कीचड़ में खिला नाम
शहर में उस दिन बारिश नहीं हुई थी।
फिर भी सड़क पर कीचड़ था।
अजीब बात यह थी कि कीचड़ सड़क पर कम और लोगों की बातचीत में ज्यादा था।
सुबह से एक ही खबर हवा में तैर रही थी—
“शर्मा जी ने चोरी की है।”
किसने कहा था?
किसी को मालूम नहीं।
किसने देखा था?
किसी ने नहीं।
लेकिन शाम तक पूरी कॉलोनी में यह तय हो चुका था कि शर्मा जी चोर हैं।
शर्मा जी सरकारी स्कूल में चपरासी थे।
ईमानदार इतने कि लोग उनकी ईमानदारी की भी शिकायत करते थे।
“अरे भाई, थोड़ा बहुत तो आदमी अपने लिए रखता ही है!”
मगर शर्मा जी ने कभी कुछ नहीं रखा।
सिवाय अपनी पुरानी साइकिल के।
वह साइकिल भी ऐसी थी कि उसे देखकर चोर भी कहता—
“इसमें चोरी करने लायक बचा ही क्या है?”
उस दिन स्कूल में प्रधानाचार्य की अलमारी से पचास हजार रुपये गायब हो गए।
सबकी नजर शर्मा जी पर गई।
क्यों?
क्योंकि चाबी उन्होंने संभालकर रखी थी।
बस।
गरीब आदमी के खिलाफ सबूत जुटाना बहुत आसान होता है—उसका गरीब होना ही काफी है।
अगले दिन शर्मा जी को स्कूल से निलंबित कर दिया गया।
मोहल्ले में कानाफूसी शुरू हो गई।
“हम तो पहले से जानते थे…”
“चेहरा ही ऐसा है…”
“इतना सीधा भी कोई होता है?”
शर्मा जी चुप रहे।
उन्होंने किसी सफाई की कोशिश नहीं की।
बस रोज सुबह स्कूल के बाहर वाली सड़क पर पड़े कीचड़ को अपनी पुरानी चप्पल से किनारे करते रहे।
एक दिन उनका दस साल का बेटा बोला—
“बाबूजी, आप सफाई क्यों करते हैं? लोग तो आपको ही गंदा कह रहे हैं।”
शर्मा जी हँस दिए।
“बेटा, रास्ते का कीचड़ साफ करना आसान है।”
“फिर मुश्किल क्या है?”
“लोगों के मन का।”
कुछ दिन बाद पुलिस आई।
अलमारी फिर खोली गई।
पैसे वहीं थे।
पुरानी फाइलों के नीचे।
प्रधानाचार्य को याद ही नहीं रहा था कि उन्होंने पैसे वहाँ रखे थे।
पूरी कॉलोनी में सन्नाटा छा गया।
जिसे सब चोर कह रहे थे, वह निर्दोष निकला।
लेकिन तब तक शर्मा जी की नौकरी जा चुकी थी।
प्रतिष्ठा जा चुकी थी।
लोगों की नजर में उनकी ईमानदारी भी जा चुकी थी।
क्योंकि अफवाह की एक खासियत होती है—
वह सच से पहले पहुँचती है और माफी के बाद भी रहती है।
अगले रविवार कॉलोनी की समिति की बैठक बुलाई गई।
अध्यक्ष ने खड़े होकर कहा—
“हमें शर्मा जी से सार्वजनिक रूप से माफी माँगनी चाहिए।”
तालियाँ बजीं।
शर्मा जी पीछे बैठे रहे।
अध्यक्ष ने उन्हें आगे बुलाया।
“शर्मा जी, कहिए… आपको हमसे क्या शिकायत है?”
शर्मा जी ने जेब से एक कागज निकाला।
सबको लगा, शायद वे कोई शिकायत लिखकर लाए हैं।
उन्होंने कागज अध्यक्ष को पकड़ा दिया।
उस पर सिर्फ एक पंक्ति लिखी थी—
“मुझे चोर कहने वालों की सूची नहीं चाहिए।”
अध्यक्ष ने पूछा—
“फिर?”
शर्मा जी बोले—
“बस इतना लिख दीजिए कि अगली बार किसी गरीब पर कीचड़ उछालने से पहले… यह देख लिया जाए कि हाथ किसके हैं।”
कमरे में फिर सन्नाटा था।
तभी उनका बेटा पीछे से दौड़ता हुआ आया।
उसने कहा—
“बाबूजी!”
शर्मा जी ने मुड़कर देखा।
बेटे के हाथ में वही पुरानी चप्पल थी।
“यह मिल गई!”
“कहाँ?”
“स्कूल के पीछे।”
शर्मा जी ने चप्पल ली।
उसके नीचे मोटी परत में कुछ चिपका हुआ था।
उन्होंने खुरचकर देखा।
एक छोटा-सा पाँच सौ का नोट।
कमरे में बैठे सभी लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
अध्यक्ष घबरा गया।
“तो… पैसे सच में…?”
शर्मा जी ने नोट को गौर से देखा और मुस्कुरा दिए।
“यह मेरा नहीं है।”
“फिर किसका है?”
शर्मा जी ने नोट वापस कीचड़ में फेंक दिया।
“जिसका भी हो… अब रहने दीजिए।”
सब चौंक गए।
उन्होंने धीरे से कहा—
“जिस कीचड़ में सच दबा हो, उसे खोदने से पहले यह तय कर लीजिए कि कहीं आपके अपने हाथ तो गंदे नहीं हो जाएँगे।”
और वह उठकर चले गए।
उस दिन पहली बार लोगों ने सड़क के कीचड़ को ध्यान से देखा।
उन्हें लगा—
कीचड़ गंदा जरूर होता है,
लेकिन हर कीचड़ में गिरा आदमी गंदा नहीं होता।
कभी-कभी…
गंदगी उस आदमी में नहीं होती जिस पर कीचड़ पड़ा है,
गंदगी उस हाथ में होती है जिसने कीचड़ उछाला है।
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