“भीड़ में अकेलेपन का राष्ट्रीय उत्सव”
आजकल तन्हाई कोई व्यक्तिगत भावना नहीं रही,
यह तो आधुनिक समाज का राष्ट्रीय उत्सव बन चुकी है।
हर आदमी अकेला है,
लेकिन सोशल मीडिया पर सब “बहुत खुश” दिखाई देते हैं।
सुबह उठते ही लोग भगवान का नाम कम और मोबाइल का चेहरा ज्यादा देखते हैं।
रिश्तों की शुरुआत “गुड मॉर्निंग” से होती है और अंत “सीन” पर।
अब कोई दिल से हाल नहीं पूछता,
सिर्फ स्टेटस देखकर अंदाज़ा लगा लिया जाता है कि आदमी जिंदा है या नहीं।
पहले लोग दुख बाँटने घर चले आते थे,
अब इमोजी भेजकर मानवता निभा दी जाती है।
रोता हुआ चेहरा, जुड़ी हुई हथेलियाँ और लाल दिल —
यही आज की संवेदनाओं का सरकारी पैकेज है।
घर के ड्राइंग रूम में चार लोग बैठे रहते हैं,
लेकिन बातचीत केवल वाई-फाई के पासवर्ड तक सीमित होती है।
माँ रसोई में पुकारती रहती है,
और बेटा कान में ईयरफोन डालकर दुनिया बचाने वाले वीडियो देखता रहता है।
पति-पत्नी एक ही बिस्तर पर लेटे होते हैं,
पर दोनों की उंगलियाँ अलग-अलग मोबाइलों में व्यस्त रहती हैं।
अब प्रेम आँखों में नहीं,
“लास्ट सीन” और “ब्लू टिक” में खोजा जाता है।
आज का इंसान इतना आधुनिक हो चुका है कि
उसे पड़ोसी का नाम नहीं पता,
लेकिन किसी फिल्म अभिनेता के पालतू कुत्ते की पूरी जीवनी याद रहती है।
रिश्ते अब जरूरत के हिसाब से बनते हैं।
जब तक स्वार्थ का इंटरनेट चलता है,
तब तक अपनापन फुल नेटवर्क में रहता है।
जैसे ही मतलब खत्म हुआ,
रिश्ते “नो सर्विस” दिखाने लगते हैं।
सबसे मजेदार बात यह है कि
हर व्यक्ति तन्हाई से परेशान है,
लेकिन किसी के पास किसी के लिए समय नहीं।
हर कोई चाहता है कि उसे समझा जाए,
पर कोई किसी को समझना नहीं चाहता।
अब तो हाल यह है कि
लोग अकेले बैठकर खुद से बात करने से डरते हैं।
क्योंकि जैसे ही मन के दरवाजे खुलते हैं,
भीतर से सच्चाई बाहर आने लगती है।
इसलिए लोग शोर में जीना पसंद करते हैं।
टीवी चल रहा है, मोबाइल बज रहा है,
गीत बज रहे हैं, रीलें चल रही हैं —
बस मन की आवाज़ सुनाई नहीं देनी चाहिए।
आधुनिक समाज ने आदमी को सुविधाएँ तो बहुत दीं,
पर सुकून छीन लिया।
भीड़ दी,
पर अपनापन नहीं।
संपर्क दिए,
पर संबंध नहीं।
और अंत में आदमी यही सोचता रह जाता है —
“इतने लोगों के बीच रहकर भी,
आख़िर मैं इतना अकेला क्यों हूँ?”
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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