स्वर्ग जाने की सीढ़ी
गाँव के बीचों-बीच एक दिन एक महात्मा जी आए। उन्होंने घोषणा की—
"मैं स्वर्ग जाने की सीढ़ी बेच रहा हूँ। जो इसे खरीद लेगा, उसके लिए स्वर्ग का रास्ता आसान हो जाएगा।"
बस फिर क्या था!
सुबह तक जहाँ सब्ज़ी वालों के ठेले लगते थे, वहाँ अब सीढ़ी खरीदने वालों की कतार थी।
कोई बोला, "मुझे दस पायदान वाली देना।"
दूसरा बोला, "मुझे सबसे ऊँची वाली चाहिए। आखिर मैं बड़ा आदमी हूँ।"
तीसरा बोला, "क्या ईएमआई पर मिल जाएगी? स्वर्ग भी किस्तों में मिल जाए तो अच्छा है!"
महात्मा मुस्कुराते रहे। सीढ़ियाँ बिकती रहीं।
एक नेता जी आए। बोले, "मेरे लिए वीआईपी सीढ़ी निकालो। मुझे लाइन में लगने की आदत नहीं है।"
एक व्यापारी बोला, "थोड़ी छूट कर दीजिए।"
एक बाबू ने पूछा, "कोई सिफ़ारिश वाला रास्ता नहीं है क्या?"
एक धर्मगुरु बोले, "मेरे अनुयायियों को थोक में दे दीजिए।"
महात्मा हर किसी को सीढ़ी देते रहे।
शाम होने तक पूरा मैदान सीढ़ियों से भर गया।
लेकिन एक अजीब बात हुई...
कोई ऊपर नहीं जा रहा था।
सब अपनी-अपनी सीढ़ी की सफ़ाई कर रहे थे।
कोई उसे रंग रहा था।
कोई उस पर अपना नाम लिख रहा था।
कोई उसकी फोटो सोशल मीडिया पर डाल रहा था—
"देखिए, मैंने स्वर्ग की सीढ़ी खरीद ली!"
लाइक्स बढ़ रहे थे...
लेकिन ऊँचाई नहीं।
इतने में एक बूढ़ी औरत आई।
उसने महात्मा से पूछा,
"बाबा, सीढ़ी तो सबके पास है... लेकिन स्वर्ग कौन जाएगा?"
महात्मा मुस्कुराए और बोले—
"बेटी, सीढ़ी खरीदने से कोई ऊपर नहीं जाता। ऊपर वही जाता है जो पहला कदम रखता है।"
भीड़ एक-दूसरे का चेहरा देखने लगी।
महात्मा ने आगे कहा—
"आज लोग धर्म खरीद रहे हैं, लेकिन धैर्य नहीं।
माला खरीद रहे हैं, लेकिन मन नहीं बदल रहे।
मंदिर बना रहे हैं, लेकिन भीतर का अहंकार नहीं तोड़ रहे।
दान दे रहे हैं, लेकिन अपमान बाँटना नहीं छोड़ रहे।
सीढ़ियाँ बहुत हैं...
चलने वाले बहुत कम हैं।"
इतना सुनते ही कुछ लोगों ने अपनी सीढ़ियाँ छोड़ दीं।
लेकिन अधिकांश लोग वहीं खड़े रहे...
क्योंकि उन्हें स्वर्ग नहीं,
स्वर्ग की 'सेल्फ़ी' चाहिए थी।
संदेश
आज हर व्यक्ति स्वर्ग जाने का शॉर्टकट खोज रहा है।
कोई चमत्कार में, कोई दिखावे में, कोई पद में, कोई पैसे में।
जबकि स्वर्ग की असली सीढ़ी लकड़ी या लोहे की नहीं होती।
उसकी हर पायदान पर एक शब्द लिखा होता है—
सत्य, सेवा, करुणा, क्षमा, विनम्रता, ईमानदारी और प्रेम।
जो इन पायदानों पर रोज़ चढ़ता है,
उसे स्वर्ग मरने के बाद नहीं,
जीते-जी अपने भीतर मिल जाता है।
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