बरसात का लोकतंत्र
जब बादल कम और बहाने ज़्यादा बरसे...
रात भर बादल गरजते रहे।
सुबह अख़बार आया तो पहली खबर थी—
"शहर पानी-पानी!"
दूसरी खबर थी—
"प्रशासन पूरी तरह सतर्क।"
दोनों खबरें साथ पढ़कर रामस्वरूप हँस पड़ा।
बोला, "अगर प्रशासन सचमुच सतर्क होता तो शहर पानी-पानी नहीं होता, और अगर शहर पानी-पानी है तो सतर्कता प्रेस नोट में ही रही होगी।"
बात आई-गई हो गई।
लेकिन दो घंटे बाद उसकी गली सचमुच नदी बन चुकी थी।
बच्चे स्कूल नहीं जा पाए।
एम्बुलेंस आधे रास्ते में फँस गई।
दूध वाला नाव खोज रहा था और नगर निगम के अधिकारी फ़ाइल।
उधर जिला कार्यालय में आपात बैठक चल रही थी।
पहला अधिकारी बोला,
"स्थिति गंभीर है।"
दूसरा बोला,
"जी, मीडिया को पहले बता दें कि हम रात से मैदान में हैं।"
तीसरा बोला,
"सर... मैदान तो पानी में है।"
सबने उसे घूरकर देखा।
इतनी ईमानदारी सरकारी बैठक में अच्छी नहीं लगती।
इधर नेता जी का काफ़िला निकल पड़ा।
चार गाड़ियाँ...
आठ सुरक्षाकर्मी...
दस कैमरे...
और एक जोड़ी बिल्कुल नई रबर की चप्पल।
नेता जी घुटने तक पानी में उतरे।
कैमरामैन चिल्लाया—
"सर... थोड़ा उदास चेहरा बनाइए।"
चेहरा उदास हुआ।
दूसरे कैमरे ने कहा—
"सर... अब एक बच्चे को गोद में ले लीजिए।"
बच्चा आया।
फोटो हुई।
बच्चा वापस चला गया।
नेता जी ने चप्पल उतारी और गाड़ी में बैठते हुए बोले—
"जनता के दुख-दर्द में हमेशा साथ हूँ।"
पीछे खड़ा बच्चा अपनी माँ से पूछ रहा था—
"माँ... ये अंकल हमारे साथ कब थे?"
माँ ने कहा—
"बेटा... फोटो में।"
उधर सोशल मीडिया पर भी बाढ़ आ चुकी थी।
एक युवक कमर तक पानी में खड़ा होकर रील बना रहा था—
"हेलो दोस्तों...
देखिए मैं मौत के मुँह से लाइव हूँ।
वीडियो अच्छा लगे तो लाइक, शेयर और सब्सक्राइब ज़रूर करना।"
पाँच मिनट बाद वही युवक पानी से निकलकर कॉफी पीते हुए अगली रील बना रहा था—
"बारिश का मज़ा ही कुछ और है..."
दूसरी ओर एक बुज़ुर्ग अपनी दवाइयाँ बचाने के लिए पानी में घुटनों के बल रेंग रहे थे।
लेकिन उनकी कोई रील नहीं बनी।
क्योंकि दर्द कभी ट्रेंड नहीं करता...
ड्रामा करता है।
शाम तक प्रशासन ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर दी।
कहा—
"इतनी बारिश सौ साल में पहली बार हुई है।"
पास बैठा बूढ़ा शिक्षक मुस्कुराया।
बोला—
"बेटा...
बारिश तो हर साल नई होती है,
लेकिन बहाना हमेशा पुराना होता है।"
अगले दिन विपक्ष पहुँचा।
उन्होंने उसी सड़क पर प्रेस वार्ता की जहाँ कल सत्ता पक्ष खड़ा था।
बोले—
"यदि हम सत्ता में होते तो शहर वेनिस बन जाता।"
भीड़ में से आवाज़ आई—
"साहब...
शहर तो अभी भी वेनिस ही बना हुआ है।
बस फ़र्क इतना है कि वहाँ गोंडोला चलता है, यहाँ ट्रैक्टर।"
तालियाँ बज उठीं।
दोनों पक्ष मुस्कुराए।
क्योंकि जनता की हँसी भी चुनाव तक ही गिनी जाती है।
उधर ठेकेदार अपने बंगले की बालकनी से बारिश देख रहा था।
उसने चाय की चुस्की ली और इंजीनियर से कहा—
"सड़क फिर बह गई?"
इंजीनियर बोला—
"जी सर।"
ठेकेदार मुस्कुराया—
"बहुत बढ़िया।
अगले महीने फिर टेंडर आएगा।"
बारिश उसकी दुश्मन नहीं थी...
उसकी साझेदार थी।
रात को टीवी चैनलों पर बहस शुरू हो गई।
एक एंकर गरजा—
"देश जानना चाहता है कि पानी सड़क पर क्यों है?"
दूसरा गरजा—
"पहले यह बताइए कि विपक्ष कहाँ था?"
तीसरा गरजा—
"इसमें विदेशी साज़िश की भी जाँच होनी चाहिए।"
इतनी देर में शहर का एक बच्चा अपनी कॉपी में नाव बना रहा था।
उसने मासूमियत से पूछा—
"पापा...
क्या बारिश हमेशा सड़कें बहा देती है?"
पिता ने लंबी साँस ली और कहा—
"नहीं बेटा...
बारिश तो सिर्फ़ पानी लाती है।
सड़कें तो बेईमानी बहा देती है।"
बच्चे ने फिर पूछा—
"फिर हर साल यही क्यों होता है?"
पिता ने कहा—
"क्योंकि हर साल बादल बदलते हैं...
लेकिन नीयत नहीं।"
अगली सुबह सूरज निकल आया।
पानी उतर गया।
कीचड़ रह गया।
वादे रह गए।
फ़ोटो रह गए।
हैशटैग बदल गए।
और शहर अगले मानसून का इंतज़ार करने लगा।
क्योंकि यहाँ बरसात मौसम नहीं...
एक वार्षिक उत्सव है—
जहाँ जनता डूबती है...
राजनीति तैरती है...
प्रशासन प्रेस नोट लिखता है...
ठेकेदार अगला टेंडर गिनता है...
और सोशल मीडिया पूछता है—
"दोस्तों... आपको बारिश कैसी लगी? कमेंट करके ज़रूर बताइए!"
याद रखिए—
बरसात कभी शहर को नहीं डुबोती।
शहर तब डूबता है जब नालियों से पहले ज़मीर जाम हो जाए, जब जिम्मेदारी फ़ाइलों में बह जाए और जब जनता हर साल भीगने की आदत को ही अपनी किस्मत मान ले।
जिस दिन नागरिक सवाल पूछना सीख जाएगा और व्यवस्था जवाब देना, उस दिन बारिश केवल मौसम होगी—समाचार नहीं।
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