Monday, 8 June 2026

डिजिटल सफलता और रिश्तों की खामोश जलन

डिजिटल सफलता और रिश्तों की खामोश जलन

जब आप कंटेंट क्रिएटर बनते हो,

तो सबसे पहले तालियाँ नहीं बजतीं…

सबसे पहले आँखें जलती हैं।


आपका पहला वीडियो नहीं देखा जाता,

उसे “स्कैन” किया जाता है—

कितने व्यू आए, कितनी तारीफ हुई… और क्यों हुई!


लाइक बटन से ज्यादा सक्रिय होता है

तुलना का दिमाग—

“इसमें ऐसा क्या खास है जो ये आगे बढ़ रहा है?”


कमेंट नहीं आते,

पर घर की चर्चाएँ शुरू हो जाती हैं—

“देखो, अब ये भी स्टार बनने चला है!”


सबसे दिलचस्प बात यह है—

आपकी हर सफलता पर

चेहरे मुस्कुराते हैं,

पर भीतर एक अनकहा हिसाब चलता रहता है।


व्हाट्सऐप स्टेटस पर लिखा जाता है—

“शुभकामनाएँ बेटा/बेटी”

और उसी के साथ

एक अदृश्य प्रश्न भी घूमता है—

“इतना आगे कैसे बढ़ गया?”


आपका चैनल बढ़ता है,

पर कुछ लोगों के अंदर का संतुलन घटने लगता है।


कमेंट सेक्शन में अनजान लोग बढ़ते हैं,

पर अपने ही लोग

एक नई प्रतियोगिता बना लेते हैं—

“देखते हैं ये कब तक टिकता है…”


और सबसे बड़ा व्यंग्य यही है—

आपकी मेहनत उन्हें प्रेरणा नहीं लगती,

उन्हें यह एक “अनचाही सफलता” लगती है।


इसलिए वे देखते हैं, समझते हैं, याद रखते हैं…

पर स्वीकार नहीं करते।


क्योंकि स्वीकार करना कभी-कभी

सबसे मुश्किल लाइक होता है—

जो रिश्तों के ego को दबाकर देना पड़ता है।



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✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

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