"ये जो अपने मन की स्याही है न..."
ये जो अपने मन की स्याही है न,
कभी सूखती नहीं है।
वक्त चाहे जितने पन्ने पलट दे,
यह अपनी कहानी लिखती रहती है।
कभी दर्द के अक्षर बनकर,
कभी उम्मीद के गीत रचती है।
जो बातें होंठों तक नहीं आतीं,
उन्हें चुपचाप कागज़ पर रखती है।
मन की स्याही का रंग बड़ा अजीब होता है,
दिखता काला है,
पर उसके भीतर
पूरी ज़िंदगी के रंग छिपे होते हैं।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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