हिंदी केवल शब्द नहीं, संस्कारों की धरोहर है,
जन–जन की यह प्राणवाणी, भावों की यह सेहर है।
वेदों की ऋचा से निकली, लोकगीत में ढली हुई,
विश्वमंच पर आज खड़ी, गौरव–दीप जली हुई॥
करुणा इसकी धड़कन में, प्रेम इसकी पहचान है,
संघर्षों में भी मुस्काना, हिंदी की मुस्कान है।
ज्ञान–विज्ञान, नीति–नवाचार, सबमें इसकी छाया,
अंतरिक्ष से ग्राम पथ तक, हिंदी ने ध्वज फहराया॥
अनुप्रास की मधुर लय में, उपमा–रूपक सजे हुए,
मानवता के मंत्र यहाँ, अक्षर–अक्षर रचे हुए।
जहाँ सत्य की राह कठिन हो, बनकर दीप जले हिंदी,
विश्वसनीयता का वचन बन, हर दिल में पले हिंदी॥
संयुक्त राष्ट्र के मंचों पर, गूंजे इसका स्वर गंभीर,
सभ्यता की यह साक्षी है, संस्कृति का अमृत–नीर।
भाषा नहीं, यह सेतु है, जो देशों को जोड़ सके,
विचारों की यह विश्व–धरोहर, दूरी को भी तोड़ सके॥
आज विश्व हिंदी दिवस पर, प्रण यह हम सब लें,
हिंदी को ज्ञान की भाषा, भविष्य की भाषा करें।
शब्द नहीं, यह शपथ बने, मानवता का संदेश,
हिंदी बोले—विश्व सुने, यही हमारा परिवेश॥
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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