Monday, 8 June 2026

दीपिका और त्विशा: दो बेटियाँ, दो कहानियाँ, समाज के लिए एक चेतावनी

 दीपिका और त्विशा: दो बेटियाँ, दो कहानियाँ, समाज के लिए एक चेतावनी


दीपिका और त्विशा की कहानियाँ केवल दहेज, प्रताड़ना या संदिग्ध मौतों की खबरें नहीं हैं, बल्कि वे उन अनकहे दर्दों का आईना हैं जिन्हें आज भी अनेक बेटियाँ अपने भीतर दबाकर जीती हैं। इन घटनाओं के कानूनी तथ्यों का अंतिम निर्णय न्यायालय करेगा, लेकिन इनके पीछे छिपी सामाजिक सच्चाइयों से आँखें नहीं मूँदी जा सकतीं।


जब भी किसी बहू के साथ होने वाले अत्याचार की बात होती है, तो चर्चा अक्सर पति या दहेज की मांग तक सीमित रह जाती है। लेकिन सच्चाई यह है कि कई घरों में एक बेटी को सबसे अधिक मानसिक पीड़ा उन लोगों से मिलती है जिनसे उसे अपनापन मिलने की उम्मीद होती है। कटु शब्द, ताने, अपमान, तुलना, हर बात में कमी निकालना, मायके को नीचा दिखाना और हर समय दबाव बनाकर रखना—यह भी मानसिक उत्पीड़न का ही रूप है।


कई बार दहेज से भी अधिक खतरनाक वह मानसिक वातावरण होता है जहाँ बहू को यह एहसास दिलाया जाता है कि वह इस घर की सदस्य नहीं, बल्कि एक बाहरी व्यक्ति है। ऐसे में उसका आत्मविश्वास टूटता है, उसका मनोबल बिखरता है और वह भीतर ही भीतर घुटने लगती है।


यह कहना गलत नहीं होगा कि आज समाज में अनेक परिवार ऐसे हैं जिनकी खुशियाँ आपसी ईर्ष्या, अहंकार और अनावश्यक हस्तक्षेप के कारण नष्ट हो जाती हैं। जहाँ सास माँ की भूमिका निभाने के बजाय अधिकारों की लड़ाई लड़ने लगे और ननद बहन बनने के बजाय प्रतिस्पर्धी बन जाए, वहाँ घर का वातावरण धीरे-धीरे तनाव का केंद्र बन जाता है। इसका परिणाम केवल बहू ही नहीं, पूरे परिवार को भुगतना पड़ता है।


हालाँकि यह भी उतना ही सत्य है कि हर सास या हर ननद ऐसी नहीं होती। असंख्य परिवारों में सास माँ से बढ़कर स्नेह देती हैं और ननद बहन से बढ़कर साथ निभाती है। इसलिए समस्या किसी रिश्ते में नहीं, बल्कि उस सोच में है जो रिश्तों को प्रेम के बजाय अधिकार और नियंत्रण का माध्यम बना देती है।


समाज को यह समझना होगा कि एक बेटी जब विवाह करके नए घर में आती है, तो वह अपने सपनों, विश्वास और भावनाओं के साथ आती है। उसे स्वीकार करना, उसका सम्मान करना और उसे मानसिक सुरक्षा देना पूरे परिवार की जिम्मेदारी है। केवल शारीरिक हिंसा ही अपराध नहीं है, शब्दों से दिया गया घाव भी कई बार जीवनभर नहीं भरता।


आज की बेटियों को भी यह सीख लेनी होगी कि किसी भी प्रकार के मानसिक, भावनात्मक या सामाजिक उत्पीड़न को सामान्य मानकर सहन न करें। अपनी बात कहें, अपने अधिकारों को जानें और समय रहते सहायता लें। चुप्पी कभी समाधान नहीं बनती।


दीपिका और त्विशा जैसी बेटियों की कहानियाँ हमें यही संदेश देती हैं कि एक घर तभी स्वर्ग बनता है जब वहाँ सम्मान, संवेदना और अपनापन हो। जहाँ ताने, अपमान और मानसिक प्रताड़ना का माहौल हो, वहाँ रिश्ते जीवित तो रह सकते हैं, लेकिन खुशियाँ मर जाती हैं।


बेटी को केवल दहेज से नहीं,

मानसिक उत्पीड़न से भी बचाना होगा।

क्योंकि कई बार शरीर पर लगे घाव दिख जाते हैं,

लेकिन आत्मा पर लगे घाव पूरी जिंदगी दर्द देते हैं।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

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