मेरी माँ की आसमानी साड़ी
कहते हैं, किसी घर की सबसे कीमती चीज़ सोना-चाँदी नहीं होती, बल्कि वे यादें होती हैं जो वर्षों बाद भी साँस लेती रहती हैं।
मेरे घर में भी एक ऐसी ही धरोहर थी—मेरी माँ की आसमानी रंग की सूती साड़ी।
वह कोई बनारसी नहीं थी... न उस पर ज़री का काम था... न कोई महँगी कढ़ाई...
लेकिन उस साड़ी के हर धागे में मेरी माँ का जीवन बुना हुआ था।
बचपन से मैंने माँ को उसी साड़ी में सबसे अधिक देखा।
सुबह वह उसे धोतीं... आँगन की रस्सी पर सुखातीं... दोपहर की धूप उसे फिर पहनने लायक बना देती... और शाम तक वही साड़ी फिर माँ के शरीर पर होती।
तब मैं सोचती थी— "क्या माँ को नई साड़ियाँ पसंद नहीं?"
आज समझती हूँ...
उन्हें नई साड़ियाँ पसंद थीं, लेकिन उनसे कहीं ज़्यादा अपने बच्चों के सपने प्रिय थे।
उसी आसमानी साड़ी में माँ मुझे स्कूल छोड़ने जाती थीं।
उसी साड़ी में मेरी फीस भरती थीं।
उसी साड़ी में मेरी परीक्षा के बाहर घंटों इंतज़ार करती थीं।
उसी साड़ी में रिश्तेदारों की शादियों में जातीं, जहाँ लोग उनके कपड़ों को देखते थे और मैं उनकी मुस्कान को।
मुझे आज भी याद है...
किसी दुकान पर मेरी नज़र किसी फ्रॉक या सूट पर टिक जाती, तो माँ बिना एक पल सोचे कहतीं—
"इसे पैक कर दीजिए।"
दुकानदार जब पूछता— "बहन जी, आपके लिए भी कोई साड़ी दिखाऊँ?"
तो माँ मुस्कुरा देतीं—
"नहीं... मेरी वाली अभी बिल्कुल ठीक है।"
वह "अभी" कई वर्षों तक चलता रहा।
माँ अपनी इच्छाओं को हर बार धोकर, सुखाकर, तह लगाकर फिर पहन लेती थीं।
लेकिन हमारी इच्छाएँ कभी पुरानी नहीं होने देती थीं।
समय बदला।
हम पढ़े, आगे बढ़े, अपने पैरों पर खड़े हुए।
अब मेरी अलमारी से पहले माँ की अलमारी भरने लगी।
हर त्योहार पर मैं उनके लिए साड़ी लाती।
कभी रेशमी... कभी छपाई वाली... कभी उनकी पसंद का हल्का गुलाबी रंग... कभी गहरा हरा...
मुझे लगता था— अब माँ की अधूरी इच्छाएँ पूरी हो जाएँगी।
लेकिन माँ नई साड़ियाँ अलमारी में सहेजकर रख देतीं और रोज़ फिर वही आसमानी साड़ी पहन लेतीं।
मैंने एक दिन थोड़ा रूठकर पूछा—
"माँ, मेरी लाई हुई साड़ियाँ अच्छी नहीं लगतीं क्या?"
उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
"बेटी... साड़ी सिर्फ़ कपड़ा नहीं होती, उसमें उम्र के बरस, रिश्तों की खुशबू और बच्चों के बचपन की सिलवटें भी बस जाती हैं। यह आसमानी साड़ी अब मेरी आदत नहीं... मेरी ज़िंदगी है।"
उस दिन भी मैं पूरी तरह नहीं समझी।
फिर...
एक दिन माँ चली गईं।
इतनी चुपचाप कि घर की दीवारें भी कई दिनों तक उन्हें पुकारती रहीं।
जब उनकी अलमारी खोली, तो मेरी दी हुई साड़ियाँ लगभग नई थीं।
कई पर तो अब भी तह वैसी ही थी, जैसी दुकान से आई थीं।
और सबसे ऊपर रखी थी...
वही आसमानी साड़ी।
मैंने उसे अपने सीने से लगा लिया।
उसमें अब भी साबुन की हल्की-सी महक थी...
और माँ के आँचल की गर्माहट जैसे कहीं छिपी हुई थी।
आज माँ मेरे साथ नहीं हैं...
लेकिन बैठक की दीवार पर टँगी उसी आसमानी साड़ी में मुस्कुराती उनकी तस्वीर हर दिन मुझसे बात करती है।
जब भी मैं उसे देखती हूँ, लगता है जैसे माँ अभी कहेंगी—
"बेटी... अपना ध्यान रखना।"
उस तस्वीर के सामने खड़े-खड़े अक्सर सोचती हूँ...
कभी इस घर में एक ऐसी स्त्री रहती थी, जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी एक साड़ी को बार-बार धोकर पहन ली...
ताकि उसकी बेटी कभी अभावों को पहनने के लिए मजबूर न हो।
आज मेरी अलमारी में साड़ियों की कमी नहीं है।
लेकिन हर नई साड़ी को हाथ में लेते ही आँखें उस पुरानी आसमानी साड़ी को खोजने लगती हैं...
क्योंकि अब समझ आया है—
साड़ी की कीमत उसके कपड़े से नहीं, उसे पहनने वाली माँ के त्याग से तय होती है।
और जीवन का सबसे बड़ा दुःख यह नहीं कि माँ के पास कभी साड़ियाँ कम थीं...
सबसे बड़ा दुःख यह है कि जब मैं उन्हें दुनिया की सबसे सुंदर साड़ियाँ पहनाना चाहती थी, तब उन्हें पहनने के लिए मेरी माँ ही इस दुनिया में नहीं थीं।
दीवार पर टँगी उनकी वह आसमानी साड़ी वाली तस्वीर आज भी मुस्कुरा रही है...
शायद इसलिए कि माँ कभी जाती नहीं।
वे अपने बच्चों की स्मृतियों में, अपने आँचल की खुशबू में और अपनी पुरानी साड़ियों की तहों में हमेशा जीवित रहती हैं।
— डॉ. नीरू मोहन
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