बरसात : जब बादल नहीं, चरित्र टपकने लगे
पहली बारिश की बूँद जैसे ही धरती पर गिरी, मिट्टी महक उठी। बच्चे कागज़ की नाव लेकर दौड़ पड़े। किसान ने आकाश की ओर हाथ जोड़ दिए। मोर ने पंख फैला दिए।
लेकिन शहर में एक अलग ही बरसात शुरू हो चुकी थी।
यह पानी की नहीं, अवसरों की बरसात थी।
नगर निगम की सड़कें पहली फुहार में ही ऐसे बह गईं, मानो डामर ने भी ठेकेदार से कह दिया हो—"भाई, जितना कमीशन मिला था, उतना ही टिक पाया।"
नेता जी छाता लेकर निकले। कैमरे पहले से तैयार थे। एक बच्चे को गोद में उठाया, दो मिनट कीचड़ में चले, तीसरे मिनट गाड़ी में बैठकर बोले—
"देखिए, जनता के बीच हूँ।"
उधर सोशल मीडिया पर भी बादल गरज रहे थे।
किसी ने दस साल पुरानी बाढ़ की तस्वीर डालकर लिखा—"आज हमारे शहर का हाल।"
दूसरे ने किसी विदेशी सड़क की फोटो लगाकर लिखा—"यह हमारे वार्ड की उपलब्धि है।"
तीसरे ने घर की खिड़की से चाय का कप पकड़कर लिखा—
"बारिश... अहा! कितना सुंदर मौसम!"
उसी पोस्ट के नीचे एक रिक्शेवाला भीगते हुए सवारी ढूँढ़ रहा था।
एक मजदूर की आधी दिहाड़ी बारिश बहा ले गई थी।
एक फुटपाथ पर रहने वाली माँ अपने बच्चों को प्लास्टिक से ढँक रही थी।
पर उनकी तस्वीरें ट्रेंड नहीं करतीं।
बारिश तेज हुई तो मोहल्ले के नाले ने लोकतंत्र की तरह अपना मुँह खोल दिया।
जिसने कभी सफाई नहीं देखी थी, वह अब पूरे अधिकार से सड़क पर बह रहा था।
लोग बोले—
"सरकार निकम्मी है।"
सरकार बोली—
"पिछली सरकार जिम्मेदार है।"
पिछली सरकार बोली—
"हमारे समय में इतनी बारिश कहाँ होती थी!"
और बादल ऊपर से हँस रहे थे।
इतने में चौराहे पर बैठे एक बूढ़े चायवाले ने मुस्कुराकर कहा—
"बेटा, बरसात तो हर साल आती है। फर्क इतना है कि पहले छत टपकती थी, अब नीयत टपकती है।"
सभी चुप हो गए।
वह फिर बोला—
"पहले लोग बरसात में पड़ोसी को घर बुला लेते थे।
अब मोबाइल निकालकर उसकी डूबती हुई वीडियो बना लेते हैं।
पहले छाता बाँटा जाता था।
अब सलाह बाँटी जाती है।
पहले नालियाँ साफ होती थीं।
अब सिर्फ भाषण साफ-सुथरे होते हैं।"
बारिश धीरे-धीरे थम गई।
सड़क पर कीचड़ रह गया।
दीवारों पर पोस्टर रह गए।
सोशल मीडिया पर रीलें रह गईं।
और लोगों के मन में वही पुराना सवाल रह गया—
"बरसात आखिर पानी की थी... या इंसानियत के बह जाने की?"
उस दिन समझ आया कि बादल कभी समाज को डुबोते नहीं।
समाज तब डूबता है जब ईमानदारी सूख जाती है, जिम्मेदारियाँ बह जाती हैं और संवेदनाएँ सीवर में उतर जाती हैं।
बरसात से डरना नहीं चाहिए...
डर उस दिन से होना चाहिए, जिस दिन पानी से पहले हमारा चरित्र बहने लगे।
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