मेरे से मिलने आए कान्हा
उस रात मैं बिल्कुल अकेला था।
कमरे में सन्नाटा था, लेकिन मेरे भीतर शोर था।
रिश्तों के टूटने का शोर...
उम्मीदों के बिखरने का शोर...
और उन चेहरों का शोर, जिन्हें मैंने अपना समझा था।
कहते हैं कि अपने कभी धोखा नहीं देते।
लेकिन जीवन ने सिखाया कि कभी-कभी सबसे गहरे घाव वही देते हैं, जिनके लिए हम सबसे अधिक जीते हैं।
मैं सोचता रहा—
क्या रिश्ते केवल स्वार्थ तक ही सीमित रह गए हैं?
क्या बड़े-बुज़ुर्गों के सम्मान की कीमत अब सुविधाओं से तय होती है?
क्या त्याग का कोई मोल नहीं बचा?
इन सवालों का उत्तर किसी इंसान के पास नहीं था।
मैंने थके हुए मन से श्रीकृष्ण की तस्वीर के सामने दीपक जलाया।
बस इतना ही कहा—
"कान्हा... अब मुझसे नहीं होता।
अगर सच में हो, तो एक बार मिल जाओ।"
आँखें कब बंद हुईं, पता ही नहीं चला।
अचानक बाँसुरी की मधुर धुन सुनाई दी।
मैंने आँखें खोलीं।
सामने पीताम्बर धारण किए, मोरपंख सजाए, अधरों पर मुस्कान लिए कान्हा खड़े थे।
मैं फूट-फूटकर रो पड़ा।
मैंने कहा,
"कान्हा...
जिन्हें अपना माना, वही बदल गए।
जिनके लिए जीवन लगा दिया, उन्होंने ही मुझे अकेला छोड़ दिया।"
कान्हा मुस्कुराए।
बोले,
"तुम्हें लोगों ने नहीं बदला...
उन्होंने तुम्हारी आँखों से भ्रम हटाया है।
जिसे तुम अंत समझ रहे हो,
मैं उसे तुम्हारी नई शुरुआत बना रहा हूँ।"
मैंने पूछा,
"लेकिन इतना दर्द क्यों?"
कान्हा ने कहा,
"सोना आग में तपे बिना कुंदन नहीं बनता।
और भक्त परीक्षा के बिना भक्त नहीं बनता।"
मैं चुप था।
उन्होंने फिर कहा,
"तुम लोगों के व्यवहार को अपना भाग्य मत समझो।
जो तुम्हें छोड़ गए, उन्हें छोड़ दो।
लेकिन अपने भीतर का प्रेम मत छोड़ना।
क्योंकि जो कटु होकर जीता है, वह हर दिन हारता है।
जो विश्वास रखकर जीता है, उसे मैं कभी अकेला नहीं छोड़ता।"
इतना कहकर कान्हा ने मेरा हाथ थाम लिया।
उस स्पर्श में ऐसी शांति थी, जो वर्षों से नहीं मिली थी।
सुबह जब मेरी आँख खुली, तो कमरा वैसा ही था।
दीपक अब भी जल रहा था।
लेकिन मैं बदल चुका था।
अब मैं रिश्तों से अपेक्षा नहीं करता।
सम्मान मिले तो धन्यवाद,
न मिले तो भी शिकायत नहीं।
क्योंकि उस रात मैंने जान लिया था—
जब दुनिया के सारे दरवाज़े बंद हो जाते हैं,
तब वृंदावन का एक द्वार खुलता है।
और उस द्वार पर खड़े होकर कान्हा मुस्कुराते हुए कहते हैं—
"जब सब साथ छोड़ दें, तब समझ लेना...
अब मैं स्वयं तुम्हारा हाथ पकड़ने आया हूँ।"
उस दिन से मैंने लोगों के बदलते चेहरों को नहीं,
कान्हा की स्थिर मुस्कान को अपना सहारा बना लिया।
क्योंकि रिश्ते साथ दें या न दें,
कान्हा कभी अपने भक्त का साथ नहीं छोड़ते।
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