प्रदर्शन या संवाद?
शहर के चौक पर सैकड़ों विद्यार्थी इकट्ठा थे। हाथों में तख्तियाँ थीं, गुस्सा था और नारे भी।
उसी रास्ते से एक वृद्ध शिक्षक गुज़रे। उन्होंने किसी को नहीं टोका। बस पास खड़े एक छात्र से पूछा, "बेटा, क्या तुम जानते हो कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत क्या होती है?"
छात्र बोला, "प्रदर्शन।"
शिक्षक मुस्कुराए, "नहीं, लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है—विवेकपूर्ण संवाद।"
सभी छात्र उनकी ओर देखने लगे।
शिक्षक बोले, "सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है। उससे सवाल पूछना नागरिक का अधिकार है, लेकिन कानून का सम्मान करना भी उतना ही बड़ा कर्तव्य है। यदि विरोध हिंसा, अफवाह, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान या दूसरों की पढ़ाई और जीवन में बाधा बन जाए, तो उसका उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है।"
उन्होंने आगे कहा, "हर सरकार से गलती भी हो सकती है और अच्छे निर्णय भी। इसलिए न अंधा समर्थन सही है और न अंधा विरोध। सही रास्ता है—तथ्यों के आधार पर अपनी बात रखना, न्यायिक और संवैधानिक प्रक्रियाओं का सम्मान करना और समाज में शांति बनाए रखना।"
विद्यार्थियों में सन्नाटा छा गया।
एक छात्र आगे आया और बोला, "सर, हमने अपनी आवाज़ उठाने का अधिकार तो समझा, लेकिन अपनी ज़िम्मेदारी भूल गए थे।"
शिक्षक ने उत्तर दिया, "याद रखो, राष्ट्र केवल सरकार से नहीं बनता, बल्कि उन नागरिकों से बनता है जो मतभेद होने पर भी संविधान, कानून और एक-दूसरे के सम्मान को नहीं छोड़ते।"
उस दिन कई तख्तियाँ नीचे झुक गईं, लेकिन कई सिर ऊँचे हो गए—क्योंकि उन्होंने विरोध से पहले विवेक और संवाद का महत्व समझ लिया।
संदेश:
लोकतंत्र में अपनी बात रखना अधिकार है, परंतु कानून, शांति और संविधान का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। मतभेद हों तो समाधान संवाद और संवैधानिक तरीकों से खोजे जाने चाहिए, न कि अव्यवस्था से।
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