ब्लॉगिंग की दुनिया का सच
गाँव में एक दिन खबर फैली कि शहर से एक बड़ा "ज्ञान व्यापारी" आया है।
वह चौपाल पर खड़ा होकर चिल्ला रहा था—
"ज्ञान चाहिए? सफलता चाहिए? करोड़ों पाठक चाहिए? बस मेरा ब्लॉग पढ़िए!"
लोग उमड़ पड़े।
किसी ने पूछा, "क्या आपने जीवन में बहुत कुछ सीखा है?"
वह बोला,
"सीखा नहीं... गूगल से इकट्ठा किया है।"
दूसरे ने पूछा,
"क्या ये सब आपके अनुभव हैं?"
वह हँसा,
"अनुभव लिखने में समय लगता है, कॉपी-पेस्ट करने में नहीं।"
भीड़ फिर भी ताली बजाती रही।
कुछ ही दिनों में उसने "सफलता के 21 मंत्र", "अमीर बनने के 51 तरीके", "एक मिनट में विद्वान बनें" और "पाँच मिनट में संत बनने की कला" जैसे सैकड़ों ब्लॉग लिख डाले।
हर लेख के नीचे एक ही वाक्य लिखा होता—
"अगर यह लेख पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।"
लेकिन कहीं यह नहीं लिखा था—
"अगर जीवन बदल गया हो तो किसी ज़रूरतमंद की मदद भी कर देना।"
धीरे-धीरे गाँव के लोग भी ब्लॉग लिखने लगे।
जिसने कभी किताब नहीं पढ़ी थी, वह "पढ़ने के लाभ" पर लेख लिख रहा था।
जो सुबह दस बजे तक बिस्तर से नहीं उठता था, वह "सुबह चार बजे उठने का रहस्य" बता रहा था।
जिसका अपना परिवार उससे बात नहीं करता था, वह "रिश्ते कैसे निभाएँ" पर विशेषज्ञ बन बैठा था।
और जिसने जीवन में एक पौधा तक नहीं लगाया था, वह "पर्यावरण बचाइए" पर दस हज़ार शब्द लिख चुका था।
एक दिन गाँव के बूढ़े पुस्तकालयाध्यक्ष ने सबको बुलाया।
उन्होंने एक पुरानी डायरी दिखाई।
उसमें केवल दस पन्ने लिखे थे।
लोग हँस पड़े—
"बस इतने ही?"
बूढ़े ने शांत स्वर में कहा—
"हाँ... क्योंकि इनमें जो लिखा है, वह पहले जीया गया है, फिर लिखा गया है।"
पूरा चौपाल शांत हो गया।
उन्होंने आगे कहा—
"बेटा, ब्लॉग लिखना बुरा नहीं है।
लेकिन जब शब्द अनुभव से बड़े हो जाएँ और शीर्षक सत्य से बड़े हो जाएँ, तब लेख नहीं, भ्रम पैदा होते हैं।
आज लोग पढ़ने से ज़्यादा क्लिक गिनते हैं।
ज्ञान से ज़्यादा कीवर्ड खोजते हैं।
सत्य से ज़्यादा ट्रेंड का पीछा करते हैं।
और सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि...
जिस लेख का शीर्षक होता है — 'मोबाइल की लत छोड़िए'... उसे पढ़ने के लिए भी मोबाइल ही उठाना पड़ता है!"
चौपाल में ठहाका गूँज उठा।
लेकिन वह हँसी कुछ ही क्षणों की थी।
क्योंकि हर किसी को लगा कि यह कहानी किसी और की नहीं...
उसी की थी।
संदेश
ब्लॉगिंग का उद्देश्य केवल ट्रैफिक, विज्ञापन और वायरल होना नहीं होना चाहिए।
शब्द तब तक ज्ञान नहीं बनते, जब तक उनके पीछे सत्य, अध्ययन, अनुभव और समाज के प्रति जिम्मेदारी न हो।
जो लेखक केवल खोज-इंजन के लिए लिखता है, उसे क्लिक मिल सकते हैं।
लेकिन जो मनुष्य के अंतर्मन के लिए लिखता है, उसे इतिहास याद रखता है।
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