Tuesday, 9 June 2026

थकान का भी एक सच होता है। कविता

 

थकान का भी एक सच होता है

सब कहते हैं —
"कितनी स्ट्रॉन्ग हो तुम!"
हर मुश्किल में मुस्कुरा लेती हो,
हर आँधी में संभल जाती हो।

पर काश...
किसी ने यह भी पूछा होता —
"थक तो नहीं गई हो तुम?"

कंधों पर जिम्मेदारियों का पहाड़ उठाए,
हर रिश्ते का भार निभाए,
सबके आँसू पोंछते-पोंछते
क्या कभी अपनी आँखें भी भीगी हैं तुमसे?

सबको तुम्हारी हँसी दिखाई देती है,
पर उस हँसी के पीछे छिपी
खामोश चीखें कौन सुनता है?

लोग तुम्हारी हिम्मत की मिसाल देते हैं,
पर यह नहीं जानते
कि कई रातें ऐसी भी होती हैं
जब तकिया ही तुम्हारा एकमात्र हमदर्द होता है।

तुम्हें देखकर सब कहते हैं—
"इसे क्या होगा, यह तो मजबूत है!"
मगर मजबूत लोग भी
पत्थर नहीं होते।

उनके भी सपने टूटते हैं,
उनका भी मन भर आता है,
उन्हें भी कभी-कभी
सब कुछ छोड़कर रो लेने का मन करता है।

मजबूत होना कोई शौक नहीं,
अक्सर यह हालातों की दी हुई मजबूरी होती है।
जब सहारा देने वाला कोई न हो,
तो इंसान खुद ही अपना सहारा बन जाता है।

हाँ, मैं मजबूत हूँ,
क्योंकि समय ने मुझे ऐसा बना दिया।
पर इसका मतलब यह नहीं
कि मुझे दर्द नहीं होता।

आज बस इतना कहना है—
जब किसी को मजबूत कहो,
तो उसके साहस की तारीफ़ करने से पहले
एक बार यह भी पूछ लेना—

"सच बताना,
थक तो नहीं गए हो तुम?"

क्योंकि कई बार
यही एक सवाल
किसी टूटते हुए इंसान को
फिर से जीने की वजह दे देता है।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

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