Tuesday, 9 June 2026

"सपनों से जिम्मेदारियों तक : जीवन, संबंध और पुनर्जन्म की कविताएँ"


"सपनों से जिम्मेदारियों तक : जीवन, संबंध और पुनर्जन्म की कविताएँ"

1. तेरा मेरा साथ रहे 

तेरा मेरा साथ रहे,

जैसे सुबह की पहली किरण में

चुपचाप मुस्कान का उजाला रहे…


तेरा मेरा साथ रहे,

जैसे सूखी राहों पर

बारिश की नर्म फुहार का सहारा रहे…


कभी तू थक जाए तो मैं संभाल लूँ,

कभी मैं टूट जाऊँ तो तू पुकार ले…

शब्द कम हों, पर समझ बहुत रहे,

तेरा मेरा साथ रहे…


भीड़ में भी हम अकेले न हों,

हर मोड़ पर एक-दूसरे का भरोसा रहे…

ना कोई शर्त हो, ना कोई हिसाब,

बस दिल से दिल का रिश्ता जिंदा रहे…


तेरा मेरा साथ रहे,

जैसे हवा में खुशबू का एहसास रहे,

और जिंदगी बस यूँ ही

थोड़ी आसान, थोड़ी अपनी सी रहे…



2. जब ज़िंदगी शुरू हो जाती है


जब शौक के लिए वक्त न मिले

तो समझ जाना, ज़िंदगी शुरू हो गई है…


जहाँ किताबें धूल खा जाएँ,

और सपनों की अलमारी

सिर्फ ज़रूरतों से भर जाए…


जहाँ मुस्कान भी

टाइम-टेबल देखकर आए,

और नींद भी थकी हुई आँखों से पूछे—

“आज फिर देर से मिलोगे क्या?”


जब अपने ही शौक

किसी पुराने कोने में रख दिए जाएँ,

और हम बस भागते रहें

कभी काम के पीछे, कभी जिम्मेदारियों के पीछे…


तो समझ लेना,

अब बचपन नहीं रहा,

अब ज़िंदगी शुरू हो गई है—

जहाँ जीना नहीं, निभाना पड़ता है…


पर फिर भी कहीं भीतर

एक छोटा सा बच्चा जिंदा रहता है,

जो कहता है—

“एक दिन फिर से अपने लिए जिऊँगा…”



3. जिम्मेदारियों के दिन


क्योंकि अब दिन सपनों से नहीं,

जिम्मेदारियों के चलने लगे हैं…


सुबह आँख खुलते ही

ख्वाब नहीं, हिसाब खुलता है,

कौन सा काम बाकी है

ये सवाल हर सांस में घुलता है…


पहले जिन रास्तों पर

सपने साथ चलते थे,

अब उन्हीं रास्तों पर

वक्त की भीड़ में हम अकेले चलते हैं…


हँसी भी अब यूँ ही नहीं आती,

पहले सोचती है—

“क्या आज मुझे इजाज़त है?”


और दिल…

वो अब भी कहीं छुपकर

पुरानी ख्वाहिशों को सहलाता है,

पर बाहर आते-आते

जिम्मेदारियों का दरवाज़ा बंद हो जाता है…


फिर भी,

इन सबके बीच

एक उम्मीद धीरे से कहती है—

“थोड़ा और संभाल लो,

शायद एक दिन सपने फिर लौट आएँ…”



4. टूटन का चमत्कार


ईश्वर टूटी हुई चीज़ों का

बखूबी इस्तेमाल करते हैं…


बादल टूटते हैं तो

धरती प्यास बुझा लेती है,

सूखी मिट्टी भी

जीने की वजह पा लेती है…


बीज टूटते हैं तो

एक नया जीवन जन्म लेता है,

टूटकर भी वो

हरियाली का सपना बुन लेता है…


कली बिखरती है तो

फूल बनकर मुस्कुराती है,

और हर टूटन के भीतर

एक नई कहानी बन जाती है…


इंसान भी जब टूटता है

तो बिखरने नहीं आता,

वो भीतर ही भीतर

फिर से खुद को गढ़कर उठ जाता है…


शायद यही नियम है इस सृष्टि का—

जो टूटता है, वही

किसी और रूप में

सबसे सुंदर बनकर लौट आता है…


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन 

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