रेल की पटरी से… खेत की मेड़ तक
गांव की वह मिट्टी आज भी मुझे वैसे ही याद है जैसे किसी मां की गोद की गर्माहट हमेशा मन में बसी रहती है। मैं उसी खेत की मेड़ पर बैठी हूं, जहां से सूरज हर सुबह अपने सुनहरे हाथ फैलाकर पूरे गांव को जगाता था। हवा में आज भी वही सोंधी खुशबू है, वही शीतल बयार है, और वही दूर तक फैले हरे-भरे खेत हैं, जिनमें कभी गेहूं की बालियां हवा से बातें करती थीं।
मेरी गोद में पले-बढ़े तुम सब—छुट्टन, गिरधर, बाला, गुल्लू और चमन—मेरे लिए सिर्फ नाम नहीं थे, बल्कि मेरे खेतों की मुस्कान थे। तुम्हारी किलकारियां मेरी धरती की धड़कन थीं। मुझे नहीं लगा था कि एक दिन यही धड़कन शहर की चकाचौंध में खो जाएगी।
तुम्हें याद है न, जब तुम छोटे थे, तो मेरे आंचल में छिपकर बारिश से बचते थे। मैं तुम्हें कहानियां सुनाती थी—धरती की, मेहनत की, और उस किसान की जो अपने पसीने से पूरे देश का पेट भरता है। तब तुम हंसते थे, और कहते थे—“मां, हम बड़े होकर यहीं रहेंगे, कभी तुम्हें छोड़कर नहीं जाएंगे।”
पर समय ने करवट ली।
धीरे-धीरे गांव की सादगी तुम्हें कम लगने लगी। खेतों की हरियाली से ज्यादा तुम्हें शहर की रोशनी आकर्षित करने लगी। रेडियो पर सुनाई देने वाली खबरें, ट्रेनों की आवाजें और बसों में बैठे लोगों की बातें—सबने तुम्हारे सपनों को नया रंग दे दिया। तुमने कहा था—“मां, वहां काम मिलेगा, जिंदगी बदल जाएगी।”
मैंने रोका था तुम्हें।
मैंने कहा था—“बेटा, यह खेत तुम्हारा घर है, यह मिट्टी तुम्हारी पहचान है।” पर तुम मुस्कुरा कर चले गए थे, जैसे मां की बातों को समय के पीछे छोड़ देना आसान हो।
कुछ दिनों तक तुम्हारी चिट्ठियां आती रहीं। कभी किसी ने बताया कि फैक्ट्री में काम मिल गया है, कभी किसी ने बताया कि शहर में जिंदगी आसान नहीं है, पर चल रही है। मैं हर चिट्ठी को सीने से लगाकर पढ़ती थी, जैसे तुम मेरे सामने बैठे हो।
फिर धीरे-धीरे चिट्ठियां आनी बंद हो गईं।
और फिर आया वह समय जिसे दुनिया ने “आपातकाल” कहा—कोरोना महामारी।
शहर की गलियां बंद हो गईं। फैक्ट्रियों के शटर गिर गए। बाजारों में सन्नाटा फैल गया। और जिन हाथों ने शहरों को सजाया था, वे हाथ अब खाली हो गए।
तुम सबने फिर से गांव की ओर लौटने का फैसला किया।
लेकिन यह लौटना वैसा नहीं था जैसा तुम बचपन में छुट्टियों में आते थे। यह लौटना मजबूरी का था, थकान का था, और भय से भरा हुआ था। तुम पैदल ही निकल पड़े—रेल की पटरी के किनारे-किनारे चलते हुए, भूख और थकान को पीछे छोड़ते हुए, उम्मीद के सहारे।
मैं खेत की मेड़ पर बैठी हर दिन तुम्हारी राह देखती रही।
दूर से धूल उड़ती, तो लगता तुम आ रहे हो। कभी किसी परछाई में तुम्हारा चेहरा ढूंढती, तो कभी हवा की आवाज में तुम्हारी हंसी सुनाई देती।
“छुट्टन का क्या हाल है?” मैं पूछती हवा से। “गिरधर ठीक तो होगा?” मैं खेतों से सवाल करती। “बाला, गुल्लू, चमन… सब कैसे होंगे?” मेरी आंखें हर दिशा में उन्हें ढूंढती रहतीं।
एक दिन दूर से एक यात्री मिला। उसकी आंखों में डर था, पैरों में छाले थे, और चेहरे पर थकान का पहाड़।
मैंने पूछा—“मेरे बच्चे… छुट्टन, गिरधर… क्या तुमने उन्हें देखा है?”
वह कुछ देर चुप रहा। फिर धीमी आवाज में बोला— “बहुत लंबा रास्ता है मां… रेल की पटरी पर भीड़ थी… भूख थी… और थकान भी… कुछ लोग आगे निकल गए, कुछ पीछे रह गए… और कुछ…”
उसने बात पूरी नहीं की।
लेकिन उसकी आंखों ने सब कह दिया।
मेरे हाथ कांप गए। दिल जैसे किसी ने रोक दिया हो। हवा अचानक भारी लगने लगी। खेतों की हरियाली धुंधली हो गई।
मैं समझ गई थी कि शहर की चकाचौंध ने सिर्फ सपने नहीं लिए थे… उसने कुछ जीवन भी निगल लिए थे।
रेल की पटरी, जो कभी तुम्हारे सपनों का रास्ता लगी थी, अब खामोश कहानियों की गवाह बन चुकी थी। वहां से कोई हंसी नहीं आई, सिर्फ खबरें आईं—लाशों की, भूख की, और थकी हुई सांसों की।
कहा गया कि कहीं किसी पटरी पर किसी का शरीर मिला… किसी के हाथ में अब भी रोटी का टुकड़ा था… किसी की आंखें खुली रह गई थीं जैसे रास्ता अब भी पूरा करना हो।
मैं खेत की मेड़ पर बैठी रह गई।
मेरा आंचल अब भी फैला हुआ था, जैसे मैं अब भी तुम्हें समेट सकती हूं। लेकिन अब वहां दौड़कर आने वाले कदम नहीं थे।
समय बीतता गया।
गांव फिर धीरे-धीरे संभलने लगा। खेतों में फिर से फसलें लहलहाने लगीं। पर मेरे भीतर का खालीपन वैसा ही रहा।
मैं हर गुजरते दिन से पूछती— “क्या सच में रेल की पटरी से खेत की मेड़ तक का सफर खत्म हो गया?”
और हर बार हवा चुप रहती।
आज भी मैं वहीं बैठी हूं, उसी मेड़ पर, जहां कभी तुम खेला करते थे। सूरज अब भी उगता है, खेत अब भी हरे हैं, लेकिन मेरी आंखों में वह इंतजार अब भी जिंदा है।
कभी-कभी लगता है कि दूर कहीं से तुम्हारी आवाज आएगी— “मां, हम आ गए…”
पर अब सिर्फ हवा आती है… और गुजर जाती है।
रेल की पटरी से खेत की मेड़ तक का वह सफर अब सिर्फ याद बनकर रह गया है—एक ऐसी याद, जिसमें उम्मीद भी थी और टूटे हुए सपनों की परछाईं भी।
और मैं… अब भी इंतजार में हूं।
शायद हमेशा रहूंगी।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
No comments:
Post a Comment