मोमबत्ती और मशाल
नगर के बीचों-बीच एक चौराहा था। वहाँ दो वस्तुएँ रखी थीं—एक छोटी-सी मोमबत्ती और एक जलती हुई मशाल।
मोमबत्ती मुस्कुराकर बोली, "मैं अँधेरा दूर करने के लिए जलती हूँ।"
मशाल हँस पड़ी, "मैं भी उजाला करती हूँ, लेकिन जब कोई मुझे गुस्से में उठा लेता है, तो मैं रास्ता नहीं, घर जला देती हूँ।"
इतने में कुछ युवा वहाँ पहुँचे। उनके हाथों में नारे थे, आँखों में आक्रोश।
एक वृद्ध ने उनसे पूछा, "तुम्हारा उद्देश्य क्या है?"
उन्होंने कहा, "न्याय चाहिए।"
वृद्ध बोले, "न्याय माँगना गलत नहीं है। लेकिन यदि न्याय की राह में कानून टूटे, दूसरों की पढ़ाई रुके, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचे और समाज में वैमनस्य फैले, तो नुकसान किसका होगा? सरकार का... या पूरे देश का?"
युवाओं ने कोई उत्तर नहीं दिया।
वृद्ध ने आगे कहा, "सरकारें आती-जाती हैं, लेकिन राष्ट्र स्थायी होता है। यदि किसी निर्णय पर असहमति है, तो संविधान ने न्यायालय, संवाद और शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति के रास्ते दिए हैं। वही लोकतंत्र की शक्ति है।"
पास खड़ी मोमबत्ती बोली, "मैं कम जलती हूँ, पर उजाला करती हूँ।"
मशाल ने सिर झुका लिया, "और मैं जब क्रोध के हाथों में चली जाती हूँ, तो उजाले से अधिक धुआँ फैलाती हूँ।"
युवाओं ने अपने नारे नहीं छोड़े, लेकिन उनका तरीका बदल गया। उन्होंने तय किया कि वे अपनी बात तथ्यों, तर्कों और संवैधानिक तरीकों से रखेंगे।
उस दिन किसी की जीत या हार नहीं हुई। जीता तो केवल लोकतंत्र, जिसने सिखाया कि अधिकार और कर्तव्य साथ-साथ चलते हैं।
संदेश:
"लोकतंत्र में असहमति अपराध नहीं है, लेकिन कानून का सम्मान प्रत्येक नागरिक का धर्म है। आवाज़ बुलंद हो, पर विवेक उससे भी ऊँचा हो।"
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