Monday, 8 June 2026

खोया हुआ नंबर (व्यंग्य)

 "खोया हुआ नंबर"

(एक व्यंग्य)

आजकल रिश्तों की सबसे बड़ी पहचान यह नहीं कि कौन आपका अपना है, बल्कि यह है कि आपका नंबर किसने सेव रखा है।

जब तक आप सफल हैं, आपके फोन की घंटी किसी मंदिर की आरती की तरह बजती रहती है। सुबह "सुप्रभात" से लेकर रात "शुभ रात्रि" तक संदेशों की बरसात होती है। लोग आपकी पोस्ट पर दिल, फूल और वाह-वाह की फसल उगाते रहते हैं। ऐसा लगता है जैसे आपके बिना उनकी दुनिया का इंटरनेट ही बंद हो जाएगा।

लेकिन जैसे ही जीवन की सड़क पर कोई गड्ढा आता है, आर्थिक, सामाजिक या मानसिक कठिनाई का एक बादल सिर पर मंडराता है, तब रिश्तों का असली नेटवर्क दिखाई देने लगता है। अचानक वही लोग, जो हर घंटे हाल-चाल पूछते थे, "आउट ऑफ कवरेज एरिया" हो जाते हैं।

कभी-कभी तो लगता है कि कुछ लोगों के मोबाइल में एक विशेष सुविधा होती है—"दुखी मित्र पहचानो और नंबर छिपाओ।"

यदि आप खुश हैं, तो लोग आपकी खुशी में शामिल होकर अपनी तस्वीरें चमकाते हैं। लेकिन यदि आप संघर्ष में हैं, तो उन्हें आपका नंबर तक दिखाई नहीं देता। मानो मोबाइल ने स्वयं घोषणा कर दी हो— "यह नंबर फिलहाल आपकी सुविधा के लिए बंद कर दिया गया है।"

समाज का एक बड़ा वर्ग रिश्तों को भी बैंक खाते की तरह चलाता है। जहां लाभ दिखा, वहां निवेश कर दिया। जहां कठिनाई दिखी, वहां खाता निष्क्रिय कर दिया। दुख में साथ देने की जगह लोग दूरी बना लेते हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है कि कहीं सहानुभूति देने का भी कोई टैक्स न लग जाए।

विडंबना यह है कि जो लोग आपकी सफलता की पार्टी में सबसे आगे खड़े मिलते हैं, वही आपके संघर्ष के दिनों में गली बदलकर निकल जाते हैं। और फिर समय का पहिया घूमता है। परिस्थितियां बदलती हैं। तब वही लोग मुस्कुराते हुए कहते हैं— "अरे! आपका नंबर तो कहीं खो गया था।"

सच तो यह है कि नंबर नहीं खोता, नीयत खो जाती है। संपर्क सूची नहीं मिटती, संवेदनाएं मिट जाती हैं। मोबाइल की मेमोरी नहीं भरती, मन की जगह छोटी हो जाती है।

इसलिए जीवन का सबसे बड़ा सबक यही है कि जो लोग आपके कठिन समय में आपका नंबर नहीं भूलते, वही वास्तव में आपके अपने हैं। बाकी लोग तो बस नेटवर्क की तरह हैं—सिग्नल अच्छा हो तो साथ, मौसम खराब हो तो गायब।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

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