धोखे की राख से उठता हुआ मनुष्य (लेख)
जीवन की सबसे कठिन परीक्षाएँ वे नहीं होतीं जो परिस्थितियाँ लेती हैं, बल्कि वे होती हैं जो अपने लोग लेते हैं। संसार का कोई भी आघात उतना गहरा नहीं होता जितना अपनों द्वारा दिया गया धोखा। परंतु इतिहास गवाह है कि जो व्यक्ति अपनों के छल, विश्वासघात और उपेक्षा के बाद भी टूटकर बिखरने के बजाय स्वयं को समेटकर खड़ा हो जाता है, उसे फिर कोई पराजित नहीं कर सकता।
मनुष्य जब अपनों पर विश्वास करता है तो वह केवल संबंधों पर भरोसा नहीं करता, बल्कि अपने सपनों, भावनाओं और भविष्य को भी उनके हाथों में सौंप देता है। इसलिए जब वही लोग विश्वास तोड़ते हैं तो केवल रिश्ते नहीं टूटते, भीतर का संसार भी दरक जाता है। कई बार वर्षों की मेहनत, संचित पूँजी, सामाजिक सम्मान और मानसिक शांति एक ही झटके में बिखर जाती है। उस समय व्यक्ति को ऐसा लगता है मानो उसके पैरों के नीचे की धरती खिसक गई हो।
लेकिन यहीं से एक नए मनुष्य का जन्म भी होता है।
धोखा खाने के बाद जो व्यक्ति मैदान छोड़ देता है, वह परिस्थितियों का शिकार बन जाता है। किंतु जो व्यक्ति अपने घावों को छिपाकर नहीं, बल्कि उन्हें अपनी शक्ति बनाकर आगे बढ़ता है, वह जीवन का सबसे बड़ा योद्धा बन जाता है। उसे फिर किसी प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं रहती। वह जान चुका होता है कि कौन अपना है और कौन केवल अवसर का साथी।
सच तो यह है कि संघर्ष मनुष्य को उतना मजबूत नहीं बनाता, जितना विश्वासघात बनाता है। संघर्ष में व्यक्ति को उम्मीद होती है कि कोई साथ देगा, लेकिन धोखे के बाद वह अकेले चलना सीख जाता है। अकेले चलना सीख लेने वाला व्यक्ति कभी पराजित नहीं होता, क्योंकि उसकी ताकत किसी और के सहारे पर आधारित नहीं रहती।
आज समाज में अनेक लोग ऐसे मिल जाएंगे जो अपनों की चालाकियों का शिकार हुए, आर्थिक रूप से टूटे, सामाजिक रूप से अपमानित हुए, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वे धीरे-धीरे उठे, स्वयं को संभाला और फिर एक नई पहचान बनाई। ऐसे लोग जब सफलता प्राप्त करते हैं तो उनकी सफलता केवल उपलब्धि नहीं होती, बल्कि उनके आत्मविश्वास की विजय होती है।
यथार्थ यह भी है कि धोखा देने वाले अक्सर यह मान लेते हैं कि उन्होंने किसी को हमेशा के लिए खत्म कर दिया। उन्हें लगता है कि सामने वाला अब कभी संभल नहीं पाएगा। लेकिन वे भूल जाते हैं कि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संपत्ति नहीं, उसका साहस है। संपत्ति छीनी जा सकती है, अवसर रोके जा सकते हैं, परंतु साहस और अनुभव को कोई नहीं छीन सकता।
जिस व्यक्ति ने अपनों के धोखे का विष पी लिया हो, वह जीवन की कड़वी सच्चाइयों से परिचित हो जाता है। अब उसे झूठे वादे प्रभावित नहीं करते, खोखली प्रशंसा भ्रमित नहीं करती और असफलताएँ भयभीत नहीं करतीं। वह जान जाता है कि जीवन में गिरना अंत नहीं, बल्कि स्वयं को पहचानने की शुरुआत है।
ऐसे लोग बाहर से भले शांत दिखाई दें, पर भीतर वे पर्वत की तरह दृढ़ हो चुके होते हैं। वे जानते हैं कि रिश्तों का मूल्य क्या है और विश्वास की कीमत क्या होती है। इसलिए वे दोबारा किसी से नफरत नहीं करते, बल्कि अपने अनुभवों को जीवन का शिक्षक बना लेते हैं।
अंततः जीत उसी की होती है जो टूटने के बाद भी खड़ा रहता है। जिसने अपनों के धोखे, अपमान, उपेक्षा और हानि को सहकर भी अपने कदम आगे बढ़ाए हैं, उसे हराना असंभव नहीं तो अत्यंत कठिन अवश्य है। क्योंकि वह अब परिस्थितियों से नहीं, स्वयं से लड़ना सीख चुका है। और जो स्वयं पर विजय पा लेता है, उसके सामने संसार की कोई भी हार टिक नहीं सकती।
धोखे की आग में तपकर निकला हुआ मनुष्य सोना नहीं, कुंदन बन जाता है।
धोखा उद्योग के सफल ग्राहक (व्यंग्य)
आज के समय में यदि कोई व्यक्ति अपनों के धोखे खाकर, अपनी जमा-पूँजी गंवाकर, भावनात्मक दिवालियापन झेलकर और सामाजिक तमाशा बन जाने के बाद भी मुस्कुरा रहा है, तो समझ लीजिए कि वह जीवन विश्वविद्यालय का गोल्ड मेडलिस्ट है।
हमारे समाज में एक अद्भुत उद्योग फल-फूल रहा है—"धोखा उद्योग"। इसमें न कोई लाइसेंस चाहिए, न कोई डिग्री। बस चेहरे पर अपनापन, शब्दों में मिठास और मन में स्वार्थ होना चाहिए। फिर देखिए, कैसे रिश्तों की दुकान चल पड़ती है।
पहले लोग घर बनाते थे, अब लोग भरोसे के पुल बनाते हैं और फिर स्वयं ही उन्हें तोड़कर नदी में बहा देते हैं। रिश्तों की दुनिया में आजकल एक नया नियम चल रहा है—जब तक सामने वाले से लाभ मिलता रहे, वह अपना है; जिस दिन लाभ बंद, उसी दिन संबंध भी समाप्त।
सबसे मजेदार बात यह है कि धोखा देने वाले कभी स्वयं को दोषी नहीं मानते। वे बड़े गर्व से कहते हैं, "अरे! हमने तो कुछ किया ही नहीं।" जैसे किसी का सब कुछ लूट लेना कोई सामाजिक सेवा हो। उल्टा पीड़ित व्यक्ति को ही समझाया जाता है कि उसे इतना भरोसा ही नहीं करना चाहिए था। यानी चोर चोरी करे और सलाह भी दे कि ताला मजबूत रखना चाहिए था!
समाज का एक वर्ग ऐसा भी है जो हर धोखा खाए व्यक्ति को देखकर ज्ञान बाँटने पहुँच जाता है। ये लोग घटना के बाद इतने बुद्धिमान हो जाते हैं कि लगता है मानो इन्हें पहले से सब पता था। पर जब धोखा दिया जा रहा होता है, तब ये महापुरुष गहरी निद्रा में होते हैं।
धोखा देने वालों की सबसे बड़ी उपलब्धि यह होती है कि वे सामने वाले को कमजोर समझ लेते हैं। उन्हें लगता है कि अब यह व्यक्ति उठ नहीं पाएगा। लेकिन यहीं उनकी गणित गड़बड़ा जाती है। वे भूल जाते हैं कि जो व्यक्ति अपने ही लोगों की चोट सह गया, उसे दुनिया की ठोकरें ज्यादा नुकसान नहीं पहुँचा सकतीं।
असल में धोखा खाने वाला व्यक्ति एक विशेष प्रशिक्षण से गुजरता है। उसकी आँखों से भ्रम का चश्मा उतर जाता है। वह पहचानने लगता है कि कौन रिश्ते निभा रहा है और कौन अवसर तलाश रहा है। उसके पास अब अनुभव की ऐसी डिग्री होती है जो किसी विश्वविद्यालय में नहीं मिलती।
विडंबना देखिए, समाज सफलता मिलने पर ताली बजाता है, लेकिन यह नहीं देखता कि उस सफलता के पीछे कितने विश्वासघात, कितनी रातों की बेचैनी और कितनी टूटी हुई उम्मीदें दबी पड़ी हैं।
इसलिए यदि आपको कोई ऐसा व्यक्ति मिल जाए जो अपनों के धोखे के बाद भी जीवन के मैदान में डटा हुआ है, तो उसे कमजोर मत समझिए। वह इस युग के सबसे अनुभवी खिलाड़ियों में से एक है। उसने रिश्तों की राजनीति, स्वार्थ की अर्थव्यवस्था और विश्वासघात के बाजार का पूरा पाठ्यक्रम पढ़ लिया है।
और सच कहें तो आज के दौर में वही सबसे मजबूत है, जो धोखा उद्योग का सफल ग्राहक बनकर भी दिवालिया नहीं हुआ, बल्कि अनुभवों का करोड़पति बन गया।
अपने ही जब आईना तोड़ गए (कविता)
अपने ही जब आईना तोड़ गए,
सपनों के सारे रंग छोड़ गए।
जिन हाथों को थामा था उम्र भर,
वे हाथ बीच राह में मोड़ गए।
जिनके लिए दीपक बन जलते रहे,
अंधेरों से हर पल लड़ते रहे,
वही लोग हवाओं के संग मिलकर,
घर के चिरागों को फोड़ गए।
चेहरों पर अपनापन लिखा हुआ था,
बातों में मीठा-सा नशा हुआ था,
विश्वास की सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते,
हम जाने कितनी बार तोड़ गए।
रिश्तों की मंडी में देखा हमने,
सिक्कों से बिकते चेहरों को,
कल तक जो अपना कहते थे,
वे अवसर पर रिश्ते छोड़ गए।
जब जेब भरी थी, साथ खड़े थे,
हर महफ़िल में हाथ बड़े थे,
समय ने करवट क्या बदली,
सब अपने रास्ते मोड़ गए।
आँखों में जिनको बसा रखा था,
दिल का राजा बना रखा था,
वही लोग ताज पहनकर भी,
विश्वास का सिंहासन तोड़ गए।
पर हार नहीं मानी हमने फिर भी,
आँसू को मोती बनाया है,
जिन पत्थरों ने घाव दिए थे,
उनसे ही पथ सजाया है।
अब कोई छलावा डराता नहीं,
झूठा अपनापन भाता नहीं,
सच की धूप में चलना सीखा,
मन अब किसी से घबराता नहीं।
अपनों के धोखे ने यह सिखलाया,
हर चेहरा अपना नहीं होता,
रिश्तों के जंगल में हर पेड़,
बरगद जैसा साया नहीं होता।
जो टूटकर भी खड़ा हुआ है,
वह पर्वत से भी बड़ा हुआ है,
अपनों की चोटें सहकर जो जिया,
वह जीवन का सच्चा योद्धा हुआ है।
आज भी मुस्कुराकर चलता है,
अपना दर्द स्वयं ही ढोता है,
जिसने अपनों का सच देख लिया,
उसे अब कोई नहीं खोता है।
धोखे की आग में तपकर निकला,
वह सोना नहीं, कुंदन बनता है,
अपनों से हारकर भी जो जीता,
वही इतिहास में जिंदा रहता है।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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