Saturday, 13 June 2020

कोरोना काल में सांस्कृतिक बदलाव

विषय
भारतीय भाषा साहित्य एवं संस्कृति का वर्तमान वैश्विक परिदृश्य 
उपविषय
कोरोना काल में सांस्कृतिक बदलाव

वर्तमान में संपूर्ण विश्व कोरोना महामारी से ग्रसित है । विश्व का कोई भी देश इससे अछूता नहीं है । इसे तीसरे विश्व युद्ध की संज्ञा दी जा रही है । जिसमें परमाणु शक्ति का नहीं विषाणु शक्ति का प्रयोग किया गया है । चीन से सुलगी इस आग ने आज पूरे विश्व को अपनी चपेट में लेकर एक अग्नि कुंड में डाल दिया है । जिसमें जलकर कई महाशक्तियां तो अपना वर्चस्व खोती दिखाई दे रही हैं  वहीं भारत एक विश्वशक्ति के रूप में उभरकर सामने आया है । इस विषाणु त्रासदी ने जहां एक ओर विश्व के विकसित देशों को धूल चटा दी है वहीं दूसरी ओर इसका आक्रामक रूप भारत में अब देखने में आ रहा है । भारत के पास इस महामारी से निपटने के लिए बहुत - सी चुनौतियां हैं और उनसे निपटने के लिए भेदभाव मिटाकर एकजुट होने की आवश्यकता है ।

भारत की संस्कृति की बात कहें तो यह अत्यंत प्राचीन और सम्पन्न है । विश्व की  विभिन्न सभ्यताओं में प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति को बहुत सम्मान प्राप्त है । मानव सस्कृती का संबंध रचना, ज्ञान और कर्म से है । इसका संवर्धन निरंतर बना रहे इसलिए किसी भी संस्कृति का संस्कार संपन्न होना अती आवश्यक है । संस्कृति संपूर्ण विश्व के कल्याण के लिए होती है और भारत की संस्कृति की यही विशेषता आज उसे सर्वश्रेष्ठ बनाती है । जहां एक ओर अन्य समकालीन संस्कृतियां काल के गर्त में समा गई हैं वहीं भरथे संस्कृति आज भी विश्व के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत कर संपूर्ण भारतीय जनमानस को गौरवान्वित कर रही है । भारतीय संस्कृति की जड़े इतनी मजबूत हैं कि आज भी वसुधैव कुटुंबकम्  जैसे तत्व भारतीय संस्कृति की उत्कृष्ट विशेषता को परिलक्षित करते हैं ।

भारतीय संस्कृति की रीढ़ है उसकी सांस्कृतिक विरासत । एकता, अखंडता, अतुल्यता यही भारतीय संस्कृति की पहचान और गौरव है । भारतीय संस्कृति में निहित प्राचीनता, निरंतरता, धार्मिक सहिष्णुता, सार्वभौमिकता और समन्वयता जैसे अनेक तत्व प्राचीन काल से ही आज तक जुड़े हुए हैं । हमारी भारतीय संस्कृति की जड़े इतनी मजबूत हैं कि दो सौ वर्ष के अंग्रेज़ी शासन के बाद भी आज तक उसे कोई हिला नहीं सका और वर्तमान परिवेश में ब्रिटेन और अमेरिका जैसी महाशक्तियां भारत का लोहा मानती हैं । यह भारतीय संस्कृति के संस्कार ही हैं जो भारत के ऊपर राज करने वाली विश्व की महाशक्ति भारत के आगे सिर झुकाए खड़ी हैं । 

वर्तमान में संपूर्ण विश्व कोराेना महामारी से ग्रसित है । विश्व का प्रत्येक देश, क्षेत्र, गांव, जिला सभी इसकी चपेट में हैं । भारत भी इससे अछूता नहीं है ।इस आपदा से उत्पन्न संकट ने सभी को अपनी चपेट में ले रखा है । एक छोटा - सा विषाणु पूरे विश्व के लिए काल बन गया है । भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह समय बहुत चुनौतीपूर्ण है हलांकि विश्व के कई प्रमुख देशों ने इस महामारी से उबरने के लिए भारत द्वारा उठाए गए कदमों की सराहना की है वहीं अनेक महाशक्तियां भारत से सहयोग की भी कामना रख रही हैं । यह भारत की प्राचीन संस्कृति से उपजे संस्कार ही हैं कि इस महामारी काल में भारत अन्य देशों अमेरिका, श्रीलंका इत्यादि देशों की सहायता कर रहा है । भारत सायोग के रूप में इन देशों को दवाइयां और अन्य सहयोगी वस्तुएं उपलब्ध करवा रहा है । भारत के द्वारा उठाए गए इन सहयोगी क़दमों की सराहना भी की जा रही है । इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत ने इस चुनौतीपूर्ण समय को एक अवसर के रूप में लिया है जहां न केवल एक ओर इस महामारी को समाप्त करने के लिए पूरे भारत वर्ष दृढ़ संकल्पित है वहीं दूसरी ओर पूरे जन मानस को एकजुट करने, एकात्मकता को स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है । भारत का हर जन इस महामारी पर विजय पाने हेतु प्रयासरत है । यहां मैं यही कहूंगी कि जब मातृभूमि के प्रत्येक निवासी का मनोबल दृढ़ हो तो किसी भी युद्ध को जीता जा सकता है और ये समय पूरे विश्व के लिए किसी युद्ध से कम नहीं है । 

कोरोना काल में भारतीय संस्कृति में आए बदलावों की बात करें तो प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा तालाबंदी ( लाकडाउन ) 0.1 से 0.4 तक जितने भी कदम उठाए गए वह सराहनीय हैं जिसमें संपूर्ण भारत वर्ष के हर जन ने सरकार का साथ दिया है । कहते भी हैं कि कार्य सिद्धी हेतु हाथ की एक उंगली की नहीं अपितु सभी उंगलियों की आवश्यकता होती है । एक उंगली में वो शक्ति नहीं जो मुठ्ठी में होती है अर्थात एकजुट होकर ही किसी समस्या का समाधान आसानी से मिल सकता है । प्रधानमंत्री जी की एक अपील चाहे जनता कर्फ़्यू के समय देश के कर्मवीर योद्धाओं का थाली बजाकर आभार व्यक्त करना हो या फिर 5 अप्रैल को रात के समय दिये जलाकर भारत की एकजुटता दर्शाने की बात हो दोनों समय पूरा राष्ट्र एकजुट होकर उनके रास्ते पर चल निकला… यही दर्शाता है कि भारत की संस्कृति में अभी भी संस्कार जीवित हैं । दीए के प्रकाश से नई उम्मीद की नई किरण का विस्तार हो और देश में एकता और भाईचारे का यह दीप सदैव जलता रहे जिससे कोरोना पर विजय प्राप्त करने वाले योद्धाओं को सकारात्मक  ऊर्जा और शक्ति मिलती रहे । प्रधानमंत्री मोदी जी के द्वारा आभार व्यक्त करने की इस अपील का देश के हर नागरिक ने बिना किसी भेदभाव के पालन किया ।

लोगों के इस जज़्बे ने एकता भाईचारे की एक नई मिसाल पैदा की । संकट के समय में सभी की इस संकल्प शक्ति ने एक नई सकारात्मक ऊर्जा को उत्पन्न किया । आज लोगों के सामान्य नज़रिए में भी व्यापक परिवर्तन दृष्टिमत है । देश के नागरिक बिना भेदभाव के न केवल एक दूसरे की मदद कर रहे हैं बल्कि सच्ची सेवा में भी लगे हैं । सार्वभौमिकता पर बल देते हुए भारत अपनी उन्नति के साथ - साथ  संपूर्ण विश्व के कल्याण की भी कामना करता है ।

Thursday, 4 June 2020

वर्तमान परिवेश में कबीर पंथ अति प्रासंगिक

वर्तमान परिवेश में कबीर पंथ अति प्रासंगिक

यह तो घर प्रेम का, खाला का घर नाही ।
सिर उतारे भूंई धरे , तब पैठे घर माही ।।
कबीर जी के समाज पशुओं का झुंड नहीं है उसके दो तत्व हैं रागात्मकता और सहचेतना अर्थात मानव समाज में रागात्मक रूप से एक अतः संबंध होना चाहिए और जीवन की स्वस्थ व्यवस्था के लिए एक अभिज्ञान भी इसलिए कबीर ने वैष्णव मन पर बल दिया है। वैष्णव मन अर्थात् ऐसा मन जो दरियादिल है, जो दूसरों के बारे में सोचता है , जिसका संबंध लोकहित से होता है , को दूसरों के दुख - सुख का अनुभव कर सकता है; इसलिए कबीर के जीवन दर्शन का एक ही केंद्र है - " प्रेम "  यह वह प्रेम है जो अपने लिए नहीं है दूसरों के लिए है । यह वह प्रेम है जिससे ईश्वर को पाया जा सकता है । यह वह प्रेम है जो स्वार्थरहित है ।
भक्तिकालीन निर्गुण संत परंपरा के आधार स्तंभ संत कबीर के जन्म और मृत्यु से संबंधित अनेक किंवदंतियां प्रचलित हैं । ये गृहस्थ संत थे तथा राम और रहीम की एकता में विश्वास रखते थे । कहा जाता है कि सन् 1348 में काशी में उनका जन्म हुआ और सन् 1518 के आस - पास मगहर में देहांत हुआ । कबीर ने विधिवत् शिक्षा नहीं पाई थी उनका ज्ञान अनुभव पर आधारित था जो पर्यटन और सत्संगों से प्राप्त हुआ । वे हिंदी साहित्य के भक्ति - कालीन युग में ज्ञानाश्रयी - निर्गुण शाखा की काव्यधारा के प्रवर्तक थे ।

 वर्तमान परिवेश की बात कही जाए तो आज प्रेम की भावना लुप्त हो गई है । आज भी कबीर के समय जैसा जाति, धर्म इत्यादि का भेदभाव देखने को मिलता है । अनेक संप्रदायों के मन और विचार भी समान नहीं होते । कहीं भी धर्म के आधार पर, मंदिर - मस्ज़िद के नाम पर हिंसा भड़क ही जाती है । ऐसी स्थिति से निपटने के लिए आज कबीर पंथ की आवश्यकता है जो इन सभी के दिलों से दूरियों को मिटा सके । कबीर पंथ लोकहितकारी पंथ है उनकी शिक्षाएं भेदभाव से परे सहिष्णुता और प्रेम का संदेश देती हैं । 

कबीर के समय हिन्दू जनता पर मुस्लिम आतंक का कहर छाया हुआ था । कबीर ने अपने पंथ को इस ढंग से सुनियोजित किया जिससे मुस्लिम मत की ओर झुकी हुई जनता सहज ही इनकी अनुयायी हो गई । उन्होंने अपनी भाषा सरल और सुबोध रखी ताकि आम आदमी तक उनकी अमृत वाणी पहुंच सके । इससे दोनों समुदायों के परस्पर मिलन में सुविधा होगी । कबीर को शांतिमय जीवन प्रिय था और वे आहिंसा, सत्य, सदाचार आदि गुणों के प्रशंसक थे । कबीर राम, रहीम और काशी, काबा में कोई भेद नहीं मानते थे । उनके अनुसार दोनों  स्थान ईश्वर के पवित्र स्थल हैं और ईश्वर की उपासना के लिए प्रयोग होते हैं । उनके अनुसार ईश्वर एक है और दोनों ही रूपों में हम ईश्वर को याद करते हैं ।

कबीर का दृष्टकोण सुधारवादी ही रहा है । कबीर अपने नीति परक, मंगलकारी सुझावों के द्वारा जनता को आगाह करते रहे और चेतावनी देते रहे कि जनकल्याण हेतु उनकी बातों को ध्यान से सुनें और अमल में लाएं । आधुनिक संदर्भ में भी यही बात कही जा सकती है । आज भी भारतीय समाज की वही स्थिति है जो कबीर काल में थी । सामाजिक आडंबर, भेदभाव, ऊंच - नीच की भावना , धार्मिक भेदभाव आज भी समाज में व्याप्त हैं । भ्रष्टाचार चहुं ओर व्याप्त है । समाज के प्रत्येक स्तर पर नैतिक मूल्यों का विघटन देखा जा सकता है । देश में सत्ता पक्ष से लेकर जनता तक किसी के भी विचार एक - दूसरे से मेल नहीं खाते । सभी अपनी - अपनी डफली
 और अपना - अपना राग अलाप रहे हैं और देश को दरिद्रता की ओर ले जा रहे हैं जहां अंधकार के अलावा कुछ नहीं है । इसी अंधकार से बचने के लिए आज आवश्यकता उन्हीं मूल सिद्धान्तों, विचारों और शिक्षा की है जिससे उजियारे को प्राप्त किया का सके । 
वैष्णव संत आचार्य रामानंद के शिष्य कबीर जिनकी शिक्षा और विचार आज वर्तमान परिवेश में अति प्रासंगिक हैं जिनको अपनाकर अपनत्व, भाईचारे की भावना को प्राप्त किया का सकता है । कबीर जी की दृढ़ मान्यता थी कि कर्मों के अनुसार ही गति मिलती है, स्थान विशेष के कारण नहीं । 

डॉ नीरू मोहन ' वागीश्वरी '





Sunday, 31 May 2020

Tuesday, 26 May 2020

वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग की ऑनलाइन वेबगोष्ठी(वेबिनार) का हुआ सफल समापन:

वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग की ऑनलाइन वेबगोष्ठी(वेबिनार) का हुआ सफल समापन:
चतुर्थ एवं समापन दिवस  : 24 मई,2020
वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग,मानव संसाधन विकास मंत्रालय,भारत सरकार नई दिल्ली तथा बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी के संयुक्त तत्वावधान में दिनांक 21 मई से 24 मई,2020 तक  वेबगोष्ठी (वेबिनार) का आयोजन किया जा रहा है। 
उक्त वेब गोष्टि का शीर्षक "सामाजिक एवं वैज्ञानिक शोध अध्ययन में भारतीय भाषाओं की तकनीकी शब्दावली की भूमिका" रखा गया था ।  आज वेबगोष्टि अपने उद्देश्यों को पूरा करते हुए सफल  हुई।
वेबगोष्ठी के चतुर्थ एवं समापन दिवस 24 मई,2020 को तकनीकी सत्रों में वेबगोष्टि संचालन का कार्य इंजी जयसिंह रावत, स.वैज्ञानिक अधिकारी ने किया तथा कार्यक्रम प्रभारी श्री शिव कुमार चौधरी ,स. निदेशक ने चतुर्थ दिवस की वेबगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत की।
आयोग अध्यक्ष  प्रो अवनीश कुमार जी ने सभी विद्वानों और सहभागियों का वेबगोष्टि में सक्रिय भाग लेने के लिए हार्दिक अभिनंदन एवं स्वागत  किया। 
     वेब गोष्टि के लिए लगभग 2000 से अधिक  ऑनलाइन रेजिस्ट्रेशन प्राप्त हुए थे।  प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय दिवस की भाँति चतुर्थ/समापन दिवस भी विभिन्न तकनीकी सत्रों में औसतन 700 से अधिक सहभागियों ने इस वेबगोष्टि मे ऑनलाइन सहभागिता दिखाई। 
   आज चतुर्थ एवं समापन दिवस 24 मई,2020 को निम्नलिखित विद्वान वक्ताओं को संसाधक/विषय विशेषज्ञ के रूप में आमंत्रित किया है :-
(1) प्रो एम. वैंकटेश्वर ,प्रोफेसर(भाषा विज्ञान) ओस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद
  प्रो एम. वैंकटेश्वर ने भाषा विज्ञान में तकनीकी शब्दावली पर रुचिकर व्याख्यान प्रस्तुत किया।

(2) प्रोफेसर ममता चंद्रशेखर, प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष(राजनीति विज्ञान विभाग) देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर (वर्तमान में एस ए वी राजकीय वाणिज्य एवं कला महाविद्यालय, इंदौर)
प्रोफेसर ममता चंद्रशेखर जी ने राजनीति विज्ञान के परिपेक्ष्य में तकनीकी शब्दावली  पर बहुत ही रुचिकर व्याख्यान(ppt) दिया।

(3) डॉ संतोष खन्ना, पूर्व वरिष्ठ अधिकारी,लोकसभा सचिवालय, दिल्ली
डॉ संतोष खन्ना जी ने वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली की सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वैधानिक स्वीकार्यता तथा इसके अनुप्रयोग पर सारगर्भित व्याख्यान प्रस्तुत किया।

(4) आयोग अध्यक्ष  प्रो अवनीश कुमार जी ने  वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली निर्माण सिद्धान्त ,अनुप्रयोग, समस्याएँ एवं निराकरण पर सारगर्भित व्याख्यान (PPT)प्रस्तुत किया 

(5) डॉ गजेंद्र प्रताप सिंह , असिस्टेंट प्रोफेसर , 
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय(JNU),दिल्ली
     डॉ गजेंद्र प्रताप सिंह जी ने गणितीय मॉडल और वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली पर लाभप्रद, ज्ञानवर्धक एवं सारगर्भित व्याख्यान प्रस्तुत किया।
       
आज चतुर्थ दिवस भी सभी विद्वान वक्ताओं के उपयोगी एवं रुचिकर व्याख्यान प्रस्तुत करने से  सहभागियों ने गहरी रुचि दिखाते हुए चैटबॉक्स में अपने फीडबैक एवं विचार व्यक्त किये। सहभागियों द्वारा तकनीकी शब्दावली और शोध अध्ययन से जुड़े विषयों पर पूछे गए प्रश्नों का समाधान भी किया गया।
   चतुर्थ दिवस के तकनीकी सत्र के अंत मे आयोग अध्यक्ष प्रो अवनीश कुमार जी वेबगोष्टि को सफल बनाने के लिए आज आमंत्रित सभी वक्ताओं और सहभागियों का आभार व्यक्त किया 
   चतुर्थ दिवस के समापन सत्र मे आयोग अध्यक्ष महोदय  प्रो. अवनीश कुमार,वेबगोष्टि प्रभारी अधिकारी श्री शिव कुमार चौधरी,सहायक निदेशक एवं वेबगोष्टि संचालक
 श्री जयसिंह रावत,स.वैज्ञानिक अधिकारी ने आमंत्रित सभी अतिथियों/ विद्वानों/विशेषज्ञों/वक्ताओं , सहभागियों तथा विश्विद्यालय के कुलपति महोदय ,समस्त फैकल्टी स्टाफ और वेबगोष्टि से जुड़े पूरे टेक्निकल एक्सपर्ट्स जिन्होंने ऑनलाइन वेबगोष्टि को व्यवस्थित तरीके से अपने उद्देश्य तक पहुँचाया, सभी का आभार एवं धन्यवाद व्यक्त किया ।
   बुंदेलखंड विश्वविद्यालय ,झाँसी से स्थानीय समन्वयक प्रोफेसर एस.पी. सिंह , निदेशक (अकादमिक)  द्वारा विश्वविद्यालय की ओर से आज के समापन दिवस और चार दिवसीय वेबगोष्टि का प्रतिवेदन एवं आभार व्यक्त किया गया। 
लगभग चार घंटे चली ऑनलाइन वेब गोष्ठी के संकलित फोटो चित्र प्रस्तुत।

मजदूरों का महानायक …सोनू

मजदूरों का महानायक …सोनू

सोनू मेरा प्यारा बेटा , सभी का प्यारा सोनू , सोनू तू न सबसे प्यारा है और सब को प्यारा । सूरज की पहली किरण को देखकर सोनू को मां की कही यही बातें याद आ रही थीं । सोनू सोच रहा था पूरा देश महामारी से बेहाल है और प्रवासी मजदूरों का तो और भी बुरा हाल है उनके पास तो सिर छिपाने के लिए जगह भी नहीं है अपने शहरों , गावों और अपनो से दूर जहां अब कोई भी उनका अपना नहीं है कैसे रहेंगे । जिन्हें उनके मालिकों ने भी जहां वह करते थे निकाल दिया गया है वह भी बिना कोई पैसे और तनख्वाह दिए । वह सोच रहा था कि कैसे ये अपने घर अपनों के पास पहुंचेंगे और यह भी नहीं पता कि यह स्थिति कब तक रहने वाली है । अगर ये अपने अपने गावों पहुंच जाएंगे तो खेतीबाड़ी तो करके अपना गुजारा पानी कर लेंगे और कहने को अपनी छत भी होगी । अगर सच में मां की बात और विश्वास और अपने नाम के अर्थ को सार्थक करना है तो इस महामारी काल में उन लोगों की मदद की जाए जिनकी सही अर्थों में मदद की जरूरत है।

सोनू अपने घर वालों से बात करता है कि सभी अपनी अपनी तरह से इस स्थिति से उबरने के लिए देश की निस्वार्थ सेवा कर रहे हैं और जरूरतमंदों के लिए राशन और रोटी पानी की व्यवस्था भी कर रहे हैं और बहुत से ऐसे है जो प्रधानमंत्री covid १९ सेवा कोश में अपनी चादर के अनुसार पैसे  जमा कर रहे हैं । 
सोनू कहता है अगर हमें इन प्रवासी मजदूरों की सच्ची मदद करनी है तो क्यों न जितना संभव हो सके हम इनको इनके घर पहुंचा दें जिससे ये अपने आप को सुरक्षित महसूस करें क्योंकि अपनी जन्मदात्री मिट्टी और अपनों का साथ मुसीबत से उबरने की ताकत देता है ।
सोनू तभी फैसला कर लेता है कि वह अपनी सेवा इसी प्रकार देगा और जहां तक संभव हो सकेगा वह इनको घर वापिस भेजने में इन मजदूरों की मदद करेगा । 
बस फिर क्या सोनू अपना मिशन शुरू कर देता है और मजदूरों के लिए वातानुकूलित बसों का इंतजाम, रास्ते के लिए खाने पीने का प्रबंध और सफर में इस्तेमाल होने वाली अवश्य सामग्री का प्रबंधक करवाता है और मजदूरों का मसीहा बन इस सदी के korona वर्ष 2020 के महानायक के रूप में covid १९ कर्मवीर योद्धा की भूमिका में सभी का मन जीत लेता है ।
मजदूरों को रवाना करता हुआ दोस्तों क्या आप सभी से फिर मुलाकात होगी , क्या आप लौटकर आयेंगे ।
सभी मजदूर सोनू का धन्यवाद करते हुए , जहां आप जैसे लोग हो वहां दोबारा आने का मन जरूर करेगा । सोनू बस से नीचे उतरता है सभी को हाथ हिला कर विदा करते हुए जल्दी मिलेंगे दोस्तों… सभी बसे दूर ओझल हुई चली जाती हैं सोनू लबी सांस लेता है और अगले दिन की तैयारी शुरू कर देता है ।
 
यह कहानी हमें संदेश देती है कि दूसरों की सेवा में ही परम सुख की प्राप्ति होती है । 
रचनाकार
डॉ नीरू मोहन ' वागीश्वरी '
शिक्षाविद् / प्रेरक वक्ता/ समाजसेविका / लेखिका/कवयित्री

Friday, 22 May 2020

हम मजदूर हैं … हमारे पास व्यवहार की दौलत है ।

हम मजदूर हैं … हमारे पास व्यवहार की दौलत 

आज फिर ठेकेदार नहीं आया । कोई भी मजदूर ढंग से काम ही नहीं कर रहा । ठेकेदार होता है तो किसी के हाथ पैर नहीं रुकते चाय भी तीन टाइम चाहिए और साथ में नाश्ता पानी भी । इस ठेकेदार से ठेका वापिस ले लेता हूं किसी दूसरे को देता हूं । नुकसान ही तो उठाना पड़ेगा । देखो तो ज़रा 7 दिन हो गए कोई खेर खबर ही नहीं है ।   ये एक 1 साल के काम को 2, 3 साल लगा देगा । 
कहते हुए सूरज सभी मजदूरों पर भड़क रहा था । 7 दिन हो गए थे सूरज को यूं ही मजदूरों पर भड़कते हुए । 
आज किसी को चाय नाश्ता नहीं मिलेगा । सारा समय बीड़ी फूकने और  चाय पानी में ही लगा देते हो । काम तो 2, 3 धंटे ही करते हो दिहाड़ी पूरे दिन की चाहिए ।
मजदूर गिरधारी को सूरज की बात सुनकर गुस्सा आ जाता है । साहब ऐसे मत कहिए । काम और मेहनत की रोटी खाते हैं । आप खुद ही देखिए कितनी ठंड पड़ रही है । दस माले तक मेरी मेहरारू, बालक और ये मजदूर ईंट सीमेंट चढ़ाते हैं । ट्रक वाला तो रात को बाहर सड़क पर ही छोड़ जाता है आज सुबह 5 बजे तक सारा सामान सड़क से अंदर तक डाल है अभी ऊपर भी चढ़ाना है । बच्चों का खेल थोड़ी ना है ठंड में हाथ सुन हो जाते हैं । आप तो साहब हैं ना आपको क्या पता ?  साहब हमारी मेहनत पर यूं पानी ना फेरो । 
सूरज तिलमिलाकर काम करते हो तो पैसे भी लेते हो मुफ़्त में थोड़ी न करते हो ।
गिरधारी दुखी मन से , हां साहब हम मजदूर है न इसीलिए आपका हक बन ही जाता है हमें कुछ भी कहने का । हम भी आपकी तरह पढ़े - लिखे होते तो हम भी आपकी तरह बाबू सेठ होते । हमारा तो नसीब ही यही है दूसरों के घरोंदे बनाते हैं और अपना ठोर ठिकाना ही नहीं है । जब से गांव से आए हैं खानाबदहोश की तरह घूमते रहते हैं जहां काम मिल जाता है वहीं डेरा डाल लेते हैं । बाकी ठेकेदार की मेहर । 
गिरधारी की बात अनसुनी करते हुए सूरज फोन सुनने लगता है । अरे ठेकेदार साहब कहां गुम हो गए आप , 7 दिनों से कोई खेर खबर ही नहीं , साइट पर भी सभी अपनी मनमानी कर रहे हैं ।भाई ऐसे तो काम नहीं चलेगा काम करना है तो सही तरह करो नहीं तो मैं ठेका वापिस ले लूंगा, बहुत है अभी भी काम को लेने वाले । मैंने तो आपसदारी देखी मगर अब क्या कर सकता हूं ?
अब बताओ कहां हो ?
सूरज साहब मैं जयपुर में फंसा हूं आपको तो पता है कोरोना अब भारत में भी आ गया है यहां आवाजाही बिलकुल बंद हो गई है । सुनाई में आ रहा है कि सभी जगह लॉक डाउन हो गया है ।
आप ऐसा करिए मेरे मजदूरों को 7 दिन की दिहाड़ी दे दो बेचारे समय रहते अपने - अपने घर तो पहुंच ही जाएंगे ।150 रुपए रोज के हिसाब से एक मजदूर की 7 दिन की दिहाड़ी 1050 रुपए बनती है आप 1500 - 1500 सभी को दे देना इनकी थोड़ी मदद ही हो जाएगी । बाकी हिसाब आकर करता हूं यहां का माहौल देखकर निकालने की कोशिश करता हूं ।
सूरज ठीक है कहते हुए फोन काट देता है । गिरधारी सभी से कह दो काम बंद कर देंगे । आज से अभी काम बंद रहेगा सरकार का ऐलान किया है कि सभी काम धंधे covid १९ के चलते अभी बंद रहेंगे । सभी अपनी 7 दिन की दिहाड़ी लेे लो और साइट खाली कर दो ।
सूरज सभी को 1500 की जगह 1000 रुपए देकर कहता है कि 50 रुपए चाय पानी के काट लिए । गिरधारी मन में … गरीबों की मेहनत का पैसा लेकर कितना भर लेगा सभी यहीं पर रह जाना है । 
गिरधारी मजदूरों से , अपना अपना डेरा हटाओ और सामान बांधो ।
रामू मजदूर गिरधारी से कहता है कि अब वह कहां जाएंगे । गिरधारी कहता है गांव ही चलते है पता नहीं कब तक का बंद हो । सभी मान जाते हैं । सूरज अपनी गाड़ी में बैठकर निकाल जाता है ।
गिरधारी मन ही मन शहर के पैसे वाले लोग कितने रूखे होते हैं मदद तो करने से रहे मजदूरों का भी पैसा खा जाते हैं चलों अपना - अपना व्यवहार ।
सभी 20 मजदूर एक साथ हो लेते हैं जिसमें महिलाएं और बच्चे भी हैं । कुछ दूरी पर भीड़ दिखाई देती है गाड़ी तो सूरज साहब की लग रही है गिरधारी कहता है । रामू   ये तो सूरज साहब की ही गाड़ी है नज़दीक जाकर भीड़ को हटाते हुए । अरे ये तो अपने सूरज साहब हैं । खून से लथपथ दर्द से तड़पता सूरज थोड़े होश हवास में सड़क पर पड़ा है कोई उसकी मदद के लिए आगे नहीं आ रहा । गिरधारी सूरज को अपने मजदूर भाइयों की मदद से अस्पताल तक पहुंचता है और उसके घर ख़बर कर देता है । सूरज कुछ बोल नहीं पा रहा है परन्तु आंखो ही आंखों में गिरधारी और अन्य मजदूरों से मानो माफ़ी मांग रहा है । 

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि परोपकरिता ही सबसे बड़ा धर्म और कर्तव्य है । पैसा समाप्त हो जाता है परन्तु दूसरों के साथ किया गया आपका व्यवहार सदैव साथ और याद रहता है इसलिए दूसरों के काम आईए  किसी कि मेहनत का हक छीनकर हम सुख प्राप्त नहीं कर सकते ।

अच्छे बने , अच्छे कर्म करें और दूसरों के काम आएं ।

धन्यवाद 
डॉ नीरू मोहन ' वागीश्वरी '