Monday, 8 June 2026

कॉफी की भाप में कविता

भाप बनकर उठते शब्द,

कप में घुलते एहसास हैं।

कॉफी केवल पेय नहीं,

मन के अनकहे संवाद हैं।


कभी कड़वाहट जीवन जैसी,

कभी मिठास किसी याद सी।

हर घूँट में छिपी हुई है,

एक कहानी अनबयानी सी।


कलम जब थककर बैठ जाती,

कॉफी उसे उड़ान देती है।

सूने कागज़ के आँगन में,

भावों की मुस्कान देती है।


कविता का अपना एक जहान है,

जहाँ सपने आकार लेते हैं।

और कॉफी के छोटे से कप में,

अनगिनत शब्द जन्म लेते हैं।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

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