Saturday, 23 May 2026

पेपर लीक का ज़हर

 “पेपर लीक का ज़हर”

रातों की नींद बेचकर,

आंखों में सपने पालकर,

कितने बच्चे निकल पड़े थे

अपना भविष्य संभालकर।

किसी ने मां के गहने बेचे,

किसी ने खेत गिरवी रखे,

किसी ने रिश्तों से दूरी की,

बस किताबों से नाते रखे।

सुबह-सुबह वो उठते थे,

थककर भी ना रुकते थे,

एक-एक नंबर की खातिर

दिन-रात खुद से लड़ते थे।

पर फिर खबर अखबारों में आई—

“पेपर लीक…”

बस इतना सुनना था कि

सपनों का शहर ही चीख पड़ा।

किसी की मेहनत रो पड़ी,

किसी की उम्मीद सो पड़ी,

जिसने कभी नकल ना की,

आज वही सबसे छोटा पड़ गया।

जो ईमानदारी से पढ़ते हैं,

क्या अब वही मूर्ख कहलाएंगे?

जो रातों को जलते हैं,

क्या वो हर बार यूँ ही जलाए जाएंगे?

एक बच्चा चुप बैठा था कोने में,

पिता ने पूछा—

“पेपर कैसा हुआ?”

उसकी आंखें भर आईं…

बोला—

“पापा…

गलती मेरी नहीं थी,

पर हार फिर भी मेरी हो गई…”

सोचिए…

जिस उम्र में बच्चों को सपने देखने चाहिए,

उस उम्र में वे व्यवस्था से डरना सीख रहे हैं।

जब मेहनत हारने लगे

और जुगाड़ जीतने लगे,

तो सिर्फ एक परीक्षा नहीं,

पूरा देश कमजोर होने लगता है।

अगर ऐसे ही पेपर लीक होते रहे,

तो बच्चे किताबों पर नहीं,

सिस्टम पर शक करना सीख जाएंगे।

फिर कोई डॉक्टर बनकर भी

ईमानदार नहीं होगा,

कोई शिक्षक बनकर भी

विश्वास नहीं जगा पाएगा।

क्योंकि जिसकी शुरुआत ही अन्याय से हो,

वो भविष्य कितना सच्चा होगा?

आज जरूरत सिर्फ जांच की नहीं,

विश्वास बचाने की है।

उन लाखों बच्चों की उम्मीद बचाने की है

जो अब भी किताबों में

अपना कल खोज रहे हैं।

वरना एक दिन

देश के बच्चे पढ़ना नहीं छोड़ेंगे…

बल्कि

“विश्वास करना” छोड़ देंगे।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

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