“सोशल मीडिया का नया ज़माना” (व्यंग्य कविता)
अब जमाना बदल गया है, साहब,
यहाँ चेहरा नहीं, प्रोफाइल चलता है।
मुस्कान असली हो या नकली,
लाइक के नीचे सब कुछ पलता है।
सुबह उठते ही दुनिया नहीं देखते,
पहले नोटिफिकेशन देखते हैं,
किसने देखा, किसने छोड़ा,
किसने दिल पर तीर फेंके—ये गिनते हैं।
यहाँ ज्ञान से ज्यादा
कैप्शन की चमक बिकती है,
और सच्चाई अक्सर
“एडिट” के पीछे छिपती है।
दोस्त कम, फॉलोअर ज्यादा हैं,
पर रिश्ते अब भी साइलेंट मोड में खड़े हैं।
कभी जो बातें घंटों होती थीं,
अब वो सिर्फ “स्टोरी” में पड़े हैं।
लाइक बढ़े तो आत्मविश्वास उड़ता है,
कम हो तो इंसान टूट सा जाता है।
कमेंट में तारीफ मिले तो दिन बनता है,
वरना पूरा अस्तित्व हिल जाता है।
यहाँ सब “रियल” होने का दावा करते हैं,
पर हर कोई थोड़ा “फिल्टर” में जीता है।
और जो सच में सच बोल दे,
वो ट्रोलिंग का स्वाद पीता है।
सबसे बड़ा मज़ाक यही है इस दुनिया का—
यहाँ दिखना ज़रूरी है, होना नहीं।
और जो चुप रहे समझदारी से,
उसका नाम भी “गुमनाम” हो जाना है कहीं।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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