मेरी दिल्ली — मेरी नज़र से
मैंने दिल्ली को किताबों में नहीं पढ़ा,
मैंने दिल्ली को जीया है।
इसके मौसमों को बदलते देखा है,
इसके रास्तों को बढ़ते देखा है।
जब मैं छोटी थी,
तब गलियाँ भी अपनी लगती थीं,
छतों पर उड़ती पतंगों में
सपनों की डोर बंधी लगती थी।
मैंने दिल्ली की सर्दियों में
धूप के टुकड़े समेटे हैं,
गर्मियों की तपती दोपहर में
आम और बचपन दोनों बटोरे हैं।
यहाँ की सुबहें कभी
मंदिर की घंटियों से जागती थीं,
और शामें चाय की भाप संग
घर-आँगन में उतर आती थीं।
मैंने दिल्ली को भीड़ बनते देखा है,
और भीड़ में अकेला पड़ते भी देखा है।
नई इमारतों को आसमान छूते देखा है,
पुराने पेड़ों को कटते भी देखा है।
यह शहर केवल सड़कों का जाल नहीं,
यह मेरी स्मृतियों का घर है।
यहाँ हर मोड़ पर
मेरे जीवन का कोई सफ़र है।
यहीं मैंने गिरना सीखा,
यहीं संभलना सीखा।
यहीं अपनों की पहचान हुई,
और यहीं बदलता समय देखा।
दिल्ली मेरे लिए
लाल किले की दीवार भर नहीं,
या संसद के गलियारों की खबर नहीं,
दिल्ली तो मेरे जीवन का वह पन्ना है
जिस पर मेरी उम्र की स्याही दर्ज है।
तिरपन वर्षों से
मैं इसकी धड़कनों के साथ चल रही हूँ,
कभी इसकी रफ्तार से थक जाती हूँ,
तो कभी इसकी जीवंतता पर मुस्कुरा देती हूँ।
बहुत कुछ बदल गया है यहाँ,
पर एक बात आज भी वैसी है—
दिल्ली मेरे लिए सिर्फ़ एक शहर नहीं,
मेरी यादों, मेरे संघर्षों,
मेरे सपनों और मेरी पहचान का दूसरा नाम है।
मेरी दिल्ली,
तू मेरे जीवन की वह कहानी है,
जिसे मैं हर दिन जीती हूँ,
और हर बार नए अर्थों में पढ़ती हूँ।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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