Tuesday, 26 May 2026

“गर्मी की छुट्टियां: आम, आराम और अवकाश कार्य का संग्राम!”

 मई-जून की तपती दोपहर… पंखे की आवाज़ और आम के अचार की खुशबू के बीच जैसे ही स्कूलों में छुट्टियों की घोषणा होती है, बच्चों के चेहरे ऐसे खिल उठते हैं मानो किसी कैदी को उम्रकैद से रिहाई मिल गई हो।

बच्चे सोचते हैं —

“अब देर तक सोएंगे… कार्टून देखेंगे… नानी के घर जाएंगे… और दिनभर मौज-मस्ती करेंगे!”


लेकिन बेचारे बच्चों को यह नहीं पता होता कि उनके सपनों की गर्मियों पर सबसे बड़ा हमला अभी बाकी है — अवकाश कार्य!


जी हाँ… वही अवकाश कार्य, जो छुट्टियों को छुट्टियां कम और “घरेलू जेल” ज्यादा बना देता है।


पहले के समय में गर्मियों की छुट्टियां सचमुच छुट्टियां होती थीं।

बच्चे पेड़ों पर चढ़ते थे, गिल्ली-डंडा खेलते थे, नहर में नहाते थे और शाम को दादी से कहानियां सुनते थे।

लेकिन आज के बच्चे छुट्टियों में भी “प्रोजेक्ट वर्क” के जंगल में फंसे रहते हैं।


अब छुट्टियां शुरू होने से पहले स्कूलों में एक विशेष समारोह होता है — Holiday Homework Distribution Ceremony!

शिक्षक बड़े प्रेम से कहते हैं —

“बच्चों! छुट्टियों में खूब खेलना… आराम करना…”

और फिर अगले ही पल 75 पन्नों का अवकाश कार्य थमा देते हैं।


किसी बच्चे को सौरमंडल बनाना है…

किसी को “जल संरक्षण” पर मॉडल तैयार करना है…

तो किसी को 200 पन्नों की सुंदर लिखावट लिखनी है।


ऐसा लगता है मानो बच्चों को छुट्टियां नहीं, किसी निर्माण कंपनी का ठेका दिया गया हो।


सबसे अधिक संकट तो अभिभावकों पर आता है।

बच्चे बड़े मासूम बनकर कहते हैं —

“मम्मी, बस थोड़ा-सा help कर दो…”

और देखते ही देखते पूरा प्रोजेक्ट मां-बाप के सिर पर आ जाता है।


मां इंटरनेट खंगाल रही होती है…

पापा थर्माकोल काट रहे होते हैं…

और बच्चा आराम से मोबाइल पर reels देख रहा होता है।


फिर स्कूल खुलने पर वही बच्चा गर्व से कहता है —

“मैम! ये project मैंने खुद बनाया है…”

और माता-पिता पीछे खड़े अपनी कला पर मौन गर्व महसूस करते हैं।


कुछ माता-पिता तो इतने गंभीर हो जाते हैं कि अवकाश कार्य को राष्ट्रीय परियोजना मान लेते हैं।

घर में मीटिंग होती है —

“चार्ट पेपर कौन लाएगा?”

“ग्लिटर खत्म हो गया!”

“जल्दी Fevicol पकड़ाओ!”


पूरा घर ऐसा दिखता है जैसे कोई छोटा-मोटा आर्ट एंड क्राफ्ट उद्योग चल रहा हो।


वहीं दूसरी ओर कुछ बच्चे इतने प्रतिभाशाली होते हैं कि छुट्टियों के आखिरी दो दिन तक कॉपी को हाथ भी नहीं लगाते।

फिर अचानक उन्हें शिक्षा का महत्व समझ आता है।

रात 2 बजे तक लिखाई चलती है…

सुबह आंखें लाल… हाथ सुन्न… और मन में एक ही प्रार्थना —

“हे भगवान! काश स्कूल दो दिन और बंद हो जाए!”


गर्मियों की छुट्टियां अब बच्चों के लिए कम और अभिभावकों की परीक्षा ज्यादा बन गई हैं।

बच्चों की छुट्टियां शुरू होते ही मां-बाप की छुट्टियां समाप्त हो जाती हैं।


हालांकि अवकाश कार्य का उद्देश्य बच्चों को सीखने से जोड़ना होता है, लेकिन जब छुट्टियों का आधा समय चार्ट पेपर, फाइल और मॉडल में निकल जाए, तो “मौज-मस्ती” शब्द भी पसीना पोंछने लगता है।


सच तो यह है कि गर्मियों की छुट्टियां बच्चों के बचपन की सबसे खूबसूरत यादें होनी चाहिए।

जहां थोड़ी पढ़ाई हो… थोड़ा अनुशासन हो… लेकिन भरपूर खेल, हंसी, शरारत और परिवार का साथ भी हो।


क्योंकि बचपन बार-बार नहीं आता…

और छुट्टियों की असली शिक्षा किताबों से नहीं, जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों से मिलती है।


तो इस बार अगर कोई बच्चा छुट्टियों में थोड़ा आलस कर ले, देर तक सो ले या आम खाते हुए कहानी सुन ले…

तो उसे करने दीजिए।


आख़िर गर्मियों की छुट्टियां हैं…

कोई सरकारी टेंडर तो नहीं!


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

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