छिपकली
रसोई की दीवार पर एक छिपकली रोज़ दिखाई देती थी। घर के लोग उसे देखकर घबरा जाते, कोई झाड़ू उठाता तो कोई उसे भगाने की कोशिश करता। लेकिन वह हर बार बच निकलती और फिर किसी कोने में दिखाई दे जाती।
एक दिन घर की छोटी बच्ची ने पूछा,
“माँ, हम इसे हमेशा भगाते क्यों हैं?”
माँ ने कहा,
“क्योंकि यह गंदी लगती है।”
बच्ची कुछ देर सोचती रही। तभी उसने देखा कि वही छिपकली एक मच्छर और फिर एक कीड़े को खा गई।
बच्ची मुस्कुराई और बोली,
“माँ, जिसे हम बेकार समझ रहे हैं, वह तो घर की सफाई कर रही है।”
माँ चुप हो गई।
उस दिन पहली बार घर वालों ने छिपकली को ध्यान से देखा। वह दीवार पर चुपचाप अपना काम कर रही थी। न किसी से शिकायत, न किसी से प्रशंसा की अपेक्षा।
बच्ची ने धीरे से कहा,
“माँ, हर वह चीज़ बुरी नहीं होती जो हमें अच्छी न लगे।”
माँ ने बेटी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
“बेटा, यही तो जीवन का सबसे बड़ा सच है। कई बार जिन लोगों या चीज़ों को हम बिना समझे ठुकरा देते हैं, वही हमारे लिए सबसे अधिक उपयोगी साबित होते हैं।”
उस दिन के बाद छिपकली दीवार पर पहले की तरह ही आती रही, लेकिन अब उसे देखकर घर में डर नहीं, एक सीख याद आती थी।
सीख:
किसी का मूल्य उसके रूप से नहीं, उसके कर्म से आँकना चाहिए।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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