विश्व पर्यावरण दिवस
पेड़ों से पूछो, कैसे खड़े रहते हैं धूप की तपिश में भी, बिना शिकायत किए।
नदियों से पूछो, कैसे बहती रहती हैं अपना सब कुछ लुटाकर भी, प्यास किसी की अधूरी न रहे।
धरती से पूछो, कितने घाव सहती है, फिर भी हर मौसम में नई हरियाली उगा देती है।
हमने विकास के नाम पर कितने जंगल काट दिए, सुविधाओं की दौड़ में कितने रिश्ते प्रकृति से बाँट दिए।
अब समय है, सिर्फ़ भाषणों का नहीं, एक पौधा लगाने का, एक पेड़ बचाने का, एक नदी को साफ़ रखने का।
क्योंकि...
जब आख़िरी पेड़ कट जाएगा, आख़िरी नदी सूख जाएगी, और आख़िरी चिड़िया अपना गीत भूल जाएगी,
तब समझ आएगा कि धन से नहीं, धरती से चलती है ज़िंदगी।
आओ, इस पर्यावरण दिवस पर सिर्फ़ संकल्प न लें, अपनी आदतें भी बदलें।
ताकि आने वाली पीढ़ियाँ हमें दोषी नहीं, धरती का सच्चा रखवाला कहें।
धरती हमारी विरासत है,
और विरासत को सँभालना ही
सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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