शीर्षक: "शादी के छह पड़ाव… और सातवाँ सच"
"शादी एक दिन का शोर नहीं होती, यह दो दिलों के बीच उम्रभर चलने वाला संवाद होती है।"
गाँव के पुराने घर की चौखट पर बैठी दादी आज फिर मुस्कुरा रही थीं। सामने आँगन में पोती की शादी की तैयारियाँ चल रही थीं। कहीं हल्दी की खुशबू थी, कहीं गीतों की गूँज और कहीं मोबाइल से फोटो खींचने की होड़।
पोती ने दादी से पूछा—
"दादी, आजकल लोग कहते हैं शादी तो बस एक इवेंट है… एक दिन की पार्टी। क्या सच में ऐसा है?"
दादी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
"नहीं बिटिया, शादी कोई एक दिन का कार्यक्रम नहीं, यह छह पड़ावों से गुजरने वाली जिंदगी की कहानी है।"
पहला पड़ाव — रिश्ता।
दादी बोलीं—
"जब दो लोग पहली बार मिलते हैं, तब केवल चेहरे नहीं मिलते, दो संस्कार, दो परिवार और दो सपने मिलते हैं। आजकल लोग फोटो देखकर रिश्ता तय कर लेते हैं, लेकिन जिंदगी फोटो से नहीं, स्वभाव से चलती है।"
दूसरा पड़ाव — वचन।
"सगाई की अंगूठी उंगली में पहनाई जाती है, लेकिन असली वादा दिल में लिखा जाता है। अंगूठी खो जाए तो भी रिश्ता बचा रहना चाहिए।"
तीसरा पड़ाव — तैयारी।
दादी हँसते हुए बोलीं—
"आजकल शादी की तैयारी में लाखों खर्च हो जाते हैं, लेकिन कई बार एक-दूसरे को समझने के लिए पाँच मिनट भी नहीं मिलते। सजावट घर की होती है, पर रिश्ता दिल का सजना चाहिए।"
चौथा पड़ाव — विवाह।
"फेरे सिर्फ अग्नि के सामने नहीं होते बिटिया, असली फेरे तो तब होते हैं जब पति-पत्नी एक-दूसरे के दुख के चार कदम साथ चलें।"
पाँचवाँ पड़ाव — गृहस्थी।
"शादी के बाद पता चलता है कि जिंदगी केवल हनीमून की तस्वीर नहीं होती। कभी बजट की चिंता होती है, कभी जिम्मेदारियों का बोझ। वहीं से प्रेम की असली परीक्षा शुरू होती है।"
छठा पड़ाव — साथ निभाना।
दादी की आँखें नम हो गईं।
"जब बाल सफेद हो जाएँ, चेहरे पर झुर्रियाँ आ जाएँ और फिर भी दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़कर कहें— 'तुम साथ हो तो सब ठीक है'… वही शादी की असली जीत है।"
पोती चुपचाप दादी की बातें सुन रही थी।
तभी बाहर से आवाज आई—
"दादी, आपकी पुरानी शादी की फोटो कहाँ है?"
दादी ने दीवार की ओर देखा। वहाँ दादा जी के साथ उनकी पुरानी तस्वीर लगी थी। उन्होंने कहा—
"देखो बिटिया, उस समय न बड़े होटल थे, न महंगे कपड़े, न सोशल मीडिया पर दिखाने की चिंता। बस एक विश्वास था कि जिंदगी चाहे जैसी हो, साथ नहीं छोड़ेंगे।"
फिर दादी मुस्कुराईं और बोलीं—
"आजकल लोग शादी में मेहमानों की संख्या गिनते हैं, खर्चे का हिसाब रखते हैं… लेकिन भूल जाते हैं कि शादी की सफलता रिश्तेदारों की तालियों से नहीं, दो लोगों की खामोश समझदारी से तय होती है।"
आँगन में शहनाई बज रही थी।
पोती ने दादी का हाथ पकड़ लिया।
उसे समझ आ गया था कि—
"शादी का पहला दिन सबको दिखाई देता है, लेकिन उसे निभाने के लिए जो हजारों दिन लगते हैं, वही रिश्ते की असली कहानी लिखते हैं।"
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