"माँ, तुमने सब सिखाया... पर एक बात छूट गई"
माँ,
तुमने मुझे चलना सिखाया,
गिरकर फिर संभलना सिखाया,
रिश्तों की डोर को सहेजना सिखाया,
अपनों के लिए खुद को भूल जाना सिखाया।
तुमने सिखाया कि
बड़ों का सम्मान कैसे किया जाता है,
छोटों पर स्नेह कैसे लुटाया जाता है,
घर को घर कैसे बनाया जाता है,
और आँसू छिपाकर मुस्कुराया कैसे जाता है।
पर माँ,
एक बात शायद तुम भी न सीख सकीं,
इसलिए मुझे भी न सिखा सकीं—
अपने हक़ के लिए लड़ना।
तुमने सहना सिखाया,
पर अन्याय के सामने खड़ा होना नहीं।
तुमने चुप रहना सिखाया,
पर अपनी बात बेखौफ़ कहना नहीं।
शायद तुम्हारे समय की मजबूरी थी,
या संस्कारों की कोई पुरानी परिभाषा,
जहाँ बेटियों को त्याग का पाठ तो मिलता था,
पर अधिकारों का अध्याय अधूरा रह जाता था।
आज जब मैं अपनी बेटी को देखती हूँ,
तो एक नया सपना बुनती हूँ।
मैं उसे दया भी सिखाऊँगी,
और दृढ़ता भी।
मैं उसे प्रेम भी सिखाऊँगी,
और आत्मसम्मान भी।
वह झुके जहाँ विनम्रता ज़रूरी हो,
पर टूटे कभी नहीं।
वह सुने सबकी,
पर अपनी आवाज़ खोए कभी नहीं।
मैं चाहती हूँ कि मेरी बेटी
संस्कारों की मूर्ति ही नहीं,
साहस की मिसाल भी बने।
वह जान सके कि
त्याग और आत्मसमर्पण में फर्क होता है,
और प्रेम का अर्थ
खुद को मिटा देना नहीं होता।
माँ,
तुमने मुझे बहुत कुछ दिया,
इतना कि मैं उम्र भर ऋणी रहूँगी।
बस एक अधूरा पाठ
मैं अपनी बेटी को पूरा पढ़ाऊँगी—
कि बेटियाँ केवल सहने के लिए नहीं,
सही के लिए खड़े होने के लिए भी जन्म लेती हैं।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
No comments:
Post a Comment