Saturday, 23 May 2026

लीक होते सपने (नीट परीक्षा)

 “लीक होते सपने”

सरकारें बदलती हैं,

नियम भी बनते हैं,

हर बार कहा जाता है—

“अब व्यवस्था मजबूत है…”

फिर भी न जाने क्यों

हर साल कुछ सपने

अखबारों में लीक हो जाते हैं।

कहीं कोई मेहनत बेच रहा है,

कहीं कोई ईमान खरीद रहा है,

और बीच में बैठा विद्यार्थी

बस अपना भविष्य रो रहा है।

मान लिया…

प्रशासन कोशिश कर रहा है,

सिस्टम को सुधारने में लगा है,

कई दोषियों पर कार्रवाई भी होती है,

नई तकनीकें भी लाई जा रही हैं।

लेकिन फिर भी

कहीं न कहीं कोई दरार बच जाती है…

शायद किसी छोटे से कमरे में,

किसी लालच भरी मेज़ पर,

कुछ पैसों के बदले

देश का भविष्य तौल दिया जाता है।

यही वो काला बाज़ार है

जो सिर्फ पेपर नहीं बेचता—

ये बच्चों का विश्वास बेचता है,

मां-बाप की उम्मीद बेचता है,

और देश की आने वाली पीढ़ी को

अंदर से तोड़ देता है।

जिस बच्चे ने सालों मेहनत की,

वो सोचता रह जाता है—

“क्या मेरी गलती सिर्फ इतनी थी

कि मेरे पास पैसे नहीं थे?”

ये सिर्फ परीक्षा का अपराध नहीं,

ये प्रतिभा के खिलाफ साजिश है।

ये उस किसान के पसीने का अपमान है

जिसने फीस भरने को खेत बेचा,

उस मां की आंखों का अपमान है

जिसने अपने सपनों से पहले

बच्चे का सपना देखा।

जरूरत सिर्फ कानून कठोर करने की नहीं,

जरूरत है हर उस स्तर को साफ करने की

जहां ईमानदारी अब भी हार जाती है।

क्योंकि अगर शिक्षा के मंदिर में ही

काला बाज़ार बस गया,

तो आने वाला कल

डिग्रियों वाला तो होगा…

पर चरित्र वाला नहीं।

और जिस देश के युवा

मेहनत से ज्यादा “सिस्टम” से डरने लगें,

वहां विकास की रफ्तार

धीरे-धीरे रुकने लगती है।

आज भी लाखों बच्चे

किताब खोलकर बैठे हैं…

उनकी आंखों में उम्मीद अब भी है।

जरूरत बस इतनी है कि

उनकी मेहनत को

किसी बंद कमरे में

नीलाम होने से बचा लिया जाए।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

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