रोश का कारण बन जाती हैं।


मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। उसकी शक्ति केवल सूचना देने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जनमत का निर्माण भी करता है। इसलिए मीडिया से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने शब्दों और अभिव्यक्तियों में संतुलन, संवेदनशीलता और मर्यादा बनाए रखे। टीआरपी, बहस और प्रतिस्पर्धा के इस दौर में भी यह नहीं भूलना चाहिए कि शब्दों का प्रभाव दूरगामी होता है। एक असंयमित टिप्पणी लाखों शिक्षकों और करोड़ों विद्यार्थियों की भावनाओं को प्रभावित कर सकती है।


आज आवश्यकता इस बात की है कि हम शिक्षक के योगदान को समझें और उसका सम्मान करें, चाहे वह कक्षा में ब्लैकबोर्ड के सामने खड़ा होकर पढ़ा रहा हो या मोबाइल स्क्रीन के माध्यम से लाखों विद्यार्थियों तक ज्ञान पहुँचा रहा हो। दोनों ही राष्ट्र निर्माण के सहभागी हैं, दोनों ही गुरु हैं और दोनों ही सम्मान के अधिकारी हैं।


सार रूप में कहा जाए तो शिक्षा पर चर्चा जितनी आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक उसकी भाषा में संयम, सम्मान और जिम्मेदारी भी है। शिक्षक का सम्मान केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य, ज्ञान की परंपरा और आने वाली पीढ़ियों के उज्ज्वल कल का सम्मान है।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

दीपिका और त्विशा: दो बेटियाँ, दो कहानियाँ, समाज के लिए एक चेतावनी

 दीपिका और त्विशा: दो बेटियाँ, दो कहानियाँ, समाज के लिए एक चेतावनी


दीपिका और त्विशा की कहानियाँ केवल दहेज, प्रताड़ना या संदिग्ध मौतों की खबरें नहीं हैं, बल्कि वे उन अनकहे दर्दों का आईना हैं जिन्हें आज भी अनेक बेटियाँ अपने भीतर दबाकर जीती हैं। इन घटनाओं के कानूनी तथ्यों का अंतिम निर्णय न्यायालय करेगा, लेकिन इनके पीछे छिपी सामाजिक सच्चाइयों से आँखें नहीं मूँदी जा सकतीं।


जब भी किसी बहू के साथ होने वाले अत्याचार की बात होती है, तो चर्चा अक्सर पति या दहेज की मांग तक सीमित रह जाती है। लेकिन सच्चाई यह है कि कई घरों में एक बेटी को सबसे अधिक मानसिक पीड़ा उन लोगों से मिलती है जिनसे उसे अपनापन मिलने की उम्मीद होती है। कटु शब्द, ताने, अपमान, तुलना, हर बात में कमी निकालना, मायके को नीचा दिखाना और हर समय दबाव बनाकर रखना—यह भी मानसिक उत्पीड़न का ही रूप है।


कई बार दहेज से भी अधिक खतरनाक वह मानसिक वातावरण होता है जहाँ बहू को यह एहसास दिलाया जाता है कि वह इस घर की सदस्य नहीं, बल्कि एक बाहरी व्यक्ति है। ऐसे में उसका आत्मविश्वास टूटता है, उसका मनोबल बिखरता है और वह भीतर ही भीतर घुटने लगती है।


यह कहना गलत नहीं होगा कि आज समाज में अनेक परिवार ऐसे हैं जिनकी खुशियाँ आपसी ईर्ष्या, अहंकार और अनावश्यक हस्तक्षेप के कारण नष्ट हो जाती हैं। जहाँ सास माँ की भूमिका निभाने के बजाय अधिकारों की लड़ाई लड़ने लगे और ननद बहन बनने के बजाय प्रतिस्पर्धी बन जाए, वहाँ घर का वातावरण धीरे-धीरे तनाव का केंद्र बन जाता है। इसका परिणाम केवल बहू ही नहीं, पूरे परिवार को भुगतना पड़ता है।


हालाँकि यह भी उतना ही सत्य है कि हर सास या हर ननद ऐसी नहीं होती। असंख्य परिवारों में सास माँ से बढ़कर स्नेह देती हैं और ननद बहन से बढ़कर साथ निभाती है। इसलिए समस्या किसी रिश्ते में नहीं, बल्कि उस सोच में है जो रिश्तों को प्रेम के बजाय अधिकार और नियंत्रण का माध्यम बना देती है।


समाज को यह समझना होगा कि एक बेटी जब विवाह करके नए घर में आती है, तो वह अपने सपनों, विश्वास और भावनाओं के साथ आती है। उसे स्वीकार करना, उसका सम्मान करना और उसे मानसिक सुरक्षा देना पूरे परिवार की जिम्मेदारी है। केवल शारीरिक हिंसा ही अपराध नहीं है, शब्दों से दिया गया घाव भी कई बार जीवनभर नहीं भरता।


आज की बेटियों को भी यह सीख लेनी होगी कि किसी भी प्रकार के मानसिक, भावनात्मक या सामाजिक उत्पीड़न को सामान्य मानकर सहन न करें। अपनी बात कहें, अपने अधिकारों को जानें और समय रहते सहायता लें। चुप्पी कभी समाधान नहीं बनती।


दीपिका और त्विशा जैसी बेटियों की कहानियाँ हमें यही संदेश देती हैं कि एक घर तभी स्वर्ग बनता है जब वहाँ सम्मान, संवेदना और अपनापन हो। जहाँ ताने, अपमान और मानसिक प्रताड़ना का माहौल हो, वहाँ रिश्ते जीवित तो रह सकते हैं, लेकिन खुशियाँ मर जाती हैं।


बेटी को केवल दहेज से नहीं,

मानसिक उत्पीड़न से भी बचाना होगा।

क्योंकि कई बार शरीर पर लगे घाव दिख जाते हैं,

लेकिन आत्मा पर लगे घाव पूरी जिंदगी दर्द देते हैं।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

छिपकली लघु कथा

 छिपकली


रसोई की दीवार पर एक छिपकली रोज़ दिखाई देती थी। घर के लोग उसे देखकर घबरा जाते, कोई झाड़ू उठाता तो कोई उसे भगाने की कोशिश करता। लेकिन वह हर बार बच निकलती और फिर किसी कोने में दिखाई दे जाती।


एक दिन घर की छोटी बच्ची ने पूछा,

“माँ, हम इसे हमेशा भगाते क्यों हैं?”


माँ ने कहा,

“क्योंकि यह गंदी लगती है।”


बच्ची कुछ देर सोचती रही। तभी उसने देखा कि वही छिपकली एक मच्छर और फिर एक कीड़े को खा गई।


बच्ची मुस्कुराई और बोली,

“माँ, जिसे हम बेकार समझ रहे हैं, वह तो घर की सफाई कर रही है।”


माँ चुप हो गई।


उस दिन पहली बार घर वालों ने छिपकली को ध्यान से देखा। वह दीवार पर चुपचाप अपना काम कर रही थी। न किसी से शिकायत, न किसी से प्रशंसा की अपेक्षा।


बच्ची ने धीरे से कहा,

“माँ, हर वह चीज़ बुरी नहीं होती जो हमें अच्छी न लगे।”


माँ ने बेटी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,

“बेटा, यही तो जीवन का सबसे बड़ा सच है। कई बार जिन लोगों या चीज़ों को हम बिना समझे ठुकरा देते हैं, वही हमारे लिए सबसे अधिक उपयोगी साबित होते हैं।”


उस दिन के बाद छिपकली दीवार पर पहले की तरह ही आती रही, लेकिन अब उसे देखकर घर में डर नहीं, एक सीख याद आती थी।


सीख:

किसी का मूल्य उसके रूप से नहीं, उसके कर्म से आँकना चाहिए।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

विभिन्न शीर्षकों पर दस व्यंग्य / दस कहानियां/ दस कविताएं / दस संस्मरण

 विभिन्न शीर्षकों पर  दस व्यंग्य / दस कहानियां/ दस कविताएं

10 व्यंग्य

1. संघर्ष ही जीवन है, और जीत उसका परिणाम


व्यंग्य: “संघर्ष का पोस्टर, सफलता का फोटोशूट”


आजकल संघर्ष भी ट्रेंड में है। लोग संघर्ष कम करते हैं, और उसका पोस्टर ज्यादा बनाते हैं। इंस्टाग्राम पर कैप्शन चलता है—“संघर्ष जारी है…” और नीचे फोटो नई बाइक के साथ।


गांव में संघर्ष खेत में होता था, आज Wi-Fi की स्पीड में होता है।

और जीत? वो तो सिर्फ रिज़ल्ट वाले दिन याद आती है।


सच यही है—संघर्ष दिखता है, जीत बस स्टेटस बन जाती है।



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2. रुकना नहीं है, बस धैर्य के साथ चलते रहना है


व्यंग्य: “धैर्य का रिचार्ज खत्म है”


लोग कहते हैं—धैर्य रखो।

लेकिन आजकल धैर्य भी मोबाइल डेटा की तरह खत्म हो जाता है।


लाइन में खड़े रहो तो धैर्य उड़ जाता है,

और इंटरनेट स्लो हो तो इंसान खुद ही “रुक” जाता है।


असल में हम चलते कम हैं, “लोडिंग…” ज्यादा देखते हैं।



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3. आज जिएं, मुस्कुराएँ और हर पल का आनंद लें


व्यंग्य: “खुशी का पैकेज ऑफर”


आजकल खुशी भी ऑफर में मिलती है—“सेल में मुस्कान खरीदो, चिंता फ्री पाओ।”


पर सच्चाई यह है कि हम मुस्कुराते कम हैं, और फिल्टर ज्यादा लगाते हैं।


हर पल का आनंद लेने का मतलब है—फोन की बैटरी 5% होने पर भी रिलैक्स रहना… जो लगभग असंभव है।



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4. ईश्वर आपको सुख नहीं, सुकून और संतोष दे


व्यंग्य: “सुकून अब आउट ऑफ स्टॉक है”


आजकल लोग ईश्वर से भी ट्रेंडिंग चीज़ मांगते हैं—“थोड़ा सुख, थोड़ा पैसा, और वाई-फाई फास्ट कर दो।”


सुकून? वो तो अब “नो डिलीवरी एरिया” में है।

संतोष? वो तो पुराने जमाने की किताबों में रह गया है।


असल में हम प्रार्थना कम, और ऑर्डर ज्यादा करते हैं।



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5. असली पूंजी बैंक में नहीं, दिलों में होती है


व्यंग्य: “दिलों का बैंक और एटीएम की लाइन”


कहते हैं दिलों में पूंजी होती है।

लेकिन आजकल दिल भी तभी खुलते हैं जब UPI पेमेंट फेल हो जाए।


लोग कहते हैं—“हम दिल जीतते हैं।”

पर स्कैनर न चले तो रिश्ता भी “पेमेंट पेंडिंग” हो जाता है।



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6. तुम्हारा साथ मेरी ताकत है, मुस्कान मेरी आदत


व्यंग्य: “रिश्तों का नेटवर्क एरर”


साथ और मुस्कान बहुत सुंदर शब्द हैं, लेकिन आजकल साथ भी नेटवर्क पर निर्भर है।


“ऑनलाइन हो तो प्यार है, ऑफलाइन हो तो सवाल है।”


मुस्कान भी अब फोटो में ज्यादा और असल में कम दिखती है।



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7. सच्चा जीवन वही जिसमें लोग आपकी बुराई करने से पहले सोचें


व्यंग्य: “गाँव की चाय और शहर की खबरें”


पहले लोग सोचते थे, अब सीधे बोलते हैं।

बुराई करने से पहले सोचने का समय अब किसी के पास नहीं—डेटा पैक सीमित है।


अब तो सच्चा जीवन वही है जिसमें लोग आपकी बुराई “रील” देखकर करें।



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8. सुकून ही सबसे बड़ी दौलत है


व्यंग्य: “सुकून की EMI”


सुकून अब भी सबसे बड़ी दौलत है, बस समस्या यह है कि यह EMI पर भी नहीं मिलता।


लोग बैंक बैलेंस बढ़ाते हैं, लेकिन नींद घटाते जाते हैं।


रात में मोबाइल ऑन और मन ऑफ—यही आज का सुकून है।



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9. कर्म ही बीज है, जीवन उसका फल


व्यंग्य: “बीज बोओ, रील बनाओ”


पहले लोग बीज बोते थे, अब फोटो डालते हैं—“आज हमने मेहनत की।”


फसल बाद में आती है, लेकिन पोस्ट पहले वायरल हो जाता है।


कर्म अभी भी बीज है, बस फर्क इतना है कि अब बीज से ज्यादा कैमरा चल रहा है।



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10. कर्म करो, फल समय पर मिलेगा ही


व्यंग्य: “रिजल्ट का वेटिंग रूम”


आजकल हर कोई कर्म करता है, लेकिन साथ में पूछता भी है—“रिजल्ट कब आएगा?”


धैर्य अब Google पर सर्च हो रहा है—“फल तुरंत कैसे मिले?”


असल में हम कर्म कम, और कन्फर्मेशन ज्यादा चाहते हैं।

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10 कहानियां

1. संघर्ष ही जीवन है, और जीत उसका परिणाम


कहानी: “पत्थरों से रास्ता”


गाँव के बाहर एक लड़का रोज़ स्कूल जाते हुए एक टूटी पगडंडी से गुजरता था। रास्ते में बड़े-बड़े पत्थर और कांटे थे। हर दिन उसके कपड़े फटते, पैर छिलते, लेकिन वह रुकता नहीं था।


लोग कहते—“ये रास्ता छोड़ दे, आसान रास्ता चुन ले।”

लड़का मुस्कुराकर कहता—“जो आसान है, वो मुझे मजबूत नहीं बनाएगा।”


सालों बाद वही टूटी पगडंडी पक्की सड़क बन गई और वही लड़का उसी रास्ते पर स्कूल का प्रधानाचार्य बनकर लौटा।


उस दिन उसने कहा—

“संघर्ष ही जीवन था, और आज की जीत उसका परिणाम है।”



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2. रुकना नहीं है, बस धैर्य के साथ चलते रहना है


कहानी: “धीमे कदमों की उड़ान”


एक गरीब किसान का बेटा पढ़ाई में बहुत धीमा था। लोग उसका मज़ाक उड़ाते। वह हर दिन किताब लेकर बैठता, लेकिन जल्दी कुछ याद नहीं होता।


वह रुक सकता था, लेकिन उसने हार नहीं मानी।

धीरे-धीरे, सालों बाद वही लड़का IAS अधिकारी बन गया।


जब उससे पूछा गया—“तुमने कैसे किया?”

उसने कहा—

“मैं तेज़ नहीं था, लेकिन रुका भी नहीं था।”



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3. आज जिएं, मुस्कुराएँ और हर पल का आनंद लें


कहानी: “एक दिन की सीख”


एक बूढ़ा व्यक्ति हर दिन उदास रहता था। एक बच्चा रोज़ उसे देखकर मुस्कुराता था।


एक दिन बच्चे ने पूछा—“आप कभी खुश क्यों नहीं रहते?”

बूढ़े ने कहा—“मेरे पास खुशी के दिन नहीं बचे।”


बच्चा हँसा और बोला—“दिन नहीं बदलते, आप बदलिए।”


उस दिन बूढ़े ने पहली बार खुलकर मुस्कुराया और बोला—

“आज ही मेरा सबसे अच्छा दिन है।”



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4. ईश्वर आपको सुख नहीं, सुकून और संतोष दे


कहानी: “दो घर”


दो पड़ोसी थे। एक अमीर, दूसरा साधारण। अमीर के घर में हर सुविधा थी, पर वह हमेशा तनाव में रहता था। साधारण व्यक्ति कम में भी खुश रहता था।


एक दिन अमीर व्यक्ति ने पूछा—“तुम खुश कैसे रहते हो?”

उसने कहा—“मैं जो है, उसमें ईश्वर को देखता हूँ।”


अमीर व्यक्ति चुप हो गया… उसे समझ आ गया कि

सुकून पैसे में नहीं, सोच में है।



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5. असली पूंजी बैंक में नहीं, दिलों में होती है


कहानी: “नाम जो दिलों में बस गया”


एक आदमी बहुत अमीर था, लेकिन किसी की मदद नहीं करता था। उसकी मौत के बाद लोग सिर्फ संपत्ति के बारे में बात करते रहे।


दूसरी ओर, एक गरीब शिक्षक था जो बच्चों की मदद करता था। उसकी मृत्यु पर पूरा गाँव रो पड़ा।


किसी ने कहा—

“पहला आदमी पैसा छोड़ गया, दूसरा दिलों में जगह छोड़ गया।”



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6. तुम्हारा साथ मेरी ताकत है, मुस्कान मेरी आदत


कहानी: “एक मुस्कान का सहारा”


एक युवक बहुत अकेला और टूट चुका था। जिंदगी में असफलता ही असफलता थी। तभी उसकी दोस्त ने हर दिन उसे मुस्कुराकर हिम्मत दी।


धीरे-धीरे उसका हौसला लौट आया।

वह सफल हो गया।


जब उसने कहा—“तुमने क्या किया मेरे लिए?”

वह बोली—“मैंने कुछ नहीं, बस साथ दिया और मुस्कुराई।”



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7. सच्चा जीवन वही जिसमें लोग आपकी बुराई करने से पहले सोचें


कहानी: “चुप्पी का जवाब”


एक व्यक्ति के खिलाफ लोग हमेशा बातें करते थे। लेकिन उसने कभी जवाब नहीं दिया, बस अपना काम ईमानदारी से करता रहा।


कुछ साल बाद वही लोग उसके सम्मान में खड़े थे।


किसी ने पूछा—“तुमने जवाब क्यों नहीं दिया?”

उसने कहा—“कर्म बोलते हैं, शब्द नहीं।”



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8. सुकून ही सबसे बड़ी दौलत है


कहानी: “सोने का तकिया”


एक राजा के पास सब कुछ था, लेकिन वह रातों को नहीं सो पाता था। एक साधारण संत एक पेड़ के नीचे चैन से सोता था।


राजा ने पूछा—“तुम्हें डर नहीं लगता?”

संत ने कहा—“जिसके पास इच्छाएँ कम हों, उसके पास डर भी कम होता है।”


राजा समझ गया—

“सच्ची दौलत सुकून है।”



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9. कर्म ही बीज है, जीवन उसका फल


कहानी: “खेत का सच”


एक किसान हमेशा अच्छे बीज बोता और मेहनत करता था। उसका पड़ोसी आलसी था और खराब बीज डालता था।


समय आया—एक के खेत में सोना जैसी फसल, दूसरे के खेत में सूखा।


पड़ोसी ने पूछा—“ऐसा क्यों?”

किसान बोला—“जो बोया है, वही तो पाया है।”



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10. कर्म करो, फल समय पर मिलेगा ही


कहानी: “इंतज़ार का फल”


एक छात्र दिन-रात मेहनत करता रहा, लेकिन कई बार असफल हुआ। लोग कहते—“छोड़ दे।”


वह बोला—“मैं इंतज़ार नहीं कर रहा, मैं तैयार हो रहा हूँ।”


सालों बाद वही छात्र अपने गाँव का सबसे सफल डॉक्टर बना।


उसने कहा—

“फल देर से मिला, लेकिन सही समय पर मिला।”



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10 कविताएं

नीचे आपके सभी विषयों पर नए शीर्षक के साथ 24-24 पंक्तियों की यथार्थवादी कविताएँ आपकी शैली में प्रस्तुत हैं—



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1. “संघर्षों की राह और सपनों की पहचान”


संघर्षों की धूप में जब पाँव जलते हैं,

तब सपनों के बीज भीतर पलते हैं।

हर ठोकर एक नया सबक दे जाती है,

हर हार भी कुछ कहकर चली जाती है।


रास्ते आसान कभी हुआ नहीं करते,

सपने यूँ ही किसी को मिला नहीं करते।

पसीने की बूंदें जब मिट्टी में गिरती हैं,

तब ही किस्मत की लकीरें भी फिरती हैं।


लोग कहते हैं क्यों इतना लड़ते हो,

पर हम तो हर दर्द से आगे बढ़ते हो।

जो रुक जाए वह कहानी नहीं बनता,

संघर्ष बिना कोई सच्चा इंसान नहीं बनता।


कभी भूख, कभी तानों की मार मिली,

कभी उम्मीद भी अधूरी बार-बार मिली।

फिर भी दिल ने हार कब मानी है,

यही तो जीवन की असली कहानी है।


जो आग में तपता वही सोना बनता है,

हर दर्द यहाँ एक सोपान बनता है।

संघर्ष ही जीवन का सच्चा प्रमाण है,

और जीत उसी का सुंदर परिणाम है।



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2. “धीमे कदमों की अनकही यात्रा”


रुकने को मन कई बार कहता है,

पर भीतर कोई आवाज़ बहता है।

कहता है चल, चाहे राह कठिन हो,

हर कदम में तेरा ही चिन्ह हो।


धीमे चलना भी हार नहीं होती,

हर गति में भी तैयारी होती।

जो ठहर गया वो पीछे छूट गया,

जो चला वही इतिहास बन गया।


लोग तेज़ दौड़ को ही जीत समझते हैं,

पर कई धीमे भी मंज़िल छू लेते हैं।

हर श्वास में धैर्य की कहानी है,

यही जीवन की सच्ची रवानी है।


गिरकर उठना ही पहचान बनती है,

हर कोशिश ही नई जान बनती है।

जो थककर भी चलता रहता है,

वही समय को भी बदलता रहता है।


रास्ते खुद आसान हो जाते हैं,

जब कदम रुकते नहीं, बढ़ जाते हैं।

धैर्य ही असली शक्ति की निशानी है,

यही जीवन की सच्ची रवानी है।



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3. “आज का क्षण और मुस्कान का अर्थ”


आज को जो जी ले वही अमीर है,

बाकी सब तो कल की फकीर है।

हर पल में एक कहानी छुपी है,

हर साँस में एक रवानी छुपी है।


मुस्कान चेहरे की सजावट नहीं,

यह दिल की सच्ची आवाज़ सही।

जो मुस्कुरा दे वही जीत जाता है,

हर दर्द भी हल्का हो जाता है।


कल की चिंता क्यों इतनी भारी है,

आज की खुशी ही असली प्यारी है।

बीता हुआ कल लौटेगा नहीं,

आने वाला कल भी अपना नहीं।


तो क्यों न आज को अपनाया जाए,

हर पल को दिल से सजाया जाए।

जीवन तभी सुंदर बन पाता है,

जब इंसान मुस्कुराना जान पाता है।


छोटी-छोटी खुशियाँ ही जीवन हैं,

यही असली सुंदरता का चिन्ह हैं।

हर क्षण को जो अपनाता है,

वही सच में जीवन पाता है।



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4. “सुकून और संतोष की असली संपदा”


धन की दौड़ में मन खो जाता है,

सुकून कहीं दूर सो जाता है।

हर इच्छा एक नई आग जलाती है,

और शांति धीरे-धीरे चली जाती है।


संतोष ही असली खजाना है,

बाकी सब तो आना-जाना है।

जो पास है उसमें खुश रहना सीखो,

हर पल को सच में जीना सीखो।


बाहर की चमक धोखा दे सकती है,

पर भीतर की शांति साथ चलती है।

जो मन को शांत कर लेता है,

वही जीवन को पा लेता है।


ईश्वर की सबसे बड़ी देन यही है,

सुकून से भरी हुई दुनिया सही है।

जहाँ लालच का नाम नहीं होता,

वहाँ दुख का काम नहीं होता।


कम में भी जो खुश रह जाता है,

वही सच्चा सुख पा जाता है।

सुकून ही सबसे बड़ी दौलत है,

यही जीवन की असली हकीकत है।



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5. “दिलों की दौलत और रिश्तों की पहचान”


बैंक का बैलेंस बढ़ता जाता है,

पर दिल का खालीपन रह जाता है।

रिश्ते जब सच्चे बन जाते हैं,

तब जीवन में रंग आ जाते हैं।


दौलत से सब कुछ नहीं मिलता है,

सम्मान भी दिल से खिलता है।

जो दूसरों के दिल जीत लेते हैं,

वही असली जीवन जी लेते हैं।


नाम और शोहरत मिट सकते हैं,

पर भाव हमेशा रह सकते हैं।

एक अच्छा व्यवहार ही पहचान है,

यही सबसे बड़ी इंसानियत की शान है।


किसी की मदद जो कर जाता है,

वह दिलों में घर कर जाता है।

यही असली पूंजी कहलाती है,

जो हर दिल में बस जाती है।


रिश्तों की गहराई ही जीवन है,

बाकी सब तो केवल धन है।

दिलों की दौलत सबसे खास है,

यही जीवन की असली आस है।



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6. “मुस्कान, साथ और जीवन का सहारा”


तुम्हारा साथ जब पास होता है,

हर दर्द भी खास होता है।

अकेलापन दूर चला जाता है,

दिल फिर से मुस्कुरा जाता है।


मुस्कान तुम्हारी एक आदत सी है,

मेरे लिए एक राहत सी है।

जब तुम हँसते हो दुनिया हँसती है,

हर उदासी भी वहीं बिखरती है।


रिश्ते शब्दों से नहीं बनते हैं,

ये तो एहसासों से चलते हैं।

एक साथ ही ताकत बन जाता है,

जीवन को नया रास्ता दिखाता है।


कभी दूरियाँ भी पास लगती हैं,

जब यादें दिल में बसती हैं।

तुम्हारी मुस्कान मेरी दुनिया है,

यही मेरी सबसे बड़ी पूंजी है।


हर दिन एक नई उम्मीद जगती है,

जब तुम्हारी याद साथ चलती है।

साथ ही जीवन की पहचान है,

यही दिल की सच्ची शान है।



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7. “चरित्र की ऊँचाई और मौन की ताकत”


लोगों की बातें चलती रहती हैं,

पर सच्चाई खड़ी रहती है।

जो कर्म से खुद को साबित करता है,

वही समय को जीतता है।


बुराई करने से पहले सोचते हैं,

ऐसा जीवन कम ही होते हैं।

जहाँ चरित्र की ऊँचाई होती है,

वहाँ आलोचना भी छोटी होती है।


मौन भी एक जवाब बन जाता है,

जब कर्म ही सब बताता है।

शब्दों की जरूरत नहीं रहती,

सच की रोशनी ही दिखती।


समय सब कुछ बदल देता है,

झूठ खुद ही गिर जाता है।

जो ईमान पर चलता जाता है,

वही सम्मान पाता है।


असली जीवन वही होता है,

जहाँ कर्म बोलता होता है।

और लोग सोचने पर मजबूर हों,

वही सच्चा व्यक्तित्व होता है।



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8. “सुकून की खोज और मन की शांति”


दौड़ बहुत है इस दुनिया में,

पर चैन कहाँ है जिंदगानी में।

हर कोई कुछ और चाहता है,

पर मन कभी नहीं भर पाता है।


सुकून बाहर नहीं मिलता है,

यह तो भीतर ही खिलता है।

जो खुद को समझ जाता है,

वही शांति पा जाता है।


लालच की आग बुझती नहीं,

पर संतोष की रोशनी कम नहीं।

जो पास है वही बहुत है,

यही जीवन की असली हद है।


रातों की नींद जो खो गई है,

वही सबसे बड़ी दौलत है।

अगर मन शांत हो जाए,

तो जीवन स्वर्ग बन जाए।


सुकून ही असली पहचान है,

बाकी सब तो एक कहानी है।

शांति ही सबसे बड़ा धन है,

यही जीवन का असली मन है।



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9. “कर्मों के बीज और जीवन की फसल”


जैसा बोओ वैसा ही पाओ,

यही जीवन का सच्चा भाव।

कर्मों का बीज जो बोया है,

वही फल बनकर आया है।


अच्छाई का पौधा बड़ा होता है,

समय के साथ खड़ा होता है।

बुराई भी कभी न टिकती है,

वह खुद ही गिरती दिखती है।


मेहनत की जब धूप लगती है,

तब सफलता भी खिलती है।

हर कर्म की अपनी भाषा है,

यही जीवन की परिभाषा है।


समय कभी किसी का नहीं,

पर कर्म सबका साथी सही।

जो आज बोएगा वही पाएगा,

यही नियम बदल न पाएगा।


जीवन एक खेत सा होता है,

जहाँ कर्म ही सब कुछ होता है।

कर्म ही बीज है सच्चा सत्य,

और जीवन उसका सुंदर तथ्य।



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10. “समय, धैर्य और फल की प्रतीक्षा”


कर्म करो चिंता मत करो,

फल का समय खुद आने दो।

धैर्य ही सबसे बड़ा गुण है,

यही जीवन का सच्चा धुन है।


बीज तुरंत पेड़ नहीं बनता,

हर सपना जल्दी नहीं सजता।

समय की अपनी चाल होती है,

हर चीज़ में टाल होती है।


जो रुक जाता वह खो जाता है,

जो चलता वह पा जाता है।

हर प्रयास का फल मिलता है,

बस समय पर खिलता है।


लोग जल्दी में सब चाहते हैं,

पर प्रकृति धीमे चलती है।

यही उसका नियम पुराना है,

यही उसका सच्चा बहाना है।


कर्म का फल निश्चित आता है,

बस धैर्य उसे बुलाता है।

कर्म करो फल मिलेगा ही,

यही जीवन का सत्य सही।



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10 संस्मरण

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1. “संघर्षों के दिन और सफलता की पहली दस्तक”


मुझे आज भी वे दिन याद हैं जब जीवन आसान नहीं था। रास्ते छोटे थे, सपने बड़े थे, और साधन बहुत सीमित। हर दिन एक नई परीक्षा जैसा लगता था।


कई बार मन कहता था कि रुक जाऊँ, पर भीतर से कोई आवाज़ कहती थी—चलते रहो।


एक समय ऐसा भी आया जब असफलता ने दरवाज़ा लगातार खटखटाया। लोग कहते—“शायद यह तुमसे नहीं होगा।”


लेकिन वही संघर्ष मेरे भीतर की ताकत बन गया। धीरे-धीरे हालात बदले, और एक दिन वही मेहनत पहचान बन गई।


आज समझ आता है—संघर्ष ही जीवन था, और जीत उसका परिणाम।



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2. “धीमे कदमों का सफर जो रुका नहीं”


मैं हमेशा तेज़ नहीं चल पाया। कई लोग मुझसे आगे निकल जाते थे, और मैं पीछे रह जाता था। पर मैंने कभी रुकना नहीं सीखा।


हर दिन थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़ता रहा। कभी थकान होती, कभी निराशा, पर कदम चलते रहे।


लोग हँसते थे कि मैं धीमा हूँ, पर मुझे पता था कि मैं रुकने वालों में नहीं हूँ।


समय ने मुझे सिखाया कि गति से ज्यादा महत्वपूर्ण निरंतरता होती है।


आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो समझ आता है—धीमे कदम भी मंज़िल तक पहुँचते हैं, अगर वे रुकते नहीं।



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3. “एक मुस्कान जिसने दिन बदल दिया”


एक समय मैं बहुत व्यस्त और परेशान रहता था। हर दिन तनाव भारी लगता था। उसी समय एक छोटे बच्चे की मुस्कान ने मुझे रोक लिया।


वह बिना किसी कारण मुस्कुरा रहा था। न उसके पास ज्यादा कुछ था, न कोई चिंता।


उस मुस्कान ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया—हम क्यों इतने उलझे रहते हैं?


उस दिन मैंने सीखा कि आज को जीना चाहिए। मुस्कुराना एक विकल्प है, और खुशी हमारे भीतर है।


उस दिन के बाद मैंने छोटे-छोटे पलों में जीना शुरू किया।



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4. “सुकून की तलाश का एक सफर”


मैंने जीवन में बहुत कुछ पाने की कोशिश की—सफलता, पैसा, पहचान। लेकिन जितना पाता गया, उतनी बेचैनी बढ़ती गई।


एक समय ऐसा आया जब सब कुछ होते हुए भी मन खाली था।


तभी एक साधारण व्यक्ति से मुलाकात हुई, जो कम में भी संतुष्ट था। उसके चेहरे पर एक अलग ही शांति थी।


उसने कहा—“सुकून बाहर नहीं, भीतर होता है।”


उस दिन समझ आया कि असली दौलत संतोष है, और सुकून ही जीवन का सबसे बड़ा खजाना है।



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5. “दिलों की पूंजी का अनुभव”


मैंने देखा है कि बैंक का बैलेंस बढ़ने से लोग बदल जाते हैं, लेकिन दिलों में जगह बनाने वाले लोग कभी नहीं बदलते।


एक बार मुझे किसी ने बिना स्वार्थ के मदद की। उस मदद ने मुझे धन से ज्यादा भरोसा दिया।


तभी समझ आया कि असली पूंजी पैसों में नहीं, बल्कि रिश्तों में होती है।


जो लोग दूसरों के दिलों में जगह बना लेते हैं, वे कभी अकेले नहीं रहते।



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6. “एक साथ और मुस्कान की याद”


जीवन में कुछ लोग ऐसे मिलते हैं जिनकी मौजूदगी ही ताकत बन जाती है। मेरे जीवन में भी ऐसा ही एक रिश्ता रहा।


जब भी मैं टूटता, उनका साथ मुझे संभाल लेता। और उनकी मुस्कान मेरे लिए उम्मीद बन जाती।


धीरे-धीरे वह मुस्कान मेरी आदत बन गई।


आज भी याद करता हूँ तो लगता है—कुछ रिश्ते शब्दों से नहीं, एहसासों से जीए जाते हैं।



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7. “मौन में छुपा जीवन का उत्तर”


एक समय मैं हर आलोचना का जवाब देने की कोशिश करता था। लेकिन इससे केवल थकान बढ़ती थी।


फिर मैंने देखा कि कुछ लोग बिना कुछ बोले भी अपनी सच्चाई साबित कर देते हैं।


धीरे-धीरे मैंने भी मौन को अपनाया और अपने कर्मों को बोलने दिया।


समय ने दिखाया कि सच्चाई को बोलने की जरूरत नहीं होती, वह खुद सामने आ जाती है।



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8. “सुकून की असली पहचान”


मैंने एक दौर देखा जब सब कुछ था, लेकिन नींद नहीं थी। रातें लंबी लगती थीं और मन भारी रहता था।


फिर धीरे-धीरे समझ आया कि दौलत से ज्यादा जरूरी शांति है।


जब मैंने अपेक्षाएँ कम कीं और संतोष बढ़ाया, तब जीवन बदल गया।


अब समझ आता है—सुकून ही सबसे बड़ी दौलत है।



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9. “कर्मों का असली अनुभव”


मैंने जीवन में कई बार देखा कि मेहनत तुरंत फल नहीं देती। लेकिन समय कभी खाली नहीं जाता।


कुछ काम ऐसे भी थे जिनका परिणाम देर से मिला, पर जब मिला तो बहुत सही मिला।


तभी समझ आया कि हर कर्म एक बीज है, और समय उसका खेत।


जो बोया जाता है, वही लौटकर आता है।



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10. “धैर्य और फल की सीख”


मैं बहुत बार जल्दी परिणाम चाहता था। लेकिन जीवन ने हर बार मुझे धैर्य सिखाया।


कई प्रयास ऐसे रहे जिनमें देर लगी, लेकिन हार कभी नहीं मानी।


एक दिन जब परिणाम मिला, तो समझ आया कि समय हमेशा सही होता है।


आज अनुभव कहता है—कर्म करो, फल समय पर मिलेगा ही।

कर्म करो, फल समय पर मिलेगा ही (लेख)

 कर्म करो, फल समय पर मिलेगा ही


जीवन में हर व्यक्ति सफलता चाहता है, लेकिन हर सफलता के पीछे एक लंबी प्रक्रिया होती है—मेहनत, धैर्य और निरंतर कर्म। अक्सर लोग परिणाम जल्दी चाहते हैं, लेकिन प्रकृति का नियम है कि हर चीज़ अपने समय पर ही फल देती है। इसलिए कहा जाता है—कर्म करो, फल समय पर मिलेगा ही।


कर्म का महत्व


कर्म जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है। बिना कर्म के कोई भी लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता। कर्म ही वह आधार है जिस पर भविष्य की इमारत खड़ी होती है। यदि कर्म सच्चे और ईमानदार हों, तो परिणाम भी निश्चित रूप से सकारात्मक होते हैं।


समय और धैर्य की परीक्षा


हर कर्म का फल तुरंत नहीं मिलता। जैसे बीज बोने के बाद पौधा धीरे-धीरे बढ़ता है, वैसे ही हमारे प्रयासों का परिणाम भी समय लेता है। यह समय हमारी परीक्षा भी लेता है और हमें मजबूत भी बनाता है।


धैर्य रखने वाला व्यक्ति कभी खाली हाथ नहीं रहता, क्योंकि समय उसके कर्मों को सही रूप में फल देता है।


निरंतर प्रयास की शक्ति


जो व्यक्ति बीच में रुक जाता है, वह अपने परिणाम से दूर हो जाता है। लेकिन जो लगातार प्रयास करता रहता है, वही अंत में सफलता प्राप्त करता है। निरंतर कर्म ही सफलता की सबसे मजबूत कुंजी है।


मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती


सही समय पर सही परिणाम मिलता है


निरंतरता सफलता की नींव है


धैर्य कर्म को पूर्णता देता है



प्रकृति का नियम


प्रकृति हमें सिखाती है कि हर चीज़ का एक निश्चित समय होता है। सूरज भी समय पर उगता है और समय पर ढलता है। उसी तरह कर्म का फल भी सही समय पर ही मिलता है—ना जल्दी, ना देर से।


निष्कर्ष


जीवन में जल्दबाजी केवल निराशा देती है, जबकि धैर्य और कर्म सफलता की ओर ले जाते हैं। इसलिए जीवन में एक ही मंत्र अपनाना चाहिए—


कर्म करो, फल समय पर मिलेगा ही।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

कर्म ही बीज है, और जीवन उसका फल (लेख)

 कर्म ही बीज है, और जीवन उसका फल


जीवन एक विशाल वृक्ष की तरह है, जिसकी जड़ें हमारे कर्मों में छिपी होती हैं। हम जैसा बीज बोते हैं, वैसा ही फल हमें समय के साथ मिलता है। इसलिए कहा जाता है—कर्म ही बीज है, और जीवन उसका फल।


कर्म का महत्व


कर्म केवल काम करने का नाम नहीं है, बल्कि यह हमारे विचार, व्यवहार और निर्णयों का समुच्चय है। हर छोटा-बड़ा कर्म हमारे भविष्य की दिशा तय करता है।


अच्छे कर्म अच्छे परिणाम देते हैं, और गलत कर्म जीवन में कठिनाइयाँ लाते हैं। यह प्रकृति का अटल नियम है, जिसे कोई बदल नहीं सकता।


बीज और फल का सिद्धांत


जैसे किसान खेत में जो बीज बोता है, वही फसल काटता है, वैसे ही मनुष्य अपने जीवन में जैसे कर्म करता है, वैसा ही परिणाम पाता है।


मेहनत का बीज सफलता का फल देता है


ईमानदारी का बीज सम्मान का फल देता है


सेवा का बीज प्रेम और आशीर्वाद का फल देता है


आलस्य और छल का बीज दुख का फल देता है



यह सिद्धांत हमें यह सिखाता है कि भविष्य संयोग नहीं, बल्कि हमारे कर्मों का परिणाम है।


वर्तमान ही असली खेत है


हमारा वर्तमान ही वह खेत है जहाँ हम अपने भविष्य के बीज बोते हैं। यदि हम आज सही कर्म करेंगे, तो कल हमारा जीवन सुंदर और सफल होगा।


इसलिए हर क्षण को सावधानी और समझदारी से जीना चाहिए, क्योंकि हर छोटा कर्म भविष्य की कहानी लिखता है।


धैर्य और समय की भूमिका


बीज तुरंत फल नहीं देता। उसे समय, धैर्य और देखभाल की आवश्यकता होती है। उसी तरह कर्म का फल भी तुरंत नहीं मिलता, लेकिन वह निश्चित रूप से मिलता है।


जो व्यक्ति धैर्य रखता है, वह अंततः अपने अच्छे कर्मों का फल अवश्य प्राप्त करता है।


निष्कर्ष


जीवन कोई आकस्मिक घटना नहीं है, बल्कि हमारे कर्मों का प्रतिबिंब है। इसलिए यदि जीवन को सुंदर बनाना है, तो अपने कर्मों को सुंदर बनाना होगा।


याद रखें—


कर्म ही बीज है, और जीवन उसका फल।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

सुकून ही सबसे बड़ी दौलत है (लेख)

 सुकून ही सबसे बड़ी दौलत है


आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर व्यक्ति किसी न किसी चीज़ के पीछे दौड़ रहा है—धन, सफलता, पद, प्रतिष्ठा और सुविधाएँ। लेकिन इस दौड़ में अक्सर एक चीज़ पीछे छूट जाती है, और वही सबसे महत्वपूर्ण होती है—सुकून। सच तो यह है कि सुकून ही सबसे बड़ी दौलत है।


दौलत की अंधी दौड़


पैसा जीवन की जरूरत है, लेकिन जब यही जीवन का लक्ष्य बन जाए, तो बेचैनी बढ़ने लगती है। इंसान जितना पाता है, उतना ही और पाने की इच्छा करने लगता है। यह इच्छा कभी खत्म नहीं होती।


इस दौड़ में व्यक्ति बाहरी रूप से समृद्ध हो सकता है, लेकिन भीतर से अक्सर खालीपन महसूस करता है।


सुकून क्या है?


सुकून वह स्थिति है जहाँ मन शांत हो, विचार स्थिर हों और दिल संतुष्ट हो। यह किसी बैंक बैलेंस या बड़ी संपत्ति से नहीं मिलता, बल्कि यह हमारे सोचने के तरीके और जीवन जीने के दृष्टिकोण से मिलता है।


सुकून का संबंध बाहरी दुनिया से कम और आंतरिक दुनिया से अधिक होता है।


सुकून की असली कीमत


यदि किसी व्यक्ति के पास सब कुछ हो लेकिन मन अशांत हो, तो वह जीवन अधूरा है। वहीं यदि किसी के पास सीमित साधन हों लेकिन मन शांत और संतुष्ट हो, तो वह वास्तव में अमीर है।


सुकून तनाव को कम करता है


सुकून जीवन को सरल बनाता है


सुकून रिश्तों को मजबूत करता है


सुकून खुशियों को स्थायी बनाता है



संतोष और सुकून का रिश्ता


संतोष सुकून की नींव है। जब व्यक्ति अपने पास मौजूद चीज़ों से संतुष्ट रहता है, तो मन में शांति स्वतः आ जाती है। यह शांति ही जीवन को सुंदर बनाती है।


जो लोग हमेशा अधिक पाने की इच्छा में रहते हैं, वे अक्सर सुकून से दूर हो जाते हैं।


आधुनिक जीवन और मानसिक शांति


आज की दुनिया में तकनीक, प्रतिस्पर्धा और अपेक्षाएँ बढ़ गई हैं। हर कोई दूसरों से आगे निकलना चाहता है। लेकिन इस दौड़ में मानसिक शांति सबसे अधिक प्रभावित होती है।


ऐसे समय में सुकून को बनाए रखना एक कला है—अपने मन को नियंत्रित करने की कला।


निष्कर्ष


धन, सफलता और सुविधाएँ महत्वपूर्ण हो सकती हैं, लेकिन वे स्थायी सुख नहीं देतीं। जीवन की असली समृद्धि वही है जहाँ मन शांत हो और दिल संतुष्ट हो।


इसलिए याद रखें—


सुकून ही सबसे बड़ी दौलत है।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

सच्चा जीवन वही है जिसमें लोग आपकी बुराई करने से पहले सोचें (लेख)

 सच्चा जीवन वही है जिसमें लोग आपकी बुराई करने से पहले सोचें


जीवन में हर व्यक्ति चाहता है कि उसका सम्मान हो, उसकी छवि साफ हो और लोग उसके बारे में अच्छा सोचें। लेकिन वास्तविकता यह है कि समाज में हर व्यक्ति की सोच, नजरिया और समझ एक जैसी नहीं होती। फिर भी एक बात सत्य है—सच्चा जीवन वही है जिसमें लोग आपकी बुराई करने से पहले सोचें।


व्यक्ति की पहचान उसके कर्मों से होती है


इंसान की असली पहचान उसके शब्दों से नहीं, उसके कर्मों से होती है। यदि किसी व्यक्ति के कार्य, व्यवहार और चरित्र में सच्चाई होती है, तो लोग उसके बारे में बोलने से पहले कई बार सोचते हैं।


ऐसा व्यक्ति समाज में धीरे-धीरे एक सम्मानजनक स्थान बना लेता है, जहाँ उसकी छवि को आसानी से तोड़ा नहीं जा सकता।


बुराई और समाज की प्रवृत्ति


समाज में यह स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि लोग दूसरों के बारे में जल्दी राय बना लेते हैं। लेकिन जब किसी व्यक्ति का आचरण मजबूत और साफ होता है, तो वही समाज उसकी आलोचना करने से पहले रुक जाता है।


यह रुकना ही उस व्यक्ति की सबसे बड़ी उपलब्धि है—क्योंकि यह उसके चरित्र की ताकत को दर्शाता है।


चरित्र की मजबूती ही सुरक्षा कवच है


धन, पद और शक्ति अस्थायी हो सकते हैं, लेकिन चरित्र स्थायी होता है। एक मजबूत चरित्र व्यक्ति को ऐसी ढाल देता है कि अनावश्यक आलोचना भी उसके सामने कमजोर पड़ जाती है।


सच्चाई व्यक्ति को स्थिर बनाती है


ईमानदारी सम्मान दिलाती है


व्यवहार की शुद्धता विश्वास बनाती है


संयम व्यक्ति को ऊँचाई देता है



जब ये गुण किसी में होते हैं, तो लोग उसके खिलाफ बोलने से पहले सोचने लगते हैं।


मौन सम्मान का संकेत है


कभी-कभी लोगों का चुप रहना भी एक प्रकार का सम्मान होता है। जब कोई व्यक्ति गलत के बजाय सही के मार्ग पर चलता है, तो समाज उसकी बुराई करने से पहले रुक जाता है।


यह मौन उसकी छवि की मजबूती को दर्शाता है।


सच्चा जीवन क्या है?


सच्चा जीवन केवल सफलता या प्रसिद्धि नहीं है। सच्चा जीवन वह है जहाँ व्यक्ति अपने कर्मों से इतना मजबूत हो जाए कि उसे गलत साबित करना आसान न हो।


जहाँ शब्दों से अधिक उसके काम बोलते हों, और जहाँ उसकी उपस्थिति ही उसकी पहचान बन जाए।


निष्कर्ष


यदि व्यक्ति अपने जीवन को ईमानदारी, सच्चाई और अच्छे व्यवहार से सजाता है, तो समाज स्वतः ही उसके बारे में सोच-समझकर राय बनाता है।


इसलिए कहा जा सकता है—


सच्चा जीवन वही है जिसमें लोग आपकी बुराई करने से पहले सोचें।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

असली पूंजी बैंक में नहीं, दिलों में होती है (लेख)

 असली पूंजी बैंक में नहीं, दिलों में होती है


आज के समय में जब हर कोई धन, संपत्ति और बैंक बैलेंस के पीछे भाग रहा है, तब यह समझना बहुत जरूरी हो जाता है कि असली समृद्धि क्या है। क्या केवल पैसा ही जीवन की सफलता का पैमाना है? या फिर कुछ ऐसा भी है जो उससे कहीं अधिक मूल्यवान है? सच यह है कि असली पूंजी बैंक में नहीं, दिलों में होती है।


धन और संपत्ति की सीमाएँ


पैसा जीवन जीने का साधन है, लेकिन जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं। धन से सुविधाएँ खरीदी जा सकती हैं, लेकिन उससे अपनापन, प्रेम और सम्मान नहीं खरीदा जा सकता।


बैंक का बैलेंस बढ़ सकता है, पर यदि रिश्ते कमजोर हो जाएँ, तो व्यक्ति भीतर से खाली महसूस करता है। क्योंकि पैसा सुरक्षा देता है, लेकिन सच्ची शांति नहीं।


दिलों में बसने वाली पूंजी


जब कोई व्यक्ति दूसरों के दिलों में जगह बना लेता है, तो वह वास्तव में सबसे अमीर बन जाता है। यह संपत्ति न तो चोरी हो सकती है और न ही खत्म।


सच्चा प्रेम सबसे बड़ी पूंजी है


सम्मान और विश्वास अमूल्य संपत्ति हैं


रिश्तों की गर्माहट जीवन की असली दौलत है


किसी के चेहरे पर लाई गई मुस्कान अनमोल निवेश है



जो लोग दूसरों के दिल जीत लेते हैं, वे जीवन में कभी गरीब नहीं होते।


रिश्ते और इंसानियत


आज की भागदौड़ में इंसान मशीन बनता जा रहा है। लोग एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में हैं, लेकिन कहीं न कहीं इंसानियत पीछे छूटती जा रही है।


वास्तविक सफलता वही है जहाँ इंसान अपने साथ-साथ दूसरों के दिल भी जीत सके। क्योंकि अंत में याद वही रहता है जो हमने लोगों के लिए किया, न कि हमने कितना कमाया।


असली विरासत क्या है?


हम अपने पीछे क्या छोड़कर जाते हैं—यह बहुत महत्वपूर्ण है। धन और संपत्ति तो समय के साथ खत्म हो सकती हैं, लेकिन हमारे कर्म, हमारे व्यवहार और हमारे रिश्ते हमेशा याद रहते हैं।


एक अच्छा व्यवहार, एक मददगार स्वभाव और एक सच्चा दिल—यही असली विरासत है।


निष्कर्ष


अगर जीवन में सच में समृद्ध बनना है, तो केवल बैंक बैलेंस बढ़ाने पर नहीं, बल्कि दिलों को जीतने पर ध्यान देना होगा। क्योंकि पैसा आज है, कल नहीं भी हो सकता, लेकिन दिलों में बनाई गई जगह हमेशा रहती है।


इसलिए याद रखें—


असली पूंजी बैंक में नहीं, दिलों में होती है।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

ईश्वर आपको सुख नहीं, बल्कि सुकून और संतोष से भरपूर जीवन दे (लेख)

 ईश्वर आपको सुख नहीं, बल्कि सुकून और संतोष से भरपूर जीवन दे


जीवन में हर इंसान की एक ही चाह होती है—सुख। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता है, समझ आने लगता है कि केवल सुख ही सब कुछ नहीं है। सुख क्षणिक होता है, जबकि सुकून और संतोष जीवन को स्थायी रूप से सुंदर बनाते हैं। इसी कारण कहा जा सकता है कि वास्तविक प्रार्थना यही है—ईश्वर आपको सुख नहीं, बल्कि सुकून और संतोष से भरपूर जीवन दे।


सुख और सुकून में अंतर


सुख अक्सर बाहरी चीज़ों से जुड़ा होता है—धन, सुविधा, सफलता और भौतिक उपलब्धियाँ। लेकिन यह सुख हर समय स्थायी नहीं रहता। एक इच्छा पूरी होती है, तो दूसरी शुरू हो जाती है।


वहीं दूसरी ओर, सुकून भीतर से आता है। यह मन की शांति है, जो परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती। संतोष वह स्थिति है जहाँ इंसान के पास जो है, उसमें वह प्रसन्न रहता है।


सुकून ही असली संपत्ति है


एक व्यक्ति जिसके पास बहुत धन है लेकिन मन अशांत है, वह वास्तव में गरीब है। वहीं एक व्यक्ति जिसके पास सीमित साधन हैं, लेकिन मन शांत और संतुष्ट है, वह सबसे अमीर है।


सुकून वह खजाना है जिसे कोई चुरा नहीं सकता, और जो समय के साथ खत्म नहीं होता।


सुकून मन को हल्का करता है


सुकून तनाव को दूर करता है


सुकून जीवन को सरल बनाता है


सुकून हर परिस्थिति में संतुलन देता है



संतोष का महत्व


संतोष का अर्थ यह नहीं कि इंसान आगे बढ़ना छोड़ दे, बल्कि इसका अर्थ है जो मिला है, उसके लिए आभार महसूस करना। संतोष हमें लालच से बचाता है और हमें मानसिक शांति प्रदान करता है।


जिस दिन इंसान "जो है, वही पर्याप्त है" समझ लेता है, उसी दिन से उसके जीवन में वास्तविक सुख की शुरुआत होती है।


ईश्वर से सही प्रार्थना


हम अक्सर ईश्वर से अधिक धन, अधिक सफलता और अधिक सुविधाएँ मांगते हैं। लेकिन शायद सबसे सुंदर प्रार्थना यह हो सकती है कि—


"हे ईश्वर, मुझे इतना दे कि मेरा मन शांत रहे, और मैं जो भी करूँ उसमें संतुष्ट रहूँ।"


क्योंकि यदि मन शांत है, तो थोड़े में भी जीवन सुंदर लगता है।


निष्कर्ष


सुख अस्थायी है, लेकिन सुकून और संतोष स्थायी हैं। वास्तविक समृद्धि वही है जहाँ मन शांत हो और जीवन सरल हो।


इसलिए सबसे बड़ी कामना यही होनी चाहिए—


ईश्वर आपको सुख नहीं, बल्कि सुकून और संतोष से भरपूर जीवन दे।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

आज जिएं, मुस्कुराएँ और हर पल का आनंद लें (लेख)

 आज जिएं, मुस्कुराएँ और हर पल का आनंद लें


जीवन केवल भविष्य की योजनाओं या अतीत की यादों का नाम नहीं है। यह एक ऐसा सुंदर क्षण है जो अभी हमारे सामने है। अक्सर हम या तो बीते हुए कल में उलझे रहते हैं या आने वाले कल की चिंता में खो जाते हैं, और इस बीच आज का कीमती समय हाथ से निकल जाता है।


इसलिए जीवन का सबसे सरल और सबसे गहरा संदेश यही है—आज जिएं, मुस्कुराएँ और हर पल का आनंद लें।


वर्तमान का महत्व


वर्तमान ही वह सच है जहाँ हम जी रहे होते हैं। कल बीत चुका है और आने वाला कल अभी आया नहीं है। जो पल हमारे पास है, वही वास्तविक जीवन है।


यदि हम आज को पूरी तरह जीना सीख लें, तो जीवन अपने आप सुंदर लगने लगता है। छोटे-छोटे क्षण भी बड़ी खुशी देने लगते हैं—जैसे सुबह की ताज़ी हवा, किसी अपने की मुस्कान या एक कप चाय की सादगी।


मुस्कान की शक्ति


मुस्कुराना केवल चेहरे की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि यह मन की स्थिति है। एक सच्ची मुस्कान कठिन से कठिन दिन को भी हल्का बना सकती है।


मुस्कान तनाव को कम करती है


मुस्कान रिश्तों को मजबूत बनाती है


मुस्कान आत्मविश्वास बढ़ाती है


मुस्कान जीवन में सकारात्मकता लाती है



जब हम मुस्कुराते हैं, तो हम न केवल खुद को बल्कि दूसरों को भी ऊर्जा देते हैं।


हर पल का आनंद लेना सीखें


हर दिन हमेशा वैसा नहीं होता जैसा हम चाहते हैं। लेकिन हर दिन में कुछ न कुछ ऐसा जरूर होता है जिसे हम खुशी से जी सकते हैं।


छोटी-छोटी बातों में आनंद ढूँढना ही जीवन की कला है। बारिश की बूँदें, बच्चों की हँसी, पेड़ों की छाया—ये सब हमें सिखाते हैं कि खुशी बाहर नहीं, हमारे अंदर है।


चिंता छोड़कर जीना


अक्सर हम उन चीज़ों की चिंता करते हैं जो अभी हुई ही नहीं हैं। यह चिंता हमारे वर्तमान को खराब कर देती है। यदि हम सीख लें कि जो आज है, उसे पूरी तरह जीना है, तो जीवन हल्का और सुंदर हो जाएगा।


चिंता भविष्य को नहीं बदलती, लेकिन वर्तमान को जरूर बिगाड़ देती है।


निष्कर्ष


जीवन बहुत छोटा है, इसलिए इसे भारी सोच और तनाव में खोने की बजाय सरलता और मुस्कान के साथ जीना चाहिए। हर दिन एक नया अवसर है खुशी पाने का।


इसलिए याद रखें—


आज जिएं, मुस्कुराएँ और हर पल का आनंद लें।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

रुकना नहीं है, बस धैर्य के साथ चलते रहना है (लेख)

 रुकना नहीं है, बस धैर्य के साथ चलते रहना है


जीवन एक निरंतर चलने वाली यात्रा है, जहाँ रुकना केवल शरीर को थकाता नहीं, बल्कि मन की दिशा भी बदल देता है। हर इंसान के जीवन में ऐसे पल आते हैं जब रास्ते धुंधले लगते हैं, कदम भारी हो जाते हैं और मंज़िल दूर दिखाई देती है। ऐसे समय में सबसे बड़ी आवश्यकता होती है—धैर्य और निरंतरता।


रुक जाना समाधान नहीं है


जब परिस्थितियाँ विपरीत हों, तो मन कहता है—अब रुक जाओ, अब आगे बढ़ना संभव नहीं। लेकिन सच यह है कि रुकना समस्या का हल नहीं, बल्कि कई बार नए अवसरों का द्वार बंद कर देता है।


जो व्यक्ति रुक जाता है, वह समय के साथ पीछे छूट जाता है। लेकिन जो व्यक्ति धीमे ही सही, लगातार चलता रहता है, वही अंत में अपनी मंज़िल तक पहुँचता है।


धैर्य की शक्ति


धैर्य केवल इंतज़ार करना नहीं है, बल्कि विश्वास के साथ आगे बढ़ते रहना है। धैर्य वह शक्ति है जो टूटते हुए इंसान को भी जोड़ देती है।


धैर्य हमें भावनात्मक संतुलन देता है


धैर्य हमें गलत निर्णय लेने से बचाता है


धैर्य हमें समय की परीक्षा पास करना सिखाता है


धैर्य हमें उम्मीद से जोड़े रखता है



जीवन में कई बार परिणाम तुरंत नहीं मिलते, लेकिन धैर्य रखने वाला व्यक्ति अंततः सफलता को आकर्षित करता है।


धीरे-धीरे चलना भी प्रगति है


बहुत लोग सोचते हैं कि सफलता केवल तेज़ दौड़ने वालों को मिलती है। लेकिन सच्चाई यह है कि स्थिर और निरंतर चलने वाला व्यक्ति भी अपनी मंज़िल तक पहुँचता है।


महत्वपूर्ण यह नहीं कि आप कितनी तेज़ी से चलते हैं, बल्कि यह है कि आप रुकते हैं या नहीं। एक धीमा लेकिन लगातार चलने वाला कदम भी समय के साथ बड़ी दूरी तय कर लेता है।


कठिन समय का महत्व


कठिन समय हमें रोकने के लिए नहीं आता, बल्कि हमें तैयार करने आता है। यह समय हमारे भीतर छिपी शक्ति को जगाता है और हमें मजबूत बनाता है।


जो व्यक्ति कठिन समय में भी अपने कदम नहीं रोकता, वही भविष्य में मजबूत बनकर उभरता है।


निष्कर्ष


जीवन में सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं है। यह धैर्य, मेहनत और निरंतर प्रयास का परिणाम है। इसलिए चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों, एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए—


रुकना नहीं है, बस धैर्य के साथ चलते रहना है।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

संघर्ष ही जीवन है, और जीत उसका परिणाम (लेख)

 संघर्ष ही जीवन है, और जीत उसका परिणाम

जीवन कोई सीधी और सरल राह नहीं है। यह एक ऐसा सफर है जिसमें हर मोड़ पर चुनौतियाँ, रुकावटें और कठिनाइयाँ खड़ी रहती हैं। कोई भी व्यक्ति बिना संघर्ष के न तो सफल हुआ है और न ही अपनी पहचान बना पाया है। सच तो यह है कि संघर्ष ही जीवन है, और जीत उसका परिणाम।

संघर्ष का वास्तविक अर्थ

संघर्ष केवल कठिन परिस्थितियों से लड़ना नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर की कमजोरियों, डर और असफलताओं से भी जूझना है। जब इंसान गिरता है, ठोकर खाता है और फिर भी आगे बढ़ने का निर्णय लेता है—वहीं से संघर्ष की शुरुआत होती है।

संघर्ष हमें तोड़ने नहीं आता, बल्कि हमें मजबूत बनाने आता है। जैसे लोहे को आग में तपाकर मजबूत बनाया जाता है, वैसे ही इंसान भी कठिनाइयों में तपकर निखरता है।

जीवन में संघर्ष की भूमिका

अगर जीवन में संघर्ष न हो तो सफलता का कोई मूल्य नहीं रहेगा। बिना मेहनत के मिली चीज़ें अक्सर स्थायी नहीं होतीं। संघर्ष हमें धैर्य, समझ और अनुभव देता है।

संघर्ष हमें आत्मनिर्भर बनाता है

संघर्ष हमें निर्णय लेना सिखाता है

संघर्ष हमें भावनात्मक रूप से मजबूत बनाता है

संघर्ष हमें जीवन का असली अर्थ समझाता है

असफलता और संघर्ष का रिश्ता

असफलता संघर्ष का ही एक हिस्सा है, अंत नहीं। हर असफल व्यक्ति के भीतर सफलता की एक कहानी छिपी होती है। फर्क सिर्फ इतना है कि कुछ लोग असफलता पर रुक जाते हैं, और कुछ उसे सीढ़ी बनाकर आगे बढ़ जाते हैं।

यही वह क्षण होता है जब इंसान तय करता है कि वह हार मानेगा या इतिहास बनाएगा।

जीत का वास्तविक अर्थ

जीत केवल पुरस्कार, धन या प्रसिद्धि नहीं है। असली जीत वह है जब इंसान अपने डर पर विजय पा ले, अपनी सीमाओं को तोड़ दे और हालातों के बावजूद आगे बढ़ता रहे।

जो व्यक्ति संघर्ष को स्वीकार कर लेता है, जीत उसके कदम चूमती है।

निष्कर्ष

संघर्ष जीवन का अभिशाप नहीं, बल्कि उसका सबसे बड़ा वरदान है। यह हमें तैयार करता है, निखारता है और सफलता के योग्य बनाता है। इसलिए जीवन में जब भी कठिन समय आए, उसे बोझ नहीं बल्कि अवसर समझना चाहिए।

क्योंकि सच यही है—

संघर्ष ही जीवन है, और जीत उसका परिणाम।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

संघर्ष ही जीवन है, और जीत उसका परिणाम

👉 “संघर्षों की आग में तपता जीवन, जीत की ओर बढ़ता हर कदम”

रुकना नहीं है, बस धैर्य के साथ चलते रहना है

👉 “धीमे कदमों की भी अपनी एक मंज़िल होती है”

आज जिएं, मुस्कुराएँ और हर पल का आनंद लें

👉 “हर पल में छुपी है खुशियों की एक नई कहानी”

ईश्वर आपको सुख नहीं, बल्कि सुकून और संतोष से भरपूर जीवन दे

👉 “सुकून की दौलत ही सबसे बड़ी ईश्वरीय कृपा है”

असली पूंजी बैंक में नहीं, दिलों में होती है

👉 “दिलों में बसने वाली दौलत, दुनिया की सबसे बड़ी संपत्ति”

तुम्हारा साथ मेरे जीवन की सबसे बड़ी ताकत है, और तुम्हारी मुस्कान मेरी सबसे प्यारी आदत

👉 “साथ और मुस्कान में बसी मेरी पूरी दुनिया”

सच्चा जीवन वही है जिसमें लोग आपकी बुराई करने से पहले सोचें

👉 “चरित्र की वह ऊँचाई जहाँ आलोचना भी रुक जाए”

सुकून ही सबसे बड़ी दौलत है

👉 “शांति की संपत्ति से बढ़कर कोई धन नहीं”

कर्म ही बीज है, और जीवन उसका फल

👉 “कर्मों के बीज से उगता जीवन का सत्य”

कर्म करो, फल समय पर मिलेगा ही

👉 “धैर्य और कर्म का अटल नियम, सफलता का निश्चित मार्ग”


खोया हुआ नंबर (व्यंग्य)

 "खोया हुआ नंबर"

(एक व्यंग्य)

आजकल रिश्तों की सबसे बड़ी पहचान यह नहीं कि कौन आपका अपना है, बल्कि यह है कि आपका नंबर किसने सेव रखा है।

जब तक आप सफल हैं, आपके फोन की घंटी किसी मंदिर की आरती की तरह बजती रहती है। सुबह "सुप्रभात" से लेकर रात "शुभ रात्रि" तक संदेशों की बरसात होती है। लोग आपकी पोस्ट पर दिल, फूल और वाह-वाह की फसल उगाते रहते हैं। ऐसा लगता है जैसे आपके बिना उनकी दुनिया का इंटरनेट ही बंद हो जाएगा।

लेकिन जैसे ही जीवन की सड़क पर कोई गड्ढा आता है, आर्थिक, सामाजिक या मानसिक कठिनाई का एक बादल सिर पर मंडराता है, तब रिश्तों का असली नेटवर्क दिखाई देने लगता है। अचानक वही लोग, जो हर घंटे हाल-चाल पूछते थे, "आउट ऑफ कवरेज एरिया" हो जाते हैं।

कभी-कभी तो लगता है कि कुछ लोगों के मोबाइल में एक विशेष सुविधा होती है—"दुखी मित्र पहचानो और नंबर छिपाओ।"

यदि आप खुश हैं, तो लोग आपकी खुशी में शामिल होकर अपनी तस्वीरें चमकाते हैं। लेकिन यदि आप संघर्ष में हैं, तो उन्हें आपका नंबर तक दिखाई नहीं देता। मानो मोबाइल ने स्वयं घोषणा कर दी हो— "यह नंबर फिलहाल आपकी सुविधा के लिए बंद कर दिया गया है।"

समाज का एक बड़ा वर्ग रिश्तों को भी बैंक खाते की तरह चलाता है। जहां लाभ दिखा, वहां निवेश कर दिया। जहां कठिनाई दिखी, वहां खाता निष्क्रिय कर दिया। दुख में साथ देने की जगह लोग दूरी बना लेते हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है कि कहीं सहानुभूति देने का भी कोई टैक्स न लग जाए।

विडंबना यह है कि जो लोग आपकी सफलता की पार्टी में सबसे आगे खड़े मिलते हैं, वही आपके संघर्ष के दिनों में गली बदलकर निकल जाते हैं। और फिर समय का पहिया घूमता है। परिस्थितियां बदलती हैं। तब वही लोग मुस्कुराते हुए कहते हैं— "अरे! आपका नंबर तो कहीं खो गया था।"

सच तो यह है कि नंबर नहीं खोता, नीयत खो जाती है। संपर्क सूची नहीं मिटती, संवेदनाएं मिट जाती हैं। मोबाइल की मेमोरी नहीं भरती, मन की जगह छोटी हो जाती है।

इसलिए जीवन का सबसे बड़ा सबक यही है कि जो लोग आपके कठिन समय में आपका नंबर नहीं भूलते, वही वास्तव में आपके अपने हैं। बाकी लोग तो बस नेटवर्क की तरह हैं—सिग्नल अच्छा हो तो साथ, मौसम खराब हो तो गायब।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

धोखा (लेख, व्यंग्य, कविता)

 धोखे की राख से उठता हुआ मनुष्य (लेख)

जीवन की सबसे कठिन परीक्षाएँ वे नहीं होतीं जो परिस्थितियाँ लेती हैं, बल्कि वे होती हैं जो अपने लोग लेते हैं। संसार का कोई भी आघात उतना गहरा नहीं होता जितना अपनों द्वारा दिया गया धोखा। परंतु इतिहास गवाह है कि जो व्यक्ति अपनों के छल, विश्वासघात और उपेक्षा के बाद भी टूटकर बिखरने के बजाय स्वयं को समेटकर खड़ा हो जाता है, उसे फिर कोई पराजित नहीं कर सकता।


मनुष्य जब अपनों पर विश्वास करता है तो वह केवल संबंधों पर भरोसा नहीं करता, बल्कि अपने सपनों, भावनाओं और भविष्य को भी उनके हाथों में सौंप देता है। इसलिए जब वही लोग विश्वास तोड़ते हैं तो केवल रिश्ते नहीं टूटते, भीतर का संसार भी दरक जाता है। कई बार वर्षों की मेहनत, संचित पूँजी, सामाजिक सम्मान और मानसिक शांति एक ही झटके में बिखर जाती है। उस समय व्यक्ति को ऐसा लगता है मानो उसके पैरों के नीचे की धरती खिसक गई हो।


लेकिन यहीं से एक नए मनुष्य का जन्म भी होता है।


धोखा खाने के बाद जो व्यक्ति मैदान छोड़ देता है, वह परिस्थितियों का शिकार बन जाता है। किंतु जो व्यक्ति अपने घावों को छिपाकर नहीं, बल्कि उन्हें अपनी शक्ति बनाकर आगे बढ़ता है, वह जीवन का सबसे बड़ा योद्धा बन जाता है। उसे फिर किसी प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं रहती। वह जान चुका होता है कि कौन अपना है और कौन केवल अवसर का साथी।


सच तो यह है कि संघर्ष मनुष्य को उतना मजबूत नहीं बनाता, जितना विश्वासघात बनाता है। संघर्ष में व्यक्ति को उम्मीद होती है कि कोई साथ देगा, लेकिन धोखे के बाद वह अकेले चलना सीख जाता है। अकेले चलना सीख लेने वाला व्यक्ति कभी पराजित नहीं होता, क्योंकि उसकी ताकत किसी और के सहारे पर आधारित नहीं रहती।


आज समाज में अनेक लोग ऐसे मिल जाएंगे जो अपनों की चालाकियों का शिकार हुए, आर्थिक रूप से टूटे, सामाजिक रूप से अपमानित हुए, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वे धीरे-धीरे उठे, स्वयं को संभाला और फिर एक नई पहचान बनाई। ऐसे लोग जब सफलता प्राप्त करते हैं तो उनकी सफलता केवल उपलब्धि नहीं होती, बल्कि उनके आत्मविश्वास की विजय होती है।


यथार्थ यह भी है कि धोखा देने वाले अक्सर यह मान लेते हैं कि उन्होंने किसी को हमेशा के लिए खत्म कर दिया। उन्हें लगता है कि सामने वाला अब कभी संभल नहीं पाएगा। लेकिन वे भूल जाते हैं कि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संपत्ति नहीं, उसका साहस है। संपत्ति छीनी जा सकती है, अवसर रोके जा सकते हैं, परंतु साहस और अनुभव को कोई नहीं छीन सकता।


जिस व्यक्ति ने अपनों के धोखे का विष पी लिया हो, वह जीवन की कड़वी सच्चाइयों से परिचित हो जाता है। अब उसे झूठे वादे प्रभावित नहीं करते, खोखली प्रशंसा भ्रमित नहीं करती और असफलताएँ भयभीत नहीं करतीं। वह जान जाता है कि जीवन में गिरना अंत नहीं, बल्कि स्वयं को पहचानने की शुरुआत है।


ऐसे लोग बाहर से भले शांत दिखाई दें, पर भीतर वे पर्वत की तरह दृढ़ हो चुके होते हैं। वे जानते हैं कि रिश्तों का मूल्य क्या है और विश्वास की कीमत क्या होती है। इसलिए वे दोबारा किसी से नफरत नहीं करते, बल्कि अपने अनुभवों को जीवन का शिक्षक बना लेते हैं।


अंततः जीत उसी की होती है जो टूटने के बाद भी खड़ा रहता है। जिसने अपनों के धोखे, अपमान, उपेक्षा और हानि को सहकर भी अपने कदम आगे बढ़ाए हैं, उसे हराना असंभव नहीं तो अत्यंत कठिन अवश्य है। क्योंकि वह अब परिस्थितियों से नहीं, स्वयं से लड़ना सीख चुका है। और जो स्वयं पर विजय पा लेता है, उसके सामने संसार की कोई भी हार टिक नहीं सकती।

धोखे की आग में तपकर निकला हुआ मनुष्य सोना नहीं, कुंदन बन जाता है।


धोखा उद्योग के सफल ग्राहक (व्यंग्य) 

आज के समय में यदि कोई व्यक्ति अपनों के धोखे खाकर, अपनी जमा-पूँजी गंवाकर, भावनात्मक दिवालियापन झेलकर और सामाजिक तमाशा बन जाने के बाद भी मुस्कुरा रहा है, तो समझ लीजिए कि वह जीवन विश्वविद्यालय का गोल्ड मेडलिस्ट है।


हमारे समाज में एक अद्भुत उद्योग फल-फूल रहा है—"धोखा उद्योग"। इसमें न कोई लाइसेंस चाहिए, न कोई डिग्री। बस चेहरे पर अपनापन, शब्दों में मिठास और मन में स्वार्थ होना चाहिए। फिर देखिए, कैसे रिश्तों की दुकान चल पड़ती है।


पहले लोग घर बनाते थे, अब लोग भरोसे के पुल बनाते हैं और फिर स्वयं ही उन्हें तोड़कर नदी में बहा देते हैं। रिश्तों की दुनिया में आजकल एक नया नियम चल रहा है—जब तक सामने वाले से लाभ मिलता रहे, वह अपना है; जिस दिन लाभ बंद, उसी दिन संबंध भी समाप्त।


सबसे मजेदार बात यह है कि धोखा देने वाले कभी स्वयं को दोषी नहीं मानते। वे बड़े गर्व से कहते हैं, "अरे! हमने तो कुछ किया ही नहीं।" जैसे किसी का सब कुछ लूट लेना कोई सामाजिक सेवा हो। उल्टा पीड़ित व्यक्ति को ही समझाया जाता है कि उसे इतना भरोसा ही नहीं करना चाहिए था। यानी चोर चोरी करे और सलाह भी दे कि ताला मजबूत रखना चाहिए था!


समाज का एक वर्ग ऐसा भी है जो हर धोखा खाए व्यक्ति को देखकर ज्ञान बाँटने पहुँच जाता है। ये लोग घटना के बाद इतने बुद्धिमान हो जाते हैं कि लगता है मानो इन्हें पहले से सब पता था। पर जब धोखा दिया जा रहा होता है, तब ये महापुरुष गहरी निद्रा में होते हैं।


धोखा देने वालों की सबसे बड़ी उपलब्धि यह होती है कि वे सामने वाले को कमजोर समझ लेते हैं। उन्हें लगता है कि अब यह व्यक्ति उठ नहीं पाएगा। लेकिन यहीं उनकी गणित गड़बड़ा जाती है। वे भूल जाते हैं कि जो व्यक्ति अपने ही लोगों की चोट सह गया, उसे दुनिया की ठोकरें ज्यादा नुकसान नहीं पहुँचा सकतीं।


असल में धोखा खाने वाला व्यक्ति एक विशेष प्रशिक्षण से गुजरता है। उसकी आँखों से भ्रम का चश्मा उतर जाता है। वह पहचानने लगता है कि कौन रिश्ते निभा रहा है और कौन अवसर तलाश रहा है। उसके पास अब अनुभव की ऐसी डिग्री होती है जो किसी विश्वविद्यालय में नहीं मिलती।


विडंबना देखिए, समाज सफलता मिलने पर ताली बजाता है, लेकिन यह नहीं देखता कि उस सफलता के पीछे कितने विश्वासघात, कितनी रातों की बेचैनी और कितनी टूटी हुई उम्मीदें दबी पड़ी हैं।


इसलिए यदि आपको कोई ऐसा व्यक्ति मिल जाए जो अपनों के धोखे के बाद भी जीवन के मैदान में डटा हुआ है, तो उसे कमजोर मत समझिए। वह इस युग के सबसे अनुभवी खिलाड़ियों में से एक है। उसने रिश्तों की राजनीति, स्वार्थ की अर्थव्यवस्था और विश्वासघात के बाजार का पूरा पाठ्यक्रम पढ़ लिया है।


और सच कहें तो आज के दौर में वही सबसे मजबूत है, जो धोखा उद्योग का सफल ग्राहक बनकर भी दिवालिया नहीं हुआ, बल्कि अनुभवों का करोड़पति बन गया।


अपने ही जब आईना तोड़ गए (कविता) 

अपने ही जब आईना तोड़ गए,

सपनों के सारे रंग छोड़ गए।

जिन हाथों को थामा था उम्र भर,

वे हाथ बीच राह में मोड़ गए।


जिनके लिए दीपक बन जलते रहे,

अंधेरों से हर पल लड़ते रहे,

वही लोग हवाओं के संग मिलकर,

घर के चिरागों को फोड़ गए।


चेहरों पर अपनापन लिखा हुआ था,

बातों में मीठा-सा नशा हुआ था,

विश्वास की सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते,

हम जाने कितनी बार तोड़ गए।


रिश्तों की मंडी में देखा हमने,

सिक्कों से बिकते चेहरों को,

कल तक जो अपना कहते थे,

वे अवसर पर रिश्ते छोड़ गए।


जब जेब भरी थी, साथ खड़े थे,

हर महफ़िल में हाथ बड़े थे,

समय ने करवट क्या बदली,

सब अपने रास्ते मोड़ गए।


आँखों में जिनको बसा रखा था,

दिल का राजा बना रखा था,

वही लोग ताज पहनकर भी,

विश्वास का सिंहासन तोड़ गए।


पर हार नहीं मानी हमने फिर भी,

आँसू को मोती बनाया है,

जिन पत्थरों ने घाव दिए थे,

उनसे ही पथ सजाया है।


अब कोई छलावा डराता नहीं,

झूठा अपनापन भाता नहीं,

सच की धूप में चलना सीखा,

मन अब किसी से घबराता नहीं।


अपनों के धोखे ने यह सिखलाया,

हर चेहरा अपना नहीं होता,

रिश्तों के जंगल में हर पेड़,

बरगद जैसा साया नहीं होता।


जो टूटकर भी खड़ा हुआ है,

वह पर्वत से भी बड़ा हुआ है,

अपनों की चोटें सहकर जो जिया,

वह जीवन का सच्चा योद्धा हुआ है।


आज भी मुस्कुराकर चलता है,

अपना दर्द स्वयं ही ढोता है,

जिसने अपनों का सच देख लिया,

उसे अब कोई नहीं खोता है।


धोखे की आग में तपकर निकला,

वह सोना नहीं, कुंदन बनता है,

अपनों से हारकर भी जो जीता,

वही इतिहास में जिंदा रहता है।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

“भीड़ में अकेलेपन का राष्ट्रीय उत्सव”

 “भीड़ में अकेलेपन का राष्ट्रीय उत्सव”


आजकल तन्हाई कोई व्यक्तिगत भावना नहीं रही,

यह तो आधुनिक समाज का राष्ट्रीय उत्सव बन चुकी है।

हर आदमी अकेला है,

लेकिन सोशल मीडिया पर सब “बहुत खुश” दिखाई देते हैं।


सुबह उठते ही लोग भगवान का नाम कम और मोबाइल का चेहरा ज्यादा देखते हैं।

रिश्तों की शुरुआत “गुड मॉर्निंग” से होती है और अंत “सीन” पर।

अब कोई दिल से हाल नहीं पूछता,

सिर्फ स्टेटस देखकर अंदाज़ा लगा लिया जाता है कि आदमी जिंदा है या नहीं।


पहले लोग दुख बाँटने घर चले आते थे,

अब इमोजी भेजकर मानवता निभा दी जाती है।

रोता हुआ चेहरा, जुड़ी हुई हथेलियाँ और लाल दिल —

यही आज की संवेदनाओं का सरकारी पैकेज है।


घर के ड्राइंग रूम में चार लोग बैठे रहते हैं,

लेकिन बातचीत केवल वाई-फाई के पासवर्ड तक सीमित होती है।

माँ रसोई में पुकारती रहती है,

और बेटा कान में ईयरफोन डालकर दुनिया बचाने वाले वीडियो देखता रहता है।


पति-पत्नी एक ही बिस्तर पर लेटे होते हैं,

पर दोनों की उंगलियाँ अलग-अलग मोबाइलों में व्यस्त रहती हैं।

अब प्रेम आँखों में नहीं,

“लास्ट सीन” और “ब्लू टिक” में खोजा जाता है।


आज का इंसान इतना आधुनिक हो चुका है कि

उसे पड़ोसी का नाम नहीं पता,

लेकिन किसी फिल्म अभिनेता के पालतू कुत्ते की पूरी जीवनी याद रहती है।


रिश्ते अब जरूरत के हिसाब से बनते हैं।

जब तक स्वार्थ का इंटरनेट चलता है,

तब तक अपनापन फुल नेटवर्क में रहता है।

जैसे ही मतलब खत्म हुआ,

रिश्ते “नो सर्विस” दिखाने लगते हैं।


सबसे मजेदार बात यह है कि

हर व्यक्ति तन्हाई से परेशान है,

लेकिन किसी के पास किसी के लिए समय नहीं।

हर कोई चाहता है कि उसे समझा जाए,

पर कोई किसी को समझना नहीं चाहता।


अब तो हाल यह है कि

लोग अकेले बैठकर खुद से बात करने से डरते हैं।

क्योंकि जैसे ही मन के दरवाजे खुलते हैं,

भीतर से सच्चाई बाहर आने लगती है।


इसलिए लोग शोर में जीना पसंद करते हैं।

टीवी चल रहा है, मोबाइल बज रहा है,

गीत बज रहे हैं, रीलें चल रही हैं —

बस मन की आवाज़ सुनाई नहीं देनी चाहिए।


आधुनिक समाज ने आदमी को सुविधाएँ तो बहुत दीं,

पर सुकून छीन लिया।

भीड़ दी,

पर अपनापन नहीं।

संपर्क दिए,

पर संबंध नहीं।


और अंत में आदमी यही सोचता रह जाता है —

“इतने लोगों के बीच रहकर भी,

आख़िर मैं इतना अकेला क्यों हूँ?”


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन