Monday, 8 June 2026

मेरी बेटी, मेरा आईना Kavita

 

मेरी बेटी, मेरा आईना

माँ ने मुझे चलना सिखाया,
गिरकर फिर संभलना सिखाया।
रिश्तों की डोर निभानी सिखाई,
अपनों के लिए पिघलना सिखाया।

मीठे शब्दों का मान सिखाया,
बड़ों का सम्मान सिखाया।
दुख में भी मुस्काना सिखाया,
हर हाल में जी जाना सिखाया।

पर माँ ने मुझे एक बात नहीं सिखाई,
अपने हिस्से की लड़ाई लड़ना नहीं सिखाई।
हर दर्द को चुपचाप पी जाना सिखाया,
पर अन्याय के आगे अड़ जाना नहीं सिखाई।

शायद उसकी पीढ़ी ने यही देखा था,
त्याग को ही स्त्री का गहना समझा था।
आँसू छिपाकर मुस्कुराना सीखा था,
अपने सपनों को घर के कोने में रखना सीखा था।

लेकिन मेरी बेटी,
मैं तुझे वही सब दूँगी जो माँ ने मुझे दिया,
संस्कारों का अमृत, प्रेम की छाया,
रिश्तों की गरिमा और विश्वास की माया।

पर इसके साथ कुछ और भी सिखाऊँगी,
अपने मन की आवाज़ सुनना सिखाऊँगी।
गलत को गलत कहना सिखाऊँगी,
अपने अधिकारों के लिए खड़ा होना सिखाऊँगी।

तुझे झुकना नहीं, समझना सिखाऊँगी,
डरना नहीं, सच कहना सिखाऊँगी।
अपनी पहचान खुद बनाना सिखाऊँगी,
भीड़ में भी अलग नज़र आना सिखाऊँगी।

क्योंकि तू मेरी बेटी है,
पर सिर्फ मेरी परछाई नहीं।
तू अपना एक आकाश है,
किसी और की परिभाषा नहीं।

तुझमें मैं अपना बचपन देखती हूँ,
अपने अधूरे सपनों का दर्पण देखती हूँ।
पर चाहती हूँ कि तू वहाँ पहुँचे,
जहाँ तक मेरी उड़ान नहीं पहुँची।

तू मेरा आईना है,
मगर मेरी कहानी दोहराने के लिए नहीं।
तू मेरी विरासत है,
मगर अपनी नई इबारत लिखने के लिए।

जब भी तुझे देखती हूँ,
अपने ही चेहरे की चमक दिखाई देती है।
फर्क बस इतना है कि मेरी आँखों में जो ख्वाब अधूरे थे,
तेरी आँखों में उनकी पूरी दुनिया दिखाई देती है।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

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