डॉ. नीरू मोहन : साहित्य, संवेदना और सामाजिक सरोकारों की सशक्त हस्ताक्षर
डॉ. नीरू मोहन हिंदी साहित्य की उन रचनाकारों में हैं, जिनके लिए लेखन केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज, संवेदना और जीवन-सत्य को शब्द देने का माध्यम है। पिछले दो दशकों से निरंतर साहित्य-सृजन में सक्रिय डॉ. नीरू मोहन ने लेखन की अनेक विधाओं में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। उनकी रचनाओं में जीवन के विविध रंग, स्त्री-मन की पीड़ा और शक्ति, सामाजिक विसंगतियाँ, मानवीय रिश्तों की ऊष्मा तथा बदलते समय की सच्चाइयाँ सहजता और प्रभावशीलता के साथ अभिव्यक्त होती हैं।
राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर, हिंदी साहित्य में एम.फिल., शोधकार्य तथा अटल बिहारी वाजपेयी : ‘जीवन-सृजन एवं मूल्यांकन’ विषय में पीएच.डी. की शैक्षिक पृष्ठभूमि ने उनके साहित्यिक चिंतन को व्यापक दृष्टि प्रदान की है। वे भाषा, शिक्षा, साहित्य और समाज को एक-दूसरे से जुड़ी हुई शक्तियों के रूप में देखती हैं। यही कारण है कि उनका लेखन केवल साहित्यिक सौंदर्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पाठक को सोचने, प्रश्न करने और आत्ममंथन करने के लिए प्रेरित करता है।
डॉ. नीरू मोहन की साहित्यिक यात्रा अत्यंत समृद्ध और बहुआयामी है। उन्होंने लेख, आलेख, लघुकथा, संस्मरण, व्यंग्य, कविता, दोहा, ग़ज़ल, कहानी, बाल-कविता, बाल-कहानी, नाटक, नुक्कड़ नाटक, समीक्षा, निबंध और शोधपरक लेखन सहित अनेक विधाओं में सृजन किया है। उनकी प्रकाशित कृतियों में ‘नव प्रवर्तन’, ‘बूंद–बंद सागर’, जापानी काव्य शैली हाइकु से संबंधित कृति तथा सत्य घटनाओं पर आधारित ‘क्षितिज… एक अंतहीन सफर’ जैसे महत्वपूर्ण कार्य उल्लेखनीय हैं। उनकी रचनात्मक पहुँच हिंदी से आगे बढ़कर अंग्रेजी रूपांतरण और डिजिटल माध्यमों तक भी दिखाई देती है।
विशेष रूप से उनकी रचनाओं में नारी जीवन और उसके संघर्षों की गहरी समझ दिखाई देती है। वे स्त्री को केवल करुणा की पात्र के रूप में नहीं, बल्कि संघर्ष करने वाली, निर्णय लेने वाली और अपने अस्तित्व की पहचान बनाने वाली सशक्त व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्य में समाज की विडंबनाओं पर तीखा व्यंग्य भी है और मानवीय संवेदनाओं को छू लेने वाली आत्मीयता भी।
उनकी साहित्यिक एवं सामाजिक सक्रियता को अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों और मंचों ने सम्मानित किया है। उन्हें साहित्य संगम संस्थान का ‘भाषा भूषण सम्मान’, साहित्य संगम संस्थान का ‘वीणापाणि सम्मान’, काव्य रंगोली मातृभाषा गौरव सम्मान, सुपर एचीवर्स अवॉर्ड 2018, नारी शक्ति गौरव अवॉर्ड 2018, वुमन सेलिब्रिटीज 2018, विलक्षण समाज सारथी सम्मान 2018 तथा मिशन संस्थान द्वारा नारी गौरव सम्मान 2018 सहित अनेक सम्मान प्राप्त हुए हैं। विभिन्न साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा उन्हें निर्णायक, मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथि के रूप में भी आमंत्रित किया जाता रहा है।
डॉ. नीरू मोहन साहित्य के साथ-साथ भाषायी, शैक्षिक और सामाजिक गतिविधियों से भी सक्रिय रूप से जुड़ी हैं। वे ‘भाषायी साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थान’ से संबद्ध हैं तथा विभिन्न साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थाओं में महत्वपूर्ण दायित्व निभा रही हैं। उनकी सक्रियता यह प्रमाणित करती है कि उनके लिए साहित्य केवल पुस्तक के पन्नों तक सीमित नहीं, बल्कि समाज के बीच जाकर परिवर्तन की चेतना जगाने का माध्यम है।
उनकी रचनात्मक पहचान का सबसे सुंदर पक्ष यह है कि वे गंभीर विषयों को भी सरल, सहज, संवेदनशील और प्रभावशाली भाषा में पाठकों तक पहुँचाती हैं। उनके लेखन में कहीं माँ की ममता है, कहीं स्त्री का स्वाभिमान, कहीं रिश्तों की टूटन का दर्द, कहीं सामाजिक व्यवस्था पर व्यंग्य और कहीं जीवन को नए अर्थों में देखने की प्रेरणा।
डॉ. नीरू मोहन केवल लेखिका नहीं, बल्कि शब्दों के माध्यम से समाज की धड़कनों को सुनने वाली संवेदनशील रचनाकार हैं। उनका साहित्य जीवन के उन अनकहे पक्षों को आवाज देता है, जिन्हें अक्सर समाज सुनकर भी अनसुना कर देता है। उनकी लेखनी में संवेदना है, प्रश्न हैं, प्रतिरोध है, व्यंग्य है और सबसे बढ़कर—मनुष्य और मनुष्यता में विश्वास है।
इसी बहुआयामी रचनात्मकता, सामाजिक प्रतिबद्धता और साहित्य के प्रति निरंतर समर्पण ने डॉ. नीरू मोहन को हिंदी साहित्य जगत में एक विशिष्ट और सशक्त पहचान प्रदान की है।
उपन्यास ‘निरुपमा’
सच्ची घटनाओं और वास्तविक पात्रों पर आधारित एक संवेदनशील सामाजिक उपन्यास
साहित्य केवल कल्पना का संसार नहीं होता। कई बार साहित्य जीवन की उन सच्चाइयों को शब्द देता है, जिन्हें मनुष्य अपने भीतर दबाकर जीता रहता है। कुछ कहानियाँ लिखी नहीं जातीं, बल्कि जीवन स्वयं उन्हें रचता है। ‘निरुपमा’ ऐसी ही एक कथा है।
‘निरुपमा’ — केवल एक कहानी नहीं, जीवन का आईना
‘निरुपमा’ नारी के जीवन, उसके संघर्ष, उसकी पीड़ा, उसके आत्मसम्मान और उसके अस्तित्व की लड़ाई का सजीव चित्रण प्रस्तुत करता है।
यह उपन्यास केवल एक स्त्री की कहानी नहीं है। इसके भीतर आज का समाज दिखाई देता है—वह समाज जहाँ रिश्तों की परिभाषाएँ बदल रही हैं, जहाँ अपने और पराए के बीच की रेखा धुंधली हो रही है और जहाँ कभी-कभी सबसे गहरे घाव उन्हीं लोगों से मिलते हैं, जिन्हें हम अपना समझते हैं।
इस उपन्यास में समाज की संकीर्ण सोच, माता-पिता का बदलता व्यवहार, भाई-बहन के रिश्तों की सच्चाई, नारी का नारी के प्रति द्वेष, सास-बहू के बीच की खाई, अपने ही खून के रिश्तों से मिलने वाला धोखा, लालच, स्वार्थ और दुष्टता की पराकाष्ठा जैसे अनेक सामाजिक यथार्थ सामने आते हैं।
इन घटनाओं को पढ़ते हुए पाठक केवल कहानी का हिस्सा नहीं बनता, बल्कि स्वयं से प्रश्न करने लगता है—क्या रिश्ते वास्तव में उतने ही सच्चे हैं, जितने दिखाई देते हैं?
वास्तविक पात्रों की वास्तविक कहानी
‘निरुपमा’ की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसके पात्र काल्पनिक नहीं हैं। वे वास्तविक जीवन से जुड़े वास्तविक पात्र हैं।
यह उपन्यास किसी कल्पित संसार की रचना मात्र नहीं है। इसके पात्रों के जीवन, उनके व्यवहार, उनके संबंध और उनसे जुड़ी घटनाएँ वास्तविक जीवन की अनुभूतियों और सच्ची घटनाओं पर आधारित हैं।
इसीलिए इस उपन्यास के पात्र पाठक को असाधारण रूप से जीवंत लगते हैं। वे किसी कल्पना की दुनिया में दूर खड़े चरित्र नहीं हैं, बल्कि ऐसे लोग हैं जिन्हें पाठक अपने आसपास महसूस कर सकता है।
कभी कोई पात्र अपने घर का लगता है, कभी कोई अपना रिश्तेदार दिखाई देता है और कभी किसी घटना में पाठक को अपनी ही जिंदगी की कोई भूली हुई पीड़ा दिखाई देने लगती है।
मुख्य पुरुष पात्र — कैंसर से संघर्ष करता एक जीवन
‘निरुपमा’ की कथा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील पक्ष है इसका मुख्य पुरुष पात्र, जो कैंसर से पीड़ित है।
कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से संघर्ष करते हुए उसका जीवन केवल बीमारी की कहानी नहीं रह जाता। उसके शरीर के साथ-साथ उसका मन, उसका परिवार और उसके रिश्ते भी परीक्षा से गुजरते हैं।
बीमारी के समय मनुष्य को केवल दवाओं और उपचार की आवश्यकता नहीं होती, उसे अपनेपन, विश्वास और भावनात्मक सहारे की भी आवश्यकता होती है। लेकिन जब जीवन की सबसे कठिन घड़ी में अपने ही रिश्ते सवालों के घेरे में खड़े हो जाएँ, तब संघर्ष और भी गहरा हो जाता है।
उपन्यास में कैंसर पीड़ित इस मुख्य पुरुष पात्र के माध्यम से बीमारी, जीवन-संघर्ष, पारिवारिक संबंधों, संवेदना, स्वार्थ और मनुष्य के वास्तविक चेहरे को सामने लाने का प्रयास किया गया है।
यह पात्र पाठक को यह सोचने के लिए विवश करता है कि बीमारी केवल शरीर की परीक्षा नहीं होती—कई बार वह रिश्तों की भी परीक्षा बन जाती है।
निरुपमा — एक स्त्री की नहीं, अनेक स्त्रियों की कहानी
निरुपमा का जीवन उसके अपने संघर्षों से गुजरता है। उसे जिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, वे केवल उसकी व्यक्तिगत पीड़ा नहीं रह जातीं।
उसके जीवन में आने वाले रिश्ते, उनसे मिलने वाला अपनापन और फिर उन्हीं रिश्तों में छिपा स्वार्थ—यह सब उस व्यापक सामाजिक यथार्थ को सामने लाता है जिसे अनेक स्त्रियाँ अपने जीवन में महसूस करती हैं।
निरुपमा के माध्यम से उस स्त्री की आवाज़ सामने आती है जो रिश्ते बचाते-बचाते स्वयं टूट जाती है, जो अपनों के लिए त्याग करती है और बदले में कभी-कभी उपेक्षा, अपमान अथवा विश्वासघात पाती है।
सबसे बड़ी विडंबना तब सामने आती है जब एक स्त्री दूसरी स्त्री की पीड़ा को समझने के बजाय उसकी राह में स्वयं बाधा बन जाती है।
नारी के प्रति नारी का द्वेष, सास-बहू के बीच बनी दूरी और स्त्री के जीवन में स्त्री द्वारा ही खड़ी की गई दीवारें इस उपन्यास को केवल पारिवारिक कथा न रहने देकर सामाजिक विमर्श का रूप देती हैं।
रिश्तों की असली परीक्षा
‘निरुपमा’ रिश्तों की चमकदार सतह के नीचे छिपी सच्चाई को सामने लाता है।
माता-पिता और संतान का रिश्ता हो, भाई-बहन का संबंध हो, पति-पत्नी का साथ हो अथवा सास-बहू का संबंध—हर रिश्ता किसी न किसी मोड़ पर परीक्षा से गुजरता है।
कई बार रक्त का रिश्ता भी स्वार्थ के सामने कमजोर पड़ जाता है और कभी कोई गैर व्यक्ति अपनेपन का ऐसा उदाहरण दे जाता है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।
उपन्यास में अपने ही खून के रिश्तों से मिले धोखे का चित्रण पाठक को भीतर तक झकझोरता है। लालच जब रिश्तों पर हावी हो जाता है तो अपनापन पीछे छूट जाता है और मनुष्य अपने ही प्रियजनों के प्रति संवेदनहीन हो जाता है।
‘निरुपमा’ इसी कटु सत्य को बिना किसी बनावटी आवरण के पाठक के सामने रखता है।
पाठक को अपनी आपबीती क्यों दिखाई दे सकती है?
इस उपन्यास की सबसे बड़ी शक्ति इसकी जीवन से निकटता है।
इसे पढ़ते हुए पाठक को बार-बार यह महसूस हो सकता है कि यह केवल निरुपमा की कहानी नहीं है।
कहीं उसे अपना बचपन दिखाई देगा, कहीं अपने माता-पिता; कहीं भाई-बहन का रिश्ता, कहीं सास-बहू का संबंध; कहीं किसी अपने का दिया हुआ धोखा और कहीं वह दर्द जिसे उसने वर्षों से अपने भीतर छिपाकर रखा है।
यही वह बिंदु है जहाँ ‘निरुपमा’ एक व्यक्तिगत कथा से आगे बढ़कर सामूहिक अनुभव की कथा बन जाती है।
निरुपमा की पीड़ा में अनेक स्त्रियों की पीड़ा दिखाई देती है और मुख्य पुरुष पात्र के संघर्ष में उन परिवारों का दर्द दिखाई देता है जो गंभीर बीमारी और बदलते रिश्तों के बीच जीवन जीने के लिए संघर्ष करते हैं।
सच्ची घटना पर आधारित उपन्यास
‘निरुपमा’ की कथा का आधार सच्ची घटना है। इसके पात्र वास्तविक हैं और उनके जीवन से जुड़े अनुभव इस उपन्यास की संवेदना का आधार बने हैं।
इसलिए इसकी घटनाओं में कल्पना की चमक से अधिक जीवन की सच्चाई दिखाई देती है।
यह वही सच्चाई है जो कभी सुंदर नहीं होती, कभी कड़वी होती है, कभी मन को तोड़ती है और कभी मनुष्य को भीतर से मजबूत बना देती है।
उपन्यास के पात्र आज भी जीवंत हैं। यही कारण है कि कथा समाप्त होने के बाद भी वे पाठक के मन में बने रहते हैं।
समाज के सामने कुछ प्रश्न
‘निरुपमा’ केवल घटनाएँ नहीं सुनाता, बल्कि समाज से कुछ प्रश्न भी करता है—
क्या हर रक्त-संबंध वास्तव में अपना होता है?
क्या माता-पिता का प्रेम परिस्थितियों और स्वार्थ के साथ बदल सकता है?
क्या भाई-बहन का रिश्ता संपत्ति और लालच के आगे कमजोर पड़ सकता है?
क्यों एक स्त्री दूसरी स्त्री की पीड़ा को समझने के बजाय कभी-कभी उसकी सबसे बड़ी विरोधी बन जाती है?
बीमारी की घड़ी में रिश्तों का वास्तविक चेहरा क्यों सामने आता है?
और सबसे बड़ा प्रश्न—क्या मनुष्य कठिन परिस्थितियों में भी अपने आत्मसम्मान और मानवीय मूल्यों को बचाकर जी सकता है?
इन प्रश्नों के उत्तर उपन्यास पाठक पर थोपता नहीं। बल्कि कथा के माध्यम से उसे स्वयं उत्तर खोजने के लिए प्रेरित करता है।
लेखिका — डॉ. नीरू मोहन
डॉ. नीरू मोहन साहित्य को केवल शब्दों का संसार नहीं, बल्कि जीवन और समाज को समझने का माध्यम मानती हैं।
उनकी लेखनी में मानवीय संवेदना, सामाजिक यथार्थ, रिश्तों की जटिलता, नारी जीवन के संघर्ष और जीवन के अनदेखे पक्षों को अभिव्यक्ति देने की विशेष प्रवृत्ति दिखाई देती है।
वे उन विषयों को अपनी रचनात्मक दृष्टि का केंद्र बनाती हैं जिन पर समाज अक्सर बात करने से बचता है।
उनकी लेखनी का उद्देश्य केवल पाठक का मनोरंजन करना नहीं, बल्कि उसे सोचने, महसूस करने और अपने आसपास के संबंधों को नए दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित करना है।
उनके लिए साहित्य वह है जो पाठक के मन में उतर जाए और पुस्तक बंद करने के बाद भी उसके भीतर प्रश्न जीवित रखे।
‘निरुपमा’ इसी साहित्यिक दृष्टि की परिणति है।
यह कृति वास्तविक जीवन के अनुभवों, वास्तविक पात्रों और सच्ची घटनाओं के माध्यम से नारी जीवन, पारिवारिक संबंधों, बीमारी, संघर्ष और मानवीय संवेदनाओं को सामने लाती है।
‘निरुपमा’ मेरे लिए केवल एक उपन्यास नहीं है। यह उन जीवन-संघर्षों की अभिव्यक्ति है जिन्हें मैंने महसूस किया, देखा और शब्दों में ढालने का प्रयास किया।
यह उन स्त्रियों की आवाज़ है जो अपने ही रिश्तों के बीच अकेली पड़ जाती हैं।
यह उन लोगों की पीड़ा है जो गंभीर बीमारी से लड़ते हुए अपने आसपास के रिश्तों की वास्तविकता से भी सामना करते हैं।
यह उन रिश्तों का आईना है जिन पर हम आँख मूँदकर विश्वास करते हैं।
और यह उस जीवन की कहानी है जो बाहर से सामान्य दिखाई देता है, लेकिन भीतर अनेक संघर्षों को समेटे होता है।
मेरा विश्वास है कि किसी रचना का सबसे बड़ा सम्मान तब होता है जब वह पाठक के हृदय को स्पर्श करे, उसे अपनी जिंदगी का कोई पन्ना दिखाई दे और उसे समाज के बारे में सोचने के लिए विवश करे।
‘निरुपमा’ इसी विश्वास की साहित्यिक अभिव्यक्ति है।
डॉ. नीरू मोहन
परिचय
1. नाम
डॉ. नीरू मोहन
2. जन्म
जन्म तिथि: 1 अगस्त 1973
3. शैक्षणिक योग्यता
स्नातक: राजनीति विज्ञान — दौलतराम कॉलेज
स्नातकोत्तर: हिंदी एवं राजनीति विज्ञान
बी.एड.: हिंदी एवं सामाजिक विज्ञान
एम.फिल.: हिंदी साहित्य — शोधकार्य ‘आदिकाल और रीतिकाल’
पी-एच.डी.: हिंदी — अटल बिहारी वाजपेयी : ‘जीवन-सृजन एवं मूल्यांकन’
अन्य योग्यता: एन.टी.टी., पी.टी.टी. तथा एडवांस टेक्निकल कोर्स इन ड्रेस डिजाइनिंग एंड ट्रेड
4. कार्यक्षेत्र
भाषाविद्
शिक्षिका
प्रेरक वक्ता
साहित्य लेखन
बाल विकास
नारी उत्थान
हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार एवं उत्थान के लिए समर्पित
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5. साहित्यिक सक्रियता
पिछले 20 वर्षों से हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं में निरंतर लेखन।
लेख एवं आलेख
लघुकथा
संस्मरण
छंदयुक्त एवं छंदमुक्त कविता
दोहा
सायली छंद
उद्धरण/अवतरण
सुविचार
कुंडलियाँ
नाटक एवं नुक्कड़ नाटक
भाषण
कहानी
बाल-कविता एवं बाल-कहानियाँ
साहित्यिक समीक्षा
निबंध
शोधकार्य
उपन्यास
जापानी काव्य शैलियाँ—हाइकु, चोका, तांका, रेंगा आदि
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6. प्रमुख मौलिक पुस्तकें
① पद्मंजलि
नारी के मनोभावों का सजीव चित्रण प्रस्तुत करने वाली कृति।
इसमें स्त्री-मन, उसकी संवेदनाओं और जीवन-संघर्षों को साहित्यिक अभिव्यक्ति दी गई है।
② ‘नव प्रवर्तन’
बाल-काव्य संग्रह।
बालमन, बाल-संवेदना और रचनात्मक चेतना से जुड़ी कविताओं का संग्रह।
③ ‘बूँद-बूँद सागर’
हाइकु मुक्तक/काव्य संग्रह।
जापानी काव्य शैली हाइकु को केंद्र में रखते हुए रचित कृति।
अगस्त 2018 में हुए इंडो नेपाल अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में इस पुस्तक का विमोचन हुआ।
④ ‘क्षितिज… एक अंतहीन सफर’
सत्य घटनाओं पर आधारित 25 कहानियों का संग्रह।
जीवन के यथार्थ और मानवीय संवेदनाओं को केंद्र में रखती हुई कृति।
इसका ई-बुक संस्करण अमेज़न एवं किंडल पर उपलब्ध है।
इसका अंग्रेजी रूपांतरण ‘HORIZON… An endless journey’ के रूप में प्रकाशित है।
अंग्रेजी संस्करण का ई-बुक एवं पेपरबैक संस्करण भी उपलब्ध है।
⑤ ‘व्याकरण रस’
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए उपयोगी पुस्तक।
इसमें 150 महत्वपूर्ण प्रश्नों का संग्रह है।
अमेज़न एवं किंडल पर उपलब्ध।
⑥ ‘मीठी-मीठी किलकारियाँ’
बाल-काव्य संग्रह।
बच्चों की सहज दुनिया, कल्पना और संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने वाली रचनाएँ।
* अटलगाथा (हंस प्रकाशन अमेजॉन पर उपलब्ध)
* निरुपमा : संघर्षों के सैलाब पर स्त्री जीवन (उपन्यास, my book publication Amazon)
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7. काव्य एवं अन्य साहित्यिक योगदान
जापानी काव्य शैलियों में निरंतर सृजन।
हाइकु, चोका, तांका और रेंगा जैसी विधाओं में लेखन।
देश-विदेश के विभिन्न साहित्यिक मंचों पर रचनाओं की प्रस्तुति।
साहित्य के साथ-साथ भाषा, बाल-साहित्य और नारी विमर्श को विशेष महत्व।
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8. प्रमुख साहित्यिक सम्मान
डॉ. नीरू मोहन को साहित्य एवं सामाजिक सरोकारों के लिए अनेक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए हैं—
भाव भूषण सम्मान — साहित्य संगम संस्थान
वीणापाणि सम्मान — साहित्य संगम संस्थान
काव्य रंगोली मातृभाषा गौरव सम्मान
सुपर एचीवर्स अवॉर्ड — 2018
नारी शक्ति गौरव अवॉर्ड — 2018
क्राउन ऑफ सक्सेस वूमेन सेलिब्रिटीज — 2018
विलक्षण समाज सारथी सम्मान — 2018
मंथन संस्थान द्वारा नारी गौरव सम्मान — 2018
भारत उत्थान न्यास, कानपुर एवं महिला स्नातकोत्तर विश्वविद्यालय, गाज़ीपुर द्वारा अतिथि वक्ता के रूप में आमंत्रित
वूमेन पॉवर सोसायटी द्वारा विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित एवं सम्मानित
वूमेन फाउंडेशन एवं भागीदारी जन समिति की ओर से नारी गौरव सम्मान एवं स्वर्ण पदक से सम्मानित
अनेक संस्थाओं द्वारा उत्कृष्ट साहित्य लेखन एवं सामाजिक समर्पण के लिए सम्मानित
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9. साहित्यिक एवं सामाजिक भूमिका
विभिन्न विद्यालयों, सांस्कृतिक, सामाजिक एवं साहित्यिक संस्थाओं द्वारा निर्णायक के रूप में आमंत्रित।
अनेक कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में सहभागिता।
साहित्य और समाज के बीच सेतु का कार्य।
हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार एवं संवर्धन के लिए निरंतर सक्रिय।
नारी सशक्तीकरण और बाल विकास के क्षेत्र में विशेष रुचि।
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10. डॉ. नीरू मोहन की साहित्यिक पहचान
डॉ. नीरू मोहन की पहचान केवल एक लेखिका के रूप में नहीं, बल्कि एक शिक्षिका, साहित्यकार, शोधकर्ता, कवयित्री, कथाकार, समीक्षक और संवेदनशील सामाजिक चिंतक के रूप में है।
उनकी लेखनी की विशेषता है—
सरल भाषा में गहरी बात कहना
नारी मन की संवेदनाओं को स्वर देना
सामाजिक विसंगतियों पर प्रश्न उठाना
बालमन को समझना
जीवन के यथार्थ को साहित्य में उतारना
परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन स्थापित करना
साहित्य को समाजोपयोगी बनाना
एक पंक्ति में परिचय
> “डॉ. नीरू मोहन वह साहित्यिक व्यक्तित्व हैं, जिनकी लेखनी में संवेदना की गहराई, विचारों की प्रखरता, नारी मन की पीड़ा, बालमन की सरलता और समाज के यथार्थ की स्पष्ट अभिव्यक्ति एक साथ दिखाई देती है।”
डॉ. नीरू मोहन — साहित्य की संवेदनशील लेखनी, शिक्षा की सजग दृष्टि और समाज के प्रति समर्पित व्यक्तित्व।
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