कीचड़ का आईना
बारिश उस शहर पर नहीं, जैसे लोगों के चेहरों पर बरसी थी।
सुबह से लगातार पानी गिर रहा था। सड़कें चमक रही थीं और गलियाँ कीचड़ से भर गई थीं। लोग कपड़े बचाते हुए निकल रहे थे—किसी को अपनी सफेदी पर दाग पसंद नहीं था।
चौराहे के पास एक बूढ़ा आदमी रोज की तरह अपनी छोटी-सी लकड़ी की कुर्सी पर बैठा था।
लोग उसे कीचड़ वाला बाबा कहते थे।
वह न कीचड़ साफ करता था, न किसी को रास्ता बताता था। बस बैठकर लोगों को देखता था।
उस दिन एक साहब बहुत संभलकर सड़क पार कर रहे थे। सफेद कुर्ता, चमचमाते जूते और हाथ में महँगा छाता।
अचानक उनका पैर फिसला।
धड़ाम!
वे सीधे कीचड़ में जा गिरे।
भीड़ हँस पड़ी।
साहब गुस्से में उठे और चिल्लाए—
“यह सड़क किसने बनाई है? इस शहर का कोई जिम्मेदार आदमी है या नहीं?”
बूढ़ा मुस्कुराया।
साहब ने उसे घूरकर पूछा—
“तुम हँस क्यों रहे हो?”
बूढ़े ने कहा,
“मैं आपके गिरने पर नहीं हँस रहा साहब… मैं तो यह देखकर हैरान हूँ कि कीचड़ आपके कपड़ों पर लगा है और शर्म आपको आ रही है।”
साहब कुछ समझे नहीं।
बूढ़ा आगे बोला—
“कीचड़ तो बेचारा मिट्टी और पानी का मेल है। असली कीचड़ तो हम अपने भीतर बनाते हैं।”
भीड़ चुप हो गई।
तभी एक बच्चा आया। उसने कीचड़ में पड़ा साहब का मोबाइल उठाया और उनकी ओर बढ़ा दिया।
साहब ने मोबाइल लिया और बिना धन्यवाद कहे आगे बढ़ गए।
बूढ़ा बच्चे को देखता रहा।
बच्चे ने पूछा—
“बाबा, आपने उन्हें कुछ कहा क्यों नहीं?”
बूढ़ा बोला—
“जिसे अपने कपड़ों का दाग दिखाई देता है, उसे अपने व्यवहार का दाग दिखाई देने में थोड़ा समय लगता है।”
अगले दिन बारिश रुक गई।
सड़क का कीचड़ सूखने लगा।
लेकिन उसी चौराहे पर एक नया दृश्य था।
वही साहब लौटे थे।
इस बार उनके हाथ में झाड़ू थी।
उन्होंने सड़क किनारे जमा कीचड़ हटाना शुरू किया।
लोग आश्चर्य से देखने लगे।
बूढ़ा अपनी कुर्सी पर बैठा मुस्कुरा रहा था।
साहब उसके पास आए और बोले—
“बाबा, कल समझ आया… कीचड़ सड़क पर कम था, मेरे भीतर ज्यादा।”
बूढ़े ने सिर उठाया।
“अब समझ आएगा कि सफाई सिर्फ सड़क की नहीं होती।”
साहब ने पूछा—
“और मन की सफाई कैसे होती है?”
बूढ़े ने सामने बहते नाले की ओर इशारा किया—
“जब आदमी अपने भीतर जमा गंदगी को पहचान ले, उसी दिन से सफाई शुरू हो जाती है।”
कुछ देर दोनों चुप रहे।
तभी वही बच्चा दौड़ता हुआ आया।
उसने कीचड़ में पड़े एक छोटे से पौधे को उठाया और सड़क के किनारे लगा दिया।
बूढ़े ने उसे देखा और कहा—
“देखो साहब… कीचड़ में भी कुछ उग सकता है।”
साहब ने पूछा—
“क्या?”
बूढ़ा मुस्कुराया—
“अगर कोई उसे सिर्फ गंदगी समझकर छोड़ न दे, तो उम्मीद।”
उस दिन पहली बार चौराहे पर लोगों ने कीचड़ से बचकर चलना बंद किया।
वे उसे देखने लगे।
क्योंकि उन्हें समझ आ गया था—
कीचड़ हमेशा रास्ते में नहीं होता…
कभी-कभी वह आईना बनकर सामने पड़ा होता है।
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