Saturday, 1 August 2026

जब मौत सस्ती हो गई (व्यंग्यात्मक कहानी)

 जब मौत सस्ती हो गई


उस दिन यमराज बड़े परेशान थे।


चित्रगुप्त ने पूछा, "महाराज, आज इतने चिंतित क्यों हैं?"


यमराज ने एक लंबी साँस ली और बोले, "पहले मुझे किसी की आयु पूरी होने का इंतज़ार करना पड़ता था। अब तो इंसान खुद ही मेरा काम छीनने लगा है।"


चित्रगुप्त ने आश्चर्य से पूछा, "कैसे?"


यमराज ने पृथ्वी की ओर इशारा किया।


"देखो... वहाँ एक पति, अपनी पत्नी का जीवन छीन रहा है। दूसरी ओर एक पत्नी, अपने पति की हत्या की योजना बना रही है। कहीं बेटा बूढ़े माँ-बाप पर हाथ उठा रहा है, तो कहीं पिता अपने ही बच्चे का भविष्य नहीं, जीवन खत्म कर रहा है। सड़क पर मामूली विवाद तलवार बन जाता है, और गुस्सा अब सीधे श्मशान का रास्ता पूछता है।"


चित्रगुप्त चुप हो गए।


कुछ देर बाद उन्होंने धीरे से कहा, "महाराज, क्या धरती पर इंसान कम हो गए हैं?"


यमराज बोले, "नहीं... इंसान तो उतने ही हैं, लेकिन इंसानियत कम हो गई है।"


उसी समय धरती से एक आवाज़ आई—


"ब्रेकिंग न्यूज़... एक और हत्या!"


न्यूज़ एंकर ने खबर पढ़ी। लोगों ने वीडियो देखा। कुछ ने दुख जताया, कुछ ने बहस की, कुछ ने आगे बढ़कर अगली खबर देख ली।


यमराज मुस्कुराए, लेकिन उस मुस्कान में गहरा दर्द था।


"चित्रगुप्त, अब मुझे मृत्यु से डर नहीं लगता। डर इस बात का है कि जिस समाज में हत्या एक खबर बन जाए और संवेदना कुछ मिनटों की मेहमान रह जाए, वहाँ जीवन की कीमत कौन समझाएगा?"


चित्रगुप्त ने अपनी पोथी बंद कर दी।


उन्होंने पहली बार लिखा—


"आज धरती पर मौत नहीं बढ़ी है... जीवन सस्ता हो गया है।"


और शायद यही हमारे समय का सबसे बड़ा व्यंग्य है।


हम सब्ज़ी खरीदते समय ताज़गी देखते हैं, कपड़े खरीदते समय गुणवत्ता देखते हैं, मोबाइल खरीदते समय गारंटी पूछते हैं...


लेकिन किसी इंसान की जान लेते समय न रिश्ता याद आता है, न कानून, न भगवान और न ही अपनी आत्मा।


कभी सोचिए...


अगर यही सभ्यता है, तो फिर जंगलों को बदनाम करने का हमें कोई अधिकार नहीं।

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