नानी का घर और छुट्टियों का पहला दिन — कहानी
गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हो चुकी थीं। स्कूल की घंटी की जगह अब घर में माँ की आवाज़ गूंज रही थी—
“जल्दी करो, ट्रेन छूट जाएगी!”
मैं और मेरा भाई दोनों बैग लिए खड़े थे, लेकिन बैग में कपड़ों से ज़्यादा उत्साह भरा हुआ था। आज हम नानी के घर जा रहे थे। वही नानी का घर, जहाँ समय धीरे चलता था और दिन लंबा लगता था।
रेल की खिड़की से बाहर भागते खेत, छोटे-छोटे स्टेशन और दूर तक फैली हरियाली देखकर लगता था जैसे रास्ता भी हमें जल्दी पहुँचाना चाहता हो। मैं हर स्टेशन पर सोचता—“क्या अब नानी का घर आ गया?”
आख़िरकार शाम ढलते-ढलते ट्रेन रुकी। स्टेशन पर उतरते ही हल्की सी देसी हवा ने स्वागत किया। कुछ ही देर में हम गाँव की कच्ची सड़क पर थे। मिट्टी की खुशबू ऐसी थी जैसे कोई पुरानी याद अचानक जाग गई हो।
और फिर वो घर सामने था—नानी का घर।
लकड़ी का बड़ा दरवाज़ा, आँगन में तुलसी का पौधा, और कोने में बैठा पुराना झूला—सब कुछ वैसा ही था जैसा यादों में था।
दरवाज़ा खुलते ही नानी की आवाज़ आई—
“आ गए मेरे बच्चे!”
और फिर वही हुआ जो हर बार होता था—गले लगना, माथा चूमना और आँखों में ढेर सारा प्यार।
“बहुत पतले हो गए हो,” नानी ने हमेशा की तरह कहा, और बिना रुके रसोई की ओर चली गईं। कुछ ही देर में पराठे, अचार और घी की खुशबू पूरे घर में फैल गई।
छुट्टियों का पहला दिन हमेशा अलग होता था। उस दिन कोई पढ़ाई की बात नहीं होती थी। बस खेल, दौड़ और शरारतें। मैं और मेरा भाई आँगन में दौड़ रहे थे, कभी पेड़ पर चढ़ने की कोशिश करते, तो कभी पुराने बक्सों में छुपे खजाने ढूंढते।
दोपहर में नानी कहानियाँ सुनातीं—राजा-रानी की, जंगल की, और कभी-कभी अपने बचपन की भी। उनकी आवाज़ में ऐसा जादू था कि नींद खुद-ब-खुद आँखों में उतर आती थी।
शाम को आँगन में बैठकर हम सब चुपचाप आसमान देखते। तारे धीरे-धीरे चमकने लगते और लगता जैसे पूरा ब्रह्मांड हमारे साथ बैठा हो।
उस दिन मुझे समझ नहीं आता था कि नानी का घर इतना खास क्यों है। लेकिन आज समझ आता है—वह घर नहीं था, वह बचपन की सबसे सुरक्षित जगह थी।
और छुट्टियों का पहला दिन…
वो तो बस उस जादुई दुनिया में लौटने का दरवाज़ा था।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
No comments:
Post a Comment