शीर्षक: “अनकहा सच”
तू सब जानती है, पर दुनिया ये कहाँ जानती है,
मेरे ख़ामोश लफ़्ज़ों की आग भी कोई कहाँ पहचानती है।
चेहरे पर मुस्कान है, भीतर कितनी दरारें हैं,
ये भीड़ तो बस कहानी की चमकती बाहें पहचानती है।
मैं टूटकर भी हर रोज़ जुड़ने का हुनर रखता हूँ,
पर मेरी थकान को कोई सच्चाई कहाँ मानती है।
सच आँखों में रहता है, मगर आवाज़ नहीं बन पाता,
और झूठ की दुनिया बस तालियाँ ही पहचानती है।
तू जानती है मेरा दर्द, मेरी हर अनकही बात,
पर दुनिया तो बस कहानी का सजना-संवरना जानती है।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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